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प्रकाशित साहित्य

एकता प्रकाशन

गाँधी नगर

चूरू-३३१००१ राजस्थान (भारत)


एकता प्रकाशन द्वारा राजस्थानी व हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकें :-




पुस्तक का नाम :- हमारे साहित्‍य निर्माता- रावत सारस्‍वत
लेखक का नाम :- भंवरसिंह सामौर
विधा :- जीवनी
भाषा :- हिन्‍दी
प्रकाशन वर्ष :- 2009
मूल्य :- 100 रूपये
पृष्ठ :- 96
आई एस बी एन :- 978-81-905208-8-1
प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-331001


पुस्तक का नाम :- घुळगांठ
लेखक का नाम :- भरत ओळा
विधा :- उपन्‍यास
भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- 2009
मूल्य :- 125 रूपये
पृष्ठ :- 112
आई एस बी एन :- 978-81-905208-9-8
प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-331001



पुस्तक का नाम :- कितणो पाणी
लेखक का नाम :- डॉ मंगत बादल
विधा :- कहानी
भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- 2009
मूल्य :-150 रूपये
पृष्ठ :-120
आई एस बी एन :-
प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-331001


पुस्तक का नाम :- भेड़ अर ऊन रो गणित
लेखक का नाम :- डॉ मंगत बादल
विधा :- व्यंग्य

भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- 2009
मूल्य :- 150 रूपये
पृष्ठ :- 100
आई एस बी एन :-

प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-331001



पुस्तक का नाम :- मुझ से बड़ा न कोय
लेखक का नाम :- दुर्गेश
विधा :- व्यंग्य

भाषा :- हिन्दी
प्रकाशन वर्ष :- २००८
मूल्य :- १२५ रूपये
पृष्ठ :- ८०
आई एस बी एन :- ९७८-८१-९०५२०८-६-७

प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-331001



पुस्तक का नाम :- मिणिया मोती
(राजस्थानी के ५७ लघुकथाकारों की लघुकथाएं)
संपादक का नाम :- डॉ रामकुमार घोटड़
विधा :- लघुकथा
प्रकाशन वर्ष :- २००८
मूल्य :- १५० रूपये
पृष्ठ :- १४४
आई एस बी एन :- ९७८-८१-९०५२०८-५-०

प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१



पुस्तक का नाम :- बात न बीती
(राजस्थानी के १० कहानीकारों की कहानियाँ)
सम्पादक का नाम :- दुलाराम सहारण
विधा :- कहानी संग्रह

भाषा : राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- २००७
मूल्य :- १२५ रूपये
पृष्ठ :- १०८
आई एस बी एन :-
९७८-८१-९०५२०८-४-३
प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१



पुस्तक का नाम :- बापडी
लेखक का नाम :- देवकरण जोशी दीपक
विधा :- उपन्यास

भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- २००७
मूल्य :- १२५ रूपये
पृष्ठ :- ८०
आई एस बी एन :- ९७८-८१-९०५२०८-२-९

प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१



पुस्तक का नाम :- छाँटड़ली
लेखक का नाम :- किशोर कुमार निर्वाण
विधा :- बाल कविता

भाषा:- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- २००७
मूल्य :- ३०
पृष्ठ :- ३२
आई एस बी एन :- ९७८-८१-९०५२०८-३-६

प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१



पुस्तक का नाम :- आंतरो
लेखक का नाम :- उम्मेद धानिया
विधा :- कहानी

भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- २००७
मूल्य :- १२५ रूपये
पृष्ठ :- ८०
आई एस बी एन :- ९७८-८१-९०५२०८-१-२

प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१



पुस्तक का नाम :- म्हारी धरती
लेखक का नाम :- श्रीभगवान सैनी
विधा :- बाल कविता

भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- २००६
मूल्य :- ३० रूपये
पृष्ठ :- ३२
प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१



पुस्तक का नाम :- चांदी की चमक
लेखक का नाम :- दुलाराम सहारण
विधा :- बाल कहानी

भाषा :- हिन्दी
प्रकाशन वर्ष :- २००७
मूल्य :- ३० रूपये
पृष्ठ :- ४०
प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१



पुस्तक का नाम :- दरकता री दरकार
लेखक का नाम :- अवकाश सैनी
विधा :- बाल कहानी

भाषा : राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- २००६
मूल्य :- ३० रूपये
पृष्ठ :- ३२
प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१



पुस्तक का नाम :- चिड़पड़ाट

लेखक का नाम :- विश्वनाथ भाटी
विधा :- कविता

भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- २००६
मूल्य :- १२५ रूपये
पृष्ठ :- ८०

प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-331001



पुस्तक का नाम :- सुपनो वासवदत्ता रो
लेखक का नाम :- देवकरण जोशी दीपक
विधा :- अनुवाद (संस्कृत महाकवि भास् कृत नाटक 'स्वप्नवासवाद्त्तम' का राजस्थानी में अनुवाद)
प्रकाशन वर्ष :- २००६
मूल्य :- १५१ रूपये
पृष्ठ :- ८०

प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१


एकता प्रकाशन से संबध प्रकाशन :-

पुस्तक का नाम :- जंगल दरबार
लेखक का नाम :- दुलाराम सहारण
विधा :- बाल उपन्यास

भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- २००५
मूल्य :- २५ रूपये
पृष्ठ :- ३४

प्रकाशक :- अटल प्रकाशन, चूरू / वितरक- एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१



पुस्तक का नाम :- क्रिकेट रो कोड
लेखक का नाम :- दुलाराम सहारण
विधा :- बाल कहानी

भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- २००५
मूल्य :- २५ रूपये
पृष्ठ :- ३६

प्रकाशक :- अटल प्रकाशन, चूरू / वितरक - एकता प्रकाशन, चूरू-३३१००१




पुस्तक का नाम :- पीड
लेखक का नाम :- दुलाराम सहारण
विधा :- कहानी

भाषा :- राजस्थानी
प्रकाशन वर्ष :- अप्रैल, २००५
मूल्य :- १२५ रूपये
पृष्ठ :- ८०
प्रकाशक : अमित प्रकाशन, चूरू / वितरक :- एकता प्रकाशन, चूरू -३३१००१

शंकरदान सामौर



राजस्थानी काव्य में राष्ट्रवादी अग्नि-शिखा के ऋत्विक : शंकरदान सामौर
- डॉ. के. एल. राजपुरोहित
. ना. व्यास वि.वि., जोधुपर के राजनीति विज्ञान विभाग में एसोसियेट प्रोफेसर

भारतीय इतिहास में राजस्थान ने अपनी विशिष्ट पहिचान कुछ वरेण्य जीवन मूल्यों में लिए सतत बलिदानों की सुदीर्घ परम्परा से बनायी है। स्वातंत्र्य प्रेम को इन मूल्यों का सुमेरु कहा जा सकता है। इस तथ्य की काव्यात्मक अभिव्यक्ति मरुभूमि में इन्द्र की कृपणता का खुलासा, स्वातंत्र्य चेतना व उसकी रक्षार्थ उत्सर्ग की तत्परता के संदर्भ में शंकरदान द्वारा इस भाँति हुई है-
पंणी रौ कांई पिये, (आ) रगत पियौड़ी रज्ज।
संके कन में आ समझ, घण नह बरसै गज्ज।।

स्वातंत्र्य रक्षण के प्रयत्नों की महत्ता राजस्थानी मानस में इस भाँति रची बसी है कि-
सुत मरियौ हित देश रै, हरख्यौ बंधु समाज।
मा नह हरखी जनम दे, जितरी हरखी आज।।

उन्नींसवीं सदी में राजस्थान में इस स्वातंत्र्य चेतना का तूर्यनाद करने वाले चूरू जिले के बोबासर गाँव में २२ नवम्बर १८२४ को जन्में कवि शंकरदान सामौर का व्यक्ति और जीवन इस प्रदेश की बलिदानी परम्परा का गौरव मंडित अध्याय है। सामौर क्रांतिचेता कवि होने के साथ-साथ जनसाधारण के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर चुके थे। अपनी गहरी सूझ-बूझ से उन्होंने विदेशी शासन की वास्तविक प्रकृति व उसके विनाशकारी प्रभाव को भली-भाँति समझ लिया था। साथ ही तत्कालीन सामंती व्यवस्था की विद्रूपता व उसके जनविरोधी स्वरूप की भी उन्हें ठीक-ठीक पहचान थी। समकालीन हालात से उनसे भीतर जो विक्षोभ खदबदा रहा था, १८५७ के विप्लव ने उस लावे को बहिर्मुख कर दिया। वे स्वतंत्रता यज्ञ में समिधा डालने हेतु तत्पर हो गये और अपनी काव्य प्रतिभा का प्रभावी उपयोग इस महत् ध्येय की सिद्धि के लिये किया।
अन्याय व अनाचार का विरोध उनकी दूसरी प्रकृति थी। उस समय शासक वर्ग की मनमानी और कदाचार के विरूद्ध चारणों द्वारा दिए जाने वाले धरानों में उनकी सदैव अग्रणी भूमिका रही और इस भावना का चरमोत्कर्ष १९५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका से परिलक्षित होता है। शंकरदान के काव्य में युगीन चेतना के स्वर सशक्त रूप से उभरे। उनका काव्य मनो विनोद या निसत्व राजाओं के प्रशस्तिगान द्वारा लाख पसाव प्राप्त करने का साधन नहीं अपितु राष्ट्र के सुप्त पौरुष व निष्पंद गौरव भाव को जगाने, लोगों में ऐक्य भाव का संचार करने, कर्तव्य विमुख हो चुके सत्ताधीशों को शब्दों के प्रतोद से प्रताड़ित करने एवं विदेशी शासन के बहुविध शोषण से हतश्री हो चुके देश के जनसाधारण को उठ खड़े होने का आव्हान था। उनके काव्य में राष्ट्रीयता की तेजस्विता व स्निग्धता दोनों विद्यमान थीं। समकालीन परिस्थिति से अवसन्न इस कवि की दृष्टि से जनसाधारण के दु:ख-दर्द कभी ओझल नहीं हुए। यही कारण है कि उनके काव्य में सर्वत्र प्रखर देशभक्ति व मातृभूमि के उद्धार के लिए बलिदान की महत्ती आवश्यकता मुखरित हुई है।
१८५७ के विप्लव को पराधीनता के पाश से मुक्ति पाने का महान्ब अवसर मानने वाले सामौर ने अपने पूर्ववर्ती कविराजा बांकीदास की भाँति राष्ट्रवासियों को जगाने का स्तुत्य कार्य किया। वे इस विप्लव की घटनाओं के न केवल साक्षी थे वरन् इसमें उन्होंने सक्रिय भूमिका भी निभायी। अंग्रेज व उनके आश्रित राजाओं-सामन्तों की जन विरोधी घातक नीतियों व क्रिया कलापों ने उन्हें आहत कर दिया था, जिसकी अभिव्यक्ति उनके सम्पूर्ण सृजन में हुई है। तत्कालीन राजस्थान के हालात के संदर्भ में क्रांति का शंखनाद करने वाले इस जनकवि की व्यथा को भली-भाँति समझा जा सकता है।

ब्रिटिश सत्ता के विस्तार की परिणति-
ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना से राजस्थान में अराजकता व राजनीतिक अस्थिरता के अंधयुग की तो समाप्ति हुई किन्तु जनसाधारण के लिए उस अन्तहीन दु:खरजनी का प्रारम्भ हुआ जिसमें, अन्याय, शोषण व उत्पीड़न के अंधकार में जीवन एक दु:सह अभिशाप बन कर रह गया। ब्रिटिश प्रभुओं से प्राप्त अभयदान ने राजाओं को अपनी प्रजा पर कहर ढ़ाने की खुली छूट दे दी। इस युग में राजस्थान में सामन्ती व्यवस्था प्रजापीड़न, क्रूरता व मानवीय अध:पतन की पराकाष्ठा की प्रतीक बनकर रह गयी। एक जंगल राज की शुरुआत हो गई जिसमें रैयत राजाओं व उनके जागीरदारों का भक्ष्य बन गयी। गोरे प्रभुओं की चाटुकारिता मंे तल्लीन राजा व जागीरदार प्रजा की गर्दन पर सिंदवाद की कथाओं के बूढ़े की तरह सवार हो गए। जिन मेहनतकश लोगों के परिश्रम पर उनकी विलासिता का तांडव चल रहा था, वे तिहरी गुलामी के बोझ के नीचे दबकर सर्वथा असहाय हो गए। सामंती तत्त्वों के गर्हित आचरण के फलस्वरूप जागीरदारी प्रथा जुल्म का पर्याय बन गयी। रियासती प्रजा रूपी नींबू को इतनी निर्दयता से निचोड़ा गया कि उसके रेशे तक बाहर निकल आये। ये शोषक सामन्त इतने विवेकहीन हो चुके थे कि रैयत द्वारा की गई फरियाद को भी उन्होंने अपनी सत्ता के लिए चुनौती समझ कर निर्मम दमन का सहारा लिया। सामौर ने तत्कालीन परिस्थिति पर समग्रता से विचार किया। फलत: यह बात उनके सम्मुख दिन के उजाले की भाँति स्पष्ट हो गई कि 'मीठे ठग` अंग्रेजों की बनिया मनोवृति ही इसके लिए उत्तरदायी है। श्री अरविन्द के शब्दों में ''बनिया जब शासक बन जाता है तो सबसे बुरा शासक सिद्ध होता है।`` उदीयमान ब्रिटिश पूंजीवाद के हितों के संवर्धन के लिए स्वावलंबी भारतीय अर्थ व्यवस्था को तो अंग्रेजों ने चौपट किया ही और साथ ही राजनीतिक प्रभुत्व के विस्तार के लिए हर प्रकार के छल-छद्म का भी सहारा लिया। इन तथ्यों व उनके निहितार्थ का चित्रण सामौर ने अपने एक गीत में इस प्रकार किया है-
बिणज रौ नांव ले आया बण बापड़ा, तापड़ा तोड़िया राज तांईं
मोकौ पा मुगळां रौ माण जिण मारियौ, पोखो थां कुणकयां समझ कांईं
धोळ दिन देखतां नबाबी धपाई, संताई बेगमां अवधसाई
खोड़लां फौज हिंदवांण री खपाई, सफाई नांखौ मत सरम साई
धरा हिंदवांण री दाबर्या धकै सूं, प्रगट में लड़यां ई पार पड़सी
संकट में अेक हुय भेद मेटो सकळ, लोक जद जोस हूं जबर लड़सी

