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चांदी की चमक

'चांदी की चमक' हिन्दी बाल कहानी संग्रह है। दुलाराम सहारण द्वारा रचित इस संग्रह में कुल ५ कहानियाँ है। प्रस्तुत है शीर्षक कहानी के अंश -
चांदी की चमक
सुनसान हवेली। उससे सटी जमील चाचा की दुकान। दुकान के पार ही तो भाालिनी और रागिनी का घर था। दोनों सगी बहिनें। आपस में खूब स्नेह। दोनों मम्मी-पापा की आज्ञाकारिणी। भाालिनी बड़ी तो रागिनी छोटी।
दोनों बहिनें पढ़ने में होि ायार। समय पर स्कूल जाना और स्कूल का काम समय पर करना आदत में भाुमार। अध्यापकों के आदे ाों की अनुपालना में माहिर। बस यही कारण की दोनांे बहिनें अध्यापकों की चहेती।
घर से स्कूल और स्कूल से घर दोनों बहिनें साथ-साथ आती-जाती। कस्बे के मुख्य मार्ग से अलग होकर सुनसान हवेली के आगे से गुजरने वाली तंग गली में दोनों बहिनें जरूर कुछ डर महसूस करती। एक तो गली सुनसान। ऊपर से गली में बिखरे पत्थर।
वे पत्थर जो बरसात-पानी की मार से हवेली के भरभराकर गिरने से गली में गिरते। मोहल्लेवासियों ने परदेस बसे हवेली मालिकों से इस सम्बन्ध में काफी सम्पर्क किया। परंतु हवेली मालिकों ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। उनको हवेली से कोई मतलब नहीं था।
जब भी पत्थर गली में गिरते तो गली से गुजरना मुि कल हो जाता। आखिर थक-हारकर मोहल्लेवासियों ने जमील चाचा से बात की। कुछ मेहनताना देकर जमील चाचा को दायित्व दिया गया कि जब भी हवेली के पत्थर गली में गिरें तो उन्हें हटा दिया जाये।
बस तभी से जमील चाचा की ड्यूटी हवेली में ज्यादा व दुकान में कम हो गयी। कारण साफ था कि हवेली भव्य होते हुए भी पुरानी-जर्जर थी। मामूली-सी हलचल से उसका कोई न कोई हिस्सा गिर ही जाता था। और ऐसा होने पर जमील चाचा का दायित्व आगे आ जाता।
एक दोपहर की बात है। भाालिनी और रागिनी स्कूल से आ रही थी। सुनसान दोपहर में जब वे मुख्य मार्ग छोड़ सुनसान हवेली की गली में मुड़ी तो उनकी नजर जमील चाचा पर पड़ी। जमील चाचा हवेली से निकलकर अपनी दुकान में घुस रहे थे। उनके हाथ में एक कल ानुमा बर्तन था।
जमील चाचा ने दुकान में घुसते वक्त एक बार बाहर झांका। जब भाालिनी और रागिनी को देखा तो सकपका गए। परंतु अगले ही क्षण फुर्ती से दुकान में घुस गये। जब तक दोनों बहिनें दुकान पहुंची तब तक वे दुकान से बाहर आ चुके थे। उनके माथे पर पसीना दमक रहा था तो चेहरे पर बनावटी मुस्कान।
भाालिनी ने जमील चाचा से कल ा के विशय में पूछा तो जमील चाचा सफेद हो गये। बस कुछ नहीं... बस कुछ नहीं.....का ताना जमील चाचा ने बिछाया।
भाालिनी बात को ताड़ गई। उसने कई कहानियों में पढ़ा था कि पुराने लोग धन की सुरक्षा के लिए धन को कल ा में भरकर जमीन में गाड़ देते थे। कल ा गाड़ने वाले की असामयिक मौत से वह धन गड़ा का गड़ा ही रह जाता था। पुरानी हवेलियों में ऐसे गड़े कल ा काफी निकलते हैं।
भाालिनी को जमील चाचा पर भाक हुआ। उसे लगा कि जमील चाचा कुछ छिपा रहे हैं।
भाालिनी ने सोचा कि जमील चाचा को धन का लालच नहीं करना चाहिए। यह धन उनका नहीं है। हवेली मालिकों तक यह धन पहुंचाना चाहिए। परंतु अगले ही क्षण दिमाग में आया कि हवेली मालिकों को जब हवेली से ही कोई मतलब नहीं तो धन पर उनका क्या अधिकार ? उनकी हवेली के कारण पूरा मोहल्ला परे ाान होता रहे तो हो भले, उन्हें कोई मतलब नहीं तो धन उन्हें क्यों दिया जाये ! धन पर तो जमील चाचा का ही अधिकार है जो कि गली-मोहल्ले के लिए पत्थरों को हटाकर आने-जाने का मार्ग बनाते है।
