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दुर्गेश


संक्षिप्त परिचय : दुर्गेश
जन्म : २५ मार्च, १९५२ ई।
जन्म स्थान : चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम : श्री मेघाराम माली
शिक्षा : बी।ए। ऑनर्स हिन्दी (लोहिया कॉलेज, चूरू)
सेवा : लिपिक, जिला कलेक्ट्रेट, चूरू
पत्रकारिता : अध्ययनकाल से ही दैनिक नवज्योति सहित कई पत्र-पत्रिकाओं हेतु संवाद संकलन का अनुभव।
लेखन : देश की प्रमुख हिन्दी व राजस्थानी पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखन।सतर-अस्सी के दशक के पत्र-पत्रिकाओं मे चर्चित रचनाकार। प्राय: पत्र-पत्रिकाओं के हर अंक में स्थान। अंतिम समय तक क्रम जारी।
पुस्तक प्रकाशन : कालपात्र : हिन्दी लघुकथा काळो पाणी : राजस्थानी लघुकथा धूल की धरोहर : हिन्दी कहानी ऊजळा दागी : राजस्थानी व्यंग्य नवांकुर : संपादन, नवोदित रचनाकारों की रचनाएँ









पुरस्कार : शिवचंद्र भरतिया गद्य पुरस्कार, पुस्तक 'काळो पाणी` (राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा)प्रयास सम्मान-२००६ (समग्र योगदान के लिए प्रयास संस्थान, तारानगर इकाई द्वारा) कर्णधार सम्मान (राजस्थान पत्रिका द्वारा) सहित अनेकों संस्थाओं द्वारा सम्मानित।



आयोजक : अच्छे आयोजक। अनेकों बड़े-बड़े साहित्यिक समारोहों के संयोजक। आयोजनों में माहिर। कमलेश्वर, भीष्म साहनी से लेकर अनेकों लेखकों का समागम करने में कुशल।
विशेष : चूरू अंचल के नवोदित साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने में अग्रणी।
स्वर्गवास : १८ नवम्बर, २००७, चूरू में सीढ़ियों से फिसलने के कारण आकस्मिक।
सम्पर्क : श्री अमित कुमार सैनी (पुत्र), रामजस का कुआं, अगुणा मोहल्ला, चूरू-३३१


दुर्गेश की रचनाओं की एक बानगी
हिन्दी व्यंग्य-
निमंत्रण की चाह में
चौरासी लाख जीवों में मुझे गधा ही सर्वाधिक पसंद है। इसके कई कारण है। गधेेेेेेेेेे या गधे रेहड़ी पर चाहे चार गुना बोझा डाल दो, वह कोई शिकायत नहींंंंंंंं करेगा। चार गुना वजन लादने पर रेहड़ी नीचे लटक जायेगीं और गधा बेचारा हवा में ऊंचा अटक जायगा। लेकिन मजाल है किसी छोटी बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटा दे। दूसरी बात गधे की आवाज मुझे सर्वाधिक सुरीली लगती है। हो सकता है मुझे नाद और सुरों का ज्ञान न हो। पर मुझे शास्त्रीय संगीत से क्या मतलब है? जो मन को भावे वह श्रेष्ठ। तीसरी बात गधे के लिए किसी विशेष पशु आहार की आवश्यकता नही रहती। वह चाहे जैसा घास-फूस खाकर चाय की पत्तियों के अवशेष की चटनी खाकर संतोष कर लेता है।
गधे पर बैठकर पाकिस्तान की यात्रा करना मेरे जीवन की अंतिम और एक मात्र इच्छा है। एक समाचार के अनुसार पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ 'हॉट एयर बैलून` से भारत आएंगे। उन्होने हॉट एयर बैलून से अमृतसर आने का निमंत्रण स्वीेकार कर लिया है। एक विदेशी समाचार पत्र के अनुसार 'वर्ल्ड हॉट एयर बैलून एसोसियशन` के अध्यक्ष व पूर्व सांसद विश्व बंधु गुप्त ने मुशर्रफ को यह निमंत्रण दिया। इस समाचार को पढ़कर मेरा चंचल चित और भी चलायमान हो गया और गधे पर बैठकर पाकिस्तान जाने की मेरी लालसा और भी बलवती हो गई।
पाठक मेरी इस भावना को कोई प्रतिक्रिया न समझें, क्यों? कि हमारे देेश के दिग्गज नेता तक ऐसा कर चुके हैं फिर मेरी तो उनके सामने हैसियत ही क्या है। एक बार पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी 'पेट्रोल बचाओ` के प्रतीक रूप में बग्घी में बैठकर संसद गई। तब दिग्गज विपक्षी अटल बिहारी वाजपेयी कब चुकने वाले थे। सो वे पीछे से तांगे में सवार होकर ससंद पहुंचे।
काश मुझे भी कोई खान, हुसैन या अली गधे पर बैठकर पाकिस्तान आने का निमंत्रण दे और मैं उसे स्वीकार कर दोनों देशो के मध्य प्रेम का पुल बांध दूं।

