प्रविष्ठियां

प्रभा खेतान





















प्रभा खेतान का व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व
- कृष्णा जाखड़, चूरू

वंश परम्परा :
राजपूताने (राजस्थान) की जनता पर दोहरा शासन अंग्रेजों के आगमन के साथ शुरू हो गया था। चार वर्गों में बंटी हुई जनता में वैश्यों (खासकर बनियांे) का काम धन कमाना और राजकार्य के लिए धन मुहैया कराना था। धन कमाने बनियें दिसावर जाते और देस में लाकर खर्च करते। ऐसी ही स्थितियों में राजस्थान (तत्कालीन राजपूताना) में चूरू क्षेत्र के सुजानगढ़ कस्बे से एक खेतान परिवार आज से वर्षों पहले रोजी के लिए निकला; जो कलकत्ता जाकर ठहरा। कलकत्ता में ही अपना व्यापार जमाया और वहीं पारिवारिक उन्नति की ओर अग्रसर हुआ।
इसी परिवार के पांच बेटों में से एक श्री लादूरामजी खेतान थे। श्री लादूरामजी बड़े ही नेकदिल इंसान थे। उन्हीं के घर (बालीगंज, कलकत्ता के मकान नं. ७१) में पांचवीं बेटी का आगमन १ नवम्बर, १९४२ ई. को हुआ। यह संतान ही प्रभा खेतान थीं।
उस समय मारवाड़ी परिवार में बेटी होना ही गुनाह था फिर प्रभा तो पांचवीं बेटी थीं। पुराने खयालातों के समृद्ध परिवार में इस प्रतिभा के जन्म लेने पर कोई खुशी नहीं मनाई गई। उल्टे परिवार में निराशा ने स्थान बनाया। और तो और, बच्ची के आगमन के साथ ही मां श्रीमती पूरणीदेवी की बीमारी भी शुरू हो गई। प्रभा को न मां का प्यार मिला और न ही उनके स्तनों का दूध। मां की गोद के लिए तरसती इस बच्ची को दाई मां की गोद में स्नेह मिला और उनके ही स्तनों से दूध भी। प्रभा की मां श्रीमती पूरणीदेवी को यह संतान कभी अच्छी नहीं लगी।
पारिवारिक परिस्थितियां :
प्रभा खेतान का परिवार संकीर्णतावादी हिन्दू सनातनी परिवार था। सन् १९४२ में प्रभा का जन्म हुआ। यह समय महात्मा गांधी के राष्ट्रीय नेतृत्व का समय था। उनका प्रभाव चहुंदिश था। खेतान परिवार भी गांधीजी के विचारों से प्रभावित था। प्रभा के पिताजी तो पूर्णतया गांधीवादी ही थे। प्रभा लिखती हैं - ''बाबूजी अपनी ससुराल राजगड़िया हाउस जीमने गये थे। गांधीजी की आलोचना सुनकर बिना भोजन किए ही उठकर चले आए।`` मारवाड़ी परिवारों में हर समय व्यापार के पहलुओं और सिर्फ पैसे की चर्चा होती रहती थी। ऐसे ही परिवेश में प्रभा का बचपन और किशोरावस्था बीती। प्रभा खुद लिखती हैं- ''हमारे परिवार का परम् सुख था रुपया! अधिक से अधिक रुपया।``
प्रभा के पिताजी जूट के व्यापारी थे। उनकी खुद की जूट मिल थी। सात भाई-बहनों से भरा-पूरा परिवार और अनेक नौकर-चाकर। उन्हीं नौकर-चाकरों में प्रभा की दाई मां भी थी, जिससे प्रभा को ढेर सारा प्यार मिलता। दाई मां के अलावा प्रभा को अपने पिताजी की भी स्नेह दृष्टि मिलती। परंतु अफसोस कि; जब प्रभा मात्र ९ वर्ष की थीं तब एक साजिश के तहत उन्हें मार दिया गया। उस पीड़ा का वर्णन प्रभा करती हैं- ''दूसरे दिन अखबार में सुर्खियां थीं- प्रसिद्ध उद्योगपति लादूराम खेतान की रहस्यमयी मौत। मृत देह सोनागाछी के बाथ हाउस में मिली।`` इस घटना से पारिवारिक परिस्थितियां ही बदल गइंर्।
मारवाड़ी परिवारों में स्त्री शिक्षा को कतई महत्त्व नहीं दिया जाता था। प्रभा को स्कूल भेजने के खिलाफ सर्वप्रथम प्रभा की मां ही खड़ी हुई। लेकिन प्रभा के पिताजी की इच्छा लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलाने की थी। प्रभा उनके शब्दों का स्मरण करते हुए लिखती हैं- ''इन लड़कियों को पढ़ने भेजो, इन्हें मैं ऊंची शिक्षा दिलाना चाहूंगा।`` पिताजी के देहांत के बाद प्रभा के लिए घर असुरक्षित-सा हो गया। और ऐसी ही परिस्थितियों के बीच प्रभा बड़ी हुईं। सगे बड़े भाई के द्वारा शारीरिक शोषण और इन्कार के बाद फीस आदि पर लगी पाबंदी प्रभा के लिए किसी त्रासदी से कम न थी। भाभी और बहनें सिर्फ गहनों-कपड़ों पर ही ध्यान रखती थीं। हां, पिताजी के देहांत के बाद प्रभा ने अपनी अम्मा को सदैव परेशान देखा। उनकी परेशानी का मूल सामाजिक मर्यादा बनाए रखना था।
