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कन्हैयालाल सेठिया





महामनीषी पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया संक्षिप्त जीवन वृत्त

- जुगलकिशोर जैथलिया

जन्म : ११ सितम्बर १९२१ ई। को सुजानगढ़ (राजस्थान) में
पिता-माता : स्वर्गीय छगनमलजी सेठिया एवं मनोहरी देवी
विवाह : १९३७ ई. में श्रीमती धापू देवी के साथ।
सन्तान : दो पुत्र - जयप्रकाश एवं विनयप्रकाश तथा एक पुत्री श्रीमती सम्पत देवी दूगड़
अध्ययन : बी.ए.
निधन : ११ नवम्बर २००८
सम्मान, पुरस्कार एवं अलंकरण :
स्वतन्त्रता संग्रामी, समाज सुधारक, दार्शनिक तथा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कवि एवं लेखक के नाते आपको अनेक सम्मान, पुरस्कार एवं अलंकरण प्राप्त हैं जिनमें प्रमुख हैं -१९७६ ई. : राजस्थानी काव्यकृति 'लीलटांस` साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी भाषा की सर्वश्रेष्ठ कृति के नाते पुरस्कृत।
१९७९ ई. : हैदराबाद के राजस्थानी समाज द्वारा मायड़ भाषा की मान्यता हेतु संघर्ष के लिए सम्मानित। मायड़ भाषा को जीवन्त रखने की प्रेरणा दी।
१९८१ ई : राजस्थानी की उत्कृष्ट रचनाओं हेतु लोक संस्कृति शोध संस्थान, चूरू द्वारा 'डॉ. तेस्सीतोरी स्मृति स्वर्ण पदक` सम्मान प्रदत्त।
१९८२ ई. : विवेक संस्थान, कलकत्ता द्वारा उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए 'पूनमचन्द भूतोड़िया पुरस्कार` से पुरस्कृत।
१९८३ ई. : राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर द्वारा सर्वोच्च सम्मान 'साहित्य मनीषी` की उपाधि से अलंकृत। 'मधुमति` मासिक का श्री सेठिया की काव्य यात्रा पर विशेषांक एवं पुस्तक भी प्रकाशित।
१९८३ ई. : हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा 'साहित्य वाचस्पति` की उपाधि से अलंकृत।
१९८४ ई. : राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा अपनी सर्वोच्च उपाधि 'साहित्य मनीषी` से विभूषित।
१९८७ ई. : राजस्थानी काव्यकृति 'सबद` पर राजस्थानी अकादमी का सर्वोच्च 'सूर्यमल मिश्रण शिखर पुरस्कार` प्रदत्त।
१९८८ ई. : हिन्दी काव्यकृति 'निर्ग्रन्थ` पर भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली द्वारा 'मूर्तिदेवी साहित्य पुरस्कार` प्रदत्त।
१९८९ ई. : राजस्थानी काव्यकृति 'सत् वाणी` हेतु भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता द्वारा 'टांटिया पुरस्कार` से सम्मानित।
१९८९ ई. : राजस्थानी वेलफेयर एसोशियेसन, मुंबई द्वारा 'नाहर सम्मान`।
१९९० ई. : मित्र मन्दिर, कलकत्ता द्वारा उत्तम साहित्य सृजन हेतु सम्मानित।
१९९२ ई. : राजस्थान सरकार द्वारा 'स्वतन्त्रता सेनानी` का ताम्रपत्र प्रदत्त कर सम्मानित।
१९९७ ई. : रामनिवास आशादेवी लखोटिया ट्रस्ट, नई दिल्ली द्वारा 'लखोटिया पुरस्कार` से विभूषित।
१९९७ ई. : हैदराबाद के राजस्थानी समाज द्वारा मायड़ भाष की सेवा हेतु सम्मानित।
१९९८ ई. : ८० वें जन्म दिन पर डॉॅॅ. प्रतापचन्द्र चन्दर की अध्यक्षता में पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर तथा अन्य अनेक विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा सम्मानित।
२००४ ई. : राजस्थानी भाषा संस्कृति एवं साहित्य अकादमी बीकानेर द्वारा राजस्थानी भाषा की उन्नति में योगदान हेतु सर्वोच्च सम्मान 'पृथ्वीराज राठौड़ पुरस्कार` से सम्मानित।
२००५ ई. : राजस्थान फाउन्डेशन, कोलकाता चेप्टर द्वारा 'प्रवासी प्रतिभा पुरस्कार` से सम्मानित। एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि राजस्थानी भाषा के कार्य में लगाने हेतु फाउन्डेशन को लौटा दी जिसे फाउन्डेशन ने राजस्थान परिषद को इस हेतु समर्पित किया।
