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आंतरो

युवा कथाकार उम्मेद धानिया की राजस्थानी कथा पुस्तक ''आंतरो`` सन् २००७ में प्रकाशित हुई। संग्रह में कुल ९ कहानियां हैं। आंतरो, ध्रूनिस्चै, ब्याव रो बींत, आसीरवाद, बगत रै परवाण, बदळाव री बाण तो घालणी पड़सी, सौत, जगू री जागीर व आखातीज कहानियां इस संग्रह को उपयोगी बनाती हैं। संग्रह की आसीरवाद कहानी यहां प्रस्तुत है।
आसीरवाद

''हे बालाजी म्हाराज! इबकी बार बींत बिठावो। किंयां ई छोटकियै भाइड़ै राकेसियै माथै नौकरी री म्हैर करो। थारी वारी-वारी जायसूं। पगां ऊपाळो ठेठ सालासर धाम धोक देयसूं।`` धन्नो भींत रै आळै मांय बणायेड़ै थान आगै निंवण करै।
आज ई नीं ओ बीं रो लारलै कैयी सालां सूं नितगो नैम। जद राकेसियो दसवीं पास करी तो धन्नै नै घणी उम्मीदां दीसी। दीसै क्यूं नीं? गांव री इस्कूल रा हैडमास्टरजी लैरला पांच-छव सालां सूं ओ ई तो जज्जो देंवता आया हा। वै कैंवतां कै धनजी जिंयां-किंयां कर`र थे राकेस नै दसवीं तो करवा ई द्यो। दसवीं पछै नौकरी रो सिलसिलो सरू होवै अर ओ तै मानो कै आपरो भाई दसवीं करतां ई नौकरी लाग ज्यायसी। राकेस री पढ़ाई मांयली हुंसियारी उण नै बेगी ई गेलो पकड़ाय देसी।
हैडमास्टरजी री बातां धन्नै रो हौंसलो बधाज्यावंती अर वो इस्कूल सूं राकेसियै नै टाळतो-टाळतो थम ज्यावंतो। के ठा? भाग बदळज्या। भिखै रा दिन कीं सावळ कटज्या। करजायत जमीं नौकरी पाण बचज्या। आपणो ई सूंळो दिन आज्या।
बस मन री ठाड। अर मन हुवै सो-कीं करणहार। मन रै हार्यां हार, अर मन रै जीत्यां जीत।
धन्नो मन रो करड़ो। पण रोजगी घर रै टोटै आगै हारै। हार मानो अर चायै नीं मानो। हार तो हार हुवै। गांव रो डोळ बटोड़ा ई बता देवै। पछै उण री हार कठै ल्हुकेड़ी? घर रो अेक-अेक ठांव, घर रो अेक-अेक कूणो, गरीबी-लाचारी-मजबूरी सो-कीं मतोमत बतावै।
घर आयेड़ै बटाऊ नै तो जीमावणो पड़ै। चायै खुद भूखो भलाईं हुवो।
पण बटाऊ सारू के भगवान बखारी मांय न्यारो छोड`र जावै? जद लारलै सात सालां सूं लगोलग काळ पड़ै अर बडोड़ां री बखारी रा ऊंदरा ई थड़ी करै तो बो के करै? कठै सूं ल्यावै खुद सारू अर कठै सूं ल्यावै बटाऊवां सारू? हूणी बलवान।