एक मारवाड़ी परिवार जो अंदर से खोखला होते हुए भी सामाजिक रूप से धनी होने की उद्घोषणा से आक्रांत था। आय का घटता क्रम और व्यय की बढ़ती सीमा। प्रभा के परिवार की पिताजी के देहांत के बाद यही स्थितियां बन गई थीं और प्रभा की मां उन स्थितियों से लोहा ले रही थी।
प्रभा की मां आर्थिक कमजोरी के बाद भी अपने घर की इज्जत को बनाए रखने के लिए दोगला व्यवहार अपनाए रहती थी। पैसा मनुष्य को जहां भौतिक सुख-सुविधाएं देता है वहीं अशांत, भयभीत और तनावग्रस्त रखता है। पैसे वाले बाहर से सुखी नजर आते हैं मगर अंदर से हमेशा आशंकित रहते हैं और यही सब प्रभा के ईद-गिर्द की परिस्थितियां थीं।
बाल्यकाल :
प्रभा के जन्म के बाद उनकी मां बीमार रहने लगी। प्रभा को मां का प्यार नहीं मिला और तभी घर में एक आया को रखा गया। ये प्रभा की दाई मां थीं। इनका प्यार पाकर ही प्रभा का बचपन बीता। सभी भाई-बहन गोरे और सुंदर थे। उनके बीच प्रभा का रंग सांवला था। सांवला रंग होने के कारण वो मां की उपेक्षा का पात्र बनती। प्रभा स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट थीं और यही कारण था कि वह अपनी बहनों से बड़ी लगती।
प्रभा रंगभेद का शिकार रही और अपनी मां का प्यार पाने के लिए तरस जाती थी। प्रभा खुद लिखती हैं- ''अम्मा ने मुझे कभी गोद में लेकर चूमा नहीं। मैं चुपचाप घंटों उनके कमरे के दरवाजे पर खड़ी रहती। शायद अम्मा मुझे भीतर बुला लें। शायद.......... हां, शायद अपनी रजाई मंे सुला लें। मगर नहीं, एक शाश्वत दूरी बनी रही हमेशा हम दोनों के बीच।``
उपेक्षा पाकर बच्चे का आहत मन कुंठित हो अपनी कमियां ढूंढ़ता रहता है।
इतना होते हुए भी प्रभा अपने पिताजी की लाडली बेटी थी। पर, यह दुर्भाग्य जरूर रहा कि उनकी स्नेहिल छाया अल्प समय के लिए थी।
बाल्यकाल की उपेक्षा ने हमेशा प्रभा का पीछा किया। वह लिखती हैं- ''मैं उपेक्षित थी, आत्मसम्मान की कमी ने मेरा जिंदगी भर पीछा किया।``
गलती करने पर बच्चे को डांटा जाए तो वह दुखी नहीं होता लेकिन भाई-बहनों की बजाय उसे उपेक्षित किया जाए तो उसका बालमन टूट जाता है, कल्पनाओं के मोती बिखरने लगते हैं। ऐसी ही एक घटना का प्रभा उल्लेख करती हैं- ''बाबूजी के इतालवी दोस्त ने हम दोनों बहनों को उपहार में दो गुड़ियाएं भेंट कीं, एक बड़ी-सी वॉकी-टॉकी और दूसरी बेबी डॉल जो बोतल से पानी पीते ही सूसू कर देती, जिसे देख हम सब हंसते। हां तो अम्मा ने कहा, 'तुम दोनों बहन मिलकर खेलो।` ........... 'नहीं मुझे नहीं खेलनी गीता की गुड़िया से।` लेकिन गीता क्यों देने लगी अपनी गुड़िया को। दाई मां की गोद में मंुह छुपा के मैं बहुत-बहुत रोई थी।``
भयाक्रांत और नीरस बचपन, उससे भी ज्यादा दुखदायी असमय आती किशोरावस्था। प्रभा के मात्र ९ वर्ष की उम्र में मासिक धर्म शुरू हो गया। बढ़ता हुआ कद और किशोरावस्था के सारे परिवर्तन १० साल की प्रभा में दिखने लगे। प्रभा की मां ऊपर से इसका हरदम आभास कराती रहतीं। प्रकृति की देन का सारा दोष प्रभा पर? प्रभा को प्यार की जगह गालियां मिलतीं। प्रभा लिखती हैं- ''भाटा, पत्थर, बोकी, गधी, भंगन उपाधियों से विभूषित होकर मैं कपड़े बदलने गई।``
मन की बात कोई सुनने वाला न हो तो इंसान अकेला होने लगता है और वह अकेलापन सदा उसका दामन थामे रहता है। ऐसा ही प्रभा के साथ हुआ- ''मेरे साथ मेरा अकेलापन हमेशा रहा है।`` दूसरी जगह- ''रेलिंग पर बैठी गौरेया से मैं न जाने क्या-क्या बात किए जा रही थी।`` चाहे कुछ भी हो मगर एक आश्रय ईश्वर सबको प्रदान करता है। प्रभा को भी उनके ईश ने दाई मां के रूप में आश्रय बख्सा था। उनके बालमन को पूर्णत: संतुष्ट करने का प्रयास दाई मां करती थी। प्रभा भी दाई मां को ही अपना संरक्षक मानती थी। दाई मां के बिना वह अपने-आप को असहाय मानती। एक जगह लिखती हैं- ''मुझे मालूम नहीं कि अब क्या करना चाहिए। दाई मां दिखलाई नहीं देती। मैं कितनी असहाय हूं, दाई मां के अलावा मेरा कोई नहीं।``