२००५ ई : राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा पी.एच.डी. की मानद उपाधि प्रदत्त।




श्री कन्हैयालाल सेठिया का साहित्य एवं साहित्य चिंतन

- दुलाराम सहारण

''जग में कुण छोटो बड़ो
बड़ो हुवै है काम,
बानर बांध्यो समद नै,
पार हुए श्री राम।`` - कन्हैयालाल सेठिया

राजस्थान का साहित्यिक फलक काफी विस्तृत व व्यापक रहा हैं। यहां के अनेक साहित्य मनीि ायों ने अंतररा ट्रीय व रा ट्रीय स्तर पर अपनी बौद्धिक क्षमता का लोहा मनवाया है। हिन्दी और राजस्थानी भा ाा में समान रूप से सृजन करने वाले कविवर श्री कन्हैयालाल सेठिया एक ऐसी ही विभूति का नाम है। सुजानगढ़ (चूरू) में ११ सितम्बर, १९१९ ई. को श्रीमती मनोहरी देवी एवं श्री छगनलाल सेठिया के घर जन्में श्री कन्हैयालाल सेठिया आज अपने विराट व्यक्तित्व और कृत्तिव के कारण राजस्थान की साहित्यिक धरा के शिखर पर स्थापित हैं।
कन्हैयालाल सेठिया बहुमुखी प्रतिभा का नाम है। वे ख्यातनाम समाजसेवी, प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, कुशल राजनेता और श्रे ठ रचनाकार हैं। विविध आयामी फलकों में से जिसके कारण सेठियाजी को प्रसिद्धि की चरम अनुभूति मिली वह है- साहित्यिक अवदान।
श्री कन्हैयालाल सेठिया को साहित्यिक अवदान निमित्त पद्मश्री, साहित्य मनी ाी, साहित्य वाचस्पति, मानद् पीएच.डी. (राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर-२००५) आदि उपाधियों से लेकर मूर्तिदेवी पुरस्कार, केन्द्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार, पृथ्वीराज राठौड़ पुरस्कार, सूर्यमल मिसण शिखर पुरस्कार, महाराणा कुम्भा पुरस्कार, डॉ. तैसीतोरी स्मृति पदक, टांटिया पुरस्कार, नाहर सम्मान, पूनमचंद भूतोड़िया पुरस्कार सहित अनेकों पुरस्कार मिल चुके हैं। सेठियाजी के विविध काव्य संग्रह काफी लोकप्रिय हुए हैं। उनकी ''धरती धोरां री.......`` एवं '' पातळ अर पीथळ`` काव्य रचनाएं तो लोक-जुबान की रचनाएं बन गई हैं। राजस्थानी रचनाओं के कारण वे काफी ख्यात नाम हुए हैं। उनकी जन भावनाओं की अभिव्यक्ति वाली राजस्थानी रचनाएं आधुनिक राजस्थानी काव्य की थाती हैं। हिन्दी काव्य में वे दार्शनिक कवि के रूप में ज्यादा प्रसिद्ध हुए हैं।
आलेख को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-
१. श्री कन्हैयालाल सेठिया का साहित्य एवं,
२. श्री कन्हैयालाल सेठिया का साहित्य चिंतन।

श्री कन्हैयालाल सेठिया का साहित्य :
कन्हैयालालजी सेठिया ने अपनी युवा वय को ही सृजन की तरफ मोड़ दिया था। तभी तो वे प्रारम्भ की रचना से लेकर आखिर तक उत्साह और सत्य का मिश्रण लिए जीते रहे हैं। सेठियाजी की रचनाओं में राजस्थानी माटी की गंध और भोले-भाले लोगों, किसानों, महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों की मनोभावना साकार होती है क्योंकि अगर ये साकार नहीं होती तो सेठियाजी का कवि के रूप में इतना लोकप्रिय होना संभव नहीं था।
सेठियाजी अपनी रचनाओं के सत्य को स्वयं प्रकट करते हुए कहते हैं -
''जो हुआ न
अब तक
शब्दबद्ध वह अनकथ
मेरा कथ होगा,
आगे न
किसी के
चरण चिह्न
वह मेरे पथ का
अथ होगा।``
सेठियाजी की अब तक हिन्दी में १८, उर्दू में २ व राजस्थानी में १४ पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है। अगर सेठियाजी के सृजन दौर का क्रमिक अध्ययन किया जाए तो ाुरूआत राजस्थानी 'रमणियां रा सोरठां` (वि.सं. १९९७) से मानी जा सकती है।

समग्र प्रकाशन पर एक नज़र -
१. रमणियां रा सोरठा, वि.सं. १९९७ १९४० ई. २. वनफूल, वि.सं. १९९७ १९४० ई.
३. अग्नि वीणा, वि.सं. १९९९ १९४२ ई. ४. मेरा युग, वि.सं. २००५ १९४८ ई.