धन्नो रोजगी घड़ा-मंढ़ी करै। राकेसियै नै लेय`र सुपनां पाळै। उणियारै मुळक बापरै। मंूज री मांची माथै बैठ्यो मोटरां री असवारी करै। फाटयोड़ै पजामै-कुड़तियै नै भुलाय`र धौळा-धप्प पैरण रा मोद पाळै। पाल टूट्योड़ी झूंपड़ती नै अणदेखी कर`र सैं-सैं चिंचांवतां पंखां भेळी हेली देखै। गांव चौधरी अर गांव सेठ सूं हुक्का भरवावै। कूंट मांयलो टूटीयो पींपो जकै नै बो सदीव बखारी कैवै कदै ई खाली नीं दिखण री हूंस पाळै। खुद नै बापजेड़ो समझै अर लाडेसर भाई राकेसियै रा कांधां पकड़`र सैंजोड़ै च्यारूं धाम री जातरा करण री तेवड़ै।
तेवड़ै क्यूं नीं ? भाई सूं बेसी बाप ई तो है बो राकेसियै सारू। बाप जद सुरगां बासो लियो तद राकेसियो फगत दो बरस रो ई तो हो। मां री हारी-बीमारी। आला-सूका सूं लेय`र सगळी देखभाळ उण रै जिम्मै ई तो ही राकेसियै री। मां तो ऊपरनै हाथ कर दिया हा। कैंवती- ''ना रै धनिया! किसी पार पड़ै ईं गेरै री। दो आंगळ रो कोनी पण कित्ता फोड़ा घालै। थूं के-के करसी। म्हैं तो बस आज-का`ल री हूं। बीमारी पार पड़ती कोनी दिसै। के करां थूं बता।``
पण धन्नै कदै ई हिम्मत कोनी हारी। गेरो नीं उण नै राकेसियो जोध जुवान बरोबरियो भाई लागै। भुजा जेड़ी भुजा।
बो सदीव मां री हिम्मत बधावंतो- ''ना अे मा! हिम्मत मना हार। हिम्मत री कीमत हुया करै। म्हैं देख बडो हुग्यो। सदा इस्सो ई थोड़ो हो। कदै ई तो म्हैं ईं गींदर हो। गेरो हो। पण थूं सार-संभाळ करी तो बगत के लाग्यो। अर थूं इबै बीमार है तो के हुयो ? म्हैं हूं नीं राकेसियै सारू। ख्यांत राखसूं, खेचळ करसूं। अर तेरै देखतां-देखतां जोध-जुवान होज्यासी।``
बातां री सुहाळी सूं काम कोनी बण्या करै। बात तो कोरी बात हुवै। बात पार घालै जद जोर आवै। पण आवो भलाईं, धन्नो डिग्यो कोनी। मां तो कदे-री आयी-गयी हुयी। पण बात रैयगी। उण राकेसियै नै डील रै आंगळ लगा-लगा`र बडो कर्यो। अेक-अेक आंगळ फालतू बधती गयी। साथै-साथै उण री खुसियां अर सुपना ई बधता गया।
दसवीं करग्यो। बारवीं करग्यो। अर इण बरस सै`र मांय कॉलेज भरती हुग्यो। पण धन्नै री हालत बिंयां री बिंयां। उलटी माड़ी और। कठै हैडमास्टरजी कैंवतां कै दसवीं करवायद्यो, नौकरी भाजी आयसी। अर कठै कॉलेज।
टाळण रा मतां घणां। घर री हालत पतळी। फीस, किताबां तो दूर, खावण सारू दाणां ई नीं। पछै किंयां पढ़ावै बो राकेसियै नैं। पण करै के? जद-जद टाळण रो मतो हुयो तद-तद कोयी-न-कोयी खेतरपाळ बण`र राकेसियै आगै आय ऊभ्यो हुयो। नां रै धन्नां, इंयां कर्या करै के? दस साल ई पढ़ायो है तो अेक-आध साल और देख ले। के बेरो बींत बैठज्या।
बस, के करतो आं बातां आगै धन्नो? आगली क्लास मांय फट बैठावंतो भाईड़ै राकेसियै नैं। पण घर कद कैयो करतो?
