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मिणियां मोती

'मिणियां मोती` राजस्थानी के ५७ लघुकथाकारों की लघुकथाओं का संग्रह है। प्रत्येक लघुकथाकार की दो लघुकथाएं संग्रह में शामिल हैं। संग्रह 'बडेर`, 'अंवेर` व 'नुंवी नकोर` तीन भागों में विभाजित है। 'बडेर` में ६, 'अंवेर` में २४, 'नुंवी नकोर` में २७ लघुकथाकारों की लघुकथाएं शामिल है। प्रत्येक लघुकथाकार की २ लघुकथाएं संग्रह में दी गयी है। डॉ रामकुमार घोटड़ ने इस संग्रह का सम्पादन किया है। वहीं राजस्थानी लघुकथा के पुरोधा श्री भवंरलाल भ्रमर ने राजस्थानी लघुकथा के इतिहास पर प्रकाश डाला है। यहाँ श्री भ्रमर का आलेख प्रस्तुत है।
लघुकथा रा पांवडा : एक इतियासू दीठ
-भंवरलाल भ्रमर
लघुकथा : उद्भव अर परम्परा
साहित्य मांय लघुकथा, कहाणी सूं घणी जूनी है। पण इणनै विधा रो दरजो सातवें दशक मांय मिलतो निगै आवै। पैलां इणां नै बात, द्रष्टांत, कथा, नीतिकथा अर बोधकथावां कैया करता हा। भारतीय लघुकथा रा बीज वेदां, उपनिषदां, पुराणां अर दर्शन ग्रंथां मांय मोकळा मिलै। जिका आकार, शैली अर कथ्य री दीठ सूं लघुकथा जैड़ी-ई निगै आवै। हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, सिख, ईसाई अर मुस्लिम आद सगळै ई धरम-ग्रंथां मांय अैड़ी मोकळी छोटी-छोटी प्रेरक कथावां मिलै। भारत मांय हितोपदेश, पंचतंत्र, बैताल पच्चीसी, जातक कथावां, नीतिकथावां अर बोधकथावां आद रूपां मांय आं रो बिगसाव हुयो। आगै चाल परी`र अै इज नैनी-नैनी कथावां आधुनिक भारतीय कथा साहित्य री भाव-भोम अर आधार बणी।
अै छोटी-छोटी कथावां आकार री दीठ सूं छोटी तो हुंवती पण बै पशु-पक्षियां अर मिनख रै माध्यम सूं समै रो सांच उकेरती थकी मिनखपणै री जोरदार पैरवी कर्या करती। भारतीय जणमाणस री रग-रग मांय रचती-बसती अै प्रतीकात्मक कथावां अनुवाद रै मारफत विदेशां तांई पूग`र हजारूं बरसां पैली ई आखै संसार मांय आपरी ओळख बणाय`र आपरी धाक जमायली ही। अै आपरी रोचक कथ्य-शैली, बोध-गम्यता अर अद्भुत जींवतता रै पाण ई आज तांई जींवती रैय सकी।
राजस्थानी लोक परम्परा मांय ई अैड़ा अलेखूं अैनाण मिलै। बात, टप्पां अर लोककथा जेड़ै रूपां मांय मुखजबानी अर लिखत अेक सांवठी धरोड़ है जिकी आधुनिक लघुकथा नै अेेक नूंवी भाव-भूमि दीनी। उणीज खाद सूं लघुकथा रूपी बीज पनप परो`र आज अेक बिगसित अर सुरभित पोधै रै रूप मांय सामैं आवै। आ इज लोक परम्परा राजस्थानी लघुकथा नै बीजी भारतीय भाषावां री लघुकथा सूं अेक अळायदो रूप देय`र उणरी न्यारी-निरवाळी ओळखांण करावै।
नूंवी लघुकथा आधुनिक जूण जीवणै री शैली अर परिस्थितियां री देन मानी जाय सकै। विषय वस्तु, भाषा, शिल्प, शैली अर संवेदना री दीठ सूं आज री लघुकथा, जूनी लघुकथा सूं साव अळायदी ऊभी दीसै। पैली जठै उपदेश अर सीख नै इणरो जरूरी तत्त्व मान्यो जांवतो हो, बठै-ई आज री लघुकथा रा सुर जात-पांत, वर्ग भेद, धार्मिक पाखंड, अन्याय, शोषण अर अत्याचारां रो सशक्त विरोध करती थकी संघर्ष अर जागरूकता री चेतना जगांवता सुणीजै। सागै-ई राजनीति, लालफीताशाही अर पुलिसिया तंत्र सूं सता्योड़ै शोषित अर पीड़ित मानखै री पैरवी करती निगै आवै तो आज लघुकथाकार जीवण मांय भांत-भांत री विसंगतियां, विडरूपतावां रै साथै मिनख रै दोगलै पणै जैड़ी मोकळी अबखायां`र अंवळायां सूं जूझतो जूझार जोधा-सो लखावै।
आज री लघुकथा मूलत: अेक क्षणिक घटना हुवै जिकै री प्रस्तुति मांय ढीलोपण कोनी चालै। इण मांय उपदेश अर सीख रो सुर कोनी सुणीजै पण बा मिनखपणै री पैरवी जरूर करै। गद्य गीतां सूं आपरो नातो तोड़`र न्यारी हुंवती थकी नूंवी छिब मांय आपरी निरवाळी ओळखांण बणांवती दीसै।
पचास सूं लेय`र सात-आठ सौ सबदां री सींव मांय, गागर मांय सागर भरण वाळी अै लघुकथावां बिहारी रै दोहां दांई आकार मांय साव छोटी हुंवतां थकां-ई आपरी मारक-खिमता रै पाण पाठकां रै दिल-दिमाग नै झिंझोड़`र राख देवै।

राजस्थानी लघुकथा : उद्भव अर बिगसाव
जठै हिन्दी मांय आठवैं दशक में आधुनिक लघकथाधारा सरू हुवै बठै राजस्थानी मांय चौथै-पांचवै दशक मांय-ई इण रा लूंठा अैनाण मिलै अर बै-ई सांवठै रूप मांय। इण बात माथै आपां गीरबो कर सकां हां।
आजादी सूं पैली आधुनिक राजस्थानी कथा साहित्य मांय श्रीचंदराय, मुरलीधर व्यास, नरोत्तमदास स्वामी, भंवरलाल नाहटा, बदरीप्रसाद साकरिया अर राणी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत आद लेखकां मोकळी छोटी-छोटी कहाण्यां री सरूवात करी ही पण आं मांय श्रीचंदराय अर मुरलीधर व्यास नै टाळ किणी-ई कथाकार नै लघुकथाकार नीं मान सकां। हां, अै छोटी-छोटी कहाण्यां लघुकथावां तो कोनी ही पण आं री आ` छोटी कहाण्यां लीक इज आगै चाल`र लघुकथा री आधार-भोम बणी।
आधुनिक राजस्थानी लघुकथा रो श्रीगणेश लगैटगै १९३७-३८ ई. मांय श्री श्रीलाल नथमल जोशी रै संपादन मांय 'ज्योति` हस्तलिखित पत्रिका मांय प्रकाशित श्रीचंदराय री 'जापानी बबुओ` सूं मानी जा सकै। राजस्थानी री पैली लघुकथा रो जस 'जापानी बबुबो` नै मिलै। आ` नारी मनोविग्यान री अेक सशक्त लघुकथा कैयी जा सकै जिकै मांय नारी री संतान-कामना जोरदार ढंग सूं सामै आयी। कथ्य मुजब कमला आपरै पति सूं हंसणै-बोलणै, रूठणै-मनावणै रै साथै हेत री हिलोर री आस राखै पण उणनै मिलै है पति कानी सूं घोर उपेक्षा! सासू अर नणद सूं मिलै ताना`र प्रताड़ना! उणरै जीवण मांय अेक खालीपणो बापर जावै, जिको उणनै खावण लाग जावै। इण सूं उबरण खातर बा अेक दिन बाजार सूं 'जापानी बबुबो` मोल लियावै। इण रमतियै री बा` जी-जान सूं देखभाळ करै। दिन-रात बड़बड़ावंती रैवै, 'मुन्नू रै वास्तै ओ करणो है, बो करणो है!` सासू नै उणरी आ` सनक दाय कोनी आवै। बा` बबुअै नै लुकोय देवै। सौ ठौड़ जोयां-ई बबुओ नीं लाध्यां कमला री हालत पागलां दांई हुय जावै। इबै उणरै हाथां नित नूंवो उजाड़ हुयबो करै। सासू अर नणद री झिड़क्यां खांवती बा ज्यूं-ई अेकली हुंवती रोवण खारी हुय`र, 'मुन्नू..... मुन्नू..... ` करती बड़बड़ावंती रैंवती। अेक दिन बुखार मांय जोर-जोर सूं कूकण ढूकगी, 'म्हारो बबुओ..... म्हारो मुन्नू.... म्हारो..... मुन्नू.....!` अर सन्निपात मांय बेहोश हुयगी। ओ` लघुकथा रो चरम किणी-ई आधुनिक लघुकथा सूं उत्कृष्ट कैयो जा सकै।