कुर्सी बचाने का अमोध अस्त्र
भारत के प्रखर राजनीतिज्ञ चाणक्य ने राज्य संचालन के लिए मुख्य रूप से समुदाय दण्ड और भेद की नीति को प्रमुखता प्रदान की थी। मोटे रूप में आज भी राजनीति में इन्हीं सूत्रों को अपनाया जाता है। पर चाणक्य ने जिस समय राजनीति के ये सूत्र बताये थे उस समय राजतंत्र था। राजतंत्र में इन चारों सूत्रों की सहायता से सहज-भाव से शासन किया जा सकता है। पर आज के इस लोकतांत्रिक शासन में इन सूत्रों के बाद जो पंाचवा सूत्र है वह है; मंत्रिमंडल विस्तार की उद्घोषणा और आज यह सूत्र कुर्सी बचाने का अमोद्य अस्त्र है।
यों तो आजादी के बाद सुनहरे नारों की देश में अच्छी पैदावार की गई। और इन नारों के बल पर देश पचास वर्ष तक चलता भी रहा। लोकतंत्र में सत्ता प्रमुख को जनता का कोई भय नहीं होता, क्योंकि एक बार देश प्रमुख अथवा राज्य प्रमुख बन जाने के बाद जनता में ऐसी कोई ताकत नहीं होती कि वे अपने नेता को पदच्युत करे दें। प्रजातंत्र में प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री को कोई खतरा होता है तो मात्र अपने ही दल के सदस्यों का वे जब चाहें तब अंसंतुष्टों का अलग पाला बनाकर मुखिया जी की कुर्सी को हिला सकते हैं। ऐसे में सत्ता प्रमुखोंे ने किसी आधुनिक चाणक्य से इसकी काट पूछी तो उसने मंत्रिमंडल विस्तार के अमोध अस्त्र का आविष्कार किया, जो सर्वथा सफल सिद्व हुआ।
चाहेे देश का प्रधानमंत्री हो अथवा किसी राज्य का मुख्यमंत्री कुर्सी प्रधान सत्ता के सिंहासन पर बैठकर सर्वप्रथम यही घोषणा करेगे कि अभी तो मंत्रिमंडल प्रतीक रूप में बनाया गया है, मंत्रिमंडल का विस्तार तो आगे किया जाएगा। कुर्सी प्रमुख की इस घोषणा से जो सदस्य बगावत पर उतारू रहते है वे तत्काल ठंडे पड़ जाते है और अपने को अगले विस्तार का मंत्री समझकर संतुष्ट हो जाते है। कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात् सत्ता-प्रमुख को सर्वप्रथम अपने ही खास व्यक्तियों से चुनौती मिलती है और वे राज्य में आम आदमी के दु:ख का राग अलापने लगते है। अपने सदस्यों की यह राग सुनकर चतुर राजप्रमुख तत्काल समझ जाते है कि अब इनके पेट मे असंतुष्टि के कीटाणु पनपने लगे हैं। इसलिए अब एक विस्तार तो करना ही पड़ेगा। और कुछ दिनों में एक सादे पर गरिमामय समारोह में मंत्रिमंडल का विस्तार कर दिया जाता है। इस समारोह में सत्ता प्रमुख सबसे पहले यही घोषणा करेगे कि परिस्थितिवश यह छोटा सा विस्तार करना पड़ गया मंत्रिमंडल का बड़ा विस्तार तो कुछ समय बाद किया जाएगा। राजप्रमुख की इस घोषणा से शपथ समारोह में शपथ से वंचित जो सदस्य मन ही मन असंतुष्ट होने का संकल्प दुहराते रहते है; वे तत्काल अपने संकल्प से डिग जाते हैं और समारोह पंडाल मुख्यमंत्री जी जिंदाबाद, अगला विस्तार शीघ्र हो के नारों से गुंज उठता है।
पर जब पर्याप्त समय बीत जाने के बाद भी पुन: मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं होता तो सदस्यों की रगे एठनें लगती है और उन्हें राज्य में सर्वत्र शासन में कसावट का अभाव दिखने लगता है। वे कभी राज्य में कानून व्यवस्था बिगड़ने का सवाल उठाते हैं तो कभी उन्हें अन्य लोगों की बेराजगारी सताने लगती है। वे अपने प्रमुख के पचास गुण गांएगे तो सौ अवगुणों को भी गिना देगें। अपने ही दल के ऐसे तीखे तेवर देखकर वे तत्काल भांप लेते हैं कि अब इनको लालबत्ती और झंडी लगी गाड़ी के सपने खटकने लगे है और वे कुछ ही दिनों बाद मंत्रिमंडल विस्तार का संकेत देकर एक बार फिर अपनी कुर्सी बचा लेते है । बस मंत्रिमंडल के इसी अमोध अस्त्र के सहारे एक प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आराम से पंाच वर्ष व्यतीत कर देते हैं।

गले वोटों की जेवड़ी
मैं लतिया नामक दलदल पार्टी का नेता हूं। मतदाता मेरे आदर्श हैं और वे मेरे रोम रोम में समाये हुए हंै। वोटरों के अलावा जीवन में मुझे कुछ भी नहीं सुहाता। मैं सुबह शाम, दिन-रात, उठते-बैठते, खाते-पीते, ऊंघते-ऊंघतें, सोते-जागते मतदाताओं की ही माला जपता हूं। यदि प्रजातंत्र में नेता के लिए कोई इष्ट, आराध्य, आदरणीय, नमनीय और प्रात: स्मरणीय है तो वे वोटर ही हैं। इसलिए जब भी मुझे कोई मतदाता मिल जाता है तो मैं उसे दुआ देकर नमन् करता हूं। चुनावों के समय तो मैं प्रत्येक वोटर तक कनक दंडवत करता हुआ उसके दरबार मे मत्था टेकने पहुंचता हूं। सामान्य लोग प्रतिदिन मंदिर और शिवालयों में जाकर देव मूर्तियों के सामने नतमस्तक होते है पर मैं एक सजग नेता हूं। वोटर की नब्ज और समय की गति पहचानता हूं। इसलिए मैं मदिरों की टालियां नहीं हिलाकर सुबह शाम वोटरों के हित टटोलता रहता हूं। वोटर और मेरा चोली दामन का साथ है। मतदाता मेरे लिए नीर है और मैं मछली। जिस प्रकार मछली को पानी में से निकालते ही वह तड़पने लगती है उसी प्रकार मतदाताओं से अलग होते ही मैं छटपटाने लगता हूं।
मैं पानी हूं तो वोटर मेरे लिए चंदन है। मतदाताओं में मुुझे कुर्सी की महक, शपथ की लय, सचिवालय का द्वार, सिविल कॉलोनी की चहल पहल, मोबाइल की राग, शिलान्यास का पत्थर, उद्घाटन का फीता और चाटन की चासनी की झलक मिलती है। जैसे भक्त के लिए भगवान् की एक झलक ही पर्याप्त होती है वैसे ही चौफूली मुहर और इलेक्ट्रोनिक वोटर मशीन का बटन ही मेरे हृद्य की धड़कन है। आम आदमी को पुष्पों मे सुगंध आती है पर मुझे तो वोटरों में ही एक दिव्य महक आती है। वस्तुत: वोटरों की जिंदगी गाथा गाई जाये उतनी ही कम है। लोकतंत्र मे वोेटर ही एक ऐसा देदीप्यमान नक्षत्र है जो एक नेता को सड़ी गली से उठाकर सचिवालय के गलियारे मे पहुंचा देता है। जिस व्यक्ति के लिए गांव की चौपाल के दर्शन दुर्लभ होते हैं, वोटर उसे सदन की चकाचौंध में ले जाकर बैठा देता है। वोटर मरियल व्यक्ति को पहलवान बना देता है, उसकी इच्छा हो तो लाल बत्ती और झंडी की गाड़ी और कमांडो उपलब्ध करवा देता है। उसकी मेहरबानी से एक कंगला मात्र पांच वर्ष में करोड़पति बन जाता है। नेता के प्रति यदि वोटरों की सद्भावना जागृत हो जाये तो वे उसे गधे पर से उठाकर हेलीकॉप्टर पर बैठा देते है। उसके हाथ में फीता काटने की कैंची पकड़ा देते हैं ओर उसे उद्बोधन करने की महाशक्ति प्रदान कर देते हंै।
वस्तुत: प्रजातंत्र में वोटर की महिमा अपरम्पार है। उसके अहसानों को वाणी और कलम से व्यक्त नहीं किया जा सकता है। मैं तो वोटरों के प्रति सर्वथा समर्पित होकर उनसे यही कहता हूं:-
नेता कुत्ता वोटरोंे का, लतिया मेरा नाऊंं।
गले वोटो की जेवड़ी, जित खिंचे तित पाऊं।।