५. दीप किरण, वि.सं. २०११ १९५४ ई.
६. गळगचिया, वि.सं. २०१७ १९६० ई.
७. मींझर, वि.सं. २०१७ १९६० ई. ८. आज हिमालय बोला, वि.सं. २०१९ १९६२ ई.
९. खुली खिड़कियां चौड़े रास्ते, वि.सं. २०२४ १९६७ ई.
१०. कूंकूं, वि.सं. २०२७ १९७० ई.
११. प्रतिबिम्ब, वि.सं. २०२७ १९७० ई.
१२. प्रणाम, वि.सं. २०२७ १९७० ई.
१३. मर्म, वि.सं. २०२८ १९७१ ई. १४. लीलटांस, वि.सं. २०३० १९७३ ई.
१५. अनाम, वि.सं. २०३१ १९७४ ई.
१६. निर्ग्रन्थ, वि.स. २०३२ १९७६ ई.
१७. ताजमहल वि.सं. २०३२ १९७६ ई.
१८. धर कूंचां धर मजलां, वि.सं. २०३६ १९७९ ई.
१९. मायड़ रो हेलो, वि.सं. २०४१ १९८४ ई.
२०. सबद, वि.सं. २०४२ १९८५ ई.
२१. स्वगत, वि.सं. २०४३ १९८६ ई.
२२. सतवाणी, वि.सं. २०४४ १९८६ ई.
२३. अघोरी काळ, वि.सं. २०४४ १९८७ ई.
२४. देह-विदेह, वि.सं. २०४४ १९८८ ई.
२५. दीठ, वि.सं. २०४५ १९८८ ई.
२६. क क्को कोड रो..., वि.सं. २०४६ १९८९ ई.
२७. आकाश गंगा, वि.सं. २०४७ १९९० ई.
२८. लीकलकोळिया, वि.सं. २०४८ १९९१ ई.
२९. वामन-विराट, वि.सं. २०४८ १९९१ ई.
३०. नि पत्ति, वि.सं. २०५० १९९३ ई.
३१. श्रेयस वि.सं. २०५४ १९९७ ई.
३२. हेमाणी, वि.सं. २०५६ १९९९ ई.
३३. त्रयी, वि.सं. २०५८ २००१ ई.
३४. गुलचीं वि.सं. २०५८ २००१ ई.
इनसे इतर 'नीमड़ो` राजस्थानी की लघु पुस्तिका है। 'इरा` में चुनी हुई कविताएं हैं तो वहीं 'सप्त किरण` संयुक्त प्रकाशन है। 'परम वीर ौतानसिंह`, 'जादूगर माओ`, 'रक्त दो`, 'चीन की ललकार` आदि लघु कृतियां भी सेठियाजी की ही हैं।
इन सबके अलावा सेठियाजी की अनेक रचनाएं अप्रकाशित हैं तथा अनेक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं। उनकी कई रचनाएं विभिन्न भा ााओं में अनुवादित {प्रतिबिम्ब (त्मसिमबजपवद पद ं डपततवत), लीलटांस (ठसनम श्रंल), निर्ग्रन्थ (छपहतंदजी)-अंग्रेजी, निर्ग्रन्थ-बंगला, खुली खिड़कियां चौड़े रास्ते-मराठी, चुनिंदा राजस्थानी कविताओं का हिन्दी अनुवाद-अनुवर्तन, संस्कृत-श्रीराधा} भी हुई हैं। 'ताजमहल` व 'गुलचीं` सेठियाजी की उर्दू कृतियों के नमूने हैं।
डॉ. राधा भालोटिया उनकी रचनाओं के स्थायित्व की दिशा में सतत् संलग्न रही हैं। श्रीमती राधा भालोटिया द्वारा संपादित 'पत्रों के प्रकाश में कन्हैयालाल सेठिया` ग्रंथ भी सेठियाजी के वि ाय में खासी जानकारी कराता है। सेठियाजी की रचनाओं के सर्वसुलभ सोच से श्री जुगलकिशोर जैथलिया ने तीन खंडों में 'कन्हैयालाल सेठिया समग्र` का संपादन भी किया है।
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर ने ''कवि कन्हैयालाल सेठिया और उनका काव्य`` वि ायक पुस्तक का प्रकाशन भी किया। अकादमी पत्रिका 'मधुमति` का अक्टूबर-नवम्बर, १९८३ अंक सेठियाजी पर केन्द्रित रहा। श्री कन्हैयालाल सेठिया अभिनंदन-ग्रंथ 'प्रज्ञा-पुरु ा` श्री झूमरमल सेठिया व डॉ. भानीराम द्वारा संपादित श्रे ठ उपहार है।
श्री सेठियाजी पर राजस्थान विश्वविद्यालय व जोधपुर विश्वविद्यालय के अधीन ाोध प्रबंध भी लिखे जा चुके हैं। गौत्तम घो ा ने 'धरती धोरां री...` गीत पर वृत्त चित्र भी बनाया। दूरदर्शन ने 'पदचाप : प्रज्ञा पुरु ा की` के नाम से सेठियाजी की ाब्द यात्रा को पर्दे पर उतारा।
रचनाओं की पड़ताल :
''रच सकती