सै`र कॉलेज घाल्यो तद तो धन्नै री घर-धिराणी काळ-विकराळ होगी ही। बरसां सूं लाड लडावंती राकेसियै नै बा। पण सै`र रो खरचो अर घर री हालत, उण नैं बस मांय कोय रैवण दी नीं।
भाभी सफा नटगी। कमावो अर खावो। ब्याव करो तो म्हारै भाई री छोरी सिणगारड़ी त्यार। अर ब्याव नीं करो अर नौकरी रा सुपनां पाळो तो गांव चौधरी री फैक्टरी त्यार। हजार-दो हजार री बापरत री सोचो। लागत-ई-लागत मांय सिर देवो।
जिंयां-किंयां डाटी धन्नै बीं नै। फैक्टरी मांय देवै के? दिन-रात रा गोडा-तुड़ाई अर दो धेला रकम। आपणो राकेस नोट ल्यावसी आकरा-आकरा, कुत्तै रै कान जिस्या। ठाडी नौकरी लागसी सै`र पढ़`र। आपां तो भेड-बकरियां री सौरम काढ़तां इंयां ही सपमपाट रैयग्या। पण आपणो राकेस ऊजळो पख राखसी। देखती जाइजै।
देखो थे अर दिखावो थारां मां-बापां नै। जका इण पंपाळ नै छोड`र खुद आकासां जा बैठ्या।
धन्नै री घर-धिराणी घणां भचभेड़ा लिया। पण धन्नै री पक्कै मत्तै आगै अेक कोनी चाली। छेकड़ राकेसियो भरती हुयो ही, सै`र री कॉलेज मांय।
बगत बगतो रैवै। चायै कोयी सुंवै माथै सूत्यो हुवो अर चायै कोयी मूंधै माथै।
धन्नो मूंधै माथै पण राकेसियो सूंवै माथै। मांगै जद धन्नो पीसै-टकै रो इंतजाम कर`र देवै। टूम बेचो चायै ठीकरी। ब्याज नै लेवो चायै खाल कढ़ा`र।
कॉलेज री पढ़ाई पार घाली। राकेसियो ई आपरी लगन कोनी छोडी। तद ई तो उण सो`ळवीं करली। धन्नै सुण राखी कै सो`ळां सूं बेसी पढ़ाई हुवै ई कोनी। अर सो`ळां ताणी राकेस पूगग्यो तो इब देखो लंकां लूट ल्यावसी। घर सोनै सूं भर देयसी।
इस्कूल रै बगत अेकर छुटि्टयां मांय राकेसियो कित्तो हेत परस्यो- ''भाईजी! इब देखो थे, म्हैं ओ` लाग्यो नौकरी। लागतां थकां थारै सारू मोटरसाईकिल ल्यासूं। ढररर % % % कर`र थे निकळस्यो गांव मांयखर तो लोग मूं` पाड़ता रैयज्यासी। भीखो बामण जको आपां नै हीण-कमीण कैय`र चिगावंतो, बीं रै मूंडै मोटरसाईकिल रो धुंवो जासी। हा-हा...... हा-हा ....।``
सांच मांय सुवाद आसी। नौकरी राकेसियो लागसी अर मजा उण नंै आसी। भीखो बामण ई क्यूं? कुण कोनी चिगायो उण नैं? देखो रे राबड़ी ई कैवै कै म्हनैं दांतां सूं खावो। राकेसियै री नौकरी री बात करतो जद आ कुण कोनी कैंवतो? कीं नै सुहावंती राकेसियै री पढ़ायी! चायै मोघू चौधरी हुयो अर चायै उम्मेदसिंह ठाकर।
गरीब होवणो के गुनाह हो? हीण जात रो होवणो के सजा ही? ऊंचै तबकै वाळा अर पीसा वाळां सूं उण रो के बैर हो? बो है बिस्यो सदां सगळां रै काम ई आंवतो। पछै ओ बैरभाव क्यूं?