'विकट पहेली` बां री अेक लघुतम लघुकथा ही जिकी आजादी सूं घणी पैली छप`र घणी चावी हुयी। आजादी सूं पैलां राजावां रै राज मांय श्रीचंदराय छुआछूत जैड़ी विषय-वस्तु नै लेय`र 'सागैड़ी लुगदी` अर 'बापड़ो हरिजन` जैड़ी सशक्त लघुकथावां लिख दीनी ही। दोनूं-ई लघुकथावां बेजोड़`र बेमिसाल कैयी जा सकै। इणी भांत स्वतंत्रता आंदोलण रै बखत 'राजाजी री महर` जैड़ी लूंठी लघुकथा राजाजी री बदळती मानसिकता रा दरसण करावै। राजावां माथै सजोरो व्यंग्य लिखणो हरेक रो बूतो कोनी हुयो करतो।
श्रीचंदराय १९२०-३० रै दशक मांय लिखणो सरू कर दियो हो। आप कैयी एकांकी-नाटक ई लिख्या हा। मोकळी कहाण्यां रै साथै लघुकथावां लिख`र मायड़ भासा रो भंडार भर्यो। बां रै मरणोपरांत बांरी जोड़ायत श्रीमती शुभकुमारी माथुर अर बां रा सपूत जगदीशचंद्र राय सन् १९८१ मांय 'मिठाई रो पूतळो` नांव सूं बांरी कहाण्यां री पोथी छपायी। इण संग्रै मांय कुल ३८ रचनावां है जिकी मांय २५ लघुकथावां री श्रेणी मांय आवै। बां मांय शराब रो तुफैल, सौत री बेटी, भावना रो उथळो, राजाजी री मेहर, मुसाणियौ बैराग, माया, मादा रो त्याग, बुराई रो अंत, बापड़ो हरिजन अर सागेड़ी लुगदी जैड़ी सजोरी लघुकथावां बांचण नै मिलै, जिकी किणी-ई भारतीय भाषा री समकालीन लघुकथावां रै जोड़ मांय ऊभी रैय सकै। भावना रो उथळो 'राजस्थान वीर` नवम्बर, १९६४ मांय 'अरदास्त` नांव सूं छप`र घणी चावी हुयी।
रामनिवास मिर्धा रै सबदां मांय, ''स्व. श्रीचंदराय का राजस्थानी भाषा के लेखकों में विशिष्ट स्थान है। उनकी लघुकथाएं राजस्थान साहित्य की उत्कृष्टतम कृतियां समझी जाती हैं।``सन् १९८४ मांय श्रीचंदराय रो 'लाडो` कहाणी संग्रै छपियो। जिण मांय उणां री कुल २१ रचनावां हैं। जिकी मांय सूं १२ लघुकथावां है। हार, भेद भर्यो उत्तर, सधवा दादी, निजोरी बात, हिम्मत बिन किम्मत नाआीं, प्रकृति रो पुजारी, बो फेर नीं उठियो, तो कांई हूं विधवां हूं?, मन री मन में, जापानी बबुओ अर नाक री लाज लघुकथावां री पांत मांय राखीज सकै।
इण संग्रै री भूमिका मांय डॉ. मनोहर शर्मा लिखै, ''लाडो संग्रै मांय छोटै-बड़ै आकार री इक्कीस राजस्थानी कहाणियां रो संकलन है। आज साहित्य जगत मांय 'लघुकथा` अेक लोकप्रिय कथा विधा है। पण श्री श्रीचंदराय महोदय तो आज सूं घणै बरसां पैली ही बडी संख्यां में लघुकथावां लिख चुक्या है जिकी घणी प्रेरणादायक अर कला पूर्ण है। प्रस्तु संग्रै री हार, निजोरी बात अर प्रकृति रो पुजारी आद लघुकथावां ईं विषय में उदाहरण सरूप है। बै बोधकथा तथा नीतिकथा दोनूं भांत री बानगी है।``
राणी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत लिखै, ''बां री कैणियां मांय रस अर सौरम तो है ही, पण मांयली मार भी अैड़ी है कै अंतर में जाय चोट करै।``
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर सूं सन् १९६१ मांय दीनदयाल ओझा रै संपादन मांय छपी 'राजस्थान के कहानीकार (राजस्थानी)` मांय संकलित श्रीचंदराय री 'खरो सनेव` अेक लूंठी लघुकथा मानीजै। श्याम महर्षि, मनोहर शर्मा अर नीरज दईया इण रो उल्लेख करै।
श्रीचंदराय पछै मुरलीधर व्यास री कैयी लघुकथावां मिलै। सन् १९५४ मांय 'ओळमो` रै प्रवेशांक मांय व्यासजी री 'प्रभु रो धरम` बांचण नै मिलै। उणी अंक मांय ललितकुमार आजाद री 'भेद` लघुकथा ई छपी। अै` दोनूं नानकड़ी का`णी स्तंभ मांय छपी। व्यासजी रो राजस्थानी कहाणी नै घणमोलो योगदान रैयो है। पैली दफै बै इज श्रीचंदराय साथै मिल`र राजस्थानी कहाणी नै लोककथा रै दायरै सूं बारै काढ़`र अेक नूंवी दीठ अर शैली दीनी। पण बांरी लघुकथावां गिणती री इ सामीं आयी। 'प्रभु रो धरम` रै अलावा बां री 'न्याय` अर 'अंतरजामी` लघुकथावां घणी असरदार निगै आवै। बांरै कथा संग्रह 'बरसगांठ` मांय ई तीन कहाणियां, मतीरां रो भारो, चेजारो अर सचवादो लघुकथावां इज है। अै तीनूं ई कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं उण बखत री बेजोड़ लघुकथावां है। 'चेजारो` मजूरां रै स्वाभिमान री सजोरी लघुकथा है तो 'मतीरां रो भारो` मांय ग्रामीणां रो नगरीय लोगां कानी सूं हुंवतो शोषण उजागर हुवै। संवेदना री दीठ सूं आपरी अमिट छाप छोडती लखावै।
श्रीचंदराय अर मुरलीधर व्यास पछै छिड़ी-बिछड़ी इक्की-दुक्की लघुकथावां रा दरसाव हुवै। सन् १९५६ मांय रावत सारस्वत रै संपादन मांय 'मरुवाणी` रै दूजै अंक मांय शांतिदेवी री 'बिचारो दिनकर` मांय लघुकथा रा तत्त्व मिलै। अद्भुत शास्त्री रै संपादन मांय 'कुरजां` बरस १९६०, अंक २ मांय श्रीलाल नथमल जोशी री 'गोथळी रा लाडू` छपी। कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं आ` अेक लोककथा रै घणी नैड़ी लखावै। सन् १९६१ मांय 'राजस्थान के कहानीकार` मांय 'खरो सनेव` (श्रीचंदराय) लघुकथा छप`र चावी हुयी तो अेक और राजस्थानी कहाणी संग्रै मांय डॉ. उदयवीर शर्मा री 'च्यार मिनी काणियां` अर विश्वंभर प्रसाद शर्मा री 'ओसाण` लघुकथा ई छपी। अै सगळी लघुकथावां कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं लघुकथावां रै घणी नैड़ी लखावै।
सन् १९६१ पछै १९७१ तांई लघुकथावां री दीठ सूं साव सून रैयी। आ` सून उदयपुर सूं छपण वाळै साप्ताहिक 'अरावली` रै ८ जून, १९७२ वाळै अंक मांय युवा कथाकार भंवरलाल भ्रमर री 'जणै तो कीं कोनी` लघुकथा छपण सूं तूटै। इणी दिनां भ्रमर री अेक और लघुकथा 'बापड़ा भगत` नांव सूं अखबारां मांय छपी। जिकी सन् १९७२ मांय प्रकाशित हुवणवाळै बां रै कहाणी संग्रै 'तगादो` मांय संकलित है। अै` दोनूं-ई लघुकथावां कथ्य, शिल्प अर संवेदना रै स्तर माथै आपरै बखत री बेजोड़ लघुकथावां है।
१० जुलाई, १९७२ रै 'जलते दीप` साप्ताहिक मांय किरण नाहटा री अेक सजोरी लघुकथा 'सूनी दीठ` नांव सूं छपी। आ` लघुकथा रै मापदण्डां माथै खरी उतरै। गुरु-शिष्या बिचै पनपतै प्रेमांकुर रो सजीव वृतांत है इण मांय।
सन् १९७२ पछै लघुकथा लेखन मांय फेरूं सून बापरगी। आ` सून सन् १९७६ मांय तद जाय`र तूटी जद 'युगपक्ष` साप्ताहिक रै अप्रेल अंक मांय भंवरलाल भ्रमर री अेक लूंठी अर बेजोड़ लघुकथा 'अपणायत` छपी। आ` सागण लघुकथा 'नैणसी` रै सितम्बर, १९७६ अंक मांय छप`र जस कमायो। 'अपणायत` मिनख रै दोगलैपणै नै सशक्त ढंग सूं उजागर करै। इणी बरस रामनिवास शर्मा री अेक कहाणी 'नैणां खूट्यो नीर` निगै आवै। पण उण मांय लघुकथा रै तत्त्वां रो अभाव लखावै।