दूसरी जगह लिखती हैं- ''दाई मां मेरा सहारा, मेरा आश्रय थी। अम्मा के क्रोध, भाई बहनों का तूफानी वेग, गरजते बादल, कड़कती बिजलियां, दाई मां इन सबसे मुझे बचाकर रखती।``
शिक्षा-दीक्षा :
प्रभा की स्कूली शिक्षा कलकत्ता के 'बालीगंज शिक्षा सदन` में पूरी हुई। सुप्रसिद्ध साहित्यकार मन्नू भंडारी के सान्निध्य में चौथी से ग्यारहवींं कक्षा तक की पढ़ाई प्रभा ने वहां से पूरी की। बालीगंज शिक्षा सदन के अलावा अपनी आत्मकथा में प्रभा एक और स्कूल का जिक्र करती हैं- ''अम्मा ने गोखले मेमोरियल कॉन्वेंट स्कूल से गीता और मेरा नाम कटा दिया, 'घर बैठो, राई-जीरा चुनो, सिलाई-कढ़ाई करो`।``
जिस प्रकार प्रभा का बचपन कठिनाइयों से भरा था, वैसे ही इनकी शिक्षा की सीढ़ियां भी हिचकोले देती हुई आगे बढ़ने दे रही थीं। प्रभा की परेशानियां हमेशा उनके साथ चलती रहीं। स्कूल के समय पर वह तैयार नहीं हो पातीं और स्कूल बस चली जाती। दाई मां के अनुनय-विनय पर स्कूल भेजा जाता। पढ़ने में प्रभा तेज थीं। 'टॉप थ्री` में रहने वाली प्रभा ने जैसे-तैसे अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की।
प्रभा को शिक्षक हमेशा अच्छे मिले, वे हमेशा आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। अन्त:ज्ञान को जागृत करने वाले शिक्षकों ने हमेशा उन्हें उत्साहित किया।
ग्यारहवीं का रिजल्ट आने के बाद प्रभा से पूछा गया, आगे क्या पढ़ोगी? तब प्रभा का जवाब था, 'प्रेसिडेंसी कॉलेज में दर्शन।` परंतु इस इच्छा का सम्मान नहीं हुआ। चाहे हो न हो पर प्रभा ने मजबूत इरादों के कारण प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। कॉलेज के प्रथम दिन एक प्रोफेसर ने छात्रों को संबोधित करते हुए जो कहा उसका उल्लेख प्रभा करती हैं- ''इस क्लास में कभी नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी पढ़ा करते थे। तुम लोग उस परम्परा की अगली कड़ी हो।``
कॉलेज में आने के बाद प्रभा की समझ विकसित होती जा रही थी। घर में अपनी अम्मा, भाभी और बड़ी बहनों का सा जीवन उन्हें अस्वीकार होता जा रहा था। उनके सामने पूरी दुनियां थी और ढेर सारी किताबें। एक तरफ कम्युनिष्टों की राजनीति और देश में साम्यवाद लाने का दावा तो दूसरी तरफ बाजारवाद का हावी होना, प्रभा को ये सब सोचने के लिए मजबूर कर देते।
बंगाल की राजनीति गर्म पड़ती जा रही थी और प्रभा की कॉलेज शिक्षा पूरी होती जा रही थी। सन् १९६५ में प्रभा का एम.ए. फाइनल और साथ ही लॉ इंटरमीडियेड भी हो गया।
अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति और शिक्षकों के प्रोत्साहन ने प्रभा की पाठन अभिवृत्ति को विकसित किया। दर्शन की पुस्तकों को पढ़ते हुए उनमें छिपे गूढ़पन की असमझ ने प्रभा को उद्वेलित किया और अपनी जिज्ञासा अपने गुरु के सामने प्रकट करने पर विवश किया। गुरु ने जो मार्गदर्शन किया, प्रभा के शब्दों में- ''नहीं, भारतीय दर्शन को जरूर पढ़ो, बार-बार पढ़ो। अर्थों की पर्त-दर-पर्त खुलती चली जाएगी। हां, तुम्हारे अंदर तीन बातों का होना जरूरी है- अभीप्सा, जिज्ञासा और संकल्प। और फिर बार-बार दोहराते रहने का अभ्यास।``
इसके बाद प्रभा की दर्शन में बढ़ती रुचि ने उनसे दर्शन का गहन अध्ययन करवाया। आगे चलकर इसी विषय में उन्होंने पी-एच.डी. की। 'ज्यां पॉल सार्त्र का अस्तित्ववाद` पी-एच.डी. का विषय था। शोध के दौरान प्रभा ने बड़ी गहनता से अध्ययन किया।
आगे चलकर लायन्स क्लब के 'यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम` के तहत प्रभा ने अमेरिका के लॉस एंजेल्स से ब्यूटी थैरॉपी कोर्स में डिप्लोमा भी लिया।
साहित्यिक अभिरुचि :
साहित्य हमेशा प्रकृति से सामीप्य चाहता है। प्रकृति मन के कोमल भावों के संपर्क मंे आकर मन को उद्वेलित करती है और मन एक रचना-संसार बसाता है, उसमें से साहित्यकार की बुद्धि खिले हुए पुष्प लेकर एक छोटा-सा रचनात्मक घर सजाती है।