पण बात रो के निचोड़। उतारै बित्ता ई छूंतरा। उण सगळी बातां मन रै कूणै मांय दाबी अर राकेसियै नै पढ़ायो। अेक-दो नीं पूरा सो`ळा। सो`ळा ....। हां, पूरा सो`ळा।
राकेसियो नौकरी लागग्यो। डाकियै जद ओ कागद बांच`र धन्नै नै सुणायो तो बीं रै पांख आयगी। सांच मांय......। सांच मांय ........। सुण्यो कोनी। अेकर फेरूं बांच।
''भाटो है के, सुण्यो कोनी। लै ओ कागद अर बंचवां कीं और कनंै सूं।`` हरू सुनार रो पोतो मेहर डाकियो। फट कागद पकड़ा`र बळती रा लांघग्यो।
सांच मांय.....। झूंपड़ती आगली अडसर भींत रै लेव लगावण सारू गोबर रो बठळियो ल्यावंती घर-धिराणी ठै चकेड़ो बठळियो नीचै दे मार्यो। आ सुणतां पाण।
''के हुयो....? चक्कर तो को आग्यो हुवै नीं।`` धन्नो भाज्यो।
''चक्कर आवो, हरू अर उण रै पोतै मेहर नैं। आपां तो मजा करस्यां। गोबर ढोवसी म्हारी नौकराणी...।``
धन्नो भौत राजी हुयो। सै`र सूं कद आयसी इब राकेसियो..!
घर-धिराणी कैयी कै आपां ही सै`र चालां। भाड़ै री इब के चिंत्यां?
पण धन्नो खूंटै रो सीरी। खूंटै सूं बंध्यो। पड़्यो भारी हुवै, ओ मानणियो।
सगळै गांव मांय सकरपारां बांट्यां। घरां बणा`र। जलेबी-रसगुल्ला तो गांवां मांय कठै? सकरपारा-खुरमला ही सो-कीं गरज पाळै। सकरपारा के इस्या-बिस्या थोड़ी ही हुवै अर नौकरी ही के इस्सी-बिस्सी थोड़ी ई हुवै। अर बा ही बैंक मांय मैनेजर री नौकरी। सकरपारा तो बंटण रो हिसाब हुवै।
सकरपारां सारू गुड़-तेल सारू इण बगत तो प्रभु सेठ ही को नट्यो नीं। चाहिजै बित्तो लेवो। किलो, दो किलो, पांच किलो...।
जीसोरै सूं सगळै गांव सुहाळी खायी होसी। पण धन्नै रै तो पेमो चौधरी रड़कै। जबरी करी बण। सकरपारां लेवण सारू नट ज्यावंतो तो कोयी बात नीं। मटो लेय`र कुत्तियां नै न्हाख दिया।
बात घणी गडी पण जमीं धणी। गांव रो चौधरी। करै के?
गडो भलांईं पण साथै-साथै धन्नै रै अणूतो मोद ही बापर्यो कै देखो आपां कीं तो होया। कीं होया जद ही चिणखो लागै। चिरमराट लागै। जे कीं नीं होंवतां तो ओ ही चौधरी हां-हम्मै करतो अर मुळकतां थकां दो आपरा काम उढ़ाय देंवतो। पसुवां नै फूस-नीरो गेरण रो कै पछै कीं नै बुलावण सारू हेलो करण रो।
धन्नै री दोगाचींतीं घणी को रैयी नीं। घर मेळो बणग्यो। घणकरां गांव वाळा धन्नै नै आय`र भाइड़ै री नौकरी री बधाई देवै। आंगण ई लुगाइंयां सूं भर्यो पड़्यो। आंगण क्यांरो झूंपड़ती रो अेक-कालो पसवाड़ो। दूजै-कालो पसवाड़ो बाखळ।
सगळा धन्नै नै सरावै। बीं री हिम्मत नै सरावै। उण री पढ़ाई करावण री चतरायी नै सरावै।
धन्नो देखै कै बगत किंयां बदळै। का`ल ताणीं जका राकेसियै नै पढ़ावण मांय बावळ बतावंता आज बै ही बडम ठोकै। सगळा आप-आपरै टाबरां नै पढ़ांवण रो प्रण करै।