बरस १९७६ लघुकथा पेटै घणो महताऊ रैयो। इणी बरस डॉ. मनोहर शर्मा रो राजस्थानी भाषा साहित्य संगम (अकादमी), बीकानेर 'सोनल भींग` लघुकथा संग्रै छाप्यो। ओ` लघुकथा रो सनमान हो, इण सूं लघुकथावां री साख`र मानता कीं बेसी बधी।
पोथी रै लेखकीय मांय डॉ. शर्मा 'सोनल भींग` नै लघुकथा रो संकलन बतावतां थकां लिखै, ''पण ये सगळी लघुकथावां चिंतन रै आधार माथै ऊभी है, ईं कारण ये 'प्रतीक कथावां` भी कैयी जा सकै।`` 'किरत्यां रो झूमको` (डॉ. उदयवीर शर्मा) री भूमिका मांय डॉ. मनोहर शर्मा 'सोनल भींग` नै पैलो लघुकथा संग्रै बतावै।
आं नै बोधकथावां, नीतिकथावां अर गद्यकाव्य मांय खताय सकां। अै आज री लघुकथा रै संचै मांय तो फिट कोनी। आज री परिभाषा मुजब आंनै पूरी तर्यां सफल नीं ई माना तो भी आंनै साव नकारणै रो ई कोई कारण या तुक कोनी। प्रतीकात्मक बोध अर नीति री अै कथावां अंत-पंत है तो लघुकथावां इज! कथ्य, शिल्प अर संवेदना री दीठ सूं अै अलायदी दीख सकै पण आपणै लोक साहित्य री सबळी अर लांबी परम्परा नै परोटती थकी अै चिंतनपरक लघुकथावां अपणै आप मांय अनूठी है। राजस्थानी लघुकथा नै अेक ठोस जमीं देय परी`र इण रै बिगसाव रो मारग खोलती आपरो महताऊ अर घणमोलो योगदान देंवती दीसै। इण बात नै मानणी पड़सी।
राजस्थानी लोक परम्परा सूं निकळी लघुकथा री आ` अेक न्यारी-निरवाळी चिंतनपरक धारा आपरी निजी ओळखांण बणावै। इण धारा नै डॉ. मनोहर शर्मा, डॉ. उदयवीर शर्मा, भानसिंह शेखावत मरुधर अर कमल रंगा जैड़ा लघुकथाकारां बखत-बखत इण सूं जुड़`र आगै बधायी। आपां इण धारा माथै गीरबो कर सकां। जद कै हिन्दी समेत बीजी भासावां कनै अैड़ी सांवठी लोक परम्परा नीं हुयां अैड़ी चिंतनपरक प्रतीकात्मक लघुकथावां री धारा रो दरसाव कठै-ई, कणै-इज हुवै। इण धारा नै आपां जमनोतरी कैय सकां।
बीजी धारा रो श्रीगणेश खासा पैली श्रीचंदराय सूं हुय चूक्यो हो, जिण नै गंगोतरी कैयो जा सकै। इण धारा रै बिगसाव मांय मुरलीधर व्यास, भंवरलाल भ्रमर, दुर्गेश, नीरज दइया, लक्ष्मीनारायण रंगा, डॉ. रामकुमार घोटड़, रामधन अनुज, शिवराज छंगाणी, अर्जुनदान चारण, घनश्याम नाथ कच्छावा अर संजय शर्मा रो महताऊ योगदान रैयो तो अैड़ा-ई मोकळा लघुकथाकार है, बां री पोथ्यां तो कोनी छपी पण लगोलग आपरै प्रयासां सूं इण गंगोतरी धारा नै चौड़ी करतां थकां बै इणनै भागीरथी गंगा रो रूप देवण मांय लाग्योड़ा है जियां यादवेन्द्र शर्मा चंद्र, बुलाकी शर्मा, पुष्पलता कश्यप, चेतन स्वामी, मदन सैनी, मालचंद तिवाड़ी, भागीरथ मेघवाल, मनोहरसिंह राठौड़, रामस्वरूप किसान, विनोद सोमानी हंस, मनोहरलाल गोयल, घनश्याम अग्रवाल, सी.एल. सांखला जैड़ा पचासूं लघुकथाकार है जिकां रा स्वतंत्र कथा संग्रै बेगा-ई सामैं आसी, अैड़ी आस करी जा सकै।
आगलै दोय बरसां मांय छिड़ी-बिछड़ी लघुकथावां इनै-बिनै छपी निगै आवै। सन् १९७९-८० राजस्थानी लघुकथा खातर चोखो समै आयो। सन् १९७९ मांय 'राजस्थली` अर सन् १९८० मांय 'जागती जोत` आपो-आपरा लघुकथा विशेषांक काढ़`र राजस्थानी लघुकथा रै बिगसाव सारू अेक घणमोलो काम कर्यो। राजस्थानी लघुकथा इण सूं घणी बळवती हुयी। लघुकथा रो पांवडो कीं आगै बधतो निगै आवै। राजस्थली आपरै दो विशेषांकां मांय ३०-३५ लघुकथाकारां नै छाप`र लघुकथा सारू अेक साफ-सुथरी पगडांडी बणावै।
'जागती जोत` रै जुलाई, १९८० ई. रै लघुकथा अंक मांय कैयी देशी-विदेशी बीजी भासावां रा अनुवाद छाप`र राजस्थानी लघुकथाकारां नै नूंवी ऊर्जा देवण सारू समकालीन लघुकथा सूं ओळखांण करायी। अनुवाद रो महताऊ काम कर्यो, जगदीश व्यास, देवकृष्ण व्यास, उषा शंकर, शशि जोशी अर प्रिय कुमार। अै नांव अनुवादक रै रूप मां पैली दफै सामीं आया।
इण अंक मांय मोपांसा री 'नाचणिया`, चेखब री 'सरत`, फ्रेंज काका री 'जातरू`, 'मनसूबो`, खलील जिब्रान री 'कब्रिस्तान में`, मण्टो री 'पेशबंदी`, 'मसलो`, 'सलवार` जैड़ी नामी-गिरामी लघुकथावां बांचण नै मिली। जिण सूं राजस्थानी लघुकथाकारां नै अेक नूंवी दीठ मिली। साथै-ई इण अंक मांय लघुकथा जातरा सूं जुड़्या थका दो आलेख ई छप्या। पैलो जगदीश कश्यप रो 'राजस्थानी भाषा में लघुकथावां : परम्परा अर बिगसाव` अर दूजो श्याम महर्षि रो 'राजस्थानी लघुकथा : दो पांवडा`। आं आलेखां मां उण समै तांई री राजस्थानी लघुकथा रै बिगसाव री जाणकारी मिलै पण बा आधी-अधूरी कै काम चलाऊ कैयी जा सकै। ओ` काम शोध सूं जुड़्यो थको घणी खेचळ री मांग करै। फेर-ई प्रयास सराया जा सकै।
इण अंक मांय राजस्थानी रै आठ लघुकथाकारां री नव ताजी लघुकथावां ई बांचण नै मिलै। कु. शंकुतला किरण री 'अणचींत्यौ`, चेतन स्वामी री 'तैकीकात`, 'चक्रव्यूह`, मालचंद तिवाड़ी री 'भायलो`, प्रितेन्द्र कायस्थ री 'धीजो`, विष्णुदत्त गोयल री 'जोग माया रो रूप`, चंदू फड़िया री 'दानी`, विनोद सोमानी हंस री 'अेक भूख हड़ताल रो अंत` अर मनोहरसिंह राठौड़ री 'धांसी` लघुकथावां छपी। संपादक कानी सूं कीं और प्रयास हुंवता तो बेसी लघुकथावां भेळी हुय सकती ही।
अंक मांय मनोहरसिंह राठौड़ री 'धांसी` आपरी अमिट छाप छोडै। इण लघुकथा मांय संवेदना रो चरम उत्कर्ष देखण नै मिलै। मजूरां रै शोषण अर उत्पीड़न री पराकाष्ठा रा दरसाव हुवै। मालचंद तिवाड़ी री 'भायलो` ई इण दीठ सूं आछी रचना है। 'तैकीकात` मांय पुलिसिया तैकीकात नै तो 'चक्रव्यूह`, 'धीजो` अर 'अेक भूख हड़ताल रो अंत` राजनेतावां रै कामकाज री शैली रै साथै ई उणां रै स्वार्थी रूप नै बेनकाब करै। 'अणचींत्यौ` मांया माईतां रो बेटी सारू दोगलोपणो सामीं आवै। 'दानी` अर 'जोग माया रो रूप` बोधकथावां है। इण संग्रै रै आधो-आध लघुकथाकार शकुंतला किरण, प्रितेन्द्र कायस्थ, विष्णुगोपाल अर चदूं फड़िया फेर कठै-ई कदैई निगै नीं आया।
सन् १९८२ लघुकथा वास्तै शुभ मान्यो जा सकै। इण बरस दो लघुकथा संग्रै सामीं आया। पैलो हो 'राजस्थली` रो दोनूं विशेषांकां मांय छपी थकी नूूंवै-जूनै ३५ लघुकथाकारां री ६५ रचनावां रो संकलन 'राजस्थानी लघुकथा`। श्याम महर्षि रै संपादन मांय ओ` संग्रै छप्यो तो बीजो संग्रै 'किरत्यां रो झूमको` डॉ. उदयवीर शर्मा रो लघुकथा संग्रै हो।