सखी! सघन साक्षरता सांग आयो री!
प्रात: स्मरणीय निरक्षर महापंडित जगत्-बाबा कबीर ने अब से पांच शताब्दी पूर्व लोगों को शिक्षा का एक सीधा-सादा दर्शन दिया था। कबीर साहब की इस बारहखड़ी में मात्र ढ़ाई अक्षर ही थे। यदि लोग कबीर के प्रेम रूपी इन ढ़ाई अक्षरों को हृद्यगम कर लें तो सम्पूर्ण विश्व को साक्षर और शिक्षित समझना चाहिए। पर दुर्भाग्य से लोगों ने कबीर के इस दर्शन को एक पागल की सनक बताकर छोड़ दिया और इस परम् पवित्र धरा की छाती पर अनगिनत विद्यालय सूल की तरह खड़े कर दिये गये। पर इन विश्वविद्यालयों से लोग अधिक शिक्षित होकर मूर्ख के मूर्ख रहे। और तो और आदमीनुमा जीव ने अपने शातिर मस्तिष्क के तन्तुओं को अति सक्रिय कर दागल चांद को और भी दागनुमा कर दिया है। स्वाभाविक जन्मे लोगों के लिए तो पृथ्वी पर पैर धरने को ही जगह नहीं है, इधर जैव रसायन शालाओं में ट्यूब टायर बच्चे भी उत्पादित किये जाने लगे हैं। कैसी महान् उपलब्धि है, शिक्षित आदमी की। इस अड़सठ वर्ष व्यक्ति को जब जमीन की शिक्षा से संतोष नहीं हुआ तो वह पराई भूमि पर पढ़ने जाने लगा। दिल्ली का लड़का लंदन में पढ़ता है तो भूटान का बच्चा शिक्षा के लिए भारत में पधार रहा है। रामायण और महाभारत काल में यंत्रों से भी बहुत आगे निकल चूके विश्व आकाओं को अब भान हुआ है कि सारा संसार तो अभी निरक्षर पड़ा है और हम व्यर्थ में ही एक दूसरे पर मिसाइलें दाग रहे है। अत: हमें सर्वप्रथम आल वर्ल्ड को लिटरेट करना चाहिए। यह लिटरेट मनुष्य लिटरेट होकर कितना इल लिटरेट और असभ्य हो जाता है इस तथ्य पर तनिक भी विचार किये बिना विश्व के शिक्षाविदों ने सम्पूर्ण संसार के करोड़ों- करोड़ों रूपये कुछ सशक्त हाथों मे डाल दिये। यह फाऊ (फोकट) का पैसा पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ राजस्थान की शुष्क मरुधरा पर भी पहुंच गया। प्रकृति से बुरी तरह प्रताड़ित, दारू-मारू, दहेज, सती, घुंघट, अडाण (गिरवी) और टसरिये (अफीम सेवन) की अब खाइयों (कठिनाइयों) से पहले से ही दबे-चिथे राज्य में सम्पूर्ण साक्षरता ने जैसे कोढ़ में खाज (खुजली) का कार्य किया। यहां तो पहले से ही मंदिर-मेड़ियों की भरमार थी। सरकार ने साक्षरता के बहाने कोने-कोने में अनगिनत आखर मेड़ियों और आखर धामों की थरपणा (स्थापना) कर सम्पूर्ण साक्षरता को एक मजाक बनाकर रख दिया है। मैं साक्षरता और शिक्षा के महत्त्व बनाकर रख दिया है। मैं साक्षरता और शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझ रहा हंू, ऐसी बात नहीं है। पर साक्षरता और शिक्षा मनुष्य के लिए प्रथम आवश्यकता कतई नहीं है।
मनुष्य की पहली आवश्यकता तो रोटी है। तभी वो जनकवि हरीश भादानी जन सभाओं में लोगों को यह कटु सत्य बताते रहते हैं कि रोटी नाम सत्य है, खाये सो मुगत है। यही कहने का तात्पर्य यह है कि राजस्थान के आम भूखे-नंगे व्यक्ति को पहले रोटी चाहिए न कि पाटी। कपड़े-मकान तो बहुत बाद की बात है। जब यहां का सामान्य नागरिक गरीबी की रेखा से नीचे जी रहा है, लोगों के सामने रोटी की समस्या मंुह बाए खड़ी हो, आय का कोई साधन न हो, यहां तक कि पीने का पानी भी सुलभ नहीं हो, ऐसी नग्रावस्था में थोक और कमीशन में ढ़ोलक-मंजीरे खरीदकर आखर मेंड़ियों पर साक्षरता की सांकल खाना कहां की बुद्विमानी है? दूर-दराज के गांवों-कस्बों में जब जिप्सी में बैठकर आखर साहब पहुंचते है तो राज और साहब की आंतरिक बेईमानी से सर्वथा अनभिज्ञ गांव की भोली-भाली नारियां एक-दूसरी को संबोधित कर यही कहती है-सखी सघन साक्षरता सांग आयो री।