प्रभा को बचपन से ही प्रकृति के प्रति मोह था या बचपन की परिस्थितियों ने उनको प्रकृति के इतने करीब ला दिया था कि घंटों अकेली बैठी वह काल्पनिक जगत में विचरती, कभी चिड़िया से बतलाती तो कभी घंटों गंगा की लहरों को निहारती हुई उसमें कुछ खोजा करती। खुले गगन में उड़ते पाखी उनके मन को खींचते तो कभी पेड़-पौधे भी उनसे कुछ कहते। इस नन्हीं-सी बच्ची को लगता मानो ये हवा, बहता पानी, उड़ते पक्षी, हिलती हुई पेड़ों की पत्तियां और सामने बैठी चिड़िया उससे कुछ कह रही है। और प्रभा उसको लिखने के प्रति लालायित हो उठती।
बालीगंज शिक्षा सदन में पढ़ते समय ही प्रभा ने कविताएं लिखनी शुरू कीं। उनकी सबसे पहली कविता दैनिक 'सुप्रभात` में छपी, तब वे सातवीं कक्षा में थीं। उनका बालमन लिखने लगा और तब से वे लगातार लिखती रहीं।
प्रेरणा-स्रोत :
अंतर्मन में छुपे ज्ञान के अकूत भंडार को जागृत करने के लिए बाह्य उद्दीपक की आवश्यकता होती है। वही उद्दीपक प्रेरित करता है और क्रियान्विति की ओर बढ़ाता है। प्रभा को प्रेरित किया प्रकृति ने, कभी शिक्षकों ने तो कभी आत्मीयजनों ने। समकालीन परिस्थितियों से उद्वेलित होकर भी प्रभा ने लिखा। सुविख्यात साहित्यकार मन्नू भंडारी के पास ७-८ वर्षों तक अध्ययन करने के कारण प्रभा पर उनका भी असर था। प्रभा ने उन्हीं के चरण-चिह्उाों पर चलना चाहा। प्रभा लिखती हैं- ''मन्नू भंडारी, जिन्होंने मुझे चौथी से ग्यारहवीं तक पढ़ाया, साहित्य की दुनिया में जिनके कदमों की छाप पर मैंने चलना चाहा।``
विद्यालय से निकलकर जब प्रभा ने महाविद्यालय में शिक्षार्थ प्रवेश किया तो वहां के योग्य शिक्षकों से भी प्रेरणा मिली। दर्शन के अध्ययन ने प्रभा के चिंतन को और अधिक जागृत किया, अस्तित्व ने तो झकझोर कर ही रख दिया और इसी का परिणाम उनकी सार्त्र पर पी-एच. डी. है।
प्रभा ने जितना अध्ययन किया वह गहनता से किया। इससे उनका चिंतन उभरा और बौद्धिक धरातल फौलाद-सा हो गया।
बचपन से असमानताओं को झेलती आई प्रभा ने समाज की तरफ देखा तो वहां नारी का स्थान दोयम दर्जे पर नजर आया। अमीरों के घर नारी गहनों से लदी एक कठपुतली-सी दिखी। एक तरफ नारी घर की चारदीवारी में कैद थी तो दूसरी तरफ मजदूर वर्ग में पूरे दिन काम करके भी पुरुष से आधी मजदूरी पाने वाले जीवन-संघर्ष में पिस रही थी। इन सब वजहों से प्रभा में नारीवादी सोच मजबूत हुआ और जब वह कागजों पर उतरा तो साहित्य में वे नारीवादी चिंतक के रूप में पहचानी गईं।
बंगाल की राजनीतिक उथल-पुथल ने भी प्रभा के चिंतन को जगाया। मार्क्स जैसे विचारक को पढ़ने के लिए उकसाया। प्रभा ने जितना भारतीय साहित्य का अध्ययन किया उतना ही विदेशी साहित्य को भी पढ़ा। प्रभा को बार-बार विदेश जाने का मौका मिला तो उन्होंने वहां के समाज को करीब से महसूस करने का प्रयास किया। उन्होंने देखा कि व्यक्ति सिर्फ वस्तु बनता जा रहा था। आर्थिक मजबूती की दौड़ में व्यक्ति अपने मानवीय धरातल से उखड़ता जा रहा था।
इस भौतिक अंधानुकरण ने प्रभा को अंदर तक हिला दिया और उनके उद्वेलित हृद्य ने शब्दों को जन्म दिया जो कलम से झरने लगे।
व्यापारिक जगत ने भी प्रभा को ऐसे अनुभव दिए जो प्रभा के प्रेरणा-स्रोत बन गए। चमड़े की बनी वस्तुओं से छोटा-सा व्यापार शुरू करके प्रभा ने समय के साथ बड़ा व्यावसायिक साम्राज्य स्थापित किया। इस दौरान प्रभा ने जितनी समस्याओं का सामना किया, जितनी ठोकरें खाइंर् उतनी ही प्रभा मजबूत होती गईं। मानसिक मजबूती के साथ उनका चिंतन भी मजबूत हुआ और इसी चिंतन ने व्यापारिक अनुभवों को लिखवाया।
प्रभा की आंतरिक और बाह्य प्रेरणा रूपी बीज का ही परिणाम उनका श्रेष्ठ साहित्य रूपी फल है, जो हिन्दी साहित्य जगत् में अपना अहम् स्थान रखता है। उनकी अंत:प्रेरणा नहीं जागती तो वे किसी धनी पुरुष की पत्नी होती और गहनों से लदी, बच्चों से घिरी हुई किसी घुटन भरी चारदीवारी में होती। प्रभा आत्म-प्रेरणा के साथ-साथ बाह्य प्रेरणा से आलोडित हुई और उसके अनुसार चली। उसी के कारण प्रभा ने न केवल एक पूर्ण नारी, बल्कि एक संस्था का रूप लिए जिंदादिली से जीवन जीया।
व्यावसायिक अभिरुचि :