'राजस्थानी लघुकथा` आपरी भांत रो पैलो महताऊ प्रयास कैयो जा सकै जिकै नै सरावै जित्तो-ई थोड़ो है। इण संग्रै मांय दुर्गेश री 'सिका ही`, 'लंका उपचुनाव`, नंद भारद्वाज री 'भगति रो फळ`, पुष्पलता कश्यप री 'रूखाळा`, 'मिस्टर एडवोकेट`, बुलाकी शर्मा री 'झण्डो`, मालचंद तिवाड़ी री 'ओछा लोग`, आईदानसिंह भाटी री 'मजूरी`, कैलाश मनहर री 'टैम-टैम री बात`, चैनसिंह बेचैन री 'कबूतरां रै चुगै रै नांव`, डॉ. उदयवीर शर्मा री 'सवाल`, मुकुट सक्सेना री 'धर्मालू`, 'उण कीं नीं कैयो`, रतन राहगीर री 'मंतर`, मदन सैनी री 'पतिभरता`, 'सही निराकण` सशक्त अर आछी रचनावां कैयी जा सकै। अै बीजी भारतीय भासावां री लघुकथा री जोड़ मांय ऊभी दीसै।
लघुकथा पेटै ओ` अंक महताऊ पांवडो कैयो जा सकै। पण साथै-ई आ` कैवण मांय ई संको कोनी कै संग्रै रा दुर्गेश, पुश्पलता कश्यप, बुलाकी शर्मा, मदन सैनी, यादवेन्द्र शर्मा चंद्र, मालचंद तिवाड़ी नै टाळ घणखरा लघुकथाकार फेर नीं दीस्या।
इण संग्रै री जागती जोत रै मई, १९८३ अंक मांय परख करतां थकां अमरनाथ कश्यप कैवै, ''ईं पोथी में आयोड़ी सगळी लघुकथावां मानखै रै सभाव री अलायदी विशेषतावां, मिनख रै जीवण में फैल्योड़ा दु:ख-दरद, उत्पीड़न, समाज में मौजूद असमानता अर तूटतै मूल्यां री ओळखांण करावण में सफल रैयी है। जीवण में फैल्योड़ै छळ छंद सूं लगा`र आर्थिक शोषण, भूखमरी, राजनैतिक भ्रष्टाचार, प्रजातंत्र री निरर्थकता, नेतावां रो दोगलापण, औसरवाद आद कुरीतियां में जण-जीवण रा कितरा ई पख इण नान्ही रचनावां मों समेटियोड़ा है।``
१९८२ ई. मांय ई डॉ. उदयवीर शर्मा रो 'किरत्यां रो झूमको` नांव सूं लघुकथा संग्रह छप्यो। इण संग्रै मांय आपरी ९० रचनावां है। राजस्थानी लघुकथा साहित्य मांय दूजै संग्रै रो जस मिलै इणनै। डॉ. मनोहर शर्मा री परम्परा कै धारा नै आगै बंधावंतै इण संग्रै मांय बोधपरक, उपदेशात्मक व्यंग्य प्रधान प्रतीक कथावां है।
'किरत्यां रो झूमको` री भूमिका मांय डॉ. मनोहर शर्मा लिखै, ''इण संग्रै री घणखरी कथावां भाव-प्रधान, उपदेशात्मक, बोध-मूलक, व्यंग्यात्मक, शिक्षाप्रद अर नीति कथा भी कही जा सकै। थोड़ै में सीधै-सादै ढंग सूं गहरी बात कैवणो इण कथावां री अेक खास विशेषता है।`` बै आगै कैवै, ''आं रा सगळा शीर्षक सार्थक अर लघुकथा रै तत्त्वां रै अनुरूप है। प्रस्तुतिकरण आकर्षक, वर्णन रोचक, निष्कर्ष तीखो अर असरदार है।``
म्हारी जांण मांय कुल-मिलाय`र ओ कैयो जा सकै कै डॉ. उदयवीर शर्मा री लघुकथावां असरदार अर पाठकां रो मन-मोवण वाळी है। बिम्ब अर प्रतीकां रो सार्थक प्रयोग हुयो है, बां रा शीर्षक कथानुरूप संप्रेषणीय है। अै लघुकथावां डॉ. मनोहर शर्मा री लीक माथै चालती लखावै। संग्रै री जाळ रो दरद, बडो कुण?, राड़, मिनख री जूठ, पुरखां री बोली, सूई डोरो आद लघुकथावां कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं नूंवै ढाळै री लघुकथावां रै घणी नैड़ी लखावै। शिल्प री दीठ सूं आं री लघुकथावां डॉ. मनोहर शर्मा सूं कीं आगै है।
सन् १९८४ मांय भानसिंह शेखावत मरुधर रो लघुकथा संग्रै 'परख` छप्यो। डॉ. मनोहर शर्मा री परम्परा नै आगै बधावण वाळै इण संग्रै मांय प्रतीकां रै माध्यम सूं चिंतन-मननपरक प्रतीकात्मक बोधकथावां है जिकी मिनख मांय मिनखपणै री थरपणा री खेचळ करती निगै आवै।
सन् १९८५ सूं लेय`र १९८८ तांई कोयी खास काम नीं हुयो। इक्की-दुक्की रचनावां छपी। सन् १९८९ महताऊ रैयो। इण बरस अेक साथै दो लघुकथा संग्रै छप्या अर दोनूं धारावां रा अेक-अेक। अेक संग्रै 'भोर सूं आथण तांई` नीरज दइया रो हो अर बीजो संग्रै 'सीप्यां अर संख` कमल रंगा राज रो हो।
'सीप्यां अर संख` मांय १६९ रचनावां है। ओ` राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी रै आर्थिक सैयोग सूं छप्यो। इण संग्रै बाबत नीरज दइया 'जागती जोत`, जनवरी, १९९५ मांय लिखै, 'इण संग्रै मांय आठ-दस रचनावां-ई लघुकथा री जोड़ मांय आवै बाकी १६० रचनावां गद्यकाव्य का दूजी नुंवी-नुवादी रचनावां बण बैठी है......... रचनावां में ठौड़-ठौड़ नुंवी-पुराणी ओळियां लाधै। सीख देवण रो काज है। इण संग्रै री कीं रचनावां ई आज री लघुकथा नेड़ै है जियां जेब कतरो, बेचाण, मुगत, पतियारो, उद्बुदौ रोग, नूंवो सिष्टाचार आद नै लघुकथा मान सकां।
म्हारी समझ मांय इण संग्रै नै तीन भागां मांय बांट सकां। पैलै भाग मांय पचासेक रचनावां लेय सकां, बां नै नीति`र बोधपरक प्रतीक कथावां कैय सकां। दूजै भाग मांय खींच-ताण`र दस-पंद्रै रचनावां नै नूंवै ढाळै री आधुनिक जुगबोध वाळी लघुकथावां मान सकां। लारै बच्योड़ी घणी-सी`क रचनावां लघुतम सूक्तियां कैयी जा सकै कै दार्शिनिक चिंतन प्रधान ओळ्यां। जियां- 'चिलम अर हुको फूंक दियां ई सुळगै` (चिंतन), 'करड़ी चट्टान नै पाणी री कंवळी धार काट न्हाखै` (घमंड)। अै लघुकथावां लघुकथा विधान माथै खरी कोनी उतरै। डॉ. मनोहर शर्मा री धारा नै बळ देंवतै इण संग्रै मांय मुगत, आज कर रिस्ता, राष्ट्रीयता, आज रो मोरियो, सज्जनता रो दंड, खून रा रिस्ता आद नूंवै जुगबोध वाळी सबळी लघुकथावां है।
'भोर सूं आथण तांई` मांय नीरज दईया री ५३ लघुकथावां है। नूंवै भाव-बोध`र शिल्प-विधान री अै आज री लघुकथावां निगै आवै। समकालीन भारतीय लघुकथावां रो खासो असर निगै आवै, आं माथै। मिनख रै दोगलैपणै नै पाठकां सामीं सजोरै ढंग संू प्रस्तुत करै। 'विक्रम`र बेताळ` कथा नै नूंवै ढंग सूं सामीं राखै। 'तपतो सूरज` सशक्त अर सांतरी लघुकथा है। कैयी पोची लघुकथावां अर प्रूफ संबंधी भूलां कानी ध्यान नीं देवां तो नीरज दइया री लघुकथावां सही मायनै मांय नूंवै ढाळै वाळी आछी लघुकथावां कैय सकां जिकी लघुकथा रै शिल्प-विधान रो आदर करती थकी श्रीचंदराय री लघुकथा धारा नै सशक्त ढंग सूं आगै बधांवती दीसै। लघुकथा जातरा मांय इण संग्रै रो महताऊ योगदान मान सकां।
इणी बरस भानसिंह शेखावत मरुधर री ५२ लघुकथावां, बी.ए. माली अशांत रै संपादन मायं 'झुणझुणियो` बाल-पत्रिका रै जुलाई-सितम्बर, १९८९ अंक मांय छपी अर घणी चावी हुयी। अनुकूल प्रतिक्रिया सूं प्रभावित हुय`र भानसिंह शेखावत अकादमी रै आर्थिक सैयोग सूं आं लघुकथावां नै 'बाण-कुबाण` लघुकथा संग्रै रै रूप मांय सन् १९९० मांय प्रकाशित करावै। जिण मांयली नीति`र बोधपरक ५२ प्रतीकात्मक लघुकथावां पाठकां नै घणी दाय आवै। जियां- कलम, दरपण, रैठाण, चील-झपट्टो, दया, गंडक लड़ाई, पिदावणी अर बाण-कुबाण। अै इण संग्रै री जोरदार लघुकथावां है। पाठकां रै हियै मांय गैरी छाप छोडै। आं मांय मानवीकरण रा आछा उदाहरण मिलै।