हम भी हैं दावेदार
आगामी विधानसभा के चुनाव को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक दलों के महारथियों ने अपनी-अपनी गोटियां फिट करने, पाला बदलने और मतदाताओं के आगे नत-मस्तक होने की कवायद शुरू कर दी है। पर यह कोई नई बात नहीं है। चुनावों का यह प्रपंच तो इस देश में गत पचास-पचपन वर्षोंं से नए-नए रूपों में हो रहा है।
आगामी चुनावों के सबंध मे सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार आम से आम आदमी भी टिकट मांग रहा है। यदि इन टिकट चाहने वालों की बात सच निकल जाए तो यह समझना चाहिए कि इस बार विधानसभा में सारे ही नए चेहरे होंगे।
एम.एल.ए. और रेल-बस की टिकट में अन्तर नहीं समझने वाले धूड़ाराम को पता नहीं कैसे चुनावों की भनक लग गई। धूड़ाराम लोगों की बकरियां चराता है। ज्योंही उसने चुनाव और टिकट मिलने की बात सुनी तो उसने सभी को कह दिया कि अब आप कोई दूसरा ग्वाला ढूंढो; मैं तो इस बार एम.एल.ए. का टिकट मांग रहा हूं। दुनिया के इतिहास में एम.एल.ए. तो क्या एक गडरिया राष्ट्रपति तक बना है।
कुछ दिनों पहले मुझे गुरु अश्रद्वानंद जी मिल गए। गुरुजी ने अपने जीवन में छात्रों को फूटा अक्षर नहीं सिखाया। दिनभर गांजे की सिगरेट पीने और सट्टा करने के अलावा उन्हांेने केवल नियमितता बरती तो केवल फोकट का वेतन उठाने में। मैने उन्हें प्रणाम कर पूछा-गुरुजी, आजकल फुर्सत में कैसे लग रहे हैं? वे मुस्कराकर बोले-'तुम्हें पता नहीं, मैंने मास्टरी छोड़ दी है। पैंतीस सालों में मैंने हजारों बच्चों को पढ़ाया है। उन हजारों के लाखों अभिभावक है। अबकी बार मैं विधानसभा का टिकट मांग रहा हूं। अब तुम ही बताओे कौन है मुझे हराने वाला।` मैं उन्हें पुन: नमस्कार कर आगे बढ़ गया।
अफलातून गधा रेहड़ी से पलदारी करता है। जब उसने चुनावों की चर्चा सुनी तो उसने रेहड़ी किसी अन्य को बेच दी और दिनभर रेहड़ी वालों से कहता रहता है कि फलां पार्टी इस बार किसी मजदूर को टिकट देगीं अपने क्षेत्र में मुझसे योग्य मजदूर और कौन होगा? मैं एम.एल.ए. का टिकट मांग रहा हूं। आप अभी से मेरी हवा बनानी शुरू कर दें।
और तो और इस बार वे लोग भी टिकट मांग रहें हैं जिन्होंने कभी पार्षद अथवा वार्ड पंच का भी टिकट नहीं मांगा। एक दिन सर्किट हाऊस में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष आए हुए थें। वहां अधिकतर वे लोग थे जो कभी ऐसे स्थानों पर नहीं आते हैंं। मैंेने एक परिचित पिचकारीलाल से पूछा- 'आप लोग तो किसी जन समस्या का ज्ञापन देने आए हांेेगे?` वह बोला-'नहीं, मैं भी इस बार टिकट मांग रहा हूं और मेरे साथ जो लोग खड़े हैं ये भी टिकट मांगने आए हैं।` पिचकारी लाल की बात सुनकर मैंने पक्का निश्चय कर लिया कि अब किसी से कुछ भी नहीं पूछूंगा।