प्रबुद्ध कवि की
लेखनी
सामान्य ाब्दों से
कालजयी कृतियां !`` - कन्हैयालाल सेठिया
श्री कन्हैयालाल सेठिया की रचनाओं को दो भागों में बांटकर देखा जाना चाहिए। पहली हिन्दी रचनाएं और दूसरी राजस्थानी रचनाएं।
हिन्दी रचनाएं :
सेठियाजी हिन्दी की नई धारा के कवि रूप में स्थापित हुए। हिन्दी में उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। कुछ प्रमुख रचनाएं इस ढंग से हैं-
वनफूल : यह सेठियाजी की पहली हिन्दी कृति है; जो सन् १९४० में लिखी गई। इसकी भूमिका प्रसिद्ध कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने लिखी।
अग्निवीणा : सन् १९४२ के 'करो या मरो` आदि नारों से प्रभावित हो सेठियाजी २० हिन्दी कविताओं वाली कृति 'अग्निवीणा` सामने लाए। परिणति यह हुई कि बीकानेर राज्य ने सेठियाजी पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया और कृति जब्त कर ली गई। इस कृति के प्रकाशक आर्यावर्त प्रकाशन गृह, सुजानगढ़ हैं।
मेरा युग : आजादी के दौर की समस्यों-संघ र्ाों को अभिव्यक्ति देता यह संग्रह काफी लोकप्रिय रहा।
दीपकिरण : सन् १९४१ से १९४५ के बीच के १६० हिन्दी गीतों का यह संग्रह है।
आज हिमालय बोला : आर्यावर्त प्रकाशन गृह, सुजानगढ़ ने इस कृति को आकार दिया। कवि सुमनेश जोशी को समर्पित यह पुस्तक ३५ हिन्दी कविताओं का संग्रह है, जो सन् १९६२ में छपा।
खुली खिड़कियां चौड़े रास्ते : महान् संत तुलसी को समर्पित यह हिन्दी काव्य कृति आर्यावर्त प्रकाशन गृह, सुजानगढ़ के अधीन वि.सं. २०२४ में छपा। इसमें कुल १०० कविताओं का अंकन है।
प्रतिबिम्ब : यह १९७० में लिखी गई। अंग्रेजी में भी इसका अनुवाद हुआ। भूमिका हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने लिखी।
प्रणाम : हिन्दी की ४४ कविताओं का यह संग्रह आर्यावर्त प्रकाशन गृह, सुजानगढ़ के माध्यम से सन् १९७० में सामने आया।
मर्म : हिन्दी के ९० छोटे बिम्बों के बहाने सेठियाजी की कलम इस कृति के माध्यम से वि.सं. २०२८ में मर्म की बात बोली। अर्चना, २१-ए, बी.के. पाल एवेन्यू, कलकत्ता इस पुस्तक के प्रकाशक रहे।
अनाम : सन् १९७४ में प्रकाशित यह संग्रह सेठियाजी के गीतों-कविताओं का अनमोल उपहार है।
निर्ग्रन्थ : सन् १९७६ में छपे इस संग्रह पर सेठियाजी को मूर्तिदेवी पुरस्कार मिला। इस संग्रह में कुल ८२ कविताएं है।
स्वगत : रामेश्वर टांटिया स्मृति न्यास, ४, ारत चटर्जी एवेन्यू, कलकत्ता के माध्यम से सेठियाजी ने स्वगत को व्याख्यायित किया। आत्मबोध व जीवन बोध (कुल ५०+५४=१०४) दो खंडों में बंटी सेठियाजी की ये हिन्दी कविताएं सत्य को उद्घाटित करने में सर्वथा सक्षम रही हैं। इसका प्रकाशन १९८६ ई. में हुआ।
देह-विदेह : सन् १९८८ में सेठियाजी की ८१ कविताओं का यह संग्रह सामने आया।
आकाशगंगा : कुल १२९ कविताओं का यह हिन्दी कविता संग्रह सन् १९९० में छपा।
वामन विराट : सन् १९९१ में छपा यह संग्रह सेठियाजी के ७२ हिन्दी कविताओं की सौगात है।
नि पत्ति : कुल ११५ कविताओं का यह संग्रह १९९३ ई. में छपा। यह संग्रह काफी लोकप्रिय हुआ।
श्रेयस : १९९७ ई. में छपा यह संग्रह १३२ लघु कविताओं को समेटे हुए है।