मिनखाजूण रा सुखां-दुखां समेत राजनीतिक-सामाजिक जीवण रा सांगोपांग चितराम देख्या जा सकै। आप डॉ. मनोहर शर्मा अर डॉ. उदयवीर शर्मा रै पांवडां नै ई सजोरै रूप सूं आगै बधांवतां दीसै। राजस्थानी लघुकथाकारां मांय आप अेक न्यारी पिछांण राखै।
सन् १९९० मांय-ई अकादमी रै आर्थिक सैयोग सूं दुर्गेश रो लघुकथा संग्रै 'काळो पाणी` छप`र सामीं आयो। इण संग्रै नै १९९१-९२ मांय अकादमी रो शिवचंद्र भरतिया गद्य पुरस्कार मिल्यो। इण पोथी मांय ७० लघुकथावां है। आं मांय मिनखाजूण रा न्यारा-न्यारा रंग, राजनीति रा छळ-छंद मानखै रो दोगलोपणो अर शिक्षा-साहित्य समेत सामाजिक जीवण री मोकळी समस्यावां अर विसंगतियां सशक्त रूप मांय सामीं आवै। इण संग्रै सूं पैलां आपरी 'कालपात्र` नांव सूं हिन्दी लघुकथा संग्रै छप्यो हो जको घणो-ई जस कमायो।
नीरज दइया रै 'भोर सूं आथण तांई` पछै ओ` अेक सशक्त अर सांगोपांग लघुकथा संग्रै पाठकां नै बांचण नै मिल्यो। कथ्य, शिल्प अर संवेदना री दीठ सूं अै लघुकथावां अेक नूंवो तेवर लेय`र आयी जिकी लूंठी मानीजी अर घणी सरायजी। अै लघुकथावां समकालीन भारतीय साहित्य री जोड़ ऊभी दीखै। व्यंग्य आं री लघुकथावां मांय अेक अनिवार्य तत्त्व दांई सामीं आवै। आं रो व्यंग्य सहज-स्वाभाविक रूप सूं आवणै रै कारण लघुकथा मांय अेक प्राण फूंकीजण रो काम करै। कठैई-कठैई ओ` लघुकथा माथै हावी हुंवतो-सो लखावै। व्यंग्य रै पाण ई दुर्गेश बीजै लघुकथाकारां सूं अेक अलायदी पिछांण बणै। भासा, साहित्य अर पुरस्कार जैड़ा मसलां मांय लेखक री पीड़ व्यंग्य रै माध्यम सूं ई बोलै। कागद, डबल रोल, काळो पाणी अर शिल्पकार लघुकथावां आप-आपरै कथ्य नै अंवेरतां थकां जोरदार है।
सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षा सुधार, ऑडिट, कारवाई, पहरो, लैण-हाजर, टिगस अर उड़दी जैड़ी लघुकथावां ई इण संग्रै री श्रेष्ठ लघुकथावां कैयी जा सकै। 'पहरो` नांव री लघुकथा 'राजस्थानी लघुकथा` मांय 'सिपाही` नांव सूं छप`र चावी हुयी ही। 'सूण` जैड़ी लघुकथा नै मानवी मन रै केन्द्र मांय राखतां थकां कैयो जा सकै कै जीवण रै हरेक मोड़ माथै दुर्गेश री पकड़ गैरी ही। श्रीचंदराय सूं निकळी आ` गंगोतरी धारा इबै कीं चौड़ी हुंवती दीसै जिकै नै आगै बधांवतां थकां दुर्गेश अेक जोरदार पांवडो लघुकथा साहित्य मांय राख्यो, जिको आपरी अमिट छाप छोडै। दुर्गेश नै लघुकथा रो अमर सिपाही कैयो जाय सकै।
'काळो पाणी` पछै बरसां तांई इण छेतर मांय कोयी खास काम नीं हुयो। छुट-पुट लघुकथावां पत्र-पत्रिकावां मांय छपती रैयी। पण बांरी गिणती पैली सूं कीं बेसी-ई निगै आयी। जनवरी, १९९५ में 'जागती जोत` मांय पेज संख्या ४८ माथै राजस्थानी लघुकथा रो बिगसाव दरसांवतो नीरज दइया रो अेक सांगोपांग आलेख छप्यो। सन् १९९४ तांई री लघुकथा जातरा रो विवरण इण मांय है। आलेख मांय लघुकथा री परिभाषा, सबदां री सींव अर शिल्प रो बखाण करतां अेक आलोचकीय दीठ रा दरसाव हुवै। ठौड़-ठौड़ लघुकथावां री कथावस्तु रो तुलनात्मक अंतर-ई पेश करै। निर्णायक टीप बेझिझक देंवता दीसै। पण इण आलेख मांय श्रीचंदराय नै बां गंभीरता सूं कोनी लियो, अैड़ो लखावै।
सन् १९७६ मांय भंवरलाल भ्रमर लघुकथा रो बीड़ो उठायो हो। उण मांय अेक सांतरो पांवडो मे`लतां थकां मार्च, १९९६ ई. सूं लघुकथा नै समर्पित अेक तिमाही पत्रिका 'अपणायत` रो वां श्रीगणेश कर्यो। अपणायत लघुकथा री सबळी ओळखांण है। भ्रमर पैली-ई राजस्थानी कहाणी रै बिगसाव सारू ठावो अर ठोस प्रयास करतां विशुद्ध कहाणी पत्रिका 'मनवार` अर 'मरवण` तिमाही काढ़ चुक्या। कहाणी विधा नै समर्पित पत्रिका 'मरवण` रै माध्यम सूं मोकळा कहाणीकार सामीं आया। उणीज क्रम मांय लघुकथा नै राजस्थानी साहित्य मांय अेक ठावी अर ओपती ठौड़ दिरावण सारू, उण रै बिगसाव री पगडांडी बणावण सारू लघुकथाकारां नै अेक नूंवो अर निरवाळो मंच दीनो- 'अपणायत`।
'अपणायत` रै प्रवेशांक मांय संपादकीय पत्रिका री जरूरत इण सबदां मांय बतावै, ''आज, इक्कीसवीं सदी में आवण आळै ताबड़तोड़ भाजतै मिनख-मानखै नै उपन्यास`र कहाणी पढ़ण री फुरसत कठै? मानखो तो आर्थिक सबंधां री बळि चढ़ग्यो। दूरदरसण रै फटाफट बदळीजतै दरसावां रै हेटै हुयोड़ै मिनख-मानखै नै संवळो मारग बतावण सारू, आज री बेळा लघुकथा ई सगळां सूं बेसी असरदार अर सांतरो राछ बण सकै। कम सूं कम सबदां मांय बेसी सूं बेसी व्यंजना रो सामरथ राखै, लघुकथा। टुरतां-बगतां ई पढ़ीज सकै, लघुकथा। कोयी विचार, कोयी व्यंजना तो इण लेखै पल्लै पड़ ई सकै।``
लघुकथावां रै बधेवै पेटै नैणसी, मनवार, मरवण, राजस्थली, माणक अर जागती जोत आद पत्रिकावां महताऊ रैयी। पण सदी रै आठवैं अर नोवैं दशक मांय लघुकथा कीं रतार पकड़ी तो आं पांच-छव बरसां मांय आपरी निरवाळी ओळखांण ई बणायली। पण हाल उणनै ओपती ठौड़ नीं मिली। राजस्थानी रै हेतूळा अर लेखकां रै सैयोग सूं 'अपणायत` इण दिस सार्थक प्रयास रो अेक सजोरो नै इतियासू मंच बणसी, ओ भरोसो है।
भ्रमर 'अपणायत` नै अेक अनूठो अर ठोस रूप दीनो। इण मांय बै जूनै अर नूंवै दोनूं भांत रै लेखकां नै साथै लेय`र टुरै। जूनै अर स्व. लघुकथाकारां री टाळवीं लघुकथावां नै पाठकां सामीं ल्यावण खातर 'धरोड़` स्तंभ सरू कर्यो। बां चायै आपरी रचनावां नै लघुकथा नीं कैयी, पण उणां री कहाण्यां मांय लघुकथा तत्त्वां री पिछांण कर`र बांनै लघुकथाकार रूप मांय सामीं ल्याया अर बांनै बांरो ओपतो आसण दियो। दूजो स्तंभ राख्यो 'देस`। इण स्तंभ मांय राजस्थानी मांय अबार लिखण वाळा सगळा लघुकथाकारां री नूंवी अबोट रचनावां छपै। ओ` लघुकथाकार देस, परदेस कै विदेस, भलां-ई कठै ई बैठ`र लिखै। तीजो स्तंभ 'परदेस कै दिसावर` नांव सूं है जिकै मांय किणी-ई भारतीय भासा री लघुकथा रो 'अनुवाद` छपै। चौथो स्तम्भ है 'विदेस`। जिण मांय भारत री सींव सूं बारै री किणी-ई लघुकथा रो अनुवाद राजस्थानी मांय छपै। पांचवो स्तम्भ 'हेमाणी` नांव सूं राख्यो, जिकै मांय राजस्थानी रै किणी अेक चावै-ठावै अर सशक्त लघुकथाकार री अेक साथै ५-७ लघुकथावां छापै। जिण सूं उण री सांगोपांग ओळख अर कूंत हुय सकै। छेवट अेक स्तम्भ 'परख` ई है जिकै मांय किणी ई लघुकथाकार री नूंवी-जूनी पोथी री समीक्षा कराइजै।