अध्यक्ष बनने का आनंद
यों तो मंत्री बनने में जो रस और सुखानुभुति है; वह अनिर्वचनीय है, पर किसी आयोग का अध्यक्ष बनने में जो आनंद है; वह मंत्री पद से कई गुना अधिक है।
मंत्री बनने के लिए सर्वप्रथम किसी महत्त्वपूर्ण दल का टिकट प्राप्त करना आवश्यक है और ऐसे दल का टिकट प्राप्त कर लेना संजीवनी बूटी से कम नहीं है। यदि टिकट मिल भी जाए तो फिर अपार धन, अनगिनत लठैत और लोगों से अद्वितीय नाटककार की तरह बातचीत की योग्यता आवश्यक है और नाकों चने चबाकर कोई एम.पी., एम.एल.ए. बन भी जाए तो मंत्री बनने के लिए महाभारत जैसा युद्ध लड़ना पड़ता है।
और यह युद्ध जीतकर कोई योद्धा मंत्री बन भी जाए तो सदन में विपक्षी उसके कान ऐंठे और वोट क्षेत्र में कार्यकर्त्ता उनसे सौ-सौ डिजायर करवाएं। कुल मिलाकर मंत्री बनने के सौ सुख हैं तो आनंद के अतिरेक में खलनायकों की खलल भी उन्हें झेलनी पड़ती है लेकिन किसी आयोग का अध्यक्ष बन जाए यह पद माला डी की तरह सर्वथा सुरक्षित है। एक आयोग अध्यक्ष को वे सभी असीमित सुविधाएं मिलती है जो एक मंत्री भोगता ह,ै भले ही वह किसी आयोग का ही अध्यक्ष क्यों न हो? आयोग अध्यक्ष को लालबत्ती की गाड़ी मिलती है तो खाकी वर्दी का अं्रगरक्षक भी उपलब्ध करवाया जाता है।
समय-समय पर अध्यक्ष जी के टूर-प्रोग्राम बनते हैं तो कोई सरकारी पालतू उनके प्रोटोकोल में भी खड़ा रहता है। ऐसा अध्यक्ष किसी सर्किट हाऊस या रेस्ट हाऊस में रूकता है तो अनगिनत प्यादे उनके चारों ओर वैेसे ही चक्कर लगाते हैं जैसे बरसात के मौसम में रोशनी पर मच्छर चक्कर काटते हैं। आयोग अध्यक्ष कूड़े के ढ़ेर, गंदी नाली आदि का निरीक्षण भी मंत्री की शैली में करता है तो सरकारी गुर्गो पर भी गुर्राता है। ऐसे अध्यक्ष के कपड़े भी ठीक मंत्री वाली महंगी खादी के होते हैं और खीसंे भी वह मंत्री की तर्ज पर ही निपोरता है। चमकते जूते, मंुह में पान दबाए, सुनहरा चश्मा लगाए, हाथ मेंं मोबाइल लिए दो-दो कलम टांगे और नाटकीय मुद्रा में फर्जी ढंग़ से आपको हाथ जोड़ता कोई दिख जाए तो समझिये ये किसी आयोग के अध्यक्ष है। आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए न तो टिकट मांगनी पड़ती ह,ै न चुनाव लड़ना पड़ता है, न मतदाताओं के तलवे चाटने पड़ते हैं इसलिए यह पद 'अनुकम्मा पद` के नाम से जाना जाता है।
यहां प्रश्न उठता है, तो फिर कौन बनता है आयोग का अध्यक्ष? आयोग अध्यक्ष वही बन जाता है, जो प्रतिदिन कुछ समय के लिए अपने आका के बच्चों का मनोरंजन कर दे, आकी की जूती सरका दे, आका के काका की चिलम भर दे, आकी को बाजार घुमा लाए और उनके कुत्ते को दुलारता रहे। चमचा ज्यों-ज्यों अपने आका के कुत्ते को दुलारता है त्यों-त्यों आका का चमचे के प्रति विश्वास दृढ़ होता जाता है और एक दिन उसे अनायास ही किसी आयोग का अध्यक्ष बनाकर उसे मंत्री का दर्जा दिला दिया जाता है।

साक्षात्कार एक प्रत्याशी का
सर्वनाश शराब पार्टी के ठेकेदार फर्जीलाल इस बार मान्यता प्राप्त पार्टी का टिकट ले आए। टिकट मिलते ही इन्होंने नामांकन पत्र भरा और सफारी सूट को तिलांजलि देकर झट सफेद खादी का कुर्ता पाजामा धारण कर लिया। मुंह में पान, हाथ में मोबाइल और चमचमाते जूतों से इनका व्यक्तित्व देखते ही बनता है।