त्रयी : २००१ ई. में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित यह संग्रह सेठियाजी की श्रे ठ बौद्धिक क्षमता का सबूत है।
राजस्थानी रचनाएं :
रमणियां रा सोरठा : सेठिया परिवार के खानदानी गद्दी मुनीम श्री चुन्नीलाल प्रजापत के पौत्र रामनारायण उर्फ ''रमिणया`` के नाम से संबोधित ७५ सोरठों की यह राजस्थानी कृति है। 'राजिया रा दूहा` परम्परा के इन सोरठों ने काफी प्रसिद्धि पाई।
गळगचिया : राजस्थानी गद्यकाव्य का स्वरूप लिए यह पुस्तक स्व. मुरलीधर सराफ स्मृति ग्रंथ माला (९/१, ाोभाराम बैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता) के तहत १९६० ई. में प्रकाशित हुई। पुस्तक में कुल ६४ गद्यकाव्य के नमूने हैं जो काफी लोकप्रिय हुए। डॉ. भूपतिराम बदरीप्रसादोत साकरिया के अनुसार गद्यकाव्य की भावप्रवणता और गांभीर्य ने राजस्थानी साहित्य में एक ठावी ठौड़ बना ली।मींझर : यह १९६२ ई. में छपी। इसमें सेठियाजी की सन् १९४६ से लेकर १९६० तक की कविताएं ाामिल है। प्रसिद्ध कविताएं 'धरती धोरां री`, 'पातळ`र पीथळ`, 'कुण जमीन रो धणी` और 'अळगोजो` आदि कविताएं इस संग्रह में दी गई।
कूंकूं : इस राजस्थानी कृति में कुल ७१ कविताएं संग्रहित हैं। वि.सं. २०२७ में छपी इस कृति के प्रकाशक आर्यावर्त प्रकाशन गृह, सुजानगढ़ हैं। कुल ७१ रचनाओं के माध्यम से सेठियाजी ने लोक सत्य की उक्तियों को बड़े ाानदार ढंग से अपनी ौली में उतारा है।
लीलटांस : सन् १९७३ में स्व. मुरलीधर सराफ स्मृति ग्रंथ माला (९/१, ाोभाराम बैशाख स्ट्रीट, कलकत्ता) प्रकाशन के रूप में 'लीलटांस` का अभ्युदय हुआ। लीलटांस की सभी ६८ राजस्थानी कविताएं काफी चर्चित रही। इसी कृति पर सेठियाजी को १९७६ का केन्द्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।धर कूंचां धर मंजलां : यह राजस्थानी के १५६ दोहों का संग्रह है। सन् १९७९ में प्रकाशित इस पुस्तक के प्रकाशक हिन्दी बुक सेंटर, ४/५-बी, आसफ अली रोड, नई दिल्ली हैं।
मायड़ रो हेलो : सन् १९८४ में राजस्थानी साहित परि ाद, ११, आर.एन. मुकर्जी रोड, कलकत्ता से प्रकाशित इस राजस्थानी कृति में २० विभिन्न कविताओं के माध्यम से मातृभा ाा राजस्थानी की पीड़ा व राजस्थान की व्यथा को अभिव्यक्त किया गया है।
सबद : सन् १९८५ में दिव्या प्रकाशन, सुजानगढ़ से यह पुस्तक कन्हैयालाल सेठिया के १०९ दोहों के माध्यम से ाब्दों को आकार देती हुई छपी। इसमें रचना क्षमता के अनोखेपन के अलावा प्रकाशन का अनोखापन यह रहा कि पूरी पुस्तक सेठियाजी की हस्तलिपि में प्रकाशित है।
सतवाणी : ३३१ दोहों व ५ महाव्रतों (१६ दोहों) के माध्यम से सेठियाजी ने सतवाणी स्वरूप में प्रकटा। यह राजस्थानी पुस्तक दिव्या प्रकाशन, सुजानगढ़ से सन् १९८६ मंे प्रकाशित हुई।
अघोरी काळ : दिव्या प्रकाशन, सुजानगढ़ से सन् १९८७ में छपी इस राजस्थानी कृति में २६ कविताओं की मार्फत सेठियाजी ने राजस्थान के आमजन की व्यथा को रूपांकित किया है एवं विशे ाकर अकाल समस्या को बिम्बित किया है।
दीठ : १९८८ ई. में भालोटिया फाउण्डेशन, ३, न्यू रोड, अलीपुर से छपी यह पुस्तक सेठियाजी की ४६ राजस्थानी कविताओं को लिए हुए है। श्री मूलदान देपावत के अनुसार 'दीठ` की कविताओं में जीवन के गूढ़ रहस्यों को सरल वाक्यांशों द्वारा निरूपित किया गया है। कवि मनु य के समक्ष कुछ प्रश्न खड़े कर ााश्वत सत्य से साक्षात्कार कराता है। निराशा में झूलते मनु य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