अंग्रेजों के अत्याचारों को उन्होंने सूक्ष्म दृष्टि से देखा था। अपनी वणिक वृत्ति से उन्होंने पूर्ववर्ती सभी आक्रान्ताओं को पीछे छोड़ दिया था। इस बात को रेखांकित करते हुए सामौर ने कहा कि अंगे्रज तो चंगेज खां से भी दो कदम आगे थे, क्योंकि-
महलज लूटण मोकळा, चढया सुण्या चंगेज।
लूटण झूंपा लालची, आया बस इंगरेज।।
सामौर अपनी निर्भयता व स्पष्टवादिता की दृष्टि से अद्वितीय हैं। अत: अंगे्रजों के विरूद्ध अपने आक्रोश के प्रकटीकरण व आत्म सम्मान को धता बताकर क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए उनकी चाटुकारिता करने वाले राष्ट्र द्रोही राजाओं व सामन्तों की भर्त्सना करते समय उनकी लेखनी ने आग्नेय रूप धारण कर लिया। राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाले सामौर के लिए कहा गया यह दोहा उनके जीवन का सार प्रस्तुत कर देता है-
शंकरियै सामौर रा गोळी जिसड़ा गीत।
मिंत ज साचा मुलक रा, विपुवां उलटी रीत।।
१८५७ का स्वतंंत्रता संग्राम और सामौर
विदेशी शासन के अभिशाप से देश को मुक्त कराने हेतु प्राणापण से सचेष्ट सामौर का तेजस्वी रूप १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूर्णता से प्रकट हुआ। वे सर्वतोभावेन इस महद् प्रयास की सफलता के लिए जुट गए। वे इस संग्राम की महत्ता को भली भाँति समझते थे। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए उन्होंने देशवासियों को उद्बोधन देते हुए स्पष्ट किया कि इस दुर्लभ अवसर को खो देने पर हिन्द की खोयी आजादी को प्राप्त करने का ऐसा मौका फिर नहीं आएगा, जैसे छलांग भरते समय एक बार चूक जाने पर हिरण फिर संभल नहीं पाता। यह छप्पय द्रष्टव्य है-
आयौ औसर आज, प्रजा पख पूरण पाळण
आयौ औसर आज, गरब गौरां रौ गाळण
आयौ औसर आज, रीत राखण हिंदवाणी
आयौ औसर आज, विकट रण खाग बजाणी
फाळ हिरण चूक्यां फटक, पाछौ फाळ न पावसी
आजाद हिन्द करवा अवर, औसर इस्यौ न आवसी
सामौर १८५७ के विप्लव के निहितार्थों को भली भाँति समझते थे। उनकी अन्तस्थ देश भक्ति इस समय प्रबल आलोड़न की अवस्था में थी। उनके दृष्टिपथ में समस्त भारत था। अत: इस संग्राम के साथ जुड़े सभी क्षेत्रों के छोटे-बड़े सभी योद्धाओं का उन्होंने स्तवन किया। तांत्या टोपे के तो वे प्रत्यक्ष संपर्क में आए थे और गाढ़े समय में टोपे की उन्होंने जो मदद की, वह इस प्रदेश के स्वाधीनता संघर्ष का स्वर्णिम अध्याय है। तात्या जैसे दुर्धर्ष योद्धा के अथक प्रयासों से वे अभिभूत थे। उनके अदम्य साहस व प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अविचल भाव से डटे रहने जैसे गुणों की सराहना में सामौर द्वारा रचित इस गीत से इस निजंधरी नायक के प्रति उनके अहोभाव की ऊर्मिया तरंगित होती हैं।
जठै गयौ जंग जीतियौ, खटके बिन रणखेत।
तकड़ौ जड़ियौ तांतियौ, हिंदथान रै हेत।।
मचायौ हिंद में आखी तहलको तांतियै मोटो
घोटो जेम घुमायौ लंक में हणूं घोर
रचायौ रूळंती राजपूती रौ आखरी रंग
जंग में दिखायौ सुवायौ अथाग जोर
हुय हतास राजपूती छंडियौ छत्रियां हाथ
साथ चंगौ सोधियौ दिक्खणी महासूर
बिड़द धार छतीसां वंस रौ रंण बांको बीर
नीर धारी हिन्द रौ बंचायौ सागी नूर
पळकती आकास बीज कठै ई जांवती पड़ै
छड़ै तांतियै री व्हैगी इसी ही छलांग
खळकती नंद्ंया रा खाळ मांय हूतो पाड़ खड़ै
लड़ै इणा विधी लाखां हूतं एकलांग
गीत में ''रचायौ रूळंती राजपूती रौ आखरी रंग`` और ''पळकती आकाश बीज कठै ई जांवती पड़ै`` जैसी पंक्तियाँ अप्रतिम योद्धा तात्या के सम्बन्ध में कवि के गहन अध्ययन को दर्शाती हैं। अरिदल पर उनके आक्रमण जिस तीव्रता व आकस्मिकता से होते थे, उस तथ्य का रूपक द्वारा वर्णन सुहृद्य बन पड़ा है।
१८५७ के विप्लव के आखिरी दौर में चारों ओर से निराश होने के पश्चात् तात्या टोपे मदद की आशा से शेखावाटी इलाके में आए। इस समय सामौर ने उनकी यथासंभव भरपूर मदद की। मदद के भरोसे तात्या लक्ष्मणगढ़ के किले के किले में घिर गए। वहाँ से किसी तरह निकलने के बाद कहीं पर भी सहायता न मिलती देखकर सामौर उन्हें अपने पैतृक गाँव बोबासर अपने भाई पृथ्वीसिंह सामौर के गढ़ में ले आए। इस पर क्रुद्ध हो अंगे्रेजों ने गढ़ को बारूद से उड़ा दिया। इस प्रकार सामौर ने केवल शब्दों द्वारा ही नहीं वरन् अपने कर्तव्य द्वारा भी क्रांतिधर्मा होने का प्रमाण दिया। उनके अंग्रेज विरोधी रुख की भारी कीमत बड़े भाई पृथ्वीसिंह ने चुकायी। इस बारे में स्वयं शंकरदान ने कहा-
गढ़वी पिरथीसिंह गुणी, गोरां मेट गरूर।
मरद तांतिये री मदत, की उण बेळ करूर।।
तांत्या की मदद करते हुए तो सामौर परिवार को अपना सब कुछ गंवाना पड़ा पर इस स्वातंत्र्य यज्ञ में अपनी आहुति देने वाले अन्य सेनानी भी सामौर की दृष्टि से ओझल नहीं हुए। झाँसी की रानी, अवध के सैनिकों व आऊवा ठाकुर कुशालसिंह के बलिदानों का स्तवन करने में भी वे अग्रणी रहे। लक्ष्मी बाई के अप्रतिम शौर्य व बलिदान को उन्होंने इस भाँति याद किया-
हुयौ जांण बेहाल, भाल हिन्द री भोम रौ।
झगड़ौ निज भुज झाल, लिछमी झांसी री लड़ी।।

इस तरह अवध राज्य के सैनिकों की सूरमाई व अंग्रेज विरोधी हलचल का बखान करते हुए लिखा-
फिरंगां तणी फजीत, करवा नै कस कस कमर।
जण जण बण जंगजीत, लड़या अवध रा लाडला।
इस विप्लव में राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता को सबसे गम्भीर चुनौती देने वाले आऊवा की घटनाएँ इस प्रदेश के स्वाधीनता संग्राम का सर्वाधिक रोमांचक अध्याय है। ब्रिटिश सत्ता को सर्वाधिक ध्यान आऊवा पर ही देना पड़ा उनके विरुद्ध किये गये तनी अभियना एवं तदुपरान्त भीषण प्रतिशोध की भावना से किया गया आऊवा का सर्वनाश इस बात को स्पष्ट करते हैं कि अंग्रेजों की दृष्टि में आऊवा की हल-चल कितनी खतरनाक थी। इस समय आऊवा द्वारा किये गये बलिदान को गौरवभाव से चित्रित करते हुए सामौर ने लिखा-
हुआ दुखी ंहिंदवाण रा, रुकी न गोरां राह।
विकट लड़यौ सहियो बिखौ, वाह आऊवा वाह।।
आऊवा ठाकुर खुशालसिंह को इस अभियान का नेतृत्व संभालने के फलस्वरूप भीषण आपदाओं से गुजरना पड़ा उनके बारे में सामौर कहते हैं- खेल्यौ रण में खाग हूं, जचकर जूझ्यौ जंग। दियौ सरब हित देश रै, रंग खुशाला रंग।
आऊवा की अगुआई में हुए संघर्ष में मारवाड़, बीकानेर, मेवाड़ एवं शेखवाटी के कई ठिकानों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। आऊवा से निपटने के बाद अंग्रेजों ने इस सभी ठिकानों को ठिकाने लगाने पर ध्यान दिया।
१८५७ के विप्लव का सबसे दु:खद पहलू यह रहा कि राजस्थान के सभी रजवाड़े इस मुक्ति संग्राम से न केवल विलग रहे अपितु उसे कुचलने में भी अंग्रेजों का भरपूर सहयोग दिया। राष्ट्रभक्त शंकरदान को राजाओं के इस निंदनीय कृत्य से मरणान्तक व्यथा हुई।
गुलामी को खाद-पानी देने वाले इन राजाओं के प्रति सामौर के क्रोध का कोई पारावार नहीं था। अपनी रियासत बीकानेर के शासक सरदारसिंह भी इस दुष्कर्म के भागी थे। कवि ने इन सभी देशद्रोहियों की जमकर खबर ली। स्वातंत्र्य योद्धाओं का स्तवन करने वाली उनकी लेखनी ने अंग्रेज समर्थकों की भर्त्सना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बीकानेर रियासत के गोपाळपुरा, कणवारी तथा शेखावाटी के नवलगढ़, खेतड़ी, खण्डेला आदि ठिकाने भी उनके कोपभाजन बने क्योंकि इन ठिकानेदारों ने तात्या की मदद करने से उनके आग्रह को ठुकरा दिया था। अत्यन्त तीक्ष्ण शब्दशरों से उन्हें अंग्रेज भक्तों को बींध डाला। सरदारसिंह को धिक्कारते हुए कहा-
देख मरै हित देश रै, पेख सचौ रजपूत।
सरदारा तोनै सदा, कहसी जगत कपूत।।
खास बांधवां खीज, सैण गोरिया गिण सचा।
थूं बा`वै अेहड़ा बीज, फोग फोग फळ भोगसी।।

बीकानेर दरबार को मूर्ख मण्डली की संज्ञा देते हुए कवि ने कहा-
डफ राजा डफ मुसद्दी डफ ई देश दीवांण।
डफ ई डफ भेळा हुया, (जद) बाज्यौ डफ बीकांण।।

सरदारसिंह के उत्तराधिकारी डूंगरसिंह की अंग्रेज परस्ती के विरुद्ध सामौर के रोष की अभिव्यक्ति इस प्रकार हुई-
हो-छोगो हिंदवाण रौ, अडिग फिरंती आण।
पत्थर पाट बिराजतां, बटटौ लग्यौ बीकांण।।

तांत्या की मदद करने से इन्कार करने पर गोपाळपुरा के ठिकानेदार हमीरसिंह को उपालंभ देते हुए कहा-
तन मोटो मोटो तखत, मोटो वंश गंभीर।
हुयौ देश हित क्यूं हमैं, (थारौ) मन छोटो हम्मीर।।

इस वजह से खेतड़ी के शासक को इन शब्दों में फटकारा-
खेतड़ी मिळा दूं भेळी रेतड़ी
आकां ऊन ज्यूं उड़ा दूं हुर्र् फुर्र्।।

युगचेतना के उद्गाता जनकवि के रूप में-
सामौर ने राजस्थानी काव्य को एक नई भाव-भूमि पर खड़ा कर दिया। दरबारी संरक्षण में पनपी और फली-फूली कविता के सरोकार सर्वथा भिन्न थे। राजस्थान में ब्रिटिश प्रभुत्व के विस्तार ने ऐसे हालात पैदा कर दिये थे जिनमें आप व्यक्ति का जीवन दुस्वप्न में बदल गया। अभाव व भुखमारी जनता की नियति बन गये। सामौर के काव्य में विदेशी शासन के फलितार्थों के साथ ही जन साधारण की व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। झोंपड़ियों में रहने वाले राष्ट्र के मेरुदण्ड स्वरूप धरती पुत्रों की महिमा व कष्ट गाथा, दोनों को उन्होंने उजागर किया। उनकी रचना 'वगत बायरौ` में अंग्रजी शासन शोषणकारी प्रवृत्ति और उससे हतश्री सामान्य जनता की दशा का चित्रण हुआ है तो 'देश दर्पण` में देश वासियों को उठ खड़े होने के उद्बोधन के साथ साथ झोंपड़ियों को राष्ट्र का सच्चा शृंगार बताते हुए उनकी महत्ता को रेखांकित किया गया है। 'वगत वायरौ` हालात को समझने की उनकी विश्लेषणात्मक प्रतिभा का उत्तम उदाहरण है। अंग्रेजी अमल की अनुगूंज उसमें सुनाई पड़ती है। जन सामान्य की विपदाओं से सर्वथा उदासीन सत्ताधारी वर्ग को झिंझोड़ने वाले इस जनकवि की व्यथा इस प्रकार प्रकट हुइ है-
हुयगा सह हुक्काम, मिळ अंगरेजां हूं मुरख।
आज दुख्यारण आम, रैयत बापड़ी रामजी।।
रह्यौ सह्यौ रुजगार, अंगरेजां खोस्यौ अठै।
भूखी किण विध भार, रैयत झालै रामजी।।
सजा मुख मली सेज, नर सूवै हुय हुय निशंक।
बै कांटां रा बेझ, रै क्यूं जाणै रामजी।।
मुगळां खो निज मत्त, सहर बिगाड़या सांतरा।
गांवां री आ गत्त, अंगरेजां की रामजी।।

स्वामी विवेकानन्द ने बारम्बार इस बात पर बल दिया था कि देश के उद्धरण की आशा दीन-हीन सामान्य जनों से ही है। सामौर ने अपनी कृत 'देश दर्पण` में इसी तथ्य को रेखांकित किया है, जब वे कहते हैं-
धिन झूंपड़ियां रा घण्यां, भुज थां भारत भारत।
हो थे ई इण मुलक रा, साचकला सिणगार।।
झूंपड़िया रहसी जितै, इण धरती पर अेक।
मिनखपणौ रहसी मतै, छळी कपटियां छेक।

ये दोहे इस बात को प्रमाणित करते हैं कि 'शंकरदान की साम्राज्य विरोधी चेतना क्रम से जनवाद की ओर अग्रसर हुई। सामौर ने कविता को आधुनिक विचारधारा से जोड़कर एक नयी सम्भावना जगायी। अब तक चली आ रही साहित्यिक व सामाजिक मान्यताओं को तोड़ा। कविता को स्वतंत्रता व राष्ट्रीयता से जोड़ा। अंग्रेजों को मुल्क के 'मीठे ठग` करार देकर उन्हें निकाल बाहर करने हेतु एक होने का मूलमंत्र देकर कवि ने युगधर्म निभाया। अपने समकालीनों में यह आव्हान करने वाले सामौर अकेले थे-
मिळ मुसळमान, रजपूत ओ मरेठा, जाट सिख पंथ छंड जबर जुड़सी।
दौड़सी देश रा दबियौड़ा, दाकल कर, मुलक रा मीठा ठग तुरत मुड़सी।।
जिस समय अधिकांश कवियों की देशभक्ति की भावना अपनी रियासत की सीमाओं से जुड़ी हुई थी, सामौर की वाणी में जाति, धर्म और प्रान्तीयता का अतिक्रमण करती हुई राष्ट्र के नवविहान की सूचक स्वतंत्रता की शंखध्वनि सुनायी पड़ती है।
शंकरदान सही अर्थों में अग्निधर्मा कवि थे। उन्हें गोरी सत्ता के विद्रोही कवि, गोळी हंदा गीतों के कवि के रूप में याद किया जाता है। जब अन्य कवियों के स्वर में राष्ट्रीयता तुतला रही थी, तब उनके स्वर में उसका प्रचंड गर्जन था। राजस्थानी कविता के माध्यम से व्यक्त राष्ट्रीयता की भावना को व्यक्त करने वाले कवियों में वे पांक्तेय थे। उनके काव्य में राष्ट्र के प्रति गौरवभाव व निर्भयता पदे पदे लक्षित होती है। उनके समकालिनों द्वारा कहे गये मरसियों से यह बात प्रमाणित होती है। उदाहरण स्वरूप ये मरसिये-
नह जणजै जग में निलज, दीण-हीण दबकेल
बेमाता हेकण भळै, जण शंकर जबरैल
- गिरधारीसिंह गारबदेसर
सुण्यौ निधन सामौर रौ, चट आयी आ चींत
कुण दकाल कहसी अबैं, गोळी जेहड़ा गीत
मीठा ठग इण मुलक रा, नहचै हुवा नचींत
बीतौ शंकर बाहरू, मुलक तणौ दृढ़ मींत
- पाबूदान बारहठ फोगां
रह्यौ हितू बण रैंत रौ, लाग लपट सह तोड़
नान्हां मिनखां हित लड़यौ, मुलक तणौ सिर मोड़
- दयालदास सिंढ़ायच

हिन्दी साहित्यकार सूची

हिन्दी के कुछ साहित्यकारों की सूची :-

अमरकांत : एफ-६, पंचपुष्प अपार्टमंेट्स, नेवादा, इलाहाबाद/ ०५३५-२४२२४१०
अर्चना वर्मा : ११-मिरांडा हाउस शिक्षक निवास, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-७
अजय तिवारी : बी-३०, श्रीराम अपार्टमंेट्स, ३२/४, द्वारका, नई दिल्ली-७८/ ०११-२४५१०१३८,६५४७१६४०, ९८६८१०६१६१
अनामिका : डी-द्यद्यद्य ८३, पश्चिमी किदवई नगर, नई दिल्ली-२३
अरुण कुमार असफल : आवास सं. २३, सेक्टर-३, निर्माण विहार-३, विद्याधर नगर, जयपुर-२३
असगर वजाहत : ७९, कला विहार, मयूर विहार, फेज-१, दिल्ली-११००९१
अशोक वाजपेयी : सी-६०, अनुपम अपार्टमंेट्स, बी-१३, वसुंधरा इंक्लेव, दिल्ली-११००९६
इंदु जैन : सी-४००, सरिता विहार, नई दिल्ली-४४/ २६९७२०५५
उदयप्रकाश : ९/२, जज कॉलोनी, वैशाली सेक्टर-९, गाजियाबाद, उप्र/ ९८१०७१६४०९
उमाशंकर चौधरी : ए-५६१/२, शास्त्री नगर, दिल्ली-५२/ ९८६८२४५१५७
ए. असफल : २०, ज्वाला माता गली, भिण्ड (भिण्ड) म.प्र./ ९८२६६९५१७२,९९२६९६२१८०
एकांत श्रीवास्तव : द्वारा श्रीमती मंजुल श्रीवास्तव, एलआईसी, सीबीओ-२१, चौथा तल, हिंदुस्तान बिल्ंडिग एनेक्सी, ४ सीआर एवेन्यू, कोलकाता-७२/ ०३३-२५३२६४९५-हिंदी टीचिंग स्कीम, २३४/४, १८ माला, एमएसओ बिल्डिंग, निजाम पैलेस, एजीसी बोस रोड, कोलकाता-२०
ओमप्रकाश वाल्मीकि : सी-५/२, आर्डनेस फैक्टरी इस्टेट, देहरादून-२४८००८
ओमा शर्मा : ४, सेंट्रल रेवेन्यू अपार्टमेंट्स, नारायण दाभोलकर रोड, ऑफ नेपियन सी रोड, मुम्बई-४००००६