कीं कैवो भलां ईं। बगत बलवान। बै ही तीर-कमाण, भीलां लूटी गोपियां।
धन्नै देख्यो घर-धिराणी ई मुळकती फिरै। ब्याव मांय बिनायकियो फिरै ज्यूं। ओ`लै री आड सूं के दिखै कोनी। कांणां कोइयां देखै अर मुळकै। धन्नै नै सुपनां सांच होवण रै बगत री बधाई देवै।
कोड इस्यो कै ठा ही कोनी पड़्यो कै अेक म्हीनो कद निसर्यो। राकेस पैलै म्हीनै री तिणखा लेय`र घरां आयो। बहोत ही मोद सूं। सो`वणी-सी पेंट अर ऊपर डबकां री सो`वणी-सी बुरसट। तीखी ठोकर रा नुंवां-नकोर बंूट। हाथ मांय अेक सो`वणो-सो बैग अर उण मांय अणमांवती चीजां।
धन्नै रै पगां लाग्यो तो धन्नै रो धीरज थम्यो नीं। लैरलो भिखो आसूंड़ां रै मिस ढळकण लाग्यो। दोनूं भायी बो`ळी बार ताणीं छाती चिप्या रैया।
धन्नो अळगो हुयो तो चेतो हुयो कै घर-धिराणी ई आपरै देवर रो सिर पळूंसण सारू उतावळी है। धन्नै राकेस कानीं देख्यो। राकेस भाभी रै चरणां लाग्यो तो भाभी रा सतपुरख बणण रा आसीस उमड़ पड़्या।
हेत रै मिस हियो दोनूं लोग-लुगायां राकेस रै आगै मेल दियो।
गांव वाळा ई राकेस सूं मिलण सारू आवै। आप-आपरी बैंक री समस्यावां बतावै। जमा री नीं लोन लेवण री योजनावां री। कमती ब्याज माथै बैंक सूं करजो किंयां लेयीजै? सगळा आपरै फायदै रो बींत बैठावै।
राकेस सगळां सूं हेत भरी बात करै। आपरै ग्यान सारू जाणकारी देवै। फूलो बडो कैयो कै राकेसियां म्हें क्यूं कीं रा टंटा चकां, थूं ई थारी बदळी करवा`र आपरलै बैंक मांय आज्या।
फूलै बडै री बात माथै तो बो घणो हांस्यो। बोल्यो बाबा! आ के म्हारै सारै है। ऊपरला अधिकारी जठै घालै बठै जावणो कर्मचारी रो ध्येय बणै। पछै हाल ई तो म्हैं लाग्यूं ई हूं। कठै बदळी अर कठै काम!
दोनूं भायी रात नै मोड़ै ताणीं बदळावंता रैया। घरबीती बेसी परबीती कम। भावज ई मांचली माथै कीं और ई सुपना मांय रमती रैयी।
दिनूंगै उठ्या तो भावज बात सरू करी- ''राकेस! थूं इब तो पढ़णो हो बित्तो पढ़ लियो। नौकरी इज लागग्यो। म्हारी अेक मनसा पूरी कर नीं ......।``
''क्यां री भाभीजी! हुक्म देवो नीं।``
''भोळी-सी, सो`वणी-सी देवराणी री।`` भाभी मुळकती थकां कैयो।
''.....................।``
''क्यूं तावळ मचावै है। राकेसियो कठै सूं भजा`र थोड़ी ई ल्यासी। आपां ब्याव-साव करस्या तद ही नीं। आ बात तो आपणै सारू है। थूं पछै मांदी क्यूं होवै! थारै भाई री छोरी सिणगारड़ी पछै कुणसी इब ताणीं परणीजगी। बात करस्यां।`` धन्नै बात रो उथळो दियो।
''...........................।`` राकेस बोलबालो रैयो।