क क्को कोड रो... : सन् १९८९ में दिव्या प्रकाशन, सुजानगढ़ के प्रकाशन के रूप में इस राजस्थानी कृति का आगमन हुआ। कुल ८५ राजस्थानी कविताओं का समावेश इस पुस्तक में सेठियाजी ने किया।
लीकलकोलिय़ा : सन् १९९१ में छपी इस पुस्तक में छोटी-छोटी १०२ कविताएं हैं। इसके प्रकाशक श्री जयप्रकाश सेठिया, ३ मैंगोलेन, कलकत्ता हैं। डॉ. मूलचंद सेठिया के ाब्दों में यह कृति राजस्थानी में काव्योत्क र्ा का अत्युच्च प्रतिमान स्थापित करती है।
हेमाणी : यह कृति वि.सं. २०५६ में प्रकाशित हुई। इसके प्रकाशक डूंगरमल सुराणा, ३/४, बस्ती हरफूलसिंह, सदर थाना रोड, दिल्ली हैं। इस राजस्थानी कृति में ६३ रचनाओं का समागम है।


श्री कन्हैयालाल सेठिया का साहित्य चिंतन :
श्री कन्हैयालाल सेठिया के समग्र साहित्य में मूल्य बोध है। उनका व्यक्तिगत चिंतन यथार्थवादी है। सत्य को वे करीब से महसूस करते हैं। दर्शन उनके रोम-रोम में विराजमान है तो वहीं आम आदमी उनके हर वास-उच्छवास में निवास करता है। कवि को सेठियाजी अनुभूति का माध्यम मात्र मानते हैं। सेठियाजी की रचनाओं में एक दृि ट पाठक को मिलती है और पाठक स्वयंमेव उद्योग के प्रति उद्धत हो उठता है। कविवर सेठियाजी कवियों को उद्देश्य युक्त रचनाओं के सृजन की ओर प्रेरित करते हुए कहते हैं- ''रचना वा जिण में दिखै
सिरजणियै री दीठ
नहीं`स बोझो सबद रो
लद मत कागद पीठ।``

सेठियाजी की रचनाओं का चिंतनपरक अध्ययन किया जाएं तो वे युग के कवि साबित होते हैं। युगानुकूल भाव-भंगिमाओं से उनकी काव्य यात्रा ओत-प्रोत है। वे जहां ाब्दों में कठोरता लाते हैं, वहीं संदेश संप्रे ाण के लिए कहीं-कहीं नरमाई भी अख्तियार कर लेते हैं। हिन्दी हो या राजस्थानी, सेठियाजी ने कहीं भी भावों पर भा ाा को प्रभावी नहीं होने दिया है। वे व्यक्ति और समाज को उपयोगिता का गुर सिखाते हैं। सभ्यता के मूल तत्व को समझाते हैं और एक ााश्वत चिंतन का परिपालन करते हैं-
''लीली कामड़ी
मत घणी तण,
लुळज्या डावड़ी
चिटियो बण।``
सेठियाजी के काव्य के विभिन्न पहलुओं को छूते हुए उनका क्रमिक विस्तारण इस ढंग से किया जा सकता है : -
यथार्थवादी चिंतन : श्री कन्हैयालाल सेठिया यथार्थ के कवि हैं। उन्होंने सत्य को कहा और वो भी नए ढंग से। उनका चिंतन युगबोध के भावों से संलिप्त है। सेठियाजी की हिन्दी कविता हो; चाहे राजस्थानी कविता, वे समाज को हर मोड़ पर दिशाबोध कराते नजर आते हैं। उनका मानना है कि जब तक जन का मन नहीं बदलेगा तब तक वतन की ऊंचाईयों का जतन कैसा ? वे सत्य को बेबाकी से बयान करने वाले कवियों में ाुमार हैं। तभी तो कहते नजर आते हैं -
''बलि
वासनाओं की दो,
नारियल
कुण्ठा का तोड़ो,
चन्दन
अहम का घिसो
बन जाएगा
तुम्हारा पशु ही प्रभु !``
आम व्यक्ति की पीड़ा मुक्ति और जरूरतों की पूर्ति के बाद ही प्रगति की संभावना बनती है। समानता की बात करता हुआ कवि कहता है-
''जकां कनै
कोनी
रोटी`र माचो
किंयां रैण देसी बै
जच्योड़ो जाचो ?