कमर मेवाड़ी : संबोधन, चांदपोल, कांकरोली-३१३३२४, राजसंमद, राजस्थान/ ०२९५२-२२३२३१, ९८२९१६१३४२
कन्हैयालाल नंदन : १३२, कैलाश हिल्स, नई दिल्ली-६५
कविता : द्वारा राकेश बिहारी, जेएओ बीएसएनएल, ऑफिस ऑफ जीएमटी, बुलडाणा, स्थित खामगांव-४४४३०३ महाराष्ट्र
कमलकिशोर गोयनका : ए-९८, अशोक विहार, फेज-१, दिल्ली-५२/ ०११-२७२१९२५१, ९८११०५२४६९
प्रो. कमलाप्रसाद : एम-३१, निराला नगर, दुष्यंत मार्ग, भदभदा रोड, भोपाल-३/ ०७५५-२७७२२४९, ९४२५०१३७८९
कांतिकुमार जैन : विद्यापुरम्, मकरोनिया कैम्प, सागर-४७०००४ मप्र/ ०७५८२-२६२३५४
काशीनाथसिंह : बी-६१, ब्रिज एन्क्लेव, सुंदरपुर, वाराणसी, उप्र/ ९४३३०८७८२१
कुंवर नारायण : एच-१५४४, चितरंजन पार्क, नई दिल्ली-११००१९
केदारनाथसिंह : एस-८८/३, एसएफएस लैट्स, साकेत, नई दिल्ली-११००१७
कुमार अंबुज : ९८ सी-रोज, प्लेटिनम पार्क, माता मंदिर के सामने, भोपाल
कैलाश बनवासी : ४१, मुखर्जी नगर, सिकोलाभाठा, दुर्ग-४९१००१ छत्तीसगढ़/ ९८२७९९३९२०
कृष्णकुमार रत्तू : ९/८५०, मालवीय नगर, जयपुर-१७/ ९४१४००२७३६
डॉ. कृष्ण बिहारी सहल : पुलिस लाइन के पीछे, सीकर-३३२००१/ ०१५७२-२५३४३९
कृष्णा अग्निहोत्री : ५३२ ए-१, महालक्ष्मी नगर, इंदौर, मप्र
कृष्णा सोबती : ५०५-बी, पूर्वाशा, आनंद लोक, फेज-१, दिल्ली-११००९१
खगेन्द्र ठाकुर : क्षितिज, जनशक्ति कॉलोनी, पथ संख्या-२४, राजीव नगर, पटना-८०००२४/ ९४३११०७३६
गिरिराज किशोर : ११/२१०, सूटरगंज, कानपुर-२०८००१/ ०५१२-३२६१०७६, ९८३९२१४९०६
गीताजंलि श्री : वाईए-३, सह विकास अपार्टमेंट, ६८ आईपी एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-११००९२
गुलजार : बोस्क्याना, पाली हिल, बांद्रा पश्चिम, मुम्बई-४०००५०

चंद्रकिरण सौनरेक्सा : ३४४, एयरफोर्स एंड नेवल ऑफिसर्स एन्क्लेव, सेक्टर-७, प्लाट नं.२, द्वारका, दिल्ली
चंद्रकांता : मकान नं. ३०२०, सेक्टर-२३, गुड़गांव-१२२०१७ हरियाणा/ ९८१०६२९९५०
चंदन पांडेय : प्रकाश कुंज, बी-१/७१-बी-२, अस्सी वाराणसी-२२१००५/ ९२३६४६०२२४
चंद्रभानु भारद्वाज : संप्रेषण, ११९, श्रीजी नगर, दुर्गापुरा, जयपुर-१८/ ०१४१-२५४५३२७,२५४६९५५,९४१४५१७८४२
चित्रा मुद्गल : बी-१०५, वर्धमान अपार्टमेंट्स, मयूर विहार, फेज-१, दिल्ली-९१/ ०११-२२७११३७१
छोटाराम कुम्हार : ए-७३, सरस्वती नगर, जोधपुर
जयप्रकाश कर्दम : ६३४, एमआईजी लैट्स, ईस्ट ऑफ लोनी रोड, दिल्ली-९३/ ०११-२२८११४८८७
जया जादवानी : कस्तूरबा नगर, जरहा भाटा, बिलासपुर-४९५००१ छत्तीसगढ़/ ९८२७९४७४८०
जितंेद्र श्रीवास्तव : मानविकी विद्यापीठ, इग्नू, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली/ ९८१८९१३७९८

तुलसीराम : १९, दक्षिणापुरम्, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-११००६७
तुषार धवल : २१, सेंट्रल रेवन्यू अपार्टमेंट, नारायण दाभोलकर रोड ऑफ नेपियन सी रोड, मलाबार हिल, मुम्बई-६/ ९९३०३१५९६६
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल : ई-२/२११, चित्रकूट, वैशालीनगर के पास, जयपुर-२१/ ९८८२९५३२५०४
दूधनाथसिंह : एचआईजी/बी-१७, एडीए कॉलोनी, प्रतिष्ठानपुरी, नइयी झूसी, इलाहाबाद-१
नंदकिशोर आचार्य : सुथारों की बड़ी गुवाड़, बीकानेर-३३४००५/ ०१५१-२२०१०४५
नंद भारद्वाज : ७१/२४७, परमहंस मार्ग, मानसरोवर, जयपुर/ ९८२९१०३४५५
नंदकिशोर नवल : घाघा घाट रोड, महेन्द्रू, पटना-८००००६
नमिता सिंह : २८ एमआईजी अवतिंका, रामघाट रोड, अलीगढ़
नामवरसिंह : ३२ ए, शिवालिक अपार्टमेंट, अलकनंदा, कालकाजी, नई दिल्ली-१९/ ९८११२१०२८५
नासिरा शर्मा : डी-३७/७५४, छतरपुर पहाड़ी, नई दिल्ली-७४/ ९८११११९४८९
नीलाक्षीसिंह : लाल पोखर, दीघी, हाजीपुर-८४४१०१ बिहार - ८२,ऊपरी मंजिल, दयानंद स्कूल मार्ग, बी ब्लाक, अपर सोनाटी, जमशेदपुर, झारखंड

पंकज बिष्ट : ९८, कला विहार, मयूर विहार, फेज-१, दिल्ली-९१/ ९८६८३०२२९८
पंखुरी सिन्हा/राय : ए-२०४, प्रकृति अपार्टमेंट्स, प्लाट नं. २६, सेक्टर-६, द्वारका, नई दिल्ली-७५ -वीसी लेन, फेज-३, क्लब रोड, मुजफरपुर-८४२००२ बिहार/ ९९६८१८६३७५
परमानंद श्रीवास्तव : बी-७०, आवास विकास कॉलोनी, सूरजकुंड, गोरखपुर-२७३०१५
पद्मा सचदेव : ९८१११४७६५४
पद्मजा शर्मा : १५-बी, पंचवटी कॉलोनी, जोधपुर
पल्लव : ४०३ बी-३, वैशाली अपार्टमेंट, उदयपुर/ ९४१४७३२२५८
प्रत्यक्षा : बी-१/४०२, पीडब्ल्यूडी हाउसिंग काम्प्लेक्स, सेक्टर-४३, गुड़गांव, हरियाणा
प्रभाकर श्रोत्रिय : ए-६०१, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-९, वसुंधरा, गाजियाबाद-२०१०१२
प्रयाग शुक्ल : एच-४१६, पार्श्वनाथ प्रेस्टीज, सेक्टर-९३ ए, नोएडा-२०१३०४/ ०१२०-४२५७९७७, ९८१०९७३५९०
प्रांजल धर : १२०९, तृतीय तल, डॉ. मुखर्जी नगर, दिल्ली-९
प्रियवंद : १५/२६९, सिविल लाइन्स, कानपुर-२०८००१/ ०५१२-२३०५५६१, ९८३९२१५२३६
पीयूष दईया : विश्राम कुटी, सहेली मार्ग, उदयपुर-३१३००१/ ०२९४-२५२८३१६
प्रेमचंद गांधी : २२०, रामा हेरिटेज, सेंट्रल स्पाइन, विद्याधरनगर, जयपुर-२३/ ९८२९१९०६२६
बजरंग बिहारी तिवारी : २०४, दूसरी मंजिल, टी-१३४/१, बेगमपुर, मालवीय नगर, नई दिल्ली
भारत भारद्वाज : २/ए-१, हिंदुस्तान टाइम्स अपार्टमंेट्स, मयूर विहार फेज-१, दिल्ली-९१/ ९३१३०३४०४९
भालचंद्र जोशी : एनी १३, एच आई जी, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, जैतापुर, खरगोन, मप्र/ ९८९३५२४४९८
मंगलेश डबराल : ३२६, निर्माण अपार्टमेंट, मयूर विहार, फेज-१, दिल्ली-९१/ ९९१०४०२४५९
महुआ माजी : १८ सी, राधा गोंविद स्ट्रीट, थड़पकना, रांची-८३४००१ झारखंड/ ९८३५१९३१११
मधु कांकरिया : द्वारा अशोक कुमार सुनील कुमार, ५४, एजरा स्ट्रीट, ग्राउण्ड लोर, कोलकाता-१
महाश्वेता देवी : १६२/८३, लेक गार्डेन्स, कोलकाता-७०००४५/ ०३३-२४२२५१७१
ममता कालिया : ए-७३, लाजपत नगर-१, नई दिल्ली-२४/ ९२१२७४१३२२
मरुधर मृदुल : ७१, नेहरू पार्क, जोधपुर-३४२००२/ ०२९१-२४३०७८९
मधुरेश : ३७२, छोटी बामनपुरी, बरेली-२४३००३/ ०५८१-२४५४६७०
महावीर अग्रवाल : सापेक्ष, ए-१४, आदर्शनगर, दुर्ग-४९१००३ छत्तीसगढ़/ ०७८८-२२१०२३४
मनोजकुमार पांडेय : १८/२०१, इंदिरा नगर, लखनऊ
महीपसिंह : एच-१०८, शिवाजी पार्क, नई दिल्ली-११००२६
मलय पानेरी : ४३१/३७, पानेरियों की मादड़ी, उदयपुर, राजस्थान
महेश दर्पण : सी-१/५१, सादतपुर, दिल्ली-९४/ ०११-२२९६७१३४
मानिक बच्छावत : २०, बालमुुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता-७/ ९८३०४ ११११८
मार्कण्डेय : एडी-२, एकांकी कुंज, २४ म्योर रोड, इलाहाबाद-१, उप्र/ ०५३२-२४२११५४
मुशर्रफ आलम जौकी : डी-३०४, ताज एन्क्लेव, लिंक रोड, गीता कॉलोनी, दिल्ली-११००३१
मो. आरिफ : सेंट्रल पब्लिक स्कूल, ताजपुर रोड, समस्तीपुर, बिहार/ ९९३१९२७१४०
मैनेजर पांडेय : ५/१२, एनसीईआरटी स्टाफ कॉलोनी, मयूर विहार, फेज-१, दिल्ली-९१ - वी/१२, एनआईई कैम्पस, एनसीईआरटी, श्री अरविंदो मार्ग, नई दिल्ली-१६/ ०११-२६८५०९२६
मैत्रेयी पुष्पा : १०४, महागुन मॉर्फियस, ई-४, सेक्टर-५०, नोएडा/ ९९१०४१२६८०
मृदुला गर्ग : ई-११८, मारजिड मॉथ, जीके-३, नई दिल्ली-४८/ ०११-२६२१२१४०, २६२१८०७३
मृदुला सिन्हा : पीटी-६२/२०, कालकाजी, नई दिल्ली-११००१९

रमणिका गुप्ता : एक-२२१, ग्राउंड लोर, डिफेंस कॉलोनी, नई दिल्ली-२४/ ०११-४६५७७७०४, ९८६८१२९६२३
रत्नकुमार सांभरिया : भाड़ावास हाउस, सी-१३७, महेशनगर, जयपुर-१५/ ९४६०४७४४६५
राजेन्द्र यादव : २/३६, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-२/ ९८१०६२२१४४
प्रो. रामबक्ष : मानविकी पीठ, इग्नू, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-११००६८
रामकुमार कृषक : सी-३/५९, सादतपुर विस्तार, दिल्ली-११००९४
राजेन्द्र केड़िया : १६, नूरमल लोहिया लेन, कोलकाता-७/ ०३३-२२७४८६१८, ९८३११०७४४४
रामशरण जोशी : १०५, समाचार अपार्टमेंट, मयूर विहार, फेज-१, दिल्ली-११००९१
राजेश जोशी : एम-११, निराला नगर, दुष्यंत मार्ग, भदभदा रोड, भोपाल/ ०७५५-२७७६२६६
राजाराम भादू : समानंतर, ४३, हिम्मतनगर, टोंक रोड, जयपुर-१८/ ०१४१-२७२२६९२, ९८२८१६९२७७
रामकुमारसिंह : ७३/३०९ ए, टैगोर लेन, मानसरोवर, जयपुर-२०/ ९८२९२ ६६०७४
रामकुमार आत्रेय : ८६४-ए/१२, आजाद नगर, कुरुक्षेत्र-१३६११९
राजी सेठ : एफ-१६, साकेत, नई दिल्ली-११००१७
रामदरश मिश्र : आर-३८, वाणी विहार, उत्तम नगर, नई दिल्ली-११००५९
राजेन्द्र लहरिया : ईडब्ल्यूएस-३९५, दर्पण कॉलोनी, थाटीपुर, ग्वालियर-४७४०११
लवलीन : ३९९/३, आत्रेय मार्ग, राजापार्क, जयपुर-३०२००४
लीलाधर जगूड़ी : सीताकुटी, बदरीपुर जोगीवाला, देहरादून-२४८००५/ ९४११७३३५८८
लीलाधर मंडलोई : ए-२४९२, नेताजी नगर, नई दिल्ली-२३/ ९८१८२९११८८
विजय मोहन सिंह : ७७, अनुपम अपार्टमेंट्स, वसुंधरा एन्क्लेव, दिल्ली-९६/ ०११-२२६१९०३०
विष्णु प्रभाकर : बी-१५१, महाराना प्रताप एन्क्लेव, पीतमपुरा, दिल्ली-३४
विष्णु खरे : ए-३३, नवभारत टाइम्स अपार्टमेंट, मयूर विहार, फेज-१, दिल्ली-११००९१
विनोद कुमार शुक्ल : सी-२१७, शैलेन्द्र नगर, रायपुर-४९२००१/ ०७७१-२४२७५५४
विजय वर्मा : १०१/४८, मीरा मार्ग, मानसरोवर, जयपुर
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : दस्तावेज, बेतियाहाता, गोरखपुर-२७३००१/ ९४१५६९१३७८
विश्वनाथ त्रिपाठी : बी-५/एफ-१२, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-९५/ ०११-२२५८१४१८
विश्वेश्वर : एम-१८१, सेक्टर-३, पंडित दीनदयाला उपाध्याय नगर, रायपुर-४९२०१०, छत्तीसगढ़/ ०७७१-६४५९०६४, ९९२६२७८६९४
विष्णु नागर : ए-३४, नवभारत टाइम्स अपार्टमेंट्स, मयूर विहार, फेज-१, दिल्ली-९१/ ९८१०८९२१९८
विजय शर्मा : प्रथम तल, १५१ न्यू बाराद्वारी, जमेशदपुर-८३१००१/ ९४३०३८१७१८
विजेन्द्र : सी-१३३, वैशाली नगर, जयपुर/ ९९२८२४२५१५
व्योमेश शुक्ल : सी-२७/१११, बी-४, जगतगंज, वाराणसी-२/ ९३३५४७०२०४

शंभुनाथ : ३८९, जीटी रोड, हावड़ा-७१११०६/ ९३१९२११७५२
शिवमूर्ति : ५/११४०, विराम खंड, गोमती नगर, लखनऊ
शर्मिला बोहरा जालान : ६, रिची रोड, शांकुलम्, कोलकाता-१९/ ९४३३८५५०१४
संजय कुंदन : सी-३०१, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-९, वसुंधरा, गाजियाबाद-२०१०१२/ ९९१०२५७९१५
सत्यनारायण : ७२/५, शक्ति कॉलोनी, रातानाड़ा, जोधपुर/९४१४१३२३०१
सुधा अरोड़ा : १७०२, सॉलिटेयर हीरानंदानी गार्डेन, पवई, मुम्बई
सूरजपालसिंह चौहान : डी-२०, एसटीसी कॉलोनी, नई दिल्ली
सूरज पालीवाल : ७१, सेंट्रल स्कूल स्कीम, एयरफोर्स एरिया, जोधपुर/ ९४१४१२८२१५
सुरेश पंडित : ३८३, स्कीम नं. २, लाजपत नगर, अलवर-३०१००१/ ९२१४९४५१५६
स्नोवा बार्नो : फिनपोल हाउस, पो.बा. नं. ८१, मनाली-१७५१३१ हिप्र
स्वयं प्रकाश : ३/३३, ग्रीन सिटी, ई-८, अरेरा कॉलोनी, भोपाल/ ०७५५-२५६२९६०, ९४२५०१८२९०
श्रीप्रकाश शुक्ल : हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी/ ०५४२-२३१७७२८
एस. आर. हरनोट : ओम भवन, मोरले बैंक इस्टेट, निगम विहार, शिमला-१७१००२/ ९८१६५६६६११
हरिनारायण : सी-५२/जेड-३, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-९५/ ०११-२२५७०२५२, ९८६८३८२७८३
हरदर्शन सहगल : ५-ई/९, सम्वाद, डुप्लैक्स कॉलोनी, बीकानेर
हरीश करमचंदाणी : ९/९१३, मालवीय नगर, जयपुर-३०२०१७
हरीराम मीणा : ३१, शिवशक्ति नगर, किंग्स रोड, अजमेर हाईवे, जयपुर-१९/ ९४१४१२४१०१
हरीश भादानी : छबीली घाटी, बीकानेर, राजस्थान-सीएफ-२०४, साल्ट लेक, कोलकाता-६४/०३३-२३३४३५५५
हेतु भारद्वाज : छावनी, नीमकाथाना-३३२७१३/ ९४१४७५२०३९
हेमंत कुकरेती : डी-६१/६, परमहंस अपार्टमेंट्स, दिलशाद कॉलोनी, मेन रोड, दिल्ली-११००९५
हेमंत शेष : ४०/१५८, स्वर्ण पथ, मानसरोवर, जयपुर-३०२०२०
हृद्येश : १३६/२, बक्सरिया, शाहजहांपुर-२४२००१/ ९४५१८०७११९
क्ष
ज्ञान चतुर्वेदी : ए-४०, अलकापुरी, भोपाल-४६२०२४
ज्ञानप्रकाश विवेक : १८५७, सेक्टर-६, बहादुरगढ़-१२४५०७
ज्ञानरंजन : १०१, रामनगर, अधार ताल, जबलपुर-४८२००४/ ०७६१-२४६०३९३, ९८९३०१७८५३
ज्ञानेद्रपति : बी-३/१२, अन्नपूर्णा नगर, विद्यापीठ मार्ग, वाराणसी-२२१००२/ ९४१५३८९९९६

साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं की सूची

कुछ साहित्यिक हिन्दी पत्रिकाएं :

अंचल भारती : सं. जयनाथमणि त्रिपाठी। अंचल भारती प्रिटिंग प्रेस, राजकीय औद्योगिक आस्थान, गोरखपुर मार्ग, देवरिया-२७४००१/ १५ प्रति
अकार : अकार प्रकाशन, १५/२६९, सिविल लाइंस, कानपुर-२०८००१/ ३० प्रति अंक
अक्सर : त्रैमासिक, सं. हेतु भारद्वाज। ए-२४३, त्रिवेणीनगर, गोपालपुरा बाईपास, जयपुर- ३०२०१८ राजस्थान/ २५ प्रति अंक
अपना पैगाम : स. सुहैल अख्तर, जाकिरखान। एम-११, एमआईजी-३३१, सत्यसाईं एनक्लेव, कोलथिया, खंडगिरि, भुवनेश्वर-७५१०३०/ ४० प्रति अंक
अनभै सांचा : सं. द्वारिका प्रसाद। १४८, कादम्बरी, सेक्टर-९, रोहिणी, दिल्ली-११००८५
अनुकृति : त्रैमासिक, सं. जयश्री शर्मा। ११ क ६, ज्योति नगर, सहकार मार्ग, जयपुर-३०२००६ राजस्थान/ २० प्रति अंक
अन्यथा : त्रैमासिक, सं. कृष्ण किशोर। २०३५, फेज-१, अरबन इस्टेट डुगरी, लुधियाना-१४१०१३
अभिनव कदम : सं. जयप्रकाश धूमकेतु। प्रकाश निकुंज, २२३, पावर हाउस रोड, निजामुद्दीनपुरा, मऊनाथ भंजन, मऊ-२७५१०१ उ.प्र.
अरावली उद्घोष : मासिक, सं. बीपी वर्मा पथिक। ४४८, टीचर्स कॉलोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर-३१३००४ राजस्थान/ २० प्रति अंक
अवध अर्चना : मासिक, सं. विजयरंजन। १९ अश्फाक अल्लाह कॉलोनी, फैजाबाद उप्र/ २० प्रति अंक
असुविधा : सं. रामनाथ शिवेंद्र। अक्षरघर, हर्षनगर, पूरब माहोल, राबर्ट्सगंज, सोनभद्र-२३१२१६ उप्र/ १० प्रति अंक
अक्षर शिल्पी : मासिक, सं. राजुरकर राज। एल-१८, थद्दाराम कॉम्पलेक्स, जोन-१, महाराणा प्रताप नगर, भोपाल-४६२०११/ २० प्रति अंक
आधारशिला : सं. दिवाकर भट्ट, अनियतकालीन। बड़ी मुखानी, हल्द्वानी, नैनीताल-२६३१३९ उत्तराखंड। ४० प्रति अंक
आर्यकल्प : सं. लोलार्क द्विवेदी। बी-२/१४३ ए, भदैनी, वाराणसी-२२१००१/ ३० प्रति अंक
आलोचना (त्रैमासिक) : राजकमल प्रकाशन, १-बी, नेताजी सुभाष मार्ग दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२/ ५० प्रति अंक
आह्वान : त्रैमासिक, सं. कविता, अभिनव। बी-१००, मुकुंद विहार, करावल नगर, दिल्ली/ १० प्रति अंक
इंद्रप्रस्थ भारती : त्रैमासिक, हिन्दी अकादमी, दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली सरकार, समुदाय भवन, पदम नगर ,किशनगंज, दिल्ली-०७/दूरभाष- ३६२१८८९, ३५३३४४८, ३५५०२७४ फैक्स- ३५३६८९७/ १०० वार्षिक
इरावती : सं. राजेन्द्र राजन, अनियतकालीन। वी-४, टीका चेलियां, धर्मशाला-१७६२१५ हिमाचल/३० प्रति अंक
उद्भावना : मासिक, सं. अजेय कुमार। ए-२१, झिलमिल इंडस्ट्रीयल एरिया, जीटी रोड, शाहदरा, दिल्ली-११००९५/
उत्तर प्रदेश : मासिक। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, पार्क रोड, लखनऊ/ १० प्रति अंक

कला प्रयोजन : सं. हेमंत शेष । निदेशक, पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, बागौर हवेली, गणगौर घाट, उदयपुर-३१३००१/ ५० प्रति अंक
कला समय : द्वैमासिक, सं. सत्येन्द्र शर्मा। जे-१९१, मंगल भवन, ई-६, महावीर नगर, अरेरा कॉलोनी, भोपाल-४६२०१६/ २० प्रति अंक
कथन : त्रैमासिक, सं. रमेश उपाध्याय, संज्ञा उपाध्याय। १०७, साक्षरा अपार्टमंेट्स, ए-३, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-११००६३। २५ प्रति अंक
कथा : सं. मार्कण्डेय। ए.डी.-२, एकांकी कुंज, २४ म्योर रोड, इलाहाबाद-०१/ ५० प्रति अंक
कथाक्रम : ३, ट्रांजिस्ट हॉस्टल, वायरलेस चौराहे के पास, महानगर, लखनऊ-२२६००६/ २० प्रति अंक
कथादेश : मासिक, सं. हरिनारायण। सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि., सी-५२/जेड-३, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-११००९५/ २० प्रति अंक
कथाबिंब : ए-१०, बसेरा, ऑफ दिन-क्वारी रोड, देवनगर, मुंबई-४०००८८/ १५ प्रति अंक
कथा शिखर (त्रैमासिक) : सं. रमेश कपूर, ए ४/१४, सेक्टर-१८, रोहिणी, दिल्ली-११००८९/ १०० वार्षिक
कहानीकार : सं. कमल गुप्त। के-३०/३७, अरविंद कुटीर, निकट भैरवनाथ, वाराणसी
कादम्बिनी : मासिक, सं. मृणाल पांडे। नई दिल्ली
काव्यम् : द्वैमासिक, सं. प्रभात पांडेय। जीडी-४४, साल्ट लेक, कोलकाता-७००१०६/ १५ प्रति अंक
कृति ओर : सं. विजेन्द्र, सी-१३३, वैशालीनगर, जयपुर-३०२०२१ राजस्थान/ २५ प्रति अंक
गवेषणा : केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा/ ४० प्रति अंक

जनपक्ष : सं. अशोक पाठक। एस-२४/६, ए-११-ख, इंदिरागांधी नगर, कैंट, वाराणसी-२/ ३० प्रति अंक
जनविकल्प : सं. प्रेमकुमार मणि, प्रमोद रंजन। सूर्यनगर, आशियाना नगर, पटना-८०००२५/ ५० प्रति अंक


तटस्थ : त्रैमासिक, सं. डॉ. कृष्णबिहारी सहल। विवेकानंद विला, पुलिस लाइन के पीछे, सीकर-३३२००१ राजस्थान/ २५ प्रति अंक
तद्भव : सं. अखिलेश, १८-२०१, इंदिरानगर, लखनऊ-२२६०१६/ ५० प्रति अंक
तनाव : त्रैमासिक। ५७ मंगलवारा, पिपरिया-४६१७७५/ १० प्रति अंक
तीसरा पक्ष : मासिक, सं. देवेश चौधरी देव, मासिक। ३७३४/२३ ए, त्रिमूर्तिकार, दमाहेनावा, जबलपुर-४८२००२ म.प्र./ २० प्रति अंक
दलित साहित्य : मासिक, जयप्रकाश कर्दम। बी-६३४, डीडीए लैट्स, ईस्ट ऑफ लोदी रोड, दिल्ली-११००९३/ ७० रुपये
देशज : मणि भवन, संकटमोचन नगर, आरा-८०२३०१/ १५ प्रति अंक
दिव्यालोक : जगदीश किंजल्क। साहित्य सदन, सी-५, आकाशवाणी कॉलोनी, सिविल लाइन्स, सागर, मप्र/ ५० रुपये
धरती : सं. शैलेन्द्र चौहान, अनियतकालीन। मीरसिंह, ४०२, रायल ब्लाक, साकार रेसिडेंसी, एबी रोड, इंदौर-४५२०११/ २० प्रति अंक
नटरंग : सं. अशोक वाजपेयी, रश्मि वाजपेयी। बी-३१, स्वास्थ्य विहार, विकास मार्ग, दिल्ली-११००९२/ ४० प्रति अंक
नया पथ : त्रैमासिक, सं. चंचल चौहान। जनवादी लेखक संघ, ८ विट्ठल भाई पटेल हाउस, नई दिल्ली-११०००१/ २० प्रति अंक
नया ज्ञानोदय : मासिक। भारतीय ज्ञानपीठ, १८, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, पो.बा. नं. ३११३, नई दिल्ली-११०००३/ २० प्रति अंक
नवनीत : मासिक, मुम्बई
निष्कर्ष : द्वैमासिक, सं. डॉ. गिरीशचंद्र श्रीवास्तव। डी-१/१७१, सेक्टर-एफ, जानकीपुरम, लखनऊ-२२६०२१/ २० प्रति अंक

परती पलार : द्वैमासिक, सं. राजराघव, नमितासिंह। आश्रम रोड, वार्ड नं. ८, अररिया-८५४३११ पूर्णिया/ २० प्रति अंक
परिकथा : २५, वेसमेंट, फेज-ट, इरोज गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली-११००४४/ २० प्रति अंक
परिचय : सं. श्रीप्रकाश शुक्ल। ६८, रोहित नगर, नरिया, वाराणसी-२२१००५
परिवेश : सं. मूलचंद गौतम। शक्तिनगर, चंदौसी, मुरादाबाद-२०२४१२/ २० प्रति अंक
पल-प्रतिपल : सं. देश निर्मोही। आधार प्रकाशन, एससीएफ २०७, सेक्टर-१०, पंचकूला-१३४११३ हरियाणा/ ५० प्रति अंक
पहल : १०१, रामनगर, आधारतल, जबलपुर-४८२००४/ ५० प्रति अंक
पक्षधर : सं. विनोद तिवारी। बी-३३/१४-७३, कोसलेश नगर, सुंदरपुर, वाराणसी-२२१००५/ ५० प्रति अंक
पूर्वापर : त्रैमासिक, सं. सूर्यपालसिंह। पूर्वापर प्रकाशन, निकट प्रधान डाकघर, सिविल लाइन्स, गोण्डा-२७१००१ उप्र/ २० प्रति अंक
प्रगतिशील वसुधा : द्वैमासिक, सं. कमलाप्रसाद। एम-३१, निरालानगर, दुष्यंत मार्ग, भदभदा मार्ग, भोपाल
प्रतिश्रुति : त्रैमासिक, सं. रामप्रसाद दाधीच। ९३, नैवेध, नेहरू पार्क, जोधपुर-३४२००२ राजस्थान/ २५ प्रति अंक
प्रति शीर्षक : सं. डॉ. बीएनसिंह। १११/९८, लैट-२२, आधार नगर, कानपुर-२०८०१२/ नि:शुल्क
पाखी : इंडिपेंडेट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-१०७, सेक्टर-६३, नोएडा-२०१३०१ उप्र/ २४० वार्षिक
पाठ : सं. देवांशु पाल। गायत्री विहार गली, विनोबा नगर, विलासपुर-४९५००१/ १५ प्रति
पुस्तक वार्ता : द्वैमासिक, सं. राकेश श्रीमाल। म.गा.अ.हि.वि. विद्यालय, पो.बा. नं. १६, पंचटीला, वर्धा-४४२००१ महाराष्ट्र/ १० प्रति अंक
प्रवासी संसार : ५/२३, डीडीए प्लाट, गीता कॉलोनी, दिल्ली-११००३१
बनास : सं. पल्लव, ४०३, बी-३, वैशाली अपार्टमेंट, सेक्टर-४, हिरणमगरी, उदयपुर-३१३००२/९४१४७ ३२२५८
बया : मासिक, सं. गौरीनाथ। बया साहित्य मंच, ३८, बृजपुरी एक्सटेंशन, परवाना रोड, दिल्ली- ११००५१/ ३० प्रति अंक
बयान : मासिक, सं. मोहनदास नैमिशराय। बीजी ५ए/३० बी, पश्चिम विहार, नई दिल्ली- ११००६३/ १० प्रति अंक
बहुवचन : त्रैमासिक ५० प्रति अंक। म.गा.अ.हि.वि. विद्यालय, पो.बा. नं. १६, पंचटीला, वर्धा-४४२००१ महाराष्ट
भारतीय लेखक : त्रैमासिक, सं. मोहन गुप्त। डी-१८०, सेक्टर-१०, नोएडा-१
भाषा (द्वैमासिक) : केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, पश्चिमी खंड-७, रामकृष्णपुरम, नई दिल्ली-११००६६/ २५ प्रति अंक, १२५ वार्षिक
मधुमती : मासिक। सेक्टर-४, हिरणमगरी, उदयपुर, राजस्थान/ १२० वार्षिक
मनस्वी : मासिक। एम-८, कृष्णदीप कॉम्पलेक्स, महारानी रोड, इंदौर-४५२००७
मनोवेद डाइजेस्ट : त्रैमासिक सं. डॉ. विनयकुमार। विजयमणि प्रकाशन, एनसी-११६, एसबीआई ऑफिसर्स कॉलोनी, कंकड़बाग, पटना-८०००२०/ ३० प्रति अंक
मुक्तिबोध : सं. डॉ. मांछीलाल यादव, मासिक। साहित्य कुटीर, गंडई-पंडरिया, राजनांद गांव- ४९१८८८ छतीसगढ़/ १० प्रति अंक
मुक्तिमार्ग : मासिक, सं. नानक चेलानी। ३०४, सफायर हाउस, सपना-संगीता मार्ग, इंदौर-४५२००१ / १० प्रति अंक
मूलप्रश्न : ३, न्यू अहिंसापुरी, ज्योति स्कूल के पास, फतेहपुरा, उदयपुर-३१३००१ राजस्थान
मीडिया विमर्श : मासिक, सं. डॉ. श्रीकांतसिंह। ४२८, रोहित नगर, फेज प्रथम, भोपाल/ २५ प्रति अंकय
युद्धरत आम आदमी : त्रैमासिक, सं. रमणिका गुप्ता। ए-२२१, डिफेंस कॉलोनी, भूतल, नई दिल्ली-११००२१/ २५ प्रति अंक
रंगकर्म : सं. उषा आठले, युवराजसिंह अजय। आठले हाउस, सिविल लाइंस, दरोगा पारा, रायगढ़ (छतीसगढ़)
रचना उत्सव : ३/१४७, विकास खंड, गोमती नगर, लखनऊ/ २५ प्रति अंक
लेखन सूत्र : मासिक, सं. विजयसिंह। बंद टॉकिज के सामने, जगदलपुर-४९४००१ (बस्तर) छतीसगढ़
व्यंग्य यात्रा : त्रैमासिक, प्रेम जनमेजय। ७३, साक्षरा अपार्टमंेटस, ए-३ पश्चिम विहार, नई दिल्ली-११००६३
वर्तमान साहित्य : सं. कुंवरपालसिंह, नमिता सिंह, मासिक। २८, एमआईजी अवंतिका-१, रामघाट रोड, अलीगढ़-२०२००१/ १८ प्रति अंक
वर्तिका : त्रैमासिक, सं. महाश्वेता देवी, अरुण कुमार त्रिपाठी। वाणी प्रकाशन, २१-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२/ ६० प्रति अंक
वाक् : त्रैमासिक, सं. सुधीश पचौरी। वाणी प्रकाशन, २१-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२/ ५० प्रति अंक
वागर्थ : मासिक। भारतीय भाषा परिषद, ३६ ए, शेक्सपियर सरणी, कोलकाता-७०००१७/ २० प्रति अंक
विकल्प : मासिक। अजित फाउण्डेशन, सेवगों की गली, आचार्यों की ढ़ाल,़ बीकानेर-३३४००५/ १५ प्रति अंक
विपाशा : द्वैमासिक। भाषा एवं संस्कृति विभाग, ३९-एस-डी-ए, शिमला, हिप्र/ १५ प्रति अंक, ६० वार्षिक