प्रभा का जन्म व्यावसायिक मारवाड़ी घराने में हुआ। उन्होंने घर में व्यापार की बातें सुनीं। प्रसिद्ध उद्योगपति श्री लादूरामजी खेतान के व्यापारी दोस्त, व्यापारी रिश्तेदार और ईद-गिर्द पूर्णतया व्यापारिक वातावरण था। इसी वातावरण में प्रभा ने अपना बचपन जीया। जैसे-जैसे वे बड़ी हो रही थीं, अपने भाइयों की व्यापारिक बुद्धि को देखती जा रही थीं। उनकी रगों में भी व्यापारिक वंश का खून दौड़ रहा था। विषम परिस्थितियों को सहते-सहते प्रभा अंदर से मजबूत होने के साथ-साथ सबसे अलग अपना अस्तित्व बनाने का मंसूबा भी मन में पाल रही थीं। समाज में अपना अस्तित्व स्थापित करने की ललक और मारवाड़ी समाज को यह दिखाने का संकल्प कि औरत भी व्यापार कर सकती है, पैसे कमा सकती है। बस यही वजह रही, जिसने प्रभा में व्यावसायिक हौड़ पैदा की।
आर्थिक समस्याओं का सामना तो प्रभा को विद्यार्थी जीवन से ही करना पड़ रहा था। पितृसत्तात्मक समाज में पिताजी के देहांत के बाद घर के मालिकाना अधिकार प्रभा के बड़े भाई के पास चले गये। प्रभा ने अपने ऊपर जब भाई की मनमानी बेजा हरकत को नहीं चलने दिया तो भाई ने कॉलेज फीस के लिए मना कर दिया। प्रभा खुद लिखती हैं- ''एम.ए. की परीक्षा की फीस के पैसे भी इस बड़े घर की बेटी ने अपनी सहेली से उधार लिये थे। क्योंकि अम्मा का कहना था कि अब वे मेरी पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। 'हर महीने तेरी पढ़ाई के पैसे कहां से लाऊं? धन्नू (बड़े भैया) पैसे देना नहीं चाहता।` ......`` और धन्नू पैसे क्यों नहीं देना चाहता, यह सिर्फ प्रभा जानती थीं या फिर दाई मां। लेकिन शोषण के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत प्रभा में अब तक समावेशित हो चुकी थीं।
प्रभा ने ऐसी ही परिस्थितियों के बीच एक बड़ा साहसिक निर्णय लिया कि वह शादी नहीं करेंगी। प्रभा को इस फैसले की पूर्णता के लिए भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना पहली जरूरत थीं।
प्रभा ने नारी की पीड़ाओं को जितना अपनी मां के जीवन से ग्रहण किया उतना तो शायद पुस्तकों से भी नहीं। प्रभा एक रूप में मां के कष्ट भरे जीवन के कारण ही पुस्तकों की ओर आकृष्ट हुईं। अमीर घर में रहकर भी प्रभा की मां कभी संतुष्ट नहीं थी। उन्हें पैसे के लिए पहले अपने पति यानि प्रभा के पिताजी लादूराम से और उसके बाद अपने ही बेटे धन्नाराम से याचना करनी पड़ती थी। औरत का स्वाभिमान तार-तार होता। क्यों? जिस बेटे का पृथ्वी पर आना मां के बिना असम्भव होता है वही मां पर मालिकाना हक रखता है। वह मां के हाथ पर पैसे रखते हुए अहसान जताना नहीं भूलता। ये पीड़ाएं प्रभा ने बड़ी नजदीकी से देखी। सिर्फ मां ही नहीं भाभी-बहनों को भी प्रभा ने इन स्थितियों से गुजरते देखा। प्रभा की मां कई बार कह भी देती थी कि तुम सशक्त बनो। प्रभा लिखती हैं- ''किसी भी पढ़ी-लिखी स्वावलम्बी स्त्री को देखती तो अम्मा यही कहा करतीं, 'तुम लोग जरूर रुपया कमाना, अपने पैरों पर खड़ी होना` ......।`` प्रभा जिस समाज में जन्मी उसमें स्त्री वस्तु मात्र थी। देखने में वो गहने और मंहगें कपड़ों से सजी-धजी खुश नजर आती मगर नजदीक होने पर पता चलता कि वह चारदीवारी के बीच घूंघट में सिमटी मूरत है। उसकी ये स्थिति शिक्षा के अभाव और आत्मनिर्भरता की कमी के कारण थी। बस प्रभा ने मन में ठान लिया कि उसे ऐसी घुटन भरी जिंदगी नहीं चाहिए।
कई बार मन बुद्धि पर हावी हो जाता है और मन के बस में होकर मनुष्य बड़ा फैसला ले लेता है। वही प्रभा के साथ हुआ। मन के झुकाव के कारण प्रभा डॉ. सर्राफ के बंधन में बंध गई और हमेशा बंधी रहीं। उन्हीं की सलाह से प्रभा अमेरिका गईं। अमेरिका में प्रभा ने महसूस किया कि वहां के अमीर लोग भारतीय गरीबी को कैसे दया की दृष्टि से और गरीब बना देते हैं। वहां मिले कष्टों ने भी प्रभा को पैसे कमाने के लिए उकसाया। प्रभा लिखती हैं- ''मिसेज डी की तरह मेरा भी ऑफिस होगा, ढेरों पैसे कमाऊंगी।``