दार्शनिक चिंतन : सेठियाजी के काव्य का अध्ययन पाठक को दर्शन की अप्रतिम ऊंचाईयों का भी संस्पृश कराता है। वे जब लिखते हैं तो पूर्णतया दार्शनिक स्वरूप प्रकट होने लगता है। व्यक्ति, समाज, देश, काल को वे दार्शनिक की भांति महसूस करते हैं और कलम के माध्यम से विचारों को ाब्दबद्ध करते चलते हैं। वे मानते हैं-
''दृि ट से परे
दर्शन
जीवन से परे
आत्मा``
हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक श्री यशपाल जैन मानते हैं- ''कन्हैयालाल दार्शनिक हैं। उन्होंने विभिन्न दर्शनों का कितना अध्ययन किया है; मैं नहीं जानता। किन्तु इतना मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि उन्होंने भारतीय दर्शन को हृद्यंगम करने का प्रयत्न किया है। वही दर्शन उनकी रचनाओं में निहित रहता है और वही उनकी रचनाओं को दार्शनिक बनाता है। लेकिन उनका दर्शन गगन-विहारी नहीं है, वह जीवन को छूता है और उनकी रचनाओं को सुपाठ्य और हृद्यग्राही बनाता है।``
सेठियाजी की रचनाओं में दर्शन के बहाने चित्रों का बनना एक कला नजर आती है-
''नाम रूप की भीड़ जगत में
भीतर एक निरंजन
सुरति चाहिए, अंतर दृग को
बाहर दृग को अंजन
देखे को अनदेखा कर रे
अनदेखे को देखा
क्षर लिख तू रहा निरक्षर
अक्षर सदा अलेखा !``
समय-बोध युक्त चिंतन : सेठियाजी ने समय की धारा को समझा। सम्पूर्ण साहित्य युग धारा के साथ चलता नजर आता है। स्वतंत्रता संग्राम के समय की कविताओं में जहां विद्रोह तो वहीं उत्तरोत्तर कविताओं में सांमजस्य। वे व्यक्ति को हकों की बात सिखाते हैं और उसे हकों से वंचित होते नहीं देखना चाहते। तभी तो कहते हैं -
''भर न सकेगी आग देश में
कवि केवल कविताई
वाक् ाूर अब बनना होगा
तुम्हें चन्दवरदाई।
एक हाथ में कलम, अपर में
अब बन्दूक संभालो
आज ाब्द की तरह गोलियां
तुम ाीशे की ढालो।``
आशावादी चिंतन : सेठियाजी के काव्य में कहीं भी निराशा नहीं है। व्यवस्था के प्रति आक्रोश है तो वहीं संतुलन भी है। आत्मविश्वास का खोना कवि सर्वस्व खोना मानता है। आशा से प्राप्ति का संदेश कवि का निज चिंतन जग चिंतन है-
''मत हार मतो
जा बगतो
अवै
कतो`क रसतो ?``
सत्यान्वे ाी चिंतन : सेठियाजी का साहित्यिक चिंतन का आधार पुख्ता है। वे सत्य के खोजी हैं। सत्य की नींव पर जो मीनार बनाता है; वह स्थाई रहती है। कवि को अपने काव्य में सत्य बयानी में कहीं हिचक महसूस नहीं होती। वे बेबाकी से कहते हैं-
अवतार मरते नहीं
मारे जाते हैं।
अस्वीकार कर
स्वीकारे जाते हैं।``
समन्वय के संुदर मिश्रण का सोच : सेठियाजी सत्य के करीब रहते हुए भले और बुरे को समन्वय करने की सीख देते हैं। उनका चिंतन है कि समाज में कोई अगर बुरा है तो उसके गुणों के अनुरूप उसका सही स्थान पर उपयोग करना चाहिए। बुरा मानकर तिरस्कार करना तो व्यवस्था को नकारना है। वे कहते हैं-
''मत कांटा सूं राड़ कर, कर कांटा री बाड़
बणकर सैण रुखाळसी, बैरी गांव गुवाड़।``
ााब्दिक आडम्बर की तुलना में चेतनायुक्त चिंतन : कन्हैयालाल सेठिया के साहित्य में कहीं भी ााब्दिक आडम्बर नहीं दिखाई देता। कवित्व उन पर हावी नहीं है। वे सरल और सहज ाब्दों में बात को ढालने में महारथी हैं। वे मानते हैं कि यह ाब्द तो मात्र सहारा है, इससे चेतना का संचार होना आवश्यक है। अगर वह नहीं तो कवि कहने से नहीं चूकता-
'' शब्द तो अब मात्र मेरे
रूग्ण मन का मोह
जाग मेरी चेतने कर
शब्द से विद्रोह।``