अजै तांई 'धरोड़` मांय मुरलीधर व्यास, सांवर दइया, श्रीचंदराय, नृसिंह राजपुरोहित, अर दुर्गेश जैड़ा लघुकथाकारां री टाळवीं सशक्त लघुकथावां सामीं आयी तो 'हेमाणी` रै मांय आज रा नामी-गिरामी लघुकथाकार नीरज दइया, डॉ. मनोहर शर्मा, भंवरलाल भ्रमर, बुलाकी शर्मा अर डॉ. उदयवीर शर्मा री टाळवीं लघुकथावां छाप`र लघुकथा रो मान बधायो। 'दिसावर` मांय सुब्रह्मण्यम भारती, रा-विलियन (तमिल), डॉ. रामकुमार घोटड़, हरदर्शन सहगल (हिन्दी), सरोज त्रिवेदी, रवीन्द्र पारेख (गुजराती), विनोबा भावे अर खांडेकर (मराठी) री लघुकथावां रा अनुवाद छप्या। 'विदेस` मांय खलील जिब्रान, विलियम सरोया (अंग्रेजी), खालिद सुहेल (उर्दू), लुथुन (चीनी), अमर जलील, गुलाम नबी मुगल, शेख अयाज (पाकिस्तान, सिंधी) रा अनुवाद छाप`र राजस्थानी पाठकां नै विदेसी लघुकथावां रो आस्वाद करायो। आं देसी`र विदेसी लघुकथाकारां री लघुकथावां रा अनुवादक हा, भंवरलाल भ्रमर, कन्हैयालाल भाटी, माणक तिवाड़ी बंधु, मीठेश निर्मोही अर नीरज दइया। आं लघुकथाकारां नै नूंवो अबोट शिल्प`र तेवर अंगेजण रो औसार मिल्यो। अनुवादक री दीठ सूं देखां तो इब तांई सगळां सूं बेसी अनुवाद 'अपणायत` रै मारफत आया।
'देस` मांय राजस्थानी रा थापित, नूंवै-जूनै दोनूं भांत रा पचास सूं बेसी लघुकथाकारां री सबळी लघुकथावां छप`र चावी हुयी। जिका आज तांई लगोलग लघुकथा साहित्य रै भंडार नै भरण तांई जूझ रैया है- भरत ओळा, भागीरथ मेघवाल, डॉ. मनोहरलाल गोयल, मनोहरसिंह राठौड़, बुलाकी शर्मा, बी.एल. माली अशांत, नवनीत पांडे, अमोलक चंद जांगिड़, मोहन योगी, मालचंद तिवाड़ी, राणुसिंह राजपुरोहित, माधव नागदा, पवन पहाड़िया, यादवेन्द्र शर्मा चंद्र, मोहनलाल जांगिड़, संदीप धामू, भानसिंह शेखावत, श्रीमंत व्यास, श्रीलाल नथमल जोशी, हनुमान दीक्षित, रामकुमार ओझा, घनश्याम अग्रवाल, प्रो. तारालक्ष्मण गहलोत, बुद्धिप्रकाश पारीक, मोहनलाल सिद्धावत, अशोक जोशी क्रांत, रामस्वरूप किसान, एस.आर. टेलर, जगदीश प्रसाद बाणिया, महेन्द्रसिंह मील, श्रीभगवान सैनी, रवि पुरोहित, डी.के. पुरोहित, सुखदेवसिंह, छगनलाल व्यास, विनोद सोमानी हंस, मदन सैनी, सी.एल. सांखला, रामेश्वर गोदारा ग्रामीण, दीनदयाल शर्मा, लक्ष्मीनारायण रंगा, पुश्पलता कश्यप अर मेहरचंद धामू आद रा नांव घणै मान सूं लिया जाय सकै।
इण भांत कैयो जा सकै कै 'अपणायत` सूं जुड़`र मोकळा लघुकथाकार पाठकां रै सामीं आया अर चावा हुया। वां री पांत लगोलग बधती जाय रैयी है। लघुकथा विधा पाठकां नै जबरी दाय आयी। लघुकथा इतियास मांय 'अपणायत` आपरै अकूत योगदान रै कारण सदीव याद करी जासी, जिकी नै लघुकथा रो सबसूं लूंठो पांवडो उठावण रो जस दियो जाय सकै।
सन् १९९७ मांय भंवरलाल भ्रमर रो लघुकथा संग्रै 'सुख सागर` पाठकां सामीं अयो। इण मांय भ्रमर री नूंवी-जूनी ६६ लघुकथावां है। डॉ. मदन सैनी इणरी समीक्षा करतां थकां इण संग्रै नै 'लघुकथा रै गागर मांय समायोड़ो सुख रो सागर` शीर्ष देंवतां लिखै, ''कथा सिरजण री दीठ सूं आपरी पोथी 'सातू सुख` जिण भांत आदरीजी उणीज भांत राजस्थानी लघुकथा रै सीगै आपरो 'सुख सागर` संग्रै री सैंग लघुकथावां अेक सूं अेक अणमोली नै घणमोली भाव-भूमि रो रचाव करै, जिण सूं जुड़तां थकां पाठक 'सुख सागर` रै विचार-सागर मांय डूबतो-तिरतो लखावै।``
भ्रमर री लघुकथावां मायं भ्रष्टाचार, घूसखोरी, बेरोजगारी, भाई-भतीजावाद अर खोटी मानसिकता रा सांगोपांग चितराम मांडीज्योड़ा निगै आवै। लोड कोनी झालै, जिम्मेदारी, छुट्टी मरगी, जवाबी कारवाई, सुख सागर, बांझ, समझगी, कवच, घंटी किसनै लगाई, रक्त संबंध, हाळी, फरज आद लघुकथावां आपरी अमिट छाप छोडै। शिल्प अर शैली विधान अै सांतरी लघुकथावां है।
सन् १९९९ मांय नूंवै जुगबोध सूं जुड़ी लक्ष्मीनारायण रंगा री 'घाव करै गंभीर` नांव सूं लघुकथा पोथी सामीं आयी। इण मांय १८० लघुकथावां है। म्हैं पात-पात, केसरो, वजन, मेलोडियस बार्किंग, संवेदणा, पारस, सपूत अर खाली हथेळ्यां लघुकथावां कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं सजोरी लघुकथावां है। अै समकालीन भारतीय लघुकथावां रै जोड़ मांय ऊभी दीसै। कैयी बोधात्मक प्रतीक कथावां ई मिलै है, इण संग्रै मांय।
रंगाजी समाज मांय फैल्योड़ी हर भांत री विसंगतियां अर विडरूपतावां नै सशक्त ढंग सूं उजागर करै। उणां री कथावस्तु मांय दहेज, साक्षरता, शिक्षा, समीक्षा, पर्यावरण, ईमानदारी, बालश्रम, पुलिस, राजनीति सूं जुड़ी थकी मोकळी सामाजिक समस्यावां नै सांगोपांग ढंग सूं प्रस्तुत करै।
व्यंग्य नै रंगाजी लघुकथा रो अेक अनिवार्य तत्त्व समझै। आं री घणखरी लघुकथावां मांय सशक्त अर सहज व्यंग्य आयो है। व्यंग्य रंगाजी री अेक न्यारी-निरवाळी ओळखांण बणावै। आप चावा-ठावा नाट्यकार अर व्यंग्यकार है। कैयी लघुकथावां माथै व्यंग्य हावी हुंवतो दीसै तो कठै-ई उणां री अति नाटकीयता रा दरसण ई हुवै। आं सूं आपनै बंचणो चाइजतो। कैयी रचनावां लघुकथावां नीं रैय`र लघुव्यंग्य रै पाळै मांय जांवती दीसै। आं मांय सूं जे ५०-६० सबळी लघुकथावां टाळ`र अेक संग्रै छपांवता तो बो लघुकथा साहित्य रो अेक सजोरो अर टाळवों लघुकथा संग्रै गिणीजतो। कुल-मिलाय`र ओ कैयो जा सकै कै रंगाजी राजस्थानी लघुकथा नै अेक नूंवी दीठ अर नूंवो तेवर दियो है। हिन्दी मांय ई आपरी मोकळी लघुकथावां छपती रैयी है।
सन् २००० मांय राजस्थानी लघुकथाकारां री पांत मांय अेक नूंवो नांव जुड़ जावै, डॉ. रामकुमार घोटड़ रो। आप पेशै सूं डॉक्टर हुय`र जठै लोगां रै तन री बैमारियां ठीक करै बठै-ई समाज मांय व्याप्त असंतोख अर कुंठावां सूं पीड़ित मानखै नै लघुकथा रूपी राछ सूं मानसिक चिकित्सिक रो दायित्व निभांवता निगै आवै। इण बरस अकादमी सैयोग सूं आपरो 'थारी-म्हारी बातां` लघुकथा संग्रै छप`र पाठकां सामीं आयो। जिण मांय घर-परिवार, देस-समाज, मिनख`र मिनखाजूण री सैंग भांत री अबखायां नै सांवठै ढंग सूं प्रस्तुत करती आपरी ६१ लघुकथावां है। हिन्दी मांय ई आप मोकळी लघुकथावां लिख`र घणा चावा हुया है। आपरा तीन हिन्दी लघुकथा संग्रै 'तिनके-तिनके` (१९८९ ई.), 'प्रेरणा` (१९९२ ई.) अर 'क्रमश:` (२००० ई.) ई छप्योड़ा है। आप हिन्दी रै कैयी संकलनां रो संपादन कर`र ई जस कमायो।
