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जंगळ दरबार

'जंगळ दरबार` दुलाराम सहारण का राजस्थानी बाल उपन्यास है। राजस्थानी साहित्य में बाल उपन्यास अभी तक कम ही लिखे गए हैं। इस अभाव की पूर्ति करता हुआ यह उपन्यास समसामयिक मुद्दों से बाल मन को परिचित कराता है तथा मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा देता चलता है। प्रस्तुत है कुछ अंश......

का`ल री भांत आज ओजूं जंगळ दरबार लाग्यो। आज काळू रींछ का`ल रै रंग मांय नीं हो। बो कीं आकरो होर्यो हो। काळू कदै ही इंयां आकरो कोनी हुवै। राजा शेरसिंह ही कीं रौब मांय दिखै हा। बात तो कीं ठावी ही।
फुदकू गिलहरी इनंै-बिनंै देख्यो अर झिंतरू काकै कनंै जाय`र बैठगी। झिंतरू कुत्तो घणो समझदार।
काळू रींछ सभा नैं निरखी। सगळां नैं आयेड़ा देख`र बो कीं राजी हुयो। उणियारै माथै कीं नरमाई आयी।
फुदकू चीं-चीं कर`र झिंतरू नैं कीं बूझण सारू तकायो। झिंतरू टेढ़ी निजरां सूं फुदकू कानी देख्यो अर नाड़ हला`र बोलबाली रैवण रो इसारो करयो। फुदकू नैं बुरो तो घणो ही लाग्यो पण करै के ? साम्ही अंाख्यां काढ़तो जंगळ रो मंत्री काळू खड़्यो हो। फुदकू बोलबाली भेळी होय`र बैठगी।
काळू ओजूं सभा नैं निरखी। सगळा काळू री निजरां पिछाणै। बीसूं बरसां सूं काळू जंगळ रो मंत्री। सांच नैं सांच अर झूठ नैं झूठ कैवण वाळो। राजा शेरसिंह नैं सांची सलाह देवण वाळो। ओ ही कारण कै सगळां जंगळां सूं ओ जंगळ अळगो। घणी खुसियां रो घर। सगळा इण जंगळ मांय आय`र रैवणो चावै।
राजा शेरसिंह काळू नैं नाड़ हला`र सभा सरू करण रो हुक्म दियो। काळू घणो सावचेत मंत्री। सभा मांय लैरलै पासै बैठ्या मंगतू हिरण, चिपकू खरगोश अर कीं दूजा बूढ़ा-बडेरा नैं आगै आय`र बैठण रो कैयो अर सगळी सभा रो जंगळ दरबार मांय आवण सारू सुवागत कर्यो।
''का`ल कीं फैेसलोे कोनी हुयो तो आज थानैं सगळां नैं ओजूं फोड़ा घाल्या। म्हैं माफी चावूं। म्हैं ओ म्हारै जीवण मांय न्यारो ही किस्सो देखूं हूं। बेईमानी अर झूठ तो सगळी जिगां हुवै पण बठै आपरो कीं फायदो हुवै। आ बात इस्सी कोनी। इण मांय किनंै ही फायदो कोनी। घाटो ही घाटो है अर आ जकी सरूवात हुयी है बा भोत घणी खतरै री घंटी है। आपां नैं सोचणो पड़सी।`` काळू बात री सरूवात करी।
''थे सगळा जाणो, मिनखां री अर आपणी कदै ही बैर-दुसमणी कोनी ही। आपां कदै ही मिनखां रो बुरो कोनी कर्यो। हुयी जद ताणी आपां बां री मदद ही करी है पण का`ल मिनख जका जंगळ मांय ऊध मचाग्या बा चिंता री बात है।`` काळू सभा कानी देख्यो तो सगळां रा उणियारा सोच मांय डूब्योड़ा लाग्या।
''थे जाणो, चन्नण घणो कीमती हुवै। चन्नण नैं काटण रै मिस बै मिनख जंगळ मांय आया अर बां ऊध मचायी।`` काळू कीं सोचण लागग्यो।
''मंत्री जी, म्हनैं म्हारलो छोरो फगदूड़ो बतावै हो कै भारत देस मांय चन्नण सारू वीरप्पन नांव रो ठाडो चोर हुयेड़ो है। वीरप्पन चन्नण री जंगळां सूं चोरी करतो अर दूजै देसां मांय बेचतो। इण चोरी खातर बण सीध मांय आया उण मिनखां नैं मार्या अर न जाणै कितणी बार पुलिस साथै गोळीबारी करी। कित्ता ही मिनख लालची टट्टू ही बस्ती मांय छोड़ दिया हा। बै वीरप्पन री गैंंग खातर खाणैं-दाणैं रो इंतजाम करता।`` रिगदियो सगळी सभा मांय पूरो ग्यानी बण्यो बखाण करै।
''जिनावरां नैं के खतरो होयो फेर चन्नण री तस्करी सूं अर वीरप्पन सूं ?`` बो`ळी बार सूं अळसायेड़ी सी बैठ्यी कौ`जळी लूंकड़ी आपरा कान साम्ह`र बोली।
''खतरो...ओ तो ठा कोनी।`` रिगदियै तीतर आपरी पांखां नैं ढीली छोड दी।
''म्हैं बतावूं, सुणो।`` झिंतरू कुत्तै आपरो मून तोड़्यो।
''वीरप्पन जंगळ नैं आपरो रैवास बणा लियो हो, आ बात तो रिगदियै बता ही दी। वीरप्पन अर उण री गैंग रा दूजा मिनख जदै-कदै गोठ करता तो बारी जिनावरां री ही आवंती। भोजन बस्ती सूं नीं आवंतो तो बै मांस पकावंता, बो जिनावरां नैं मार`र ही तो पकावंता।`` झिंतरू बतायो तो सभा मांय भय सो पसरग्यो।
घणी ताळ मून रैया पछै रमकू कागलो बोल्यो - ''इण भांत तो जंगळ रा घणां जिनावरां नैं वीरप्पन अर उण रा साथ्यां मार्या होसी ?``
''और के तो। घरां बड़ेड़ा डाकू के लाड करै।`` रिगदियै रो हौसलो पाछो बापर्ग्यो।
''म्हैं तो आ ही सुणी ही कै वीरप्पन कीमती जिनावरां री खाल ही बेच्या करतो अर साथै ही हाथी दांतां रो ब्योपार ही करतो। आ सांच है के ?`` मोमली चिड़ी भोळी सी बण`र पूछ्यो।
''अेकदम सांच है मोमल।`` झिंतरू हामळ भरी।