मिट्टी के प्रति सम्मान : चिंतक कभी भी जन्मदात्री धरा से परे बातंे नहीं बखानता। जिसमें पला, बढ़ा और जिसको हर क्षण भोगा; वह सर्वोपरि भला कैसे नहीं ? सेठियाजी का चिंतन जन्मभूमि के प्रति सम्मान का रहा है। वे मिट्टी से बढ़कर कोई सत्य स्वीकार नहीं करते-
''कोनी
माटी स्यूं
मोटी
कोई साच
सगळा
तत
माटी रे पाण
सत``
अपनी जन्मभूमि राजस्थान की धरा को भला वे कैसे भूल सकते हैं-
''आ तो सुरगां नै सरमावै
ईं पर देव रमण नै आवै
ईं रो जस नर-नारी गावै
धरती धोरां री................।``
स्व सभ्यता के प्रति गौरवमय चिंतन : श्री कन्हैयालाल सेठिया ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मोह को, उनकी गरिमा को, उनके चिंतन को सदैव मुखर किया। पश्चिमी सभ्यता की ओर भागने वालों को आगाह करते हुए वे सचेत करते हैं-
''पिच्छम री जिनगानी
सासतो भाजणै री एक होड़,
पूरब री
थम`र सोचणै री एक मोड़,
अतैक फरक स्यूं
पिच्छम में जलमै जुद्ध
पूरब में बुद्ध!``
निज भा ाा उन्नति अहै..... : सेठियाजी के काव्य की और व्यक्तित्व की मूल चिंतनपरक जो सोच है वह है राजस्थानी भा ाा के प्रति मोह। वे निज भा ाा की उन्नति और उन्नयन के प्रति सदैव जागरूक रहे हैं। उनका हर चिंतन इस पहलू के ईद-गिर्द मंडराता रहता है-
खाली धड़ री कद हुवै, चेरै बिन्या पिछाण ?
मायड़ भासा रै बिन्यां, क्यां रो राजस्थान ?
कवि को भय है कि-
रवि ठाकर बंगाली, गांधी गुजराती जस गासी
राजस्थान्यां थांरी पीढी, किणरो नांव गिणासी ?
आत्मश्लाघा से दूर परहित चिंतन : सेठियाजी ने अपने साहित्यिक व्यक्तित्व को सदैव गौण माना। वे मानते हैं कि मैं भी एक आम आदमी हूं। मैंनें जो लिखा; वह रूचि भर है। मैं क्या बना! कवि तो जन्मजात होता है। मैंने अर्जित क्या किया ? अर्जित पर गर्व होने की कुप्रवृत्ति होती है। परंतु मैंनें तो कुछ अर्जित ही नहीं किया। रही लिखने की बात, सो अब तक लिखना भी कहां आया है-
''लिख लीनी
पोथ्यां निरी
पण कठै आयो
हाल मांडणो ?``
आत्म आहुति के बाद कल : कवि सेठियाजी के चिंतन का पक्ष काफी गहरा है। उन्होंने बातों-ही-बातों में सत्य बयानी कर डाली कि आज पर मत इतरा। आज गल तब बनेगा कल। कवि के ाब्दों में-
''बनता
बीज गल फल,
जल सूख बादल,
दीप बूझ काजल,
तल डूब अतल,
आज मिट कल।``
उपसंहार :
सेठियाजी के रचनाकाल और रचना समग्र पर दृि टपात करने के बाद स्प ट कहा जा सकता है कि उनका चिंतन प्रौढ़ है, यथार्थ से युक्त है, आत्मपरक है, दार्शनिक है, भाव और भा ाा के प्रवाह से आप्लावित है व युग कवि के समुच्चय को स्वयंसिद्ध करने वाला है।
स्वयं के बहाने रचनाकर्म ही सेठियाजी के चिंतन की प्रभावोत्पादकता है। तभी तो प्रसिद्ध कवि शिवमंगलसिंह सुमन ने कहा- ''रचनाओं में उन्मे ाशील आत्मपरक अभिव्यक्तियों की समुज्जवल संरचना है।``
चिंतन से इतर सेठियाजी की भा ाा मंे दम है। वे छंद को लयबद्ध करने में सिद्धहस्त है। उनकी रचनाओं में गेयता, संप्रे ाणीयता, गत्यातात्मकता व भावप्रवणता का सुंदर समिश्रण है। भा ाा के प्रयोग के प्रति वे इतने सतर्क है कि प्रसिद्ध रचनाधर्मी श्री बालकवि बैरागी को भी कहना पड़ा- ''शायद ही किसी ने इस ाताब्दी में अल्प विराम और स्वल्प विराम तक का इतना सम्मान किया हो, इस मुकाम पर वे ऋि ावत् हैं।``
साहित्य और साहित्य चिंतन वि ाय की गूढ़ता के अंत में श्री कन्हैयालाल सेठिया के वि ाय में कहना समीचीन होगा कि-
''विराट पन्नों की
कदम्ब-शाखों पर
झूलता,
बंसी बजाता,
देखो हमारा
वामन कन्हैया!``