प्रभा पढ़ने में होशियार थीं। उसके शिक्षक चाहते थे कि अन्य मारवाड़ी लड़कियों की तरह प्रभा घर नहीं बैठे। अमेरिका जाने से पहले जब वो अपनी स्कूल की अध्यापिका से मिली और अपनी मंशा बताई तो उन्होंने प्रभा को आगे बढ़कर विद्वता प्राप्त करने की सलाह दी। प्रभा का उस वक्त जवाब था कि मेरे समाज में व्यक्ति की विद्वता को महत्व नहीं दिया जाता बल्कि वहां उसे पैसे से तोला जाता है। प्रभा अपनी अध्यापिका से कहती हैं- ''नहीं मेरी लड़ाई अपने ही समाज से चलेगी। आप नहीं जानती बहनजी, औरत की सारी स्वतंत्रता उसके पर्स में निहित है।``
जब अमेरिका में प्रभा ने आत्मनिर्भर स्त्री को देखा तो उसका मन भी कहता कि मुझे भी आर्थिक रूप से मजबूत होना है। अपनी ही जमीन पर मुझे स्वाभिमान से जीना है। वो लिखती हैं- ''आर्थिक स्वतंत्रता मेरी पहली जरूरत है। कलकत्ता लौटकर अपने पैरों पर मुझे आत्मनिर्भर होना होगा।``
जहां भी आर्थिक समस्या प्रभा के रास्तों को रोकना चाहती वहां पैसे कमाने का इरादा और दृढ़ हो जाता। हर जगह आर्थिक समस्या प्रभा के सामने आई, चाहे देश में पढ़ाई का वक्त हो या फिर विदेश मेंं रहने का समय। इन अवसरों ने ही आर्थिक महत्वाकांक्षा के बीज उनके मन में रोप दिया। आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रभा ने डाक्टर के यहां मात्र ३०० रुपये माहवार की नौकरी से सफर शुरू किया और समय के साथ अपने व्यापारिक साम्राज्य को अरबों तक पहुंचाया।
प्रभा ने सपने देखे और उनको पूरा करने का हौंसला रखा। प्रभा आत्मकथा में लिखती हैं- ''अम्मा कहा करतीं ..... 'चांद को छूने की कल्पना करो तो खजूर के पेड़ तक पहुंचोगे। अरे तुम्हारी चाहना ही सीमित रहेगी तो आगे कैसे बढ़ोगे?`` प्रभा अर्थ के खजूर तक नहीं रही, उसने अर्थ के चांद की प्राप्ति कीं।
सफलताओं के शिखर पर :
कहते हैं कि हिम्मत की कीमत होती है। प्रभा के जीवन को जानने के बाद यह सिद्ध हो जाता है। सच भी है। बचपन में प्यार को तरसती बच्ची, अपने ही घर में असुरक्षित किशोरी, बंगाली सहपाठियों से अपने समाज मारवाड़ियों को लुटेरे कहते हुए लगातार ताने सुनती छात्रा, समाज में स्वयं के अस्तित्व के लिए संघर्षरत कुंवारी लड़की और सफलताओं की बुलन्दियों पर प्रभा खेतान।
नदी की धारा के साथ बहने वाले जीवन को आसानी से जी लेते हैं मगर धारा के विपरीत बहने वालों को संकटों का सामना करना पड़ता है। साहस के कारण वे धारा को अपने मनवाकिफ मोड़ लेते हैं मगर वे धारा के साथ बहने की आदत वालों के दिल का नासूर बन जाते हैं। प्रभा ने मारवाड़ी समाज की रूढ़ियों पर से परदा उठाया और कुंठाओं से घिरी मारवाड़ी स्त्री को एक राह दिखाई। नारी की क्षमता को समाज के सामने उदाहरण के रूप में रखा। प्रभा की सफलता की कहानी उनका आत्मकथ्य बयान करता है- ''मैंने अपने-आप को बचाया है, अपने मूल्यों को जीवन में संजोया। हां, टूटी हूं, बार-बार टूटी हूं,..... पर कहीं तो चोट के निशान नहीं..... दुनियां के पैरों तले रौंदी गई, पर मैं मिट्टी के लोंदे में परिवर्तित नहीं हो पाई। इस उम्र में भी एक पूरी-की-पूरी साबुत औरत हूं, जो जिंदगी को झेल नहीं रही बल्कि हंसते हुए जी रही है, जिसे अपनी उपलब्धियों पर नाज है। दोस्ती का हाथ बढ़ाकर जिसकी गर्म हथेलियां हर किसी को अपने करीब खींच लेती हैं।``
साहित्याकाश की अनंत राहों पर :
जीवन की राहों पर कांटों-फूलों को समान रूप से लेते हुए इंसान जब संघर्षों को पार कर अपनी मंजिल तक पहुंचता है, तब लोग कहते हैं कि उसने सफलताओं की बुलदिंयों को छू लिया है।
सातवीं कक्षा में पढ़ते वक्त लिखी कविता जो 'सुप्रभात` में छपी, इस कविता से शुरू हुई प्रभा की साहित्य साधना अनवरत रूप से अंत तक चलती रही।