शब्दयोग : २८०, डोभाल वाला, देहरादून (उत्तराखंड)/ २० प्रति अंक
शेष : त्रैमासिक, सं. हसन जमाल। पन्ना निवास, साइकिल मार्केट के पास, लोहारपुरा, जोधपुर-३४२००२ राजस्थान/ २० प्रति अंक
शेष दुनिया : मासिक, सं. आचार्य सारथि। शेष दुनिया प्रकाशन, १/५७८६, बलवीर नगर चौक, शाहदरा, दिल्ली-११००३२/ ३० प्रति अंक
संधान : सं. सुभाष गाताडे, मासिक। बी-२/५१, रोहिणी, सेक्टर-१६, दिल्ली-११०००८५/ ४० प्रति अंक
संप्रेषण : ११९, श्रीजी नगर, दुर्गापुरा, जयपुर, राजस्थान/ २५ प्रति अंक
संबोधन : त्रैमासिक, सं. कमर मेवाड़ी। चांदपोल पो. कांकरोली-३१३३२४ जिला राजसंमद, राजस्थान/ १२५ वार्षिक
संवदिया : त्रैमासिक, सं. उमाशंकर अचल। जयप्रकाश नारायण, वार्ड नं. ७, अररिया-८५४३११ बिहार/ २० प्रति अंक
सबके दावेदार : सं. पकंज गौत्तम, लालसा लाल तरंग। मु. सीताराम, आजमगढ़-२७६००१/ २५ प्रति अंक
समकालीन भारतीय साहित्य : द्वैमासिक, सं. अरुण प्रकाश। रवीन्द्र भवन, ३५, फिरोजशाह रोड, नई दिल्ली-११०००१/ २५ प्रति अंक
समन्वय पूर्वोत्तर : केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, ओल्ड डी.आई.ऐ.ए. बिल्डिंग, दीमापुर/ ४० प्रति अंक
समय माजरा : मासिक। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन, आगरा रोड, जयपुर-३०२००३ राजस्थान/ १५ प्रति अंक
समय सुरभि अनंत : त्रैमासिक, सं. नरेन्द्र कुमारसिंह। शिवपुरी (नया जेल से पश्चिम), जिला-बेगूसराय-८५११०१/ १५ प्रति अंक
समयांतर : मासिक, सं. पंकज बिष्ट। ७९, ए दिलशाद गार्डन, दिल्ली-११००९५/ २५ प्रति अंक
समरलोक : त्रैमासिक, सं. मेहरुन्निसा परवेज। भोपाल, म.प्र.
समापर्वतन : १२९, दशहरा मैदान, उज्जैन-४५६०१० म.प्र./ १५ प्रति अंक
समीक्षा : त्रैमासिक, गोपालराय, हरदयाल। एच-२, यमुना, इ.गा.रा.मु. विश्वविद्यालय, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-११००६८/ २५ प्रति अंक
सर्वनाम : त्रैमासिक, सं. रजत कृष्ण। संकल्प प्रकाशन, बाग बाहरा, जिला- महासंमुद-४९३४४९/ २० प्रति अंक
सामयिक वार्ता : शब्द बुक्स प्रा. लि., ए-३२०४, सिल्वर सिटी, सेक्टर-९३, एक्सप्रेस वे, नोएडा - २०१३०० / १० प्रति अंक
साहित्य अमृत : मासिक। ४/१९, आसफ अली रोड, नई दिल्ली-११०००२/ १५ प्रति अंक
साहित्य वार्ता : सं. माधवेन्द्र, भरतप्रसाद। हिन्दी विभाग, पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, शिलांग-७९३०२२ मेघालय। ६ प्रति अंक
साहिती सारिका : सं. अजय कुमार। समकालीन तापमान परिसर, सिन्हा लाइब्रेरी रोड, पटना-८००००१/ २५ प्रति अंक
सुखन : त्रैमासिक। शेष दुनिया प्रकाशन, १/५७८६, बलवीर नगर चौक, शाहदरा, दिल्ली-११००३२/ ३० प्रति अंक
सृजनपथ : मासिक, सं. रंजना श्रीवास्तव। श्रीपल्ली, गली नं. २, तीन बत्ती मोड़ के पास, पो.ऑ.- सिलीगुड़ी बाजार, ७३४४०५ जिला- जलपाईगुड़ी/ २५ प्रति अंक
हंस : मासिक, सं. राजेन्द्र यादव। अक्षर प्रकाशन प्रा. लि., २/३६, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२/ २५ प्रति अंक
हिंदी अनुशीलन : सं. रामकमल राय, यतींद्र तिवाड़ी। भारतीय हिंदी परिषद, इलाहाबाद/ २५ प्रति अंक
हिमाचल मित्र : सं. कुशलकुमार। डी-४६/१६, साईं संगम, सेक्टर-४८, नेरुल, नवी मुंबई-४००७०६/ २५ प्रति अंक


राजस्थान की हिन्दी पत्रिकाएं :

अरावली उद्घोष : मासिक, सं. बीपी वर्मा पथिक। ४४८, टीचर्स कॉलोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर-३१३००४ राजस्थान/ २० प्रति अंक
अक्सर : त्रैमासिक, सं. हेतु भारद्वाज। ए-२४३, त्रिवेणीनगर, गोपालपुरा बाईपास, जयपुर- ३०२०१८ राजस्थान/ २५ प्रति अंक
अनुकृति : त्रैमासिक, सं. जयश्री शर्मा। ११ क ६, ज्योति नगर, सहकार मार्ग, जयपुर-३०२००६ राजस्थान/ २० प्रति अंक
कृति ओर : सं. विजेन्द्र, सी-१३३, वैशालीनगर, जयपुर-३०२०२१ राजस्थान/ २५ प्रति अंक
तटस्थ : त्रैमासिक, सं. डॉ. कृष्णबिहारी सहल। विवेकानंद विला, पुलिस लाइन के पीछे, सीकर-३३२००१ राजस्थान/ २५ प्रति अंक
प्रतिश्रुति : त्रैमासिक, सं. रामप्रसाद दाधीच। ९३, नैवेध, नेहरू पार्क, जोधपुर-३४२००२ राजस्थान/ २५ प्रति अंक
बनास : सं. पल्लव/ बी-३, ४०३-वैशाली अपार्टमेंट्स, सेक्टर-४, हिरणमगरी, उदयपुर
मधुमती : मासिक। सेक्टर-४, हिरणमगरी, उदयपुर, राजस्थान/ १२० वार्षिक
मारवाड़ी डाइजेस्‍ट : संपादक- रतन जैन, पडि़हारा (चूरू) राजस्‍थान
मूलप्रश्न : ३, न्यू अहिंसापुरी, ज्योति स्कूल के पास, फतेहपुरा, उदयपुर-३१३००१ राजस्थान
शेष : त्रैमासिक, सं. हसन जमाल। पन्ना निवास, साइकिल मार्केट के पास, लोहारपुरा, जोधपुर-३४२००२ राजस्थान/ २० प्रति अंक
संप्रेषण : ११९, श्रीजी नगर, दुर्गापुरा, जयपुर, राजस्थान/ २५ प्रति अंक
संबोधन : त्रैमासिक, सं. कमर मेवाड़ी। चांदपोल पो. कांकरोली-३१३३२४ जिला राजसंमद, राजस्थान/ १२५ वार्षिक
समय माजरा : मासिक। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन, आगरा रोड, जयपुर-३०२००३ राजस्थान/ १५ प्रति अंक
विकल्प : मासिक। अजित फाउण्डेशन, सेवगों की गली, आचार्यों की ढ़ाल,़ बीकानेर-३३४००५

राजस्थानी भाषा व उससे संबंधित पत्र-पत्रिकाएं
१. राजस्थली त्रैमासिक - सं. श्याम महर्षि, राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचारिणी सभा, श्रीडूंगरगढ़, बीकानेर
२. माणक मासिक - सं. पद्म मेहता, जलते दीप भवन, जालोरी गेट, जोधपुर।
३. नैणसी मासिक - सं. अंबू शर्मा, २०५, एसके देव रोड, लेक टाउन, कोलकत्ता।
४. तनिमा मासिक - सं. शंकुतला सरूपिया, १०, सिक्ख कॉलोनी, एमबी कॉलेज चौराहा, उदयपुर।
५. चौकसी पाक्षिक - सं. कजलीदास हर्ष, धर्मनगर द्वारा के बाहर, नया शहर, बीकानेर
६. कल्चर साप्ताहिक - सं. महावीर दाधीच, दाधीच भवन, जालोर।
७. युगपक्ष दैनिक - सं. उमेश सक्सेना, फड़ बाजार, बीकानेर।
८. सीमा संदेश दैनिक - श्रीगंगानगर
९. प्रभात केसरी साप्ताहिक - सं. सुरेश घोड़ेला, वार्ड नं. १९, प्रजापति मोहल्ला, नजदीक हेलीपेड, रावतसर
१०. राष्ट्रोत्थान सार पाक्षिक - सं. कुलदीपसिंह जेवलिया, वार्ड नं. २९, सेक्टर ५, नोहर
११. टाबर टोली़ पाक्षिक - सं. कमलेश शर्मा, १०/२२, आरएचबी, डी रोड़, हनुमानगढ़ जंक्शन।
१२. कानिया मानिया कुर्र त्रैमासिक - सं. कमलेश शर्मा, पो.बा. नं. २१, हनुमानगढ़ जंक्शन
१३. जलते दीप दैनिक - पद्म मेहता, जलते दीप भवन, जालोरी गेट, जोधपुर
१४. जोगती जोत मासिक - सचिव, राजस्थानी भा.सा.एवं सं. अकादमी, बीकानेर।
१५. सूरतगढ़ टाईम्स पाक्षिक - सं. मनोजकुमार स्वामी, टाईम्स चौक, अशोक विहार, सूरतगढ़।
१६. लोकमत दैनिक - अम्बेडकर सर्किल, बीकानेर
१७. राजस्थानी चिराग - सं. मोहनलाल, वैद्य मघाराम कॉलोनी, बीकानेर।
१८. बाट वाटिका मासिक - सं. भैंरुलाल गर्ग, नंद भवन, कांवा खेड़ा, भीलवाड़ा
१९. देस दिसावर मासिक - सं. जुगलकिशोर धूत, धूत भवन, सर्राफा बाजार, नांदेड़, महाराष्ट्र।
२०. गवरजा मासिक - चार भुजा चौक, लाडनूं (नागौर)
२१. कुरजां द्वैमासिक -
२२. राजस्थानी गंगा त्रैमासिक - राजस्थानी ज्ञानपीठ संस्थान, द्वारा हिन्दी विश्वभारती अनुसंधान परिषद्, नागरी भण्डार, स्टेशन रोड, बीकानेर
२३. लूर सं. जयपालसिंह राठौड़, गोपालवाड़ी, चौपासनी, जोधपुर
२४. ओळख द्वैमासिक - सं. भंवर कसाना, सुभाष चौक, डीडवाना, नागौर
२५. गुणज्ञान - सं. लक्ष्मणदास सैनी, मुख्य डाकघर के पास, हनुमानगढ़
२६. राजस्थान उद्घोष - सं. कुमार महादेव व्यास, व्येकटेश भवन, २३५, कालबादेवी रोड़, ३ मंजिल, मुम्बई -२
२७. वरदा - सं. उदयवीर शर्मा, पो. बिसाऊ, झुंझुनूं
२८. समाचार सफर पाक्षिक - सती चबूतरे की गली, मकबरा बाजार, कोटा - ३२४००६ सं. दुर्गाशंकर गहलोत
२९. तुमुल तूफानी साप्ताहिक - बड़ा बाजार, चंदौसी, उ.प्र.
कुछ पत्रिकाएँ वेब पर :-

http://www.hansmonthly.com
http://zindagilife.com
http://www.gitapress.org/hindi/homeH.htm
http://www.panchjanya.com/dynamic
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http://www.hindinest.com
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http://students.iitk.ac.in/meander/pratidhvani
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चांदी की चमक

'चांदी की चमक' हिन्दी बाल कहानी संग्रह है। दुलाराम सहारण द्वारा रचित इस संग्रह में कुल ५ कहानियाँ है। प्रस्तुत है शीर्षक कहानी के अंश -
चांदी की चमक
सुनसान हवेली। उससे सटी जमील चाचा की दुकान। दुकान के पार ही तो भाालिनी और रागिनी का घर था। दोनों सगी बहिनें। आपस में खूब स्नेह। दोनों मम्मी-पापा की आज्ञाकारिणी। भाालिनी बड़ी तो रागिनी छोटी।
दोनों बहिनें पढ़ने में होि ायार। समय पर स्कूल जाना और स्कूल का काम समय पर करना आदत में भाुमार। अध्यापकों के आदे ाों की अनुपालना में माहिर। बस यही कारण की दोनांे बहिनें अध्यापकों की चहेती।
घर से स्कूल और स्कूल से घर दोनों बहिनें साथ-साथ आती-जाती। कस्बे के मुख्य मार्ग से अलग होकर सुनसान हवेली के आगे से गुजरने वाली तंग गली में दोनों बहिनें जरूर कुछ डर महसूस करती। एक तो गली सुनसान। ऊपर से गली में बिखरे पत्थर।
वे पत्थर जो बरसात-पानी की मार से हवेली के भरभराकर गिरने से गली में गिरते। मोहल्लेवासियों ने परदेस बसे हवेली मालिकों से इस सम्बन्ध में काफी सम्पर्क किया। परंतु हवेली मालिकों ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। उनको हवेली से कोई मतलब नहीं था।
जब भी पत्थर गली में गिरते तो गली से गुजरना मुि कल हो जाता। आखिर थक-हारकर मोहल्लेवासियों ने जमील चाचा से बात की। कुछ मेहनताना देकर जमील चाचा को दायित्व दिया गया कि जब भी हवेली के पत्थर गली में गिरें तो उन्हें हटा दिया जाये।
बस तभी से जमील चाचा की ड्यूटी हवेली में ज्यादा व दुकान में कम हो गयी। कारण साफ था कि हवेली भव्य होते हुए भी पुरानी-जर्जर थी। मामूली-सी हलचल से उसका कोई न कोई हिस्सा गिर ही जाता था। और ऐसा होने पर जमील चाचा का दायित्व आगे आ जाता।
एक दोपहर की बात है। भाालिनी और रागिनी स्कूल से आ रही थी। सुनसान दोपहर में जब वे मुख्य मार्ग छोड़ सुनसान हवेली की गली में मुड़ी तो उनकी नजर जमील चाचा पर पड़ी। जमील चाचा हवेली से निकलकर अपनी दुकान में घुस रहे थे। उनके हाथ में एक कल ानुमा बर्तन था।
जमील चाचा ने दुकान में घुसते वक्त एक बार बाहर झांका। जब भाालिनी और रागिनी को देखा तो सकपका गए। परंतु अगले ही क्षण फुर्ती से दुकान में घुस गये। जब तक दोनों बहिनें दुकान पहुंची तब तक वे दुकान से बाहर आ चुके थे। उनके माथे पर पसीना दमक रहा था तो चेहरे पर बनावटी मुस्कान।
भाालिनी ने जमील चाचा से कल ा के विशय में पूछा तो जमील चाचा सफेद हो गये। बस कुछ नहीं... बस कुछ नहीं.....का ताना जमील चाचा ने बिछाया।
भाालिनी बात को ताड़ गई। उसने कई कहानियों में पढ़ा था कि पुराने लोग धन की सुरक्षा के लिए धन को कल ा में भरकर जमीन में गाड़ देते थे। कल ा गाड़ने वाले की असामयिक मौत से वह धन गड़ा का गड़ा ही रह जाता था। पुरानी हवेलियों में ऐसे गड़े कल ा काफी निकलते हैं।
भाालिनी को जमील चाचा पर भाक हुआ। उसे लगा कि जमील चाचा कुछ छिपा रहे हैं।
भाालिनी ने सोचा कि जमील चाचा को धन का लालच नहीं करना चाहिए। यह धन उनका नहीं है। हवेली मालिकों तक यह धन पहुंचाना चाहिए। परंतु अगले ही क्षण दिमाग में आया कि हवेली मालिकों को जब हवेली से ही कोई मतलब नहीं तो धन पर उनका क्या अधिकार ? उनकी हवेली के कारण पूरा मोहल्ला परे ाान होता रहे तो हो भले, उन्हें कोई मतलब नहीं तो धन उन्हें क्यों दिया जाये ! धन पर तो जमील चाचा का ही अधिकार है जो कि गली-मोहल्ले के लिए पत्थरों को हटाकर आने-जाने का मार्ग बनाते है।
पर नहीं। यह गलत है। उसने घर में व स्कूल में यही जाना था कि जिसकी जो चीज होती है उस पर ही उसका हक होता है। धन से भरा कल ा हवेली मालिकों का है। उस पर अधिकार उनका है। जमील चाचा को मेहनत के बदले मोहल्लेवासी मेहनताना देते हैं। उन्हें इमानदारी से कल ा के विशय में सबको बता देना चाहिए। भाालिनी ऊहापोह की स्थिति से बाहर आई तब तक जमील चाचा दुकान बंद कर जा चुके थे।
भाालिनी ने रागिनी को कुछ समझाया। रागिनी अपना स्कूल बैग भाालिनी को संभला मोहल्ले के अंदर भागी। जबकि भाालिनी जमील चाचा की दुकान की निगरानी में तैनात हो गई।
थोड़े ही समय बाद जमील चाचा की दुकान के आगे मोहल्ले वासियों का हुजूम हो गया। सब 'हवेली में गड़ा धन मिला - हवेली में गड़ा धन मिला` की चर्चा में म ागूल थे।
कोई एक जमील चाचा को घर से बुलाकर ले आया। दुकान खुलवायी गई। तला ाी ली गई। चांदी के रुपयों से भरा कल ा बरामद हो गया। जमील चाचा फक्क थे। उनकी नजरें भाालिनी और रागिनी पर थी। चांदी की चमक से अगर जमील चाचा को कोई दूर कर रहा था तो वे थी- भाालिनी और रागिनी।
मोहल्ले वासियों ने धन के उपयोग के बारे में काफी बातें की। किसी ने कहा कि धन जमील चाचा को मिला है तो धन उन्हें ही देना चाहिए। तो कोई कह रहा था कि धन चूंकि दबा मिला है अत: कानूनन उसे पुलिस को सुपर्द कर देना चाहिए। तो कोई कह रहा कि मोहल्लेवासियों को आपस में धन बांट लेना चाहिए क्योंकि इस हवेली के कारण सारे मोहल्लेवासी ही परे ाान होते हैं।
भाालिनी ने सबकी बातें सुनी तो दंग रह गई। उसने सोचा कि इससे अच्छा तो था कि वह जमील चाचा की हरकत अनदेखी कर देती। बेचारे गरीब जमील चाचा का तो भला होता।
भाालिनी को गम था कि कोई इस धन को उसके असली मालिक तक पहुंचाने की बात क्यों नहीं करता ! आखिर उससे रहा नहीं गया और वह बोल पड़ी -''चांदी से भरे कल ा पर हक हवेली मालिकों का है। उन्हें सूचित करो और कल ा सुर्पद करो।``
भाालिनी की बात पर सब नाराज हुए। यह कैसे हो सकता है भला ! जो मालिक अपनी हवेली को बिसार चुका, उसका धन ! जो मालिक अपनी हवेली से मोहल्लेवासियों को होने वाले परे ाानी का ही ख्याल नहीं करें, उसका धन ! नहीं ऐसा नहीं होगा।
लेकिन भाालिनी अड़ गई। धन पर अधिकार हवेली मालिकों का है। धन उन्हें ही सुर्पद किया जाए। भाालिनी की जिद को देखकर उसके पापा ने भी भाालिनी का साथ देना उचित समझा। आखिर कुछ और लोग सहमत हुए।
फोन से हवेली मालिकों को गड़ा धन मिलने की सूचना मोहल्ले की तरफ से दी गई। उनसे यह भी निवेदन किया गया कि आपकी हवेली में धन मिला है तो निि चत ही यह आपके पुरखों की गाढ़ी कमाई है। अतएवं इस पर आपका अधिकार है।
हवेली मालिक मोहल्लेवासियों की इमानदारी भरी बातों से प्रभावित हुए। उन्होंने फोन पर ही निर्देि ात किया कि यह धन जमील चाचा को दे दिया जाए तथा उन्हें कहा जाए कि इस धन से इमानदारी का कोई काम भाुरू करें और कमाएं-खाएं। हवेली मालिकों ने मोहल्लेवासियों को आ ाान्वित किया कि वे जल्द ही आएंगें और हवेली से होने वाली परे ाानी से मोहल्ले को निजात दिलाएंगें।
फोन पर हवेली मालिकों से की गई बात जब सबके सामने आई तो सब हतप्रभ रह गए। चांदी की चमक से हवेली मालिकों का प्रभावित न होना सबको रास आया। थोड़ी देर पहले हवेली मालिक जो बुरे लग रहे थे; वे अब सबको अच्छे लगने लगे। जमील चाचा भी खु ा थे। भाालिनी और रागिनी भी खु ा थी।
कई दिनों बाद सुनसान हवेली के मालिक आए। उन्होंने हवेली का मुआयना किया। मोहल्लेवासियों से चर्चा की। काफी विचार-विम र्ा के बाद उन्होंने तय किया कि हवेली को समतल किया जाए। इसकी जगह विद्यालय भवन बनाया जाए और सरकार को सौंपा जाए।
हवेली मालिकों की दानवीरता और भाालिनी की समझदारी से सब मोहल्लेवासी प्रसन्न थे। चांदी की चमक से बेहतर भी कोई फैसला होता है; यह उन्होंने जान लिया था।