'थारी-म्हारी बातां` राजस्थानी मांय आपरो पैलो लघुकथा संग्रै हुंवतां थकां ई शिल्प, कथावस्तु अर शैली री दीठ सूं नूंवोपण लेय`र आंवतो दीसै। इण संग्रै री मिनखपणो, बदळाव, आजादी रा बांदरा, सिंघासण, बगत-बे-बगत, सिबकली, मूंछां, बगत-बगत री बात, सीख, मौत अरमायड़ रो हियो आद सशक्त अर सरावै जैड़ी लघुकथावां है।
घोटड़ समाज री मोकळी विसंगतियां अर विडरूपतावां नै उजागर करतो अेक सशक्त युवा लघुकथाकार रै रूप मांय ऊभा दीसै। कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं आप अेक सफळ लघुकथाकार मान्य जा सकै।
सन् २००४ मांय इक्कीसवीं सदी रो पैलो लघुकथा संग्रै युवा लघुकथाकार रामधन अनुज रो 'काळी कनेर` नांव सूं सामीं आयो। इण संग्रै मांय अनुज री ६८ लघुकथावां है। अकादमी सैयोग सूं छपियोड़ै इण संग्रै री घणखरी लघुकथावां आपरै सार्थक उद्देश्यां री पूरती करती दीसै। कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं अै नूंवी अबोट है। आं मांय अेक ताजगी-सी लखावै। मिनख रै स्वारथपणै माथै व्यंग्य करती घटतै मानवी मूल्यां, पुलिस री ज्यादती, हराम-खोरी, मिलावट, धार्मिक कट्टरता, आतंकवाद, भौतिकवाद, पर्यावरण, मानवाधिकार, राजनीतिक आपाधापी जैड़ी मानखै री मोकळी अबखायां-अंवळायां कानी पाठक रो ध्यान खींचती अै लघुकथावां नूंवै मानवी मूल्यां नै थरपण-पोखण रो सफल प्रयास करती निगै आवै।
पुन, मुठभेड़, दूजो चोर, बिस्फोट, छुट्टी, कसूर, सांच, आण, समाधान, धरमां रो सोच आद लघुकथावां घणी असरदार निगै आवै। मुठभेड़, दूजो चोर अर छुट्टी लघुकथावां आपरी अमिट छाप छोडै। कुल-मिलाय`र ओ` संग्रै नूंवी सदी री नूंवी ताजगी रो अैसास देवै। इण युवा कथाकार सूं राजस्थानी लघुकथा साहित्य नै घणी उम्मीदां है।
सन् २००५ मांय जाण्यां-माण्यां कवि-गीतकार शिवराज छंगाणी रो लघुकथा संग्रै 'इक्कड़-बिक्कड़` अकादमी रै सैयोग सूं सामीं आवै। इण मांय ८५ लघुकथावां है। आं मायं कथा-तत्त्व है अर अै रचनावां 'लघु` ई ही है। पण आंनै लघुकथा कैंवतां की संकोच हुवै, क्यूं कै 'लघुकथा` मांय 'लघु` अर 'कथा` नै न्यारा-न्यारा करतां आं रै सबदां माथै जायां लघुकथा रै प्रति ईमानदारी कोनी हुवै। 'लघुकथा` अपणै आप मांय अेक पूर्ण 'संज्ञा` है।
छंगाणी चावा-ठावा रेखाचित्रकार है। इण कारण आपरी लघुकथावां शिल्प अर शैली री दीठ सूं रेखाचित्र रै घणी नैड़ी ऊभी दीसै। आं नै 'छोटी कहाण्यां` कै 'लघु रेखाचित्र` कैंवां तो ओपती बात लागै। आं मायं उपदेस अर सीख भरपूर है। ढोलक, मिटिंग, अचंभो, ऊपर आळी मजूरी, भड़ांस, मीटर रीडर, राज रोग अर मूंछा री मरोड़ जैड़ी कथावां लघुकथा रै नैड़ी लखावै। आप खुद ई आंनै 'म्हारी बात` मांय नानकड़ी काण्यां बतावै। अै नानकड़ी काण्यां निस्चै ई पाठकां नै बांध्यां राखै।
सन् २००६ राजस्थानी लघुकथा साहित्य रै इतियास मांय घणो उजास भर्यो, शुभ अर महताऊ मान्यो जाय सकै। इण अेक ई बरस मांय पैली दफै अेक साथै तीन लघुकथा संग्रै छप्या। तीनूं ई अकादमी रै आर्थिक सैयोग सूं छप्या।
पैलो संग्रै हो अर्जुनदान चारण रो 'चर-भर`। 'चर-भर` मांय अर्जुनदान री ५४ लघुकथावां है जिणां मांय भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, शोषण, अन्याय, धार्मिक पाखण्ड आद समाज री मोकळी अबखायां अर मिनख री पीड़ मूंडै बोलै। संवेदना अर शिल्प री दीठ सूं अै कथावां सजोरी कैयी जाय सकै तो आं रो कमजोर अर ढीलो शिल्प-विधान अखरै। सपाटबयानी हावी है।
मिनख रै ओळै-दोळै पसर्योड़ो सांच, घर-परवार, धणी-लुगायी, मां-बाप, पुलिस अत्याचार, नौकरशाही, पाखण्ड-फरेब आद बां री दीठ सूं अदीठ नीं रैय सक्या। मिनख रै मांयलै अन्तर्द्वन्द्व नै सफलता सूं सामीं राखै। उग्रवादी, सही ईलाज, रगतदान, हथियार, चर-भर, गिरजड़ा जैड़ी लघुकथावां असरदार कैयी जाय सकै।
दूजो लघुकथा संग्रै घनश्यामनाथ कच्छावा रो 'ठूंठ` है, जिण मांय कच्छावा री ३८ लघुकथावां है। सन् २००६ मांय छप्या संग्रां मांय कथ्य, शिल्प अर संवेदना रै स्तर माथै ओ` संग्रै इक्कीस निगै आवै। ठूंठ, मंत्रीजी रो दौरो, अेनीमल अेक्ट, सौ बरस, ड्यूटी, मास्टरजी, डी.आई.जी. सा`ब, फीस, संजोग, छिमा इण संग्रै री सजोरी लघुकथावां है। जिकी घणी प्रभावित करै। संग्रै री घणी-सी`क लघुकथावां आज रै लघुकथा-शिल्प मांय खरी उतरै। अेनीमल अेक्ट, ठूंठ अर सौ बरस इण संग्रै री श्रेष्ठ लघुकथावां मानी जाय सकै। अै लघुकथावां मानवीय संवेदना री दीठ सूं घणी असरदार लखावै।
''श्री कच्छावा जुग रै सांच नै घणी सुथराई सूं आपरी लेखनी रै पांण उकेरै है।`` दुर्गेश रै इण कथन सूं सहमत हुवण मांय कीं-ई दोराई कोनी।
भंवरसिंह सामौर रै मुजब, ''आं कथावां रो तानो-बानो इसी बुणगट सूं गूंथ्योड़ो है कै पढ़ेसरी नै आपरै मन री सी बात लागै।``
बरस २००६ मांय छपी तीजी लघुपोथी है, संजय शर्मा री 'मिनख री सीख`। इण संग्रै मांय ३७ लघुकथावां है। घर-परिवार अर समाज री राजनीति, भ्रष्टाचार, नौकरशाही, कामचोरी अर रिश्वतखोरी जैड़ी मोकळी समस्यावां कानी अै लघुकथावां संकेत करै। विज्ञापन, गंडकां नै जळेबी, शिलान्यास, भेद री बात, इनाम, बूढ़ापा री लाठी, गुरु दक्षिणा, भलो मिनख, ज्ञान अर दुकानदारी जैड़ी लघुकथावां सांतरी हैं। 'बेटी`र बहू` कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं सजोरी लघुकथा हैै।
सपाटबयानी अर किस्सागोई शैली इण संग्रै री कमजोरी मानी जा सकै। आं लघुकथावां रा शीर्षक आपेता अर संप्रेषण री दीठ सूं सक्षम है। शैली अर शिल्प री दीठ सूं अै लघुकथावां कसाव मांगै तो कथावस्तु अर संवेदन री दीठ सूं आछी कैयी जा सकै।

महिला लघुकथाकार :
राजस्थानी मांय महिला लघुकथाकारां री धाप`र कमी है। पैलीपोत महिला लघुकथाकार रावत सारस्वत री 'मरुवाणी` मांय शांतिदेवी नांव सूं सामीं आयी। जिकां री लघुकथा 'बिचारो दिनकर` छप`र चावी हुयी। आं आंरी पैली अर आखरी लघुकथा निगै आवै। ता पछै 'जागती जोत` रै लघुकथांक जुलाई, १९८० ई. रै अंक मांय कुु. शंकुतला किरण रो नांव सामीं आयो। इण अंक मांय बां री 'अणचींत्यो` नांव सूं अेक सशक्त लघुकथा छपी जिण मांय लघुकथा रा सैंग तत्त्व देखण नै मिलै। सन् १९८१ मांय 'हिन्दी लघुकथा` शीर्षक लघुकथा माथै इणां अेक शोध-प्रबंध ई लिख्यो। राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर सूं आपनै पी-एच.डी. री उपाधि मिली। किणी-ई विश्वविद्यालय सूं लघुकथा पेटै मिलण वाळी आ` पैली उपाधि ही। पछै आप हिन्दी मांय इज लघुकथावां लिखण लागग्या। मातृभाषा ई आपरो दाय मांगै, इण विसै मांय-ई शंकुतलाजी नै सोचणो जोईजै।