प्रभा खेतान के लेखन का दौर शुरू हुआ कविताओं से और फिर उपन्यास, अनुवाद के साथ-साथ चिंतनपरक साहित्य तक पहुंचा; जो पाठक को झकझोर कर रख देता है। जब उनके साहित्य भण्डार को देखते हैं तो इतना बड़ा व्यापार चलाने वाली प्रभा की बात झूठी-सी लगती है और जब इतना विस्तृत व्यापार देखते हैं तो ये साहित्य भण्डार झूठा-सा लगता है। दोनों कार्य एक साथ कैसे हो सकते हैं? इतना बड़ा व्यापार, देश-विदेश का भ्रमण, इनके बीच कब लिख पाती होंगी प्रभा? लेकिन यह सच है और प्रभा ने लिखा, बड़ी संजीदगी से लिखा। व्यापार की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच लिखा है। प्रभा कहती हैं- ''मैं तो हमेशा लिखती रही हूं। दौड़ते-भागते, दतर की भीड़ में, तो कभी अकेली शामों को, अकेली रातों को। सारी सामाजिकता, मौज-शौक से कट कर।`` जितना विस्तृत दायरा होगा उतना ही व्यापक सोच होगा। यही कारण है कि प्रभा का सम्पूर्ण साहित्य चिंतन प्रधान है। रचना कौशल की नवीनता है। कथ्य की मजबूताई है। और बस यही कारण है कि प्रभा इतना लिख पाईं।
प्रभा के जीवन के स्व-अनुभवों की झलक सभी रचनाओं में मिलती हैं। प्रभा ने भारतीय तथा विदेशी समाज की संरचना को नजदीक से समझा। खासकर भारतीय समाज को देखते, समझते हुए उसमें अपने वजूद को पुख्ता करने का प्रयास किया। समाज की दोगली नीति; जो नारी को जकड़े हुए थीं, प्रभा ने उस नीति को नकार दिया और पुरुष के बराबर अपना अस्तित्व स्वीकार करवाया। प्रभा जब विदेशों में गई तो देखा कि न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी सामाजिक व्यवस्था पुरुषों द्वारा ही बनाई हुई है और बड़ी जटिल है। नारी का स्थान विदेशों में भी कमजोर नजर आया। वहां भीड़ में भी मनुष्य अपने-आपको अकेला पा रहा था। लोगों के बनावटी चेहरे भी खूब देखने को मिले।
प्रभा ने कलकत्ता में 'फिगरेट` नाम से हैल्थ क्लब खोला और इसमें स्त्री को अपने शरीर के प्रति असंतुष्ट पाया। सभी अपने शरीर को उसी सांचें में ढालने के लिए भाग रही थीं जो एक पुरुष चाहता है। व्यापारिक संसार को प्रभा ने नजदीक से देखा, उसे जीया और खूब सावधानी से संवारा।
व्यापार जो कि तार पर साईकिल चलाने जैसा होता है, थोड़ी-सी चूक हुई कि सीधे नीचे। कारीगर, मजदूर और अन्य कर्मचारी! कैसे इन सबमें सांमजस्य बैठाया जाए और विदेशी व्यापारी जो वस्तुएं आयात करते हैं, कैसे मिनटों में ही बदल जाएं; पता ही नहीं चलता। इन सबके माध्यम से जो अनुभव प्रभा को हुए वे सब ही उनके साहित्य में मिलते हैं। इसके अलावा व्यक्तिगत जीवन में होने वाले खट्टे-मिट्ठे अनुभव भी उनके साहित्य में कांटों और फूलों की तरह बिखरे पड़ें हैं।
साहित्य की अनंत राहें हैं। अनंत विधाएं हैं। किसी एक विषय को लेकर लिखते जाना कुछ सहूलियत भरा हो सकता है, मगर विविध विषयों पर कलम चलाना दुष्कर होता है। यही स्थित विधाओं की होती है।
प्रभा खेतान ने न केवल मन के भावों को व्यक्त करने के लिए लिखा बल्कि विविध विषयों पर उनका चिंतन, शोध दृष्टि, विवेचनात्मक बौद्धिकता और अनुवाद के लिए चुनी गई पुस्तकें साहित्य में उनको उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, अनुवाद, आत्मकथा, चिंतनपरक व शोध साहित्य सभी विधाओं में कलम चलाना प्रभा की योग्यता रही।
'अपरिचित उजाले` से शुरू हुए लेखन के सफर में इनकी आत्मकथा 'अन्या से अनन्या` तक आते-आते पूर्ण प्रौढ़ता नजर आने लगती है। प्रभा की कविताओं में भले ही स्व सिमटा हुआ हो परंतु स्त्री की संवेदनशीलता और सशक्त स्वरूप की झलक स्पष्ट दिखलाई पड़ती है। उपन्यासों में सामाजिक परिवेश, रूढ़ियों, विकृतियांे के साथ-साथ व्यापारिक संघर्ष और व्यवसाय जगत की वास्तविकताओं पर से पर्दा उठता हुआ लगता है। मजदूर-मालिक का रिश्ता, मजदूर-मजदूर का रिश्ता, व्यवसायी-व्यवसायी का रिश्ता और व्यापारिक घरानों में रचे जाते षड्यंत्रों का खुलासा पर्त-दर-पर्त होता हुआ देखा जा सकता है। इसके अलावा प्रभा खेतान के संपूर्ण साहित्य में मजबूती से उभरा हुआ मुद्दा है- नारी की सार्वभौमिक दशा। कविता, उपन्यास, चिंतनपरक साहित्य और अनुवाद में हर जगह स्त्री की पैरवी करती हुई प्रभा मौजूद हैं। दमित-शोषित और पुरुष के प्रेमजाल में टूटती हुई नारी किस प्रकार इस दुनियां से लड़ती है और किस प्रकार कभी-कभी घुटने टेक देती है। यह सबकुछ भी है।