पर नहीं। यह गलत है। उसने घर में व स्कूल में यही जाना था कि जिसकी जो चीज होती है उस पर ही उसका हक होता है। धन से भरा कल ा हवेली मालिकों का है। उस पर अधिकार उनका है। जमील चाचा को मेहनत के बदले मोहल्लेवासी मेहनताना देते हैं। उन्हें इमानदारी से कल ा के विशय में सबको बता देना चाहिए। भाालिनी ऊहापोह की स्थिति से बाहर आई तब तक जमील चाचा दुकान बंद कर जा चुके थे।
भाालिनी ने रागिनी को कुछ समझाया। रागिनी अपना स्कूल बैग भाालिनी को संभला मोहल्ले के अंदर भागी। जबकि भाालिनी जमील चाचा की दुकान की निगरानी में तैनात हो गई।
थोड़े ही समय बाद जमील चाचा की दुकान के आगे मोहल्ले वासियों का हुजूम हो गया। सब 'हवेली में गड़ा धन मिला - हवेली में गड़ा धन मिला` की चर्चा में म ागूल थे।
कोई एक जमील चाचा को घर से बुलाकर ले आया। दुकान खुलवायी गई। तला ाी ली गई। चांदी के रुपयों से भरा कल ा बरामद हो गया। जमील चाचा फक्क थे। उनकी नजरें भाालिनी और रागिनी पर थी। चांदी की चमक से अगर जमील चाचा को कोई दूर कर रहा था तो वे थी- भाालिनी और रागिनी।
मोहल्ले वासियों ने धन के उपयोग के बारे में काफी बातें की। किसी ने कहा कि धन जमील चाचा को मिला है तो धन उन्हें ही देना चाहिए। तो कोई कह रहा था कि धन चूंकि दबा मिला है अत: कानूनन उसे पुलिस को सुपर्द कर देना चाहिए। तो कोई कह रहा कि मोहल्लेवासियों को आपस में धन बांट लेना चाहिए क्योंकि इस हवेली के कारण सारे मोहल्लेवासी ही परे ाान होते हैं।
भाालिनी ने सबकी बातें सुनी तो दंग रह गई। उसने सोचा कि इससे अच्छा तो था कि वह जमील चाचा की हरकत अनदेखी कर देती। बेचारे गरीब जमील चाचा का तो भला होता।
भाालिनी को गम था कि कोई इस धन को उसके असली मालिक तक पहुंचाने की बात क्यों नहीं करता ! आखिर उससे रहा नहीं गया और वह बोल पड़ी -''चांदी से भरे कल ा पर हक हवेली मालिकों का है। उन्हें सूचित करो और कल ा सुर्पद करो।``
भाालिनी की बात पर सब नाराज हुए। यह कैसे हो सकता है भला ! जो मालिक अपनी हवेली को बिसार चुका, उसका धन ! जो मालिक अपनी हवेली से मोहल्लेवासियों को होने वाले परे ाानी का ही ख्याल नहीं करें, उसका धन ! नहीं ऐसा नहीं होगा।
लेकिन भाालिनी अड़ गई। धन पर अधिकार हवेली मालिकों का है। धन उन्हें ही सुर्पद किया जाए। भाालिनी की जिद को देखकर उसके पापा ने भी भाालिनी का साथ देना उचित समझा। आखिर कुछ और लोग सहमत हुए।
फोन से हवेली मालिकों को गड़ा धन मिलने की सूचना मोहल्ले की तरफ से दी गई। उनसे यह भी निवेदन किया गया कि आपकी हवेली में धन मिला है तो निि चत ही यह आपके पुरखों की गाढ़ी कमाई है। अतएवं इस पर आपका अधिकार है।
हवेली मालिक मोहल्लेवासियों की इमानदारी भरी बातों से प्रभावित हुए। उन्होंने फोन पर ही निर्देि ात किया कि यह धन जमील चाचा को दे दिया जाए तथा उन्हें कहा जाए कि इस धन से इमानदारी का कोई काम भाुरू करें और कमाएं-खाएं। हवेली मालिकों ने मोहल्लेवासियों को आ ाान्वित किया कि वे जल्द ही आएंगें और हवेली से होने वाली परे ाानी से मोहल्ले को निजात दिलाएंगें।
फोन पर हवेली मालिकों से की गई बात जब सबके सामने आई तो सब हतप्रभ रह गए। चांदी की चमक से हवेली मालिकों का प्रभावित न होना सबको रास आया। थोड़ी देर पहले हवेली मालिक जो बुरे लग रहे थे; वे अब सबको अच्छे लगने लगे। जमील चाचा भी खु ा थे। भाालिनी और रागिनी भी खु ा थी।
कई दिनों बाद सुनसान हवेली के मालिक आए। उन्होंने हवेली का मुआयना किया। मोहल्लेवासियों से चर्चा की। काफी विचार-विम र्ा के बाद उन्होंने तय किया कि हवेली को समतल किया जाए। इसकी जगह विद्यालय भवन बनाया जाए और सरकार को सौंपा जाए।
हवेली मालिकों की दानवीरता और भाालिनी की समझदारी से सब मोहल्लेवासी प्रसन्न थे। चांदी की चमक से बेहतर भी कोई फैसला होता है; यह उन्होंने जान लिया था।