चुनाव टिकट मिलने के बाद फर्जीलाल में सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया कि आज तक ये चौबीसों घंटो मंुह फुलाए रखते थे लेकिन अब इनके होठों पर हरदम एक दिव्य मुस्कान देखी जा सकती है। इस प्रकार के प्रत्याशी का साक्षात्कार लेना जरूरी समझा गया जो पाठकों की जानकारी के लिए नीचे दिया जा रहा है।
आप तो पहले से ही बहुत सम्पन्न है। अच्छा व्यवसाय चलता है, पास में पर्याप्त धन है फिर आपने राजनीति में आने का निर्णय क्यों लिया?
देखिए बात स्पष्ट है। राजनीति भी एक आकर्षक व्यवसाय है। इसमें पाशा एक बार अनुकूल पड़ जाए तो पीढ़ियों तक को लाभ होता है। फिर राजनीति में रहकर दूसरे गलत कार्य भी निर्विघ्न रूप से किये जा सकते हैं। एक नेता का कार्य चाहे कितना ही नियम विरूद्ध हो उसके काम में कोई रूकावट नहीं डाल सकता।
टिकट मांगने के लिए आपके पास क्या आधार थे?
टिकट मांगने के लिए मेरे पास पैसा और पहुंच दोनों ही आधार थें।
यह टिकट प्राप्त करने में आपका कितना पैसा लगा?
कुछ मुस्कराकर यह बात साक्षात्कार में प्रकट नहीं की जा सकती। अन्य प्रश्न पूछें।
इस चुनाव में प्रत्याशी के पास पैसे आने के कौन-कौन से सा्रेत हैं?
ऐसे कई सा्रेत है। एक तो चुनाव के लिए धर्म जाति और सम्प्रदाय के नाम पर लोगों से चंदा लिया जायेगा, दूसरे सम्पन्न कार्यकर्ता भी अपने स्वार्थ के लिए प्रत्याशी को पैसा देते हैं और मोटी रकम देते हैं वे व्यवसायी जो जीतने के बाद प्रत्याशी से अपने मनोवांछित काम करवाते हैं। उन लोगों के गलत सलत काम करवा देने पर वे और भी मोटी रकम देते है।
यह चुनाव जीतने के लिए आपने कौन सी रणनीति अपनाई हैं?
देखिए, चुनाव जीतने के लिए मात्र एक रणनीति से काम नही चलता। इसमें तो साम, दाम, दण्ड, भेद चारों ही नीतियां अपनाई जाएगी। लठैत की भर्ती की जा रही है, शराब भी अनेक क्षेत्रों में सप्लाई की जायेगी, इसके लिए नकली शराब फैक्ट्री का काम प्रगति पर है। कई जगह नकद पैसे भी फैंंकने होंगे।
विधायक बनने के पीछे आपकी मूल भावना क्या है?
यह मूल भावना तो सभी जानते है, पट्टा, परमिट, प्लाट, पावर, पेंशन क्या नहीं है इस पद के पीछे?
विधायक बनते ही सर्वप्रथम आप कौनसा कार्य करेंगे?
सर्वप्रथम तो मंत्रिपद के लिए ही भागदौड़ रहेगी।
आपको मंत्रिमंडल में नही लिया गया तो?
फिर तो मुझे असंतुष्टोंे के पाले में ही जाना पडेग़ा।
आपकी राजनीति का अंतिम उद्देश्य क्या हैं?
सबसे ऊंची कुर्सी प्राप्त करनी ही मेरी राजनीति का अंतिम उद्देश्य है।
जनसेवा के लिए आपकी क्या-क्या योजनाएं है?
एक विधायक अपनी सेवा अच्छी तरह कर ले तो ही बहुत है, जन सेवा तो मात्र राजनीति का एक नारा है।
राजनीति में आप अपना आदर्श किसे मानते हैं?
वे सभी छोटे बड़े नेता मेरे आदर्श हैं जो मात्र शब्द जुगाली से ही अपनी रोटियां सेकते रहते हैं।
राजनीति में ऐसा क्या आकर्षण है जो आजकल अधिक लोग इस क्षेत्र की ओर आकर्षित हो रहे हैं?
अपार धन, देश-विदेश की यात्राएं, फोटो, माला, शिलान्यास, उद्घाटन और मीडिया मंे छाए रहने के कारण ही लोग इस धंधे को अपना रहे हैं।
युवाओं के लिए कोई संदेश?
युवाओं को चाहिए कि वे काम धंधे के चक्कर में नहीं पड़कर राजनीति में ही अपने भाग्य को चमकाएं।