नौवैं दसक मांय पुष्पलता कश्यप रो नांव सामीं आयो जिकां हिन्दी अर राजस्थानी दोनूं भासावां मांय मोकळी लघुकथावां लिखी है। माणक, मरवण, नैणसी, राजस्थली अर अपणायत मांय आपरी लघुकथावां छपती रैयी है। सन् १९८४ मांय 'अहसासों के बीच` अर सन् २००० मांय 'इक्कीसवीं सदी की लघुकथाएं` नांव सूं हिन्दी मांय दो लघुकथा संग्रै छप्या अर चावा-ई हुया। आपरी पैली लघुकथा हिन्दी मांय 'शब्द` पत्रिका रै लघुकथा विशेषांक (जनवरी, १९७५ ई.) मांय छपी। राजस्थानी मांय आपरी घणी-ई लघुकथावां छपगी पण हाल तांई राजस्थानी लघुकथा संग्रै नीं आयो। राजस्थानी रा पाठक बाट जोवै।
आपरी भासा, शैली अर शिल्प बिगसित अर कस्योड़ो लखावै। संतान, मनहूस, संतुलन, चपड़सी री बेटी, भइया अर कसौटी जैड़ी लघुकथावां घणी प्रभावित करै। आं रै लेखन मांय 'बोल्डनेश` साव निगै आवै। आं री लघुकथावां पैलां हिन्दी मांय जस कमा`र पछै राजस्थानी पाठकां सामीं आयी। आपरी मोकळी रचनावां राजस्थानी मांय छपी पण बै पैली हिन्दी मां छप`र अनुवाद रै मारफत राजस्थानी मांय आयी। आप जैड़ै सशक्त लघुकथाकार री लघुकथावां तो पैली राजस्थानी मांय छपै अर पछै अनुवाद रै मारफत हिन्दी जगत मांय जावै तो राजस्थानी लघुकथा री साख बधै, मान बधै अर मायड़ भासा रा हेतूळा रो जीवसोरो हुवै। फेर-ई आपरो योगदान घणो महताऊ नै घणमोलो कैयो जा सकै। अेक-ई तो लघुकथाकार है महिलावां मांय जिकां री लघुकथावां बखत-बखत बांचण नै मिलै।
सन् २००३ मांय सावित्री चौधरी री 'जागती जोत` रै जून अंक मांय च्यार लघुकथावां सामीं आयी। च्यारूं ई लघुकथावां, सौतन रा दास, थारा-म्हारो, पुन रो काम, हंसू`क रोऊं? लघुकथा शिल्प-विधान मांय खरी उतरती लखावै। फेर आं री लघुकथावां छपी हुवै, म्हारै निगै मांय नीं आयी। राजस्थानी महिला लघुकथाकारां नै लघुकथा सूं जुड़`र इण रै बिगसाव सारू आगै आवणो जोईजै।
लघुकथा रै बिगसाव मांय अैड़ा मोकळा-सा साहित्यकार ई है जिकां रो योगदान उल्लेखजोग है पण इण आलेख मांय नीं आया, जियां- शिवचरण मंत्री, नारायणसिंह राव, ओम अरोड़ा, राजेश अरोड़ा, विपुल ज्वालाप्रसाद, कैलाश मनहर, दीनदयाल ओझा, प्रहलाद श्रीमाली, भूराराम सुथार, प्रमोद शर्मा, बालमुकुन्द ओझा, सौभाग्यसिंह शेखावत, राजू कादरी रियाज, विश्वनाथ भाटी, पारसदासौत, प्रो. जी.एस. राठौड़, रामनिवास लखोटिया, गुरुदास भारती, मीठेश निर्मोही, दीपचंद सुथार, मंगत बादळ, श्यामसुंदर, दुलाराम सहारण, भंवर व्यास, वेदप्रकाश अर डॉ. नंदलाल आद री लघुकथावां बखत-बखत पत्र-पत्रिकावां मांय बांचण नै मिलती-ई रैवै। आं रो ओपतो योगदान भूलीजै कियां?

राजस्थानी लघुकथा : वर्तमान अर भविष्य
अजै तांई १५-१६ लघुकथा संग्रै छप्या है, जिका-ई अेक आधनै छोड`र सगळाई अकादमी रै सैयोग सूं सामीं आया। अकादमी रै इण घणमोलै सैयोग री कूंत तो अै लघुकथा संग्रै-ई करासी। पण सरावणो तो पड़सीज क्यूं कै पत्र-पत्रिका वां अर प्रकाशकां रै अभाव मांय कैयी लूंठा लघुकथाकार हिन्दी कानी पलायन करता निगै आवै। राजस्थानी मांय पत्रिकावां आंगळ्यां माथै गिणै जित्ती-ई कोनी तो ई माणक, नैणसी, ओळमो, जलते दीप, जागती जोत, युगपक्ष, मरुवाणी, मरवण, राजस्थानी गंगा अर राजस्थली जैड़ी पत्रिकावां ई जे राजस्थानी लघुकथा नै नीं अंगेजती, अपणांवती तो साव अंधारो-ई हो। तो शिक्षा विभाग, राजस्थान हरेक बरस आपरी 'राजस्थानी विविधा` नांव रै संग्रै मांय लघुकथावां छापै। आं सगळां नै लखदाद है।
राजस्थानी लघुकथा मांय जिकी दो धारावां चाली बां मांय सूं अेक परम्परा सूं जुड़ी थकी, जिकी नै डॉ. मनोहर शर्मा आगै बधायी। बा इबै कीं मोळी पड़ती लखावै। सन् १९९० मांय छप्योड़ी भानसिंह शेखावत मरुधर री 'बाण-कुबाण` इण धारा री छेकड़ली पोथी ही। इबै तो इण धारा मांय छिड़ी-बिछड़ी लघुकथावां ई मिलै। इंयां लागै कै ठैराव-सो`क आयग्यो। परम्परा अर जड़ सूं जुड़ी थकी इण धारा रो मोल समझ`र इणनै चालू राखण री दरकार है।
दूजी धारा जकी समकालीन भारतीय लघुकथा संू जुड़ी थकी है, श्रीचंदराय सूं सरू हुवण वाळी इण धारा मांय सौ सूं बेसी लघुकथाकार जुड़्या थका लघुकथा रै बिगसाव मांय लाग्योड़ा है साथै ई बै शिल्प अर शैली मांय सावचेती सूं नूंवा-नूंवा प्रयोग कर रैया है। बै लघुकथा रै नूंवै शिल्प नै अंगेज रैया है तो कलात्मकता कानी सूं ई बेपरवाह कोनी। आज आ` धारा बगीड़ करती बैंवती दीसै जकी गंगोतरी सूं भागीरथी गंगा रो रूप धारण करती निगै आवै। नूंवै सूं नूंवा युवा लघुकथाकार लगोलग समरपण भाव सूं जुड़ता-ई जाय रैया है।
पण फेर-ई अजै तांई जिका-ई प्रयास हुया है बां नै देख`र संतोख करणो भूल-ई हुवैला। आ बिगसाव री गाडी संख्यात्मक दीठ सूं सागीड़ी चालती लखावै। आवण वाळो बखत लघुकथा रो कैयो जा सकै। आंवतै पांच-दस बरसां मांय कहाणी संग्रां सूं बेसी निगै आयसी, लघुकथा संग्रै। अैड़ो पतियारो है।
पण भासा, कथ्य, शिल्प अर संवेदना रै स्तर माथै घणी सावचेती राखण री जरूरत लखावै। गुणात्मक दीठ सूं बिगसाव हुयां-ई लघुकथा रो भलो हुयसी। इण खातर आपां नै लगोतार बीजी भारतीय अर विदेसी भासावां री लघुकथावां सूं जुड़णो पड़सी। अनुवाद रै मारफत ई राजस्थानी लघुकथा नै सबळ बणावण री घणी जरूरत है। बीजी भारतीय भासावां सूं सशक्त लघुकथा संग्रै राजस्थानी मांय छपणा जोईजै। राजस्थानी लघुकथा कोश ई छपणो जोईजै। इण रो बीड़ो कै तो राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी उठावै कै केन्द्रीय साहित्य अकादमी नै ओ` काम करावण सारू आगै आवणो चाईजै।
जिका ऊंतावळ मांय लघुकथा री तकनीक समझ्यां बिनां-ई इण नै छोटै सूं छोटो आकार देवणै, छपास रोग सूं ग्रसित चुटकलाबाजी सूं काम चलावणै री कोसिस कर रैया है बै लघुकथा साथै अन्याय-ई नीं बलात्कार कर रैया है। 'लघु` अर 'कथा` दोनूं रै न्यारै अरथां मांथै नीं जाय इणरै अेक सबद 'लघुकथा` नै 'संज्ञा` मान`र चालणो पड़सी। महतब इण बात रो कोनी कै लघुकथा छोटी हुवै`क बडी? पण इण बात रो है कै लघुकथा रै विधान मुजब उणरै सगळै-ई तत्त्वां माथै खरी उतरै। आपरी माटी री सौंधी खुशबू हुयां च्यार चांद लाग जावै।
लघुकथा रो भविष्य निस्चै-ई घणो ऊजळो`र चमकदार दीसै। म्हनैं पतियारो है कै आंवतै बखत इण रो बिगसाव गति पकड़सी अर २१वीं सदी राजस्थानी लघुकथा री इज हुयसी।