दुर्गेश


संक्षिप्त परिचय : दुर्गेश
जन्म : २५ मार्च, १९५२ ई।
जन्म स्थान : चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम : श्री मेघाराम माली
शिक्षा : बी।ए। ऑनर्स हिन्दी (लोहिया कॉलेज, चूरू)
सेवा : लिपिक, जिला कलेक्ट्रेट, चूरू
पत्रकारिता : अध्ययनकाल से ही दैनिक नवज्योति सहित कई पत्र-पत्रिकाओं हेतु संवाद संकलन का अनुभव।
लेखन : देश की प्रमुख हिन्दी व राजस्थानी पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखन।सतर-अस्सी के दशक के पत्र-पत्रिकाओं मे चर्चित रचनाकार। प्राय: पत्र-पत्रिकाओं के हर अंक में स्थान। अंतिम समय तक क्रम जारी।
पुस्तक प्रकाशन : कालपात्र : हिन्दी लघुकथा काळो पाणी : राजस्थानी लघुकथा धूल की धरोहर : हिन्दी कहानी ऊजळा दागी : राजस्थानी व्यंग्य नवांकुर : संपादन, नवोदित रचनाकारों की रचनाएँ









पुरस्कार : शिवचंद्र भरतिया गद्य पुरस्कार, पुस्तक 'काळो पाणी` (राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा)प्रयास सम्मान-२००६ (समग्र योगदान के लिए प्रयास संस्थान, तारानगर इकाई द्वारा) कर्णधार सम्मान (राजस्थान पत्रिका द्वारा) सहित अनेकों संस्थाओं द्वारा सम्मानित।



आयोजक : अच्छे आयोजक। अनेकों बड़े-बड़े साहित्यिक समारोहों के संयोजक। आयोजनों में माहिर। कमलेश्वर, भीष्म साहनी से लेकर अनेकों लेखकों का समागम करने में कुशल।
विशेष : चूरू अंचल के नवोदित साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने में अग्रणी।
स्वर्गवास : १८ नवम्बर, २००७, चूरू में सीढ़ियों से फिसलने के कारण आकस्मिक।
सम्पर्क : श्री अमित कुमार सैनी (पुत्र), रामजस का कुआं, अगुणा मोहल्ला, चूरू-३३१


दुर्गेश की रचनाओं की एक बानगी
हिन्दी व्यंग्य-
निमंत्रण की चाह में
चौरासी लाख जीवों में मुझे गधा ही सर्वाधिक पसंद है। इसके कई कारण है। गधेेेेेेेेेे या गधे रेहड़ी पर चाहे चार गुना बोझा डाल दो, वह कोई शिकायत नहींंंंंंंं करेगा। चार गुना वजन लादने पर रेहड़ी नीचे लटक जायेगीं और गधा बेचारा हवा में ऊंचा अटक जायगा। लेकिन मजाल है किसी छोटी बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटा दे। दूसरी बात गधे की आवाज मुझे सर्वाधिक सुरीली लगती है। हो सकता है मुझे नाद और सुरों का ज्ञान न हो। पर मुझे शास्त्रीय संगीत से क्या मतलब है? जो मन को भावे वह श्रेष्ठ। तीसरी बात गधे के लिए किसी विशेष पशु आहार की आवश्यकता नही रहती। वह चाहे जैसा घास-फूस खाकर चाय की पत्तियों के अवशेष की चटनी खाकर संतोष कर लेता है।
गधे पर बैठकर पाकिस्तान की यात्रा करना मेरे जीवन की अंतिम और एक मात्र इच्छा है। एक समाचार के अनुसार पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ 'हॉट एयर बैलून` से भारत आएंगे। उन्होने हॉट एयर बैलून से अमृतसर आने का निमंत्रण स्वीेकार कर लिया है। एक विदेशी समाचार पत्र के अनुसार 'वर्ल्ड हॉट एयर बैलून एसोसियशन` के अध्यक्ष व पूर्व सांसद विश्व बंधु गुप्त ने मुशर्रफ को यह निमंत्रण दिया। इस समाचार को पढ़कर मेरा चंचल चित और भी चलायमान हो गया और गधे पर बैठकर पाकिस्तान जाने की मेरी लालसा और भी बलवती हो गई।
पाठक मेरी इस भावना को कोई प्रतिक्रिया न समझें, क्यों? कि हमारे देेश के दिग्गज नेता तक ऐसा कर चुके हैं फिर मेरी तो उनके सामने हैसियत ही क्या है। एक बार पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी 'पेट्रोल बचाओ` के प्रतीक रूप में बग्घी में बैठकर संसद गई। तब दिग्गज विपक्षी अटल बिहारी वाजपेयी कब चुकने वाले थे। सो वे पीछे से तांगे में सवार होकर ससंद पहुंचे।
काश मुझे भी कोई खान, हुसैन या अली गधे पर बैठकर पाकिस्तान आने का निमंत्रण दे और मैं उसे स्वीकार कर दोनों देशो के मध्य प्रेम का पुल बांध दूं।

कुर्सी बचाने का अमोध अस्त्र
भारत के प्रखर राजनीतिज्ञ चाणक्य ने राज्य संचालन के लिए मुख्य रूप से समुदाय दण्ड और भेद की नीति को प्रमुखता प्रदान की थी। मोटे रूप में आज भी राजनीति में इन्हीं सूत्रों को अपनाया जाता है। पर चाणक्य ने जिस समय राजनीति के ये सूत्र बताये थे उस समय राजतंत्र था। राजतंत्र में इन चारों सूत्रों की सहायता से सहज-भाव से शासन किया जा सकता है। पर आज के इस लोकतांत्रिक शासन में इन सूत्रों के बाद जो पंाचवा सूत्र है वह है; मंत्रिमंडल विस्तार की उद्घोषणा और आज यह सूत्र कुर्सी बचाने का अमोद्य अस्त्र है।
यों तो आजादी के बाद सुनहरे नारों की देश में अच्छी पैदावार की गई। और इन नारों के बल पर देश पचास वर्ष तक चलता भी रहा। लोकतंत्र में सत्ता प्रमुख को जनता का कोई भय नहीं होता, क्योंकि एक बार देश प्रमुख अथवा राज्य प्रमुख बन जाने के बाद जनता में ऐसी कोई ताकत नहीं होती कि वे अपने नेता को पदच्युत करे दें। प्रजातंत्र में प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री को कोई खतरा होता है तो मात्र अपने ही दल के सदस्यों का वे जब चाहें तब अंसंतुष्टों का अलग पाला बनाकर मुखिया जी की कुर्सी को हिला सकते हैं। ऐसे में सत्ता प्रमुखोंे ने किसी आधुनिक चाणक्य से इसकी काट पूछी तो उसने मंत्रिमंडल विस्तार के अमोध अस्त्र का आविष्कार किया, जो सर्वथा सफल सिद्व हुआ।
चाहेे देश का प्रधानमंत्री हो अथवा किसी राज्य का मुख्यमंत्री कुर्सी प्रधान सत्ता के सिंहासन पर बैठकर सर्वप्रथम यही घोषणा करेगे कि अभी तो मंत्रिमंडल प्रतीक रूप में बनाया गया है, मंत्रिमंडल का विस्तार तो आगे किया जाएगा। कुर्सी प्रमुख की इस घोषणा से जो सदस्य बगावत पर उतारू रहते है वे तत्काल ठंडे पड़ जाते है और अपने को अगले विस्तार का मंत्री समझकर संतुष्ट हो जाते है। कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात् सत्ता-प्रमुख को सर्वप्रथम अपने ही खास व्यक्तियों से चुनौती मिलती है और वे राज्य में आम आदमी के दु:ख का राग अलापने लगते है। अपने सदस्यों की यह राग सुनकर चतुर राजप्रमुख तत्काल समझ जाते है कि अब इनके पेट मे असंतुष्टि के कीटाणु पनपने लगे हैं। इसलिए अब एक विस्तार तो करना ही पड़ेगा। और कुछ दिनों में एक सादे पर गरिमामय समारोह में मंत्रिमंडल का विस्तार कर दिया जाता है। इस समारोह में सत्ता प्रमुख सबसे पहले यही घोषणा करेगे कि परिस्थितिवश यह छोटा सा विस्तार करना पड़ गया मंत्रिमंडल का बड़ा विस्तार तो कुछ समय बाद किया जाएगा। राजप्रमुख की इस घोषणा से शपथ समारोह में शपथ से वंचित जो सदस्य मन ही मन असंतुष्ट होने का संकल्प दुहराते रहते है; वे तत्काल अपने संकल्प से डिग जाते हैं और समारोह पंडाल मुख्यमंत्री जी जिंदाबाद, अगला विस्तार शीघ्र हो के नारों से गुंज उठता है।
पर जब पर्याप्त समय बीत जाने के बाद भी पुन: मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं होता तो सदस्यों की रगे एठनें लगती है और उन्हें राज्य में सर्वत्र शासन में कसावट का अभाव दिखने लगता है। वे कभी राज्य में कानून व्यवस्था बिगड़ने का सवाल उठाते हैं तो कभी उन्हें अन्य लोगों की बेराजगारी सताने लगती है। वे अपने प्रमुख के पचास गुण गांएगे तो सौ अवगुणों को भी गिना देगें। अपने ही दल के ऐसे तीखे तेवर देखकर वे तत्काल भांप लेते हैं कि अब इनको लालबत्ती और झंडी लगी गाड़ी के सपने खटकने लगे है और वे कुछ ही दिनों बाद मंत्रिमंडल विस्तार का संकेत देकर एक बार फिर अपनी कुर्सी बचा लेते है । बस मंत्रिमंडल के इसी अमोध अस्त्र के सहारे एक प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आराम से पंाच वर्ष व्यतीत कर देते हैं।

गले वोटों की जेवड़ी
मैं लतिया नामक दलदल पार्टी का नेता हूं। मतदाता मेरे आदर्श हैं और वे मेरे रोम रोम में समाये हुए हंै। वोटरों के अलावा जीवन में मुझे कुछ भी नहीं सुहाता। मैं सुबह शाम, दिन-रात, उठते-बैठते, खाते-पीते, ऊंघते-ऊंघतें, सोते-जागते मतदाताओं की ही माला जपता हूं। यदि प्रजातंत्र में नेता के लिए कोई इष्ट, आराध्य, आदरणीय, नमनीय और प्रात: स्मरणीय है तो वे वोटर ही हैं। इसलिए जब भी मुझे कोई मतदाता मिल जाता है तो मैं उसे दुआ देकर नमन् करता हूं। चुनावों के समय तो मैं प्रत्येक वोटर तक कनक दंडवत करता हुआ उसके दरबार मे मत्था टेकने पहुंचता हूं। सामान्य लोग प्रतिदिन मंदिर और शिवालयों में जाकर देव मूर्तियों के सामने नतमस्तक होते है पर मैं एक सजग नेता हूं। वोटर की नब्ज और समय की गति पहचानता हूं। इसलिए मैं मदिरों की टालियां नहीं हिलाकर सुबह शाम वोटरों के हित टटोलता रहता हूं। वोटर और मेरा चोली दामन का साथ है। मतदाता मेरे लिए नीर है और मैं मछली। जिस प्रकार मछली को पानी में से निकालते ही वह तड़पने लगती है उसी प्रकार मतदाताओं से अलग होते ही मैं छटपटाने लगता हूं।
मैं पानी हूं तो वोटर मेरे लिए चंदन है। मतदाताओं में मुुझे कुर्सी की महक, शपथ की लय, सचिवालय का द्वार, सिविल कॉलोनी की चहल पहल, मोबाइल की राग, शिलान्यास का पत्थर, उद्घाटन का फीता और चाटन की चासनी की झलक मिलती है। जैसे भक्त के लिए भगवान् की एक झलक ही पर्याप्त होती है वैसे ही चौफूली मुहर और इलेक्ट्रोनिक वोटर मशीन का बटन ही मेरे हृद्य की धड़कन है। आम आदमी को पुष्पों मे सुगंध आती है पर मुझे तो वोटरों में ही एक दिव्य महक आती है। वस्तुत: वोटरों की जिंदगी गाथा गाई जाये उतनी ही कम है। लोकतंत्र मे वोेटर ही एक ऐसा देदीप्यमान नक्षत्र है जो एक नेता को सड़ी गली से उठाकर सचिवालय के गलियारे मे पहुंचा देता है। जिस व्यक्ति के लिए गांव की चौपाल के दर्शन दुर्लभ होते हैं, वोटर उसे सदन की चकाचौंध में ले जाकर बैठा देता है। वोटर मरियल व्यक्ति को पहलवान बना देता है, उसकी इच्छा हो तो लाल बत्ती और झंडी की गाड़ी और कमांडो उपलब्ध करवा देता है। उसकी मेहरबानी से एक कंगला मात्र पांच वर्ष में करोड़पति बन जाता है। नेता के प्रति यदि वोटरों की सद्भावना जागृत हो जाये तो वे उसे गधे पर से उठाकर हेलीकॉप्टर पर बैठा देते है। उसके हाथ में फीता काटने की कैंची पकड़ा देते हैं ओर उसे उद्बोधन करने की महाशक्ति प्रदान कर देते हंै।
वस्तुत: प्रजातंत्र में वोटर की महिमा अपरम्पार है। उसके अहसानों को वाणी और कलम से व्यक्त नहीं किया जा सकता है। मैं तो वोटरों के प्रति सर्वथा समर्पित होकर उनसे यही कहता हूं:-
नेता कुत्ता वोटरोंे का, लतिया मेरा नाऊंं।
गले वोटो की जेवड़ी, जित खिंचे तित पाऊं।।