दुर्गेश से परिचित कराते आलेख :.

साधारण दीखबाळो, असाधारण मिनख

--भंवरसिंह सामौर, चूरू

राजस्थान विश्वविद्यालय रै हिन्दी विभाग सूं पढ़ाई पूरी कर राजस्थान सरकार रै कॉलेज शिक्षा विभाग मांय म्हारो चयन हुयो। उण बखत भावजोग सूं कॉलेज शिक्षा रै निदेशक पद माथै श्रद्धेय आर।एस। कपूर हा, बै महाराजा कॉलेज मांय म्हारा इतिहास गुरु हा। राजस्थान लोक सेवा आयोग सूं म्हारो नांव आयो तो म्हनैं बुलायो अर बूझ्यो कै कठै लागणो चावै है। लोहिया कॉलेज-चूरू, बांगड़ कॉलेज-डीडवाना अर दूगड़ कॉलेज-सरदारशहर मांय जिगां खाली है। म्हैं कैयो गांव सूं तो नैड़ो डीडवाणो है। और`स आप जाणों। जणां बां कैयो, डीडवाणो दूसरै जिलै मांय है अर सरदारशहर काणीयै पड़ै। चूरू अळगो जरूर है पण जिलै रो मुख्यालय हुवण सूं थारै गांव बोबासर रै विकास मांय भोत काम आसी। इण भांत बां म्हनैं लोहिया कॉलेज, चूरू मांय लगा दियो।
चूरू मांय डॉ. श्रुतिधर गुप्त, प्राचार्य रै रूप मांय आया। बै भोत उत्साही हा अर नुंवै लोगां नै आगै लेय कॉलेज रै विकास री योजनावां बणायी। इण पेटै अधिस्नातक (एम.ए., एम.एससी. एम. कॉम) कक्षावां री सरूवात तो खास मानो हो ही साथै ही हिन्दी मांय ऑनर्स री कक्षावां ई बां सरू करवायी। ऑनर्स मांय राजस्थानी रो अेक प्रश्न-पत्र बां रखवायो अर बो पढ़ावण वास्तै म्हारै सूं पक्कल करली कै थानै पढ़ाणो पड़ैलो दूसरै आदमी री व्यवस्था कोनी हो सकैली। इण रै साथै बां अेक काम और कर्यो कै लोहिया कॉलेज री सालीणा पत्रिका 'आलोक` मांय राजस्थानी रो न्यारो अनुभाग सरू करवायो। जको आज दिन लग चालू है। ऑनर्स रै पढ़ेसर्यां मांय पैलो बैच डॉ. महेशचंद्र शर्मा (पूर्व राज्यसभा सदस्य अर पूर्व प्रदेशाध्यक्ष, भाजपा) अर ओमप्रकाश शर्मा (पूर्व न्यायधीश) इत्याद १० पढ़ेसर्यां रो हो।
ऑनर्स रै आगलै बैच मांय दुर्गादत्त माळी प्रवेश लियो। ऑनर्स मांय ऊंचै नंबरां सूं प्रवेश मिलतो। दुर्गादत्त नै संगळिया पढ़ेसरी दुर्गेश नांव सूं बतळाता अर बोही उण रो नांव थरपीजग्यो। दुर्गेश आखी ऊमर इणी नांव सूं ओळखीजतो। उणरै साथै दो नांव और हा, बालमुकन्द ओझा अर गिरधारीलाल यादव। ओझो तो राजस्थान विधानसभा मांय नकली तमंचो चलाय`र चेतावनी दीन्ही कै आज तो नकली है पण तड़कै असली चालैलो। ओझो अबार राजस्थान सरकार रै जनसंपर्क विभाग मांय अधिकारी है अर गिरधारीलाल यादव, उपनिदेशक, माध्यमिक शिक्षा मांय सरकारी नौकरी करै। अै तीनू ई पढ़ेसरी कॉलेज मांय चर्चित हा। आंनै अै जुझारू संस्कार दिया माधव शर्मा पत्रकार, जिका सोशलिस्ट पार्टी सूं जुड़ेड़ा हा। म्हैं मजाक मांय बांनै सोटलठ पार्टी वाळा कैय`र बतळांतो।
दुर्गेश मूलरूप सूं साहित्य सूं जुड़ाव वाळो मिनख हो। पढ़तां थकां ई अै लक्षण उण मांय प्रगट हुग्या। उणनै 'आलोक` पत्रिका रै राजस्थानी अनुभाग रो छात्र-संपादक ई बणायो अर उण चोखो काम कर्यो। उणरी पैली रचना 'म्हैं पापी हूं` नांव री कहाणी 'आलोक` मांय ही छपी। फेरूस उणरी रचनावां हिन्दी अर राजस्थानी मांय उण जमानै री पत्रिकावां मांय छपी। फेरूं नारायणसिंह राजावत 'दिलचस्प` उणनै साथै लेय 'युवा रचनाकार समुदाय` बणाय कैयी आयोजन कर्या अर वांरी चर्चा आखै साहित्य जगत मांय हुयी। पैलो आयोजन आर.एन. अरविंद (तत्कालीन उपखण्ड अधिकारी, चूरू) री प्रेरणा सूं सुराणा स्मृति भवन, चूरू मांय राजस्थान रै युवा रचनाकारां रो हुयो। इण सूं अेक नुंवै साहित्यकारां री टीम बणी। इणरै पछै दुर्गेश रो संपर्क वेदव्यास, कमलेश्वर अर भीष्म साहनी सूं हुयो अर अै देश रा नामी साहित्यकार चूरू मांय आय आं जोध-जुवानां रो होसलो बधायो।
इंयां चालतां-चालतां आ` जोड़ी चूरू मांय राजस्थानी समारोह रो आयोजन कर्यो, जिण मांय उण जमानै रा उच्च शिक्षा मंत्री बी.डी. कल्ला अर वेद व्यास तो पधार्या ही उण रै साथै दिल्ली री 'वर्ल्ड फैमिली` नांव री संस्था रा देश-विदेश रा अनेक संस्कृति कर्मी, जामिया-मिलिया, दिल्ली रै विष्णुजी रै नेतृत्व मांय दिलचस्प रै प्रयास सूं पधार्या। उण मोकै राजस्थान रै लोक संगीत रा नामी-गिरामी लंगा-मांगणियार लोक गायक आया तो गोगाजी री गाथा गावणियां डैरूं रा लोक गायक भी हा। उण मौकै अेक स्मारिका भी छपी।
इण भांत पुराणां साथी छूटता गया अर नुंवां जुड़ता गया। नुंवा साथ्यां मांय गुरुदास भारती, कमल शर्मा, हनुमान आदित्य अर दुलाराम सहारण इत्याद जुड़्या अर कारवों चालतो रैयो। रचनात्मक काम चालता रैया। दुर्गेश नै राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर सूं 'काळो पाणी` रचना माथै पुरस्कार ई मिल्यो। प्रगतिशील लेखक संघ सूं ई आखी ऊमर जुड़्यो रैयो। आगै री योजनावां रा कैयी काम उण ओढ़ राख्या हा पण अेक दिन दुलाराम सहारण रो फोन आयो, दुर्गेश कोनी रैयो। सुण`र विस्वास कोनी हुयो पण कांई हुवै? मरणो तो कोयी रै बस री बात कोनी हुवै। मरणो तो पड़सी मुदै, जलम्या जका जरूर। बिलख`र रैयग्या।
दुर्गेश री स्मृति मांय हुयी शोक सभा मांय उण रै जलम दिन २५ मार्च माथै कार्यक्रम री बात आयी। दुलाराम सहारण भाली सम्हाई। उणरा जोड़ीदार बण्या डॉ. रामकुमार घोटड़ अर आसीरवाद हो बैजनाथजी पंवार रो। सुधी लोगां री भावना रै मुजब ओ आयोजन आपनै दाय आवैलो।
कुड़तै, पजामैं वाळो अेक पतळो`क साधारण दीखबाळो मिनख साहित्य जगत मांय असाधारण काम कर आपरी छाप छोडग्यो।