''देख राकेस! थनै अेक बात बतावूं। थारी भाभी री बात तो छोड, म्हारी सुण। आपणै मांय गांव रा मिनखां घणा फोड़ा घाल्या है। हीण-कमीण कैवण मांय कुण ही कमी कोनी छोडी। लोटो हाथ मांय देय`र कुण ही पाणी को प्यायो नीं। सगळा ओक मंडवाई। रिपियै-टकै री कदै जरुत पड़ी तो दूणै ब्याज माथै मांड`र काटो ई काट्यो। म्हारी मजबूरी ही कै थन्नै आगै बढ़ावणो हो। जरुत सारू सगळां म्हारी खाल काढ़ी। कुण ही आपणै हित रो कोनी। बस साथ दियो इण डील ....... ।`` धन्नो अणमणो होग्यो।
''हां, भाईजी! थारी बात साव सांची है। थारी हिम्मत रै पाण इज तो दो पीसा कमावण जोग नौकरी मिली है। नीं तो म्हैं ई कीं रै हाळी रैंवतो ......।`` राकेस बात रो समरथण कर्यो।
''राकेस! म्हारी अेक ईंच्छ्या थूं पूरी कर दे बेटा!`` धन्नै जीवण मांय पैली पोत राकेस नै बेटो कैय`र सिर पळूंस्यो।
''बोलो भाईजी! म्हे हूं जेड़ो त्यार हूं। आप रो अेक-अेक हरफ म्हारै सारू गीता रो आखर है।`` राकेस ई गळगळो होग्यो।
''धन भाग म्हारा कै थूं आ समझै। देख राकेस दरद हाड-गोडै रो हुवै तो बो बगतसिर मिटज्या। पण दरद जे बात रै घाव रो हुवै तो बो तो बात सूं ई मिटै। थूं गांव वाळा जका साळा म्हनैं नीच-कमीण, हीण जात रो, नौकर, हाळी कैय`र जीव बाळ्यो, जिंयां किंयां उण री रड़क काढ़ बेटा ......।``
''राकेस! म्हारो जीवसोरो तो तद ही हुवै .......।`` धन्नै बरसां सूं मांय-ई-मांय धुकती आग नै बारै काढ़ी।
''भाईजी! .......।`` राकेस आगै नीं बोल सक्यो।
''राकेस! बैंक सूं आं नै इस्यो लोन दिराय कै अै तो के आं राजाया ई को चुका सकै नीं। साळां रा लोन भरतां-भरतां खूड बिकज्या ...........।``
दोनूं भाईड़ां भेळी भावज ई आंसूं टळकावण लाग्यी। भिखै रा दिन रैय-रैय`र याद आवण लागग्या। गांव रै सरतरियां मिनखां रा दियोड़ा ताना अेक-अेक कर`र साम्हीं आवा-जावी करै।
खासी ताळ हुग्यी। छेकड़ हिम्मत घर-धिराणी करी अर चा` बणावण सारू चूल्है कानीं सरकी। दोनूं भाई मून धारण कर्यां बैठ्या रैया।
चा` रो कोपड़ो उठावंता थकां राकेस बात ओजूं सरू करी- ''भाईजी! थे जकी सगळी कैवो बा सिर-माथै। भाभीजी कैवै बा ई सिर-माथै। पण भाईजी ...........।``
''पण क्यां री ......?``
''भाईजी! आग रो बदळो आग सूं लेयजण री रीत......। समाज रै जांत-पांत रै घाव मांय घोबा करण री रीत.........। ऊंच-नीच रै मांय पिसीजण री रीत........। सो-कीं माड़ी।``
''भाभी-भायी थे कैवो तो म्हैं सिणगारड़ी साथै ब्याव सारू त्यार पण भाईजी बदळो......... ।`` राकेस सूं आगै कीं नी कैइज्यो।
धन्नो बोलबालो खड़्यो होय`र गुवाड़ कानीं टुळकग्यो। राकेस अर भावज खासी ताळ ताणीं बिंयां ई बैठ्या रैया।
धन्नो बारै सूं आयो तो राकेस उणां रै सांकड़ै लाग्यो। भाईजी रो मांदो मन किंयां ई ठीक हुवै तो। पण ......