सखी! सघन साक्षरता सांग आयो री!
प्रात: स्मरणीय निरक्षर महापंडित जगत्-बाबा कबीर ने अब से पांच शताब्दी पूर्व लोगों को शिक्षा का एक सीधा-सादा दर्शन दिया था। कबीर साहब की इस बारहखड़ी में मात्र ढ़ाई अक्षर ही थे। यदि लोग कबीर के प्रेम रूपी इन ढ़ाई अक्षरों को हृद्यगम कर लें तो सम्पूर्ण विश्व को साक्षर और शिक्षित समझना चाहिए। पर दुर्भाग्य से लोगों ने कबीर के इस दर्शन को एक पागल की सनक बताकर छोड़ दिया और इस परम् पवित्र धरा की छाती पर अनगिनत विद्यालय सूल की तरह खड़े कर दिये गये। पर इन विश्वविद्यालयों से लोग अधिक शिक्षित होकर मूर्ख के मूर्ख रहे। और तो और आदमीनुमा जीव ने अपने शातिर मस्तिष्क के तन्तुओं को अति सक्रिय कर दागल चांद को और भी दागनुमा कर दिया है। स्वाभाविक जन्मे लोगों के लिए तो पृथ्वी पर पैर धरने को ही जगह नहीं है, इधर जैव रसायन शालाओं में ट्यूब टायर बच्चे भी उत्पादित किये जाने लगे हैं। कैसी महान् उपलब्धि है, शिक्षित आदमी की। इस अड़सठ वर्ष व्यक्ति को जब जमीन की शिक्षा से संतोष नहीं हुआ तो वह पराई भूमि पर पढ़ने जाने लगा। दिल्ली का लड़का लंदन में पढ़ता है तो भूटान का बच्चा शिक्षा के लिए भारत में पधार रहा है। रामायण और महाभारत काल में यंत्रों से भी बहुत आगे निकल चूके विश्व आकाओं को अब भान हुआ है कि सारा संसार तो अभी निरक्षर पड़ा है और हम व्यर्थ में ही एक दूसरे पर मिसाइलें दाग रहे है। अत: हमें सर्वप्रथम आल वर्ल्ड को लिटरेट करना चाहिए। यह लिटरेट मनुष्य लिटरेट होकर कितना इल लिटरेट और असभ्य हो जाता है इस तथ्य पर तनिक भी विचार किये बिना विश्व के शिक्षाविदों ने सम्पूर्ण संसार के करोड़ों- करोड़ों रूपये कुछ सशक्त हाथों मे डाल दिये। यह फाऊ (फोकट) का पैसा पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ राजस्थान की शुष्क मरुधरा पर भी पहुंच गया। प्रकृति से बुरी तरह प्रताड़ित, दारू-मारू, दहेज, सती, घुंघट, अडाण (गिरवी) और टसरिये (अफीम सेवन) की अब खाइयों (कठिनाइयों) से पहले से ही दबे-चिथे राज्य में सम्पूर्ण साक्षरता ने जैसे कोढ़ में खाज (खुजली) का कार्य किया। यहां तो पहले से ही मंदिर-मेड़ियों की भरमार थी। सरकार ने साक्षरता के बहाने कोने-कोने में अनगिनत आखर मेड़ियों और आखर धामों की थरपणा (स्थापना) कर सम्पूर्ण साक्षरता को एक मजाक बनाकर रख दिया है। मैं साक्षरता और शिक्षा के महत्त्व बनाकर रख दिया है। मैं साक्षरता और शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझ रहा हंू, ऐसी बात नहीं है। पर साक्षरता और शिक्षा मनुष्य के लिए प्रथम आवश्यकता कतई नहीं है।
मनुष्य की पहली आवश्यकता तो रोटी है। तभी वो जनकवि हरीश भादानी जन सभाओं में लोगों को यह कटु सत्य बताते रहते हैं कि रोटी नाम सत्य है, खाये सो मुगत है। यही कहने का तात्पर्य यह है कि राजस्थान के आम भूखे-नंगे व्यक्ति को पहले रोटी चाहिए न कि पाटी। कपड़े-मकान तो बहुत बाद की बात है। जब यहां का सामान्य नागरिक गरीबी की रेखा से नीचे जी रहा है, लोगों के सामने रोटी की समस्या मंुह बाए खड़ी हो, आय का कोई साधन न हो, यहां तक कि पीने का पानी भी सुलभ नहीं हो, ऐसी नग्रावस्था में थोक और कमीशन में ढ़ोलक-मंजीरे खरीदकर आखर मेंड़ियों पर साक्षरता की सांकल खाना कहां की बुद्विमानी है? दूर-दराज के गांवों-कस्बों में जब जिप्सी में बैठकर आखर साहब पहुंचते है तो राज और साहब की आंतरिक बेईमानी से सर्वथा अनभिज्ञ गांव की भोली-भाली नारियां एक-दूसरी को संबोधित कर यही कहती है-सखी सघन साक्षरता सांग आयो री।

हम भी हैं दावेदार
आगामी विधानसभा के चुनाव को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक दलों के महारथियों ने अपनी-अपनी गोटियां फिट करने, पाला बदलने और मतदाताओं के आगे नत-मस्तक होने की कवायद शुरू कर दी है। पर यह कोई नई बात नहीं है। चुनावों का यह प्रपंच तो इस देश में गत पचास-पचपन वर्षोंं से नए-नए रूपों में हो रहा है।
आगामी चुनावों के सबंध मे सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार आम से आम आदमी भी टिकट मांग रहा है। यदि इन टिकट चाहने वालों की बात सच निकल जाए तो यह समझना चाहिए कि इस बार विधानसभा में सारे ही नए चेहरे होंगे।
एम.एल.ए. और रेल-बस की टिकट में अन्तर नहीं समझने वाले धूड़ाराम को पता नहीं कैसे चुनावों की भनक लग गई। धूड़ाराम लोगों की बकरियां चराता है। ज्योंही उसने चुनाव और टिकट मिलने की बात सुनी तो उसने सभी को कह दिया कि अब आप कोई दूसरा ग्वाला ढूंढो; मैं तो इस बार एम.एल.ए. का टिकट मांग रहा हूं। दुनिया के इतिहास में एम.एल.ए. तो क्या एक गडरिया राष्ट्रपति तक बना है।
कुछ दिनों पहले मुझे गुरु अश्रद्वानंद जी मिल गए। गुरुजी ने अपने जीवन में छात्रों को फूटा अक्षर नहीं सिखाया। दिनभर गांजे की सिगरेट पीने और सट्टा करने के अलावा उन्हांेने केवल नियमितता बरती तो केवल फोकट का वेतन उठाने में। मैने उन्हें प्रणाम कर पूछा-गुरुजी, आजकल फुर्सत में कैसे लग रहे हैं? वे मुस्कराकर बोले-'तुम्हें पता नहीं, मैंने मास्टरी छोड़ दी है। पैंतीस सालों में मैंने हजारों बच्चों को पढ़ाया है। उन हजारों के लाखों अभिभावक है। अबकी बार मैं विधानसभा का टिकट मांग रहा हूं। अब तुम ही बताओे कौन है मुझे हराने वाला।` मैं उन्हें पुन: नमस्कार कर आगे बढ़ गया।
अफलातून गधा रेहड़ी से पलदारी करता है। जब उसने चुनावों की चर्चा सुनी तो उसने रेहड़ी किसी अन्य को बेच दी और दिनभर रेहड़ी वालों से कहता रहता है कि फलां पार्टी इस बार किसी मजदूर को टिकट देगीं अपने क्षेत्र में मुझसे योग्य मजदूर और कौन होगा? मैं एम.एल.ए. का टिकट मांग रहा हूं। आप अभी से मेरी हवा बनानी शुरू कर दें।
और तो और इस बार वे लोग भी टिकट मांग रहें हैं जिन्होंने कभी पार्षद अथवा वार्ड पंच का भी टिकट नहीं मांगा। एक दिन सर्किट हाऊस में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष आए हुए थें। वहां अधिकतर वे लोग थे जो कभी ऐसे स्थानों पर नहीं आते हैंं। मैंेने एक परिचित पिचकारीलाल से पूछा- 'आप लोग तो किसी जन समस्या का ज्ञापन देने आए हांेेगे?` वह बोला-'नहीं, मैं भी इस बार टिकट मांग रहा हूं और मेरे साथ जो लोग खड़े हैं ये भी टिकट मांगने आए हैं।` पिचकारी लाल की बात सुनकर मैंने पक्का निश्चय कर लिया कि अब किसी से कुछ भी नहीं पूछूंगा।

अध्यक्ष बनने का आनंद
यों तो मंत्री बनने में जो रस और सुखानुभुति है; वह अनिर्वचनीय है, पर किसी आयोग का अध्यक्ष बनने में जो आनंद है; वह मंत्री पद से कई गुना अधिक है।
मंत्री बनने के लिए सर्वप्रथम किसी महत्त्वपूर्ण दल का टिकट प्राप्त करना आवश्यक है और ऐसे दल का टिकट प्राप्त कर लेना संजीवनी बूटी से कम नहीं है। यदि टिकट मिल भी जाए तो फिर अपार धन, अनगिनत लठैत और लोगों से अद्वितीय नाटककार की तरह बातचीत की योग्यता आवश्यक है और नाकों चने चबाकर कोई एम.पी., एम.एल.ए. बन भी जाए तो मंत्री बनने के लिए महाभारत जैसा युद्ध लड़ना पड़ता है।
और यह युद्ध जीतकर कोई योद्धा मंत्री बन भी जाए तो सदन में विपक्षी उसके कान ऐंठे और वोट क्षेत्र में कार्यकर्त्ता उनसे सौ-सौ डिजायर करवाएं। कुल मिलाकर मंत्री बनने के सौ सुख हैं तो आनंद के अतिरेक में खलनायकों की खलल भी उन्हें झेलनी पड़ती है लेकिन किसी आयोग का अध्यक्ष बन जाए यह पद माला डी की तरह सर्वथा सुरक्षित है। एक आयोग अध्यक्ष को वे सभी असीमित सुविधाएं मिलती है जो एक मंत्री भोगता ह,ै भले ही वह किसी आयोग का ही अध्यक्ष क्यों न हो? आयोग अध्यक्ष को लालबत्ती की गाड़ी मिलती है तो खाकी वर्दी का अं्रगरक्षक भी उपलब्ध करवाया जाता है।
समय-समय पर अध्यक्ष जी के टूर-प्रोग्राम बनते हैं तो कोई सरकारी पालतू उनके प्रोटोकोल में भी खड़ा रहता है। ऐसा अध्यक्ष किसी सर्किट हाऊस या रेस्ट हाऊस में रूकता है तो अनगिनत प्यादे उनके चारों ओर वैेसे ही चक्कर लगाते हैं जैसे बरसात के मौसम में रोशनी पर मच्छर चक्कर काटते हैं। आयोग अध्यक्ष कूड़े के ढ़ेर, गंदी नाली आदि का निरीक्षण भी मंत्री की शैली में करता है तो सरकारी गुर्गो पर भी गुर्राता है। ऐसे अध्यक्ष के कपड़े भी ठीक मंत्री वाली महंगी खादी के होते हैं और खीसंे भी वह मंत्री की तर्ज पर ही निपोरता है। चमकते जूते, मंुह में पान दबाए, सुनहरा चश्मा लगाए, हाथ मेंं मोबाइल लिए दो-दो कलम टांगे और नाटकीय मुद्रा में फर्जी ढंग़ से आपको हाथ जोड़ता कोई दिख जाए तो समझिये ये किसी आयोग के अध्यक्ष है। आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए न तो टिकट मांगनी पड़ती ह,ै न चुनाव लड़ना पड़ता है, न मतदाताओं के तलवे चाटने पड़ते हैं इसलिए यह पद 'अनुकम्मा पद` के नाम से जाना जाता है।
यहां प्रश्न उठता है, तो फिर कौन बनता है आयोग का अध्यक्ष? आयोग अध्यक्ष वही बन जाता है, जो प्रतिदिन कुछ समय के लिए अपने आका के बच्चों का मनोरंजन कर दे, आकी की जूती सरका दे, आका के काका की चिलम भर दे, आकी को बाजार घुमा लाए और उनके कुत्ते को दुलारता रहे। चमचा ज्यों-ज्यों अपने आका के कुत्ते को दुलारता है त्यों-त्यों आका का चमचे के प्रति विश्वास दृढ़ होता जाता है और एक दिन उसे अनायास ही किसी आयोग का अध्यक्ष बनाकर उसे मंत्री का दर्जा दिला दिया जाता है।

साक्षात्कार एक प्रत्याशी का
सर्वनाश शराब पार्टी के ठेकेदार फर्जीलाल इस बार मान्यता प्राप्त पार्टी का टिकट ले आए। टिकट मिलते ही इन्होंने नामांकन पत्र भरा और सफारी सूट को तिलांजलि देकर झट सफेद खादी का कुर्ता पाजामा धारण कर लिया। मुंह में पान, हाथ में मोबाइल और चमचमाते जूतों से इनका व्यक्तित्व देखते ही बनता है।
चुनाव टिकट मिलने के बाद फर्जीलाल में सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया कि आज तक ये चौबीसों घंटो मंुह फुलाए रखते थे लेकिन अब इनके होठों पर हरदम एक दिव्य मुस्कान देखी जा सकती है। इस प्रकार के प्रत्याशी का साक्षात्कार लेना जरूरी समझा गया जो पाठकों की जानकारी के लिए नीचे दिया जा रहा है।
आप तो पहले से ही बहुत सम्पन्न है। अच्छा व्यवसाय चलता है, पास में पर्याप्त धन है फिर आपने राजनीति में आने का निर्णय क्यों लिया?
देखिए बात स्पष्ट है। राजनीति भी एक आकर्षक व्यवसाय है। इसमें पाशा एक बार अनुकूल पड़ जाए तो पीढ़ियों तक को लाभ होता है। फिर राजनीति में रहकर दूसरे गलत कार्य भी निर्विघ्न रूप से किये जा सकते हैं। एक नेता का कार्य चाहे कितना ही नियम विरूद्ध हो उसके काम में कोई रूकावट नहीं डाल सकता।
टिकट मांगने के लिए आपके पास क्या आधार थे?
टिकट मांगने के लिए मेरे पास पैसा और पहुंच दोनों ही आधार थें।
यह टिकट प्राप्त करने में आपका कितना पैसा लगा?
कुछ मुस्कराकर यह बात साक्षात्कार में प्रकट नहीं की जा सकती। अन्य प्रश्न पूछें।
इस चुनाव में प्रत्याशी के पास पैसे आने के कौन-कौन से सा्रेत हैं?
ऐसे कई सा्रेत है। एक तो चुनाव के लिए धर्म जाति और सम्प्रदाय के नाम पर लोगों से चंदा लिया जायेगा, दूसरे सम्पन्न कार्यकर्ता भी अपने स्वार्थ के लिए प्रत्याशी को पैसा देते हैं और मोटी रकम देते हैं वे व्यवसायी जो जीतने के बाद प्रत्याशी से अपने मनोवांछित काम करवाते हैं। उन लोगों के गलत सलत काम करवा देने पर वे और भी मोटी रकम देते है।
यह चुनाव जीतने के लिए आपने कौन सी रणनीति अपनाई हैं?
देखिए, चुनाव जीतने के लिए मात्र एक रणनीति से काम नही चलता। इसमें तो साम, दाम, दण्ड, भेद चारों ही नीतियां अपनाई जाएगी। लठैत की भर्ती की जा रही है, शराब भी अनेक क्षेत्रों में सप्लाई की जायेगी, इसके लिए नकली शराब फैक्ट्री का काम प्रगति पर है। कई जगह नकद पैसे भी फैंंकने होंगे।
विधायक बनने के पीछे आपकी मूल भावना क्या है?
यह मूल भावना तो सभी जानते है, पट्टा, परमिट, प्लाट, पावर, पेंशन क्या नहीं है इस पद के पीछे?
विधायक बनते ही सर्वप्रथम आप कौनसा कार्य करेंगे?
सर्वप्रथम तो मंत्रिपद के लिए ही भागदौड़ रहेगी।
आपको मंत्रिमंडल में नही लिया गया तो?
फिर तो मुझे असंतुष्टोंे के पाले में ही जाना पडेग़ा।
आपकी राजनीति का अंतिम उद्देश्य क्या हैं?
सबसे ऊंची कुर्सी प्राप्त करनी ही मेरी राजनीति का अंतिम उद्देश्य है।
जनसेवा के लिए आपकी क्या-क्या योजनाएं है?
एक विधायक अपनी सेवा अच्छी तरह कर ले तो ही बहुत है, जन सेवा तो मात्र राजनीति का एक नारा है।
राजनीति में आप अपना आदर्श किसे मानते हैं?
वे सभी छोटे बड़े नेता मेरे आदर्श हैं जो मात्र शब्द जुगाली से ही अपनी रोटियां सेकते रहते हैं।
राजनीति में ऐसा क्या आकर्षण है जो आजकल अधिक लोग इस क्षेत्र की ओर आकर्षित हो रहे हैं?
अपार धन, देश-विदेश की यात्राएं, फोटो, माला, शिलान्यास, उद्घाटन और मीडिया मंे छाए रहने के कारण ही लोग इस धंधे को अपना रहे हैं।
युवाओं के लिए कोई संदेश?
युवाओं को चाहिए कि वे काम धंधे के चक्कर में नहीं पड़कर राजनीति में ही अपने भाग्य को चमकाएं।


दुर्गेश से परिचित कराते आलेख :.