पहली मुलाकात

- डॉ रामकुमार घोटड़, राजगढ़ (चूरू)

सन् १९९१-९२ की बात होगी। मैंने एक पत्रिका में दुर्गेशजी की लघुकथा एवं एक समीक्षात्मक टिप्पणी पढ़ी। मेरा लेखन अधिकतर लघुकथा विधा पर ही रहा है अत: इतने नजदीकी निवासी (चूरू) लघुकथाकार का नाम देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। मैंने इस संदर्भ में एक पत्र 'महाराजा होटल, स्टेशन रोड, चूरू` के पते पर लिखा। कुछ दिन बाद उनका एक स्नेहिल पत्र व साथ में 'काळो पाणी` व 'धूल की धरोहर` पुस्तकें मिली। मुझे बहुत अच्छा लगा। काळो पाणी की लघुकथाएं निस्संदेह अच्छी लगी ही लेकिन मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया धूल की धरोहर की कहानियों ने। जिसमें ग्रामीण परिवेश के पात्रों के साथ टीले, फोग, खींप, खेजड़ी, कैर-जाल का सटीक विवरण है। इन कहानियों को पढ़ते समय मुझे यूं लगा कि ये मेरे आसपास व मेरे गांव की ही कहानियां है। मेरा बचपन आंखों के आगे घूमने लगा और ऐसा अहसास हो रहा था जैसे कि इन कहानियों में मैं भी कहीं न कहीं हूं। इन कहानियों ने मुझे दुर्गेशजी से जल्दी मिलने की इच्छा जागृत कर दी। लेकिन संयोगवंश मिल नहीं पाया।
सन् १९९४ में राजस्थान सरकार द्वारा मेरा चयन उच्च अध्ययन हेतु कर लिये जाने के कारण मैं स्त्री रोग एवं प्रसूति विशेषज्ञ कोर्स हेतु बीकानेर चला गया। बीकानेर एक साहित्यिक गढ़ है। मेरी सबसे पहले मुलाकात उस समय चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत श्री बुलाकी शर्मा से हुई। तब बुलाकीजी ने कहा, 'अच्छा आप चूरू के रहने वाले हो तो आप दुर्गेशजी को तो जानते हीं होंगे। वो एक अच्छे लेखक हैं। तब मुझे अपना आलस्य खला कि समय निकालकर मैं दुर्गेशजी से क्यों नहीं मिला।
फिर बीकानेर के साथियों से धीरे-धीरे परिचय होता गया। लगभग चार वर्ष के अध्ययन के दौरान मैं बीकानेर रहा। तब यादवेन्द्र शर्मा चंद्र, मालचंद तिवाड़ी, नीरज दइया, हरदर्शन सहगल, भवानी शंकर व्यास विनोद के मैं निकट आया एवं इनसे आत्मीय संबंध बन गये। श्री हरीश भादानी, नंदकिशोर आचार्य, शिवराज छंगाणी, लक्ष्मीनारायण रंगा से परिचय भर ही हो पाया। जब इनसे मेरा शुरूआत में परिचय हुआ तब इन्होंने भी मुझसे कहा, 'अच्छा आप चूरू के रहने वाले हो, चूरू, दुर्गेशजी वाला चूरू। आप तो उनसे जरूर मिलते रहे होंगे। ऐसे भले आदमी के सान्निध्य में रहकर साहित्यिक विचार-विमर्श तो होता ही रहा होगा।` मैं मुस्करा भर रह जाता।
सन् १९९८ में कोर्स पूर्ण होने पर मेरी पोस्टिंग राजगढ़ (चूरू) कर दी गयी। संस्थान का प्रभारी होने के नाते मुझे जिला मुख्यालय पर विभागीय मीटिंग हेतु जाना होता था। हर बार मैं इसी प्रयास में रहता कि मीटिंग के बाद दुर्गेशजी से भी मिलूं। लेकिन कभी समयाभाव व कभी दुर्गेशजी के कार्यालय की सही जानकारी न होने व कभी परेशानी भरा माहौल, संकोचवश मिल न सका।
सन् १९९९ के एक दिन जब विभागीय मीटिंग से जल्दी ही मुक्त हो गये तो मैंने दुर्गेशजी से मिलने का मन बनाया। हिम्मत करके एक कर्मचारी से दुर्गेशजी के कार्यालय के विषय में पूछा। उस व्यक्ति ने इस ढंग से उनके कार्यालय का रास्ता व बैठने की जगह बताई जैसे गहरी जानकारी रखने वाला नक्शे पर हू-ब-हू इंगित करता है। मैं उसके बताए अनुसार जिलाधीश कार्यालय की दूसरी मंजिल में गया। पतली-सी गैलरी से होकर बायें हाथ की तरफ एक कमरे के दरवाजे पर गया तो देखा कि वहां दो कर्मचारी बैठे हैं। एक, गेट के पास, दूसरा, आगे की ओर। एक छोटा-सा कमरा, आलमारियों व लम्बी-लम्बी टेबल से ठसाठस भरा हुआ। दोनों को देखकर मैंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और मुंह से बुदबुदाया, 'दुर्गेशजी?` तब आगे की ओर बैठा हुआ शख्स खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर मेरा अभिवादन स्वीकारते हुए कहा, 'दुर्गेश मैं ही हूं।` मैंने अपना परिचय दिया। तब दुर्गेशजी ने मेरे से हाथ मिलाते हुए कहा, 'अच्छा! डॉ. रामकुमार घोटड़ आप हैं। पहली बार मुलाकात हुई है आज। नाम भर जानता था। अच्छा लगा कि आप आये हो। आओ! बैठो।` फिर इधर-उधर देखकर वे झिझक से गये। उस कमरे में बैठने के लिए कुर्सी रखने की जगह ही नहीं थी। तब उन्होंने अपने साथी को, 'मैं आता हूं।` कहकर मेरा हाथ पकड़ते हुए बाहर आये। फिर हम दोनों गैलरी से सीढ़ियां उतरकर कलेक्ट्रेट कार्यालय के बाहर लगी चाय की थड़ियों पर आकर बैठ गये।
हमने वहां नमकीन एक साथ ली और घण्टे भर बैठे रहे। इधर-उधर की, अपने-आपकी व साहित्य संबंधी बातें की। मैंने भी उन्हें बीकानेर के साथियों व उनके प्रति जुड़ाव व श्रद्धा की बात बताई। मेरे मन में आ रहा था कि इतना बड़ा नाम और इतनी सादगी, सरलता। जहां भी मैं साहित्यिक गोष्ठियांे में गया या साहित्यिक साथियों से मिला वे राजगढ़ के नाम को अनसुना करते हुए चूरू का नाम आते ही मुझसे कहते, 'अच्छा चूरू से आये हो, दुर्गेशजी कैसे हैं? चूरू तो दुर्गेशजी वाला ही है ना।` जिस नाम के आगे ऐसी उपमा आती हो वा आप मेरे सामने बैठा है।
वे एक बंद गले के कमीज व पायजामा पहने साधारण, सामान्य-सी वेशभूषा में बैठे थे। बात करते समय कम बोलना व सार की बात कहना, हंसी-मजाक की बात में भी होंठो पर सिर्फ मुस्कराहट, प्रत्येक बार बड़े नाम से मुझे संबोधित करके बोलना। उनके आत्मीय व्यवहार व बात करने की शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मिलने के बाद मुझे अफसोस हुआ कि मुझे तो इनसे पहले ही मिल लेना चाहिए था।
दुर्गेशजी के हंसने का ढंग भी अलग ही था। होंठो पर मुस्कराहट के साथ आंखों में खुशी का इजहार के संकेतों से ही आभास होता था कि वे हंस रहे है। मैंने कभी भी उनके होंठ खोलकर दांत दिखाने वाली ठहाके भरी हंसी हंसते नहीं देखा। लगभग एक दशक मैं उनके सम्पर्क में रहा हूं।
वे सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले एक विचारशील व्यक्ति थे। स्वयं को यथा स्थान रखकर हम उम्र एवं युवा साहित्यकारों को आगे लाने के सकारात्मक सोच के साहित्यकार रहे हैं। वे गुटबाजी को नजर अंदाज करते हुए अपने-पराये सभी का सम्मान करने वाले विशिष्ट जीवनशैली के धनी थे।
अब भी चूरू शहर वैसा ही है। वही सड़के, वही थड़ियां, वही कार्यालय व साथी। भीड़ भरे बाजार। पीं-पीं का वैसा ही स्वर। फिर भी न जाने क्यों, जब भी चूरू शहर में जाता हूं तब मुझे एक कमी-सी अखरती है, दिल में एक अजीब-सी टीस उठती है कि मेरा कुछ खो गया है। अकेलेपन का अहसास टीसने लग जाता है........ दूर कहीं दूर तक मेरी नजरें मायूस-सी लौटकर मुझे प्रकृति के सनातन सत्य का अहसास करवा देती हैं।