भाईजी तो आग रा गोळा होय रैया हा। लपटां बरसावंता थका बोल्या- ''राकेसिया! म्हनैं ठा हो कै थूं इण लड़ाई मांय म्हारो साथ कोनी दे सकै। क्यूं कै अेक तो थूं भोग्यो ही के है? अर दूजो थूं इब हेलै लाग्यो। थनैं कुण नीच-कमीण कैयसी। नीच-कमीण म्हे। थूं आज रीत-रायतां री बात करै..... उण दिन क्यूं मोटरसाईकिल रो धुंवों कीं रै मूंडै मारण री बात करै हो......।``
''भाईजी! उण बगत म्हारी बुद्धि ही ई कित्ती`क ....?``
''नां इब होग्यो बुद्धिमान। सुण ले साव! न तो थारो ब्याव म्हानैं सिणगारड़ी रै साथै करणो अर नीं म्हानैं थारो लड़ाई मांय साथ चाहिजै। म्हे म्हारे अर थूं थारै ....।`` धन्नै रा होंठ धूजण लागग्या हा।
''भाईजी! ऊंच-नीच रा दायरा तो आगै बढ़ण सूं आपी ई मिट ज्यासी। ज्यूं-ज्यूं शिक्षा आसी अर आर्थिक समृद्धता आसी त्यूं-त्यूं जात-पांत मिटसी। बदळै सूं तो आ आग आगै बढै।़ थानै गांव मांय कोयी कैवै तो आ कैवो नीं कै हां, हां, हां म्हे नीच जात रा हां। हीण-कमीण हां। पण है गांव मांय थारी किणी ऊंच जात रो भाई अफसर! आगलै री बोली ई को पाटसी। माड़ा दिन भाईजी गया पाछै। इबै तो लोग थारी लेलरी काढ़सी। जिंयां फूलो बडो ..।`` राकेस सूं आगै को बोलीज्यो नीं अर गळगळो होग्यो।
''म्हनैं कोनी कढ़वाणी कीं सूं लेलरी। म्हैं साव कैय दियो नीं कै थूं थारै अर म्हे म्हारै। थूं थारो बैगड़ो उठा`र थारो गेलो नाप। अठै जे अेक घड़ी इज और दिखग्यो तो ...............।`` धन्नो आग उगळै।
''के करो हो!`` भावज कूद`र बिचाळै पड़ी।
''थूं बोलबाली रैय। जे थनै देवर आच्छो लागै तो थूं इज थारा डांडा-डेरा सांभ। कीं बोली तो खैर नीं .......।``
राकेस हक्को-बक्को रैयग्यो। अेक कानीं जिंयां-किंयां सरक्यो।
भावज इज लैरै आयगी- ''चालो राकेस! आपां चालां। बळत री आग मांय कठै जीवणो .....।``
''नीं भाभी! नीं म्हारी मां! भाईजी देवता है। चायै वै गळत हुवो। उणां री रीस उतरसी तद सो-कीं सावळ होयज्यासी। थे उणां नै संभाळो अर म्हैं सै`र जावूं। जद कदै बात सावळ होसी तो बावड़ ज्यासूं। पण हां, थे थारै भाई रै अठै सिणगारड़ी रो रिस्तो पूगा दियो। म्हैं ब्याव उण साथै इज करस्यूं ....।`` राकेस भाभी सूं निजरां नीं मिला सक्यो अर बैग चकण सारू आगीनै सरकग्यो।
''के करो स्याणां! कीं बात संभाळो ....।`` भावज ओजूं आपरै घर-धिराणी आगै हाथ जोड़्या।
तडैं़ %%%। तडंै़ %%% ....।
राकेस आपरो बैग लेय`र भाज्यो आयो- ''दोख म्हारो है। इणां रो नीं। म्हैं जावूं हूं। हो सकै तो म्हनैं माफ कर दीज्यो। पण भाईजी जुल्म रो बदळो जुल्म नीं होवै। बुरै रो बदळो बुरो नीं हुवै....।`` राकेस कैयी अर विदा लेवण सारू भाईजी रै पगां कानीं हाथ कर्या।
भाईजी री आंख्यां मांय सूं कीं आंसूंड़ा टळक-टळक राकेस रै सिर माथै आसीरवाद रै रूप मांय आ ढूळ्या।