साधारण दीखबाळो, असाधारण मिनख

--भंवरसिंह सामौर, चूरू

राजस्थान विश्वविद्यालय रै हिन्दी विभाग सूं पढ़ाई पूरी कर राजस्थान सरकार रै कॉलेज शिक्षा विभाग मांय म्हारो चयन हुयो। उण बखत भावजोग सूं कॉलेज शिक्षा रै निदेशक पद माथै श्रद्धेय आर।एस। कपूर हा, बै महाराजा कॉलेज मांय म्हारा इतिहास गुरु हा। राजस्थान लोक सेवा आयोग सूं म्हारो नांव आयो तो म्हनैं बुलायो अर बूझ्यो कै कठै लागणो चावै है। लोहिया कॉलेज-चूरू, बांगड़ कॉलेज-डीडवाना अर दूगड़ कॉलेज-सरदारशहर मांय जिगां खाली है। म्हैं कैयो गांव सूं तो नैड़ो डीडवाणो है। और`स आप जाणों। जणां बां कैयो, डीडवाणो दूसरै जिलै मांय है अर सरदारशहर काणीयै पड़ै। चूरू अळगो जरूर है पण जिलै रो मुख्यालय हुवण सूं थारै गांव बोबासर रै विकास मांय भोत काम आसी। इण भांत बां म्हनैं लोहिया कॉलेज, चूरू मांय लगा दियो।
चूरू मांय डॉ. श्रुतिधर गुप्त, प्राचार्य रै रूप मांय आया। बै भोत उत्साही हा अर नुंवै लोगां नै आगै लेय कॉलेज रै विकास री योजनावां बणायी। इण पेटै अधिस्नातक (एम.ए., एम.एससी. एम. कॉम) कक्षावां री सरूवात तो खास मानो हो ही साथै ही हिन्दी मांय ऑनर्स री कक्षावां ई बां सरू करवायी। ऑनर्स मांय राजस्थानी रो अेक प्रश्न-पत्र बां रखवायो अर बो पढ़ावण वास्तै म्हारै सूं पक्कल करली कै थानै पढ़ाणो पड़ैलो दूसरै आदमी री व्यवस्था कोनी हो सकैली। इण रै साथै बां अेक काम और कर्यो कै लोहिया कॉलेज री सालीणा पत्रिका 'आलोक` मांय राजस्थानी रो न्यारो अनुभाग सरू करवायो। जको आज दिन लग चालू है। ऑनर्स रै पढ़ेसर्यां मांय पैलो बैच डॉ. महेशचंद्र शर्मा (पूर्व राज्यसभा सदस्य अर पूर्व प्रदेशाध्यक्ष, भाजपा) अर ओमप्रकाश शर्मा (पूर्व न्यायधीश) इत्याद १० पढ़ेसर्यां रो हो।
ऑनर्स रै आगलै बैच मांय दुर्गादत्त माळी प्रवेश लियो। ऑनर्स मांय ऊंचै नंबरां सूं प्रवेश मिलतो। दुर्गादत्त नै संगळिया पढ़ेसरी दुर्गेश नांव सूं बतळाता अर बोही उण रो नांव थरपीजग्यो। दुर्गेश आखी ऊमर इणी नांव सूं ओळखीजतो। उणरै साथै दो नांव और हा, बालमुकन्द ओझा अर गिरधारीलाल यादव। ओझो तो राजस्थान विधानसभा मांय नकली तमंचो चलाय`र चेतावनी दीन्ही कै आज तो नकली है पण तड़कै असली चालैलो। ओझो अबार राजस्थान सरकार रै जनसंपर्क विभाग मांय अधिकारी है अर गिरधारीलाल यादव, उपनिदेशक, माध्यमिक शिक्षा मांय सरकारी नौकरी करै। अै तीनू ई पढ़ेसरी कॉलेज मांय चर्चित हा। आंनै अै जुझारू संस्कार दिया माधव शर्मा पत्रकार, जिका सोशलिस्ट पार्टी सूं जुड़ेड़ा हा। म्हैं मजाक मांय बांनै सोटलठ पार्टी वाळा कैय`र बतळांतो।
दुर्गेश मूलरूप सूं साहित्य सूं जुड़ाव वाळो मिनख हो। पढ़तां थकां ई अै लक्षण उण मांय प्रगट हुग्या। उणनै 'आलोक` पत्रिका रै राजस्थानी अनुभाग रो छात्र-संपादक ई बणायो अर उण चोखो काम कर्यो। उणरी पैली रचना 'म्हैं पापी हूं` नांव री कहाणी 'आलोक` मांय ही छपी। फेरूस उणरी रचनावां हिन्दी अर राजस्थानी मांय उण जमानै री पत्रिकावां मांय छपी। फेरूं नारायणसिंह राजावत 'दिलचस्प` उणनै साथै लेय 'युवा रचनाकार समुदाय` बणाय कैयी आयोजन कर्या अर वांरी चर्चा आखै साहित्य जगत मांय हुयी। पैलो आयोजन आर.एन. अरविंद (तत्कालीन उपखण्ड अधिकारी, चूरू) री प्रेरणा सूं सुराणा स्मृति भवन, चूरू मांय राजस्थान रै युवा रचनाकारां रो हुयो। इण सूं अेक नुंवै साहित्यकारां री टीम बणी। इणरै पछै दुर्गेश रो संपर्क वेदव्यास, कमलेश्वर अर भीष्म साहनी सूं हुयो अर अै देश रा नामी साहित्यकार चूरू मांय आय आं जोध-जुवानां रो होसलो बधायो।
इंयां चालतां-चालतां आ` जोड़ी चूरू मांय राजस्थानी समारोह रो आयोजन कर्यो, जिण मांय उण जमानै रा उच्च शिक्षा मंत्री बी.डी. कल्ला अर वेद व्यास तो पधार्या ही उण रै साथै दिल्ली री 'वर्ल्ड फैमिली` नांव री संस्था रा देश-विदेश रा अनेक संस्कृति कर्मी, जामिया-मिलिया, दिल्ली रै विष्णुजी रै नेतृत्व मांय दिलचस्प रै प्रयास सूं पधार्या। उण मोकै राजस्थान रै लोक संगीत रा नामी-गिरामी लंगा-मांगणियार लोक गायक आया तो गोगाजी री गाथा गावणियां डैरूं रा लोक गायक भी हा। उण मौकै अेक स्मारिका भी छपी।
इण भांत पुराणां साथी छूटता गया अर नुंवां जुड़ता गया। नुंवा साथ्यां मांय गुरुदास भारती, कमल शर्मा, हनुमान आदित्य अर दुलाराम सहारण इत्याद जुड़्या अर कारवों चालतो रैयो। रचनात्मक काम चालता रैया। दुर्गेश नै राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर सूं 'काळो पाणी` रचना माथै पुरस्कार ई मिल्यो। प्रगतिशील लेखक संघ सूं ई आखी ऊमर जुड़्यो रैयो। आगै री योजनावां रा कैयी काम उण ओढ़ राख्या हा पण अेक दिन दुलाराम सहारण रो फोन आयो, दुर्गेश कोनी रैयो। सुण`र विस्वास कोनी हुयो पण कांई हुवै? मरणो तो कोयी रै बस री बात कोनी हुवै। मरणो तो पड़सी मुदै, जलम्या जका जरूर। बिलख`र रैयग्या।
दुर्गेश री स्मृति मांय हुयी शोक सभा मांय उण रै जलम दिन २५ मार्च माथै कार्यक्रम री बात आयी। दुलाराम सहारण भाली सम्हाई। उणरा जोड़ीदार बण्या डॉ. रामकुमार घोटड़ अर आसीरवाद हो बैजनाथजी पंवार रो। सुधी लोगां री भावना रै मुजब ओ आयोजन आपनै दाय आवैलो।
कुड़तै, पजामैं वाळो अेक पतळो`क साधारण दीखबाळो मिनख साहित्य जगत मांय असाधारण काम कर आपरी छाप छोडग्यो।

पहली मुलाकात

- डॉ रामकुमार घोटड़, राजगढ़ (चूरू)

सन् १९९१-९२ की बात होगी। मैंने एक पत्रिका में दुर्गेशजी की लघुकथा एवं एक समीक्षात्मक टिप्पणी पढ़ी। मेरा लेखन अधिकतर लघुकथा विधा पर ही रहा है अत: इतने नजदीकी निवासी (चूरू) लघुकथाकार का नाम देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। मैंने इस संदर्भ में एक पत्र 'महाराजा होटल, स्टेशन रोड, चूरू` के पते पर लिखा। कुछ दिन बाद उनका एक स्नेहिल पत्र व साथ में 'काळो पाणी` व 'धूल की धरोहर` पुस्तकें मिली। मुझे बहुत अच्छा लगा। काळो पाणी की लघुकथाएं निस्संदेह अच्छी लगी ही लेकिन मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया धूल की धरोहर की कहानियों ने। जिसमें ग्रामीण परिवेश के पात्रों के साथ टीले, फोग, खींप, खेजड़ी, कैर-जाल का सटीक विवरण है। इन कहानियों को पढ़ते समय मुझे यूं लगा कि ये मेरे आसपास व मेरे गांव की ही कहानियां है। मेरा बचपन आंखों के आगे घूमने लगा और ऐसा अहसास हो रहा था जैसे कि इन कहानियों में मैं भी कहीं न कहीं हूं। इन कहानियों ने मुझे दुर्गेशजी से जल्दी मिलने की इच्छा जागृत कर दी। लेकिन संयोगवंश मिल नहीं पाया।
सन् १९९४ में राजस्थान सरकार द्वारा मेरा चयन उच्च अध्ययन हेतु कर लिये जाने के कारण मैं स्त्री रोग एवं प्रसूति विशेषज्ञ कोर्स हेतु बीकानेर चला गया। बीकानेर एक साहित्यिक गढ़ है। मेरी सबसे पहले मुलाकात उस समय चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत श्री बुलाकी शर्मा से हुई। तब बुलाकीजी ने कहा, 'अच्छा आप चूरू के रहने वाले हो तो आप दुर्गेशजी को तो जानते हीं होंगे। वो एक अच्छे लेखक हैं। तब मुझे अपना आलस्य खला कि समय निकालकर मैं दुर्गेशजी से क्यों नहीं मिला।
फिर बीकानेर के साथियों से धीरे-धीरे परिचय होता गया। लगभग चार वर्ष के अध्ययन के दौरान मैं बीकानेर रहा। तब यादवेन्द्र शर्मा चंद्र, मालचंद तिवाड़ी, नीरज दइया, हरदर्शन सहगल, भवानी शंकर व्यास विनोद के मैं निकट आया एवं इनसे आत्मीय संबंध बन गये। श्री हरीश भादानी, नंदकिशोर आचार्य, शिवराज छंगाणी, लक्ष्मीनारायण रंगा से परिचय भर ही हो पाया। जब इनसे मेरा शुरूआत में परिचय हुआ तब इन्होंने भी मुझसे कहा, 'अच्छा आप चूरू के रहने वाले हो, चूरू, दुर्गेशजी वाला चूरू। आप तो उनसे जरूर मिलते रहे होंगे। ऐसे भले आदमी के सान्निध्य में रहकर साहित्यिक विचार-विमर्श तो होता ही रहा होगा।` मैं मुस्करा भर रह जाता।
सन् १९९८ में कोर्स पूर्ण होने पर मेरी पोस्टिंग राजगढ़ (चूरू) कर दी गयी। संस्थान का प्रभारी होने के नाते मुझे जिला मुख्यालय पर विभागीय मीटिंग हेतु जाना होता था। हर बार मैं इसी प्रयास में रहता कि मीटिंग के बाद दुर्गेशजी से भी मिलूं। लेकिन कभी समयाभाव व कभी दुर्गेशजी के कार्यालय की सही जानकारी न होने व कभी परेशानी भरा माहौल, संकोचवश मिल न सका।
सन् १९९९ के एक दिन जब विभागीय मीटिंग से जल्दी ही मुक्त हो गये तो मैंने दुर्गेशजी से मिलने का मन बनाया। हिम्मत करके एक कर्मचारी से दुर्गेशजी के कार्यालय के विषय में पूछा। उस व्यक्ति ने इस ढंग से उनके कार्यालय का रास्ता व बैठने की जगह बताई जैसे गहरी जानकारी रखने वाला नक्शे पर हू-ब-हू इंगित करता है। मैं उसके बताए अनुसार जिलाधीश कार्यालय की दूसरी मंजिल में गया। पतली-सी गैलरी से होकर बायें हाथ की तरफ एक कमरे के दरवाजे पर गया तो देखा कि वहां दो कर्मचारी बैठे हैं। एक, गेट के पास, दूसरा, आगे की ओर। एक छोटा-सा कमरा, आलमारियों व लम्बी-लम्बी टेबल से ठसाठस भरा हुआ। दोनों को देखकर मैंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और मुंह से बुदबुदाया, 'दुर्गेशजी?` तब आगे की ओर बैठा हुआ शख्स खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर मेरा अभिवादन स्वीकारते हुए कहा, 'दुर्गेश मैं ही हूं।` मैंने अपना परिचय दिया। तब दुर्गेशजी ने मेरे से हाथ मिलाते हुए कहा, 'अच्छा! डॉ. रामकुमार घोटड़ आप हैं। पहली बार मुलाकात हुई है आज। नाम भर जानता था। अच्छा लगा कि आप आये हो। आओ! बैठो।` फिर इधर-उधर देखकर वे झिझक से गये। उस कमरे में बैठने के लिए कुर्सी रखने की जगह ही नहीं थी। तब उन्होंने अपने साथी को, 'मैं आता हूं।` कहकर मेरा हाथ पकड़ते हुए बाहर आये। फिर हम दोनों गैलरी से सीढ़ियां उतरकर कलेक्ट्रेट कार्यालय के बाहर लगी चाय की थड़ियों पर आकर बैठ गये।
हमने वहां नमकीन एक साथ ली और घण्टे भर बैठे रहे। इधर-उधर की, अपने-आपकी व साहित्य संबंधी बातें की। मैंने भी उन्हें बीकानेर के साथियों व उनके प्रति जुड़ाव व श्रद्धा की बात बताई। मेरे मन में आ रहा था कि इतना बड़ा नाम और इतनी सादगी, सरलता। जहां भी मैं साहित्यिक गोष्ठियांे में गया या साहित्यिक साथियों से मिला वे राजगढ़ के नाम को अनसुना करते हुए चूरू का नाम आते ही मुझसे कहते, 'अच्छा चूरू से आये हो, दुर्गेशजी कैसे हैं? चूरू तो दुर्गेशजी वाला ही है ना।` जिस नाम के आगे ऐसी उपमा आती हो वा आप मेरे सामने बैठा है।
वे एक बंद गले के कमीज व पायजामा पहने साधारण, सामान्य-सी वेशभूषा में बैठे थे। बात करते समय कम बोलना व सार की बात कहना, हंसी-मजाक की बात में भी होंठो पर सिर्फ मुस्कराहट, प्रत्येक बार बड़े नाम से मुझे संबोधित करके बोलना। उनके आत्मीय व्यवहार व बात करने की शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मिलने के बाद मुझे अफसोस हुआ कि मुझे तो इनसे पहले ही मिल लेना चाहिए था।
दुर्गेशजी के हंसने का ढंग भी अलग ही था। होंठो पर मुस्कराहट के साथ आंखों में खुशी का इजहार के संकेतों से ही आभास होता था कि वे हंस रहे है। मैंने कभी भी उनके होंठ खोलकर दांत दिखाने वाली ठहाके भरी हंसी हंसते नहीं देखा। लगभग एक दशक मैं उनके सम्पर्क में रहा हूं।
वे सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले एक विचारशील व्यक्ति थे। स्वयं को यथा स्थान रखकर हम उम्र एवं युवा साहित्यकारों को आगे लाने के सकारात्मक सोच के साहित्यकार रहे हैं। वे गुटबाजी को नजर अंदाज करते हुए अपने-पराये सभी का सम्मान करने वाले विशिष्ट जीवनशैली के धनी थे।
अब भी चूरू शहर वैसा ही है। वही सड़के, वही थड़ियां, वही कार्यालय व साथी। भीड़ भरे बाजार। पीं-पीं का वैसा ही स्वर। फिर भी न जाने क्यों, जब भी चूरू शहर में जाता हूं तब मुझे एक कमी-सी अखरती है, दिल में एक अजीब-सी टीस उठती है कि मेरा कुछ खो गया है। अकेलेपन का अहसास टीसने लग जाता है........ दूर कहीं दूर तक मेरी नजरें मायूस-सी लौटकर मुझे प्रकृति के सनातन सत्य का अहसास करवा देती हैं।