उपन्यास 'आओ पेपे घर चलें` में तो महान सम्पन्न राष्ट्र समझे जाने वाले अमेरिका जैसे देश में भी नारी की दुर्दशा दिखाई गई। तुलनात्मक स्वरूप में भारतीय उपमहाद्वीप की स्थिति में वहां की स्थिति किसी भी ढंग से भिन्न नजर नहीं आती है, व्यक्त है। नारी सभी जगह शोषित है। उपन्यास की एक पात्र स्त्री के लिए कहती है कि स्त्री को इंसान बनने के लिए अपने अधिकारों को समझना होगा। वह कहती है- ''प्रभा, औरत अभी मनुष्य की श्रेणी में नहीं गिनी जाती और तुम अमीर-गरीब का सवाल उठा रही हो? राष्ट्र का भेद समझा रही हो? माई स्वीट हार्ट! हम सब अर्ध-मानव हैं। पहले व्यक्ति तो बनो, उसके बाद बात करना।`` प्रभा की शोधदृष्टि न केवल उनके पी-एच. डी. के शोध प्रबंध 'सार्त्र का अस्तित्ववाद` तक सिमट कर रह गई बल्कि 'शब्दों का मसीहा सार्त्र` और 'अल्बेयर कामू : वह पहला आदमी` में और निखर कर सामने आई। सतत् अध्ययन ही लेखकीय क्षमताओं को बनाए रखता है। कोई सोचे मुझे लिखना है, तब वह लिख नहीं पाता। जो बात मन को सालती है, चैन से जीने नहीं देती, रात-दिन, सोते-उठते-बैठते दिल और दिमाग पर हावी रहती है, लिखने को मजबूर कर देती है; तब कलम चलती है और जो परिणाम आता है वो संतुष्ट करने वाला होता है। कॉलेज शिक्षा से पीछा करता हुआ सार्त्र भी प्रभा को उद्वेलित किए हुए था और उसी का परिणाम इन शोध रचनाआंे में आया।
नोबल पुरस्कार से नवाजी गई फ्रांस की प्रसिद्ध लेखिका सीमोन द बोउवार की ख्याति प्राप्त कृति 'द सेकिण्ड सेक्स` का 'स्त्री उपेक्षिता` के नाम से हिन्दी अनुवाद प्रभा की एक उपलब्धि रही। एक सामान्य स्त्री जो हिन्दी तक सीमित है, उस तक नींद से जगा देने की क्षमता रखने वाली यह पुस्तक पहुंच सकी। प्रभा ने नारी विमर्श के पैरोकार के रूप में यह बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
दक्षिण अफ्रीका की कुछ कविताओं का अनुवाद 'सांकलों में कैद क्षितिज` नाम से प्रभा ने किया। दक्षिण अफ्रीका का शोषण और स्वतंत्रता की लड़ाई को समझने के लिए यह एक सहायक पुस्तक मानी जा सकती है।
'उपनिवेश में स्त्री` के प्रकाशन तक आते-आते प्रभा का चिंतन प्रखर हो गया। वे बेहिचक स्त्री की स्थितियों को दर्शाने लगीं। 'बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ` के जरिये तो स्त्री समाज में चेतना-सी पैदा करती दिखीं। स्त्री पूर्ण मानव है, वो संसार की आधी आबादी है फिर क्यों हर विकास में, हर परिवर्तन में पीछे खड़ी नजर आती है? मानो इन सबका प्रभाव स्त्री को प्रभावित कर ही नहीं पाता। वो क्यों इतनी अचेतन है? जकड़ी हुई क्यों रहती है? और इनका उत्तर खोजती हुई प्रभा साहित्य में मौजूद मिलती हैं। नारी को झकझोर कर जगाती हुई प्रभा मिलती हैं। चिंतन में उभरती हुई स्त्री को देखें तो प्रभा के विचारों में एक क्रांति की पहल है।
कदम-दर-कदम प्रभा ने अपने अनुभव संसार से साहित्य सृजन किया है और नारी की पीड़ा को केन्द्र में रखकर एक नव्य आयाम स्थापित किया। साहित्य-सीढ़ी के पहले पायदान पर सावधानी से कदम रखने वाली प्रभा की यह जागरूकता और योग्यता रही कि वह आज साहित्याकाश की अनंत राहों पर देदिप्यमान हंै।
व्यावसायिक जगत की रपटीली राहों पर :
बच्चा खड़ा होने के बाद जब पहला कदम बढ़ाता है तो उसको आत्मबल मिलता है और लड़खड़ाते हुए एक के बाद एक कदम बढ़ाते हुए वह चलना सीख जाता है।
आत्मनिर्भर बनने का सपना पाले हुए प्रभा ने भी आर्थिक जगत में लड़खड़ाते हुए प्रथम कदम एक डॉक्टर के चेम्बर में सेक्रटरी का काम मात्र ३०० रुपये माहवार में संभालते हुए रखा। इसके बाद प्रभा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और कदम-दर-कदम आगे बढ़ती रही। आर्थिक जगत की ऊंचाईयों को छूने के बाद भी उन्होंने आराम करके नहीं देखा, बस कर्म करना ही उन्होंने अपना धर्म स्वीकारा।
डॉक्टर के चेम्बर में काम करती हुई प्रभा अपने भविष्य के सपने पाल रही थीं। उसे पता था ये उसकी मंजिल नहीं, उसे आगे बढ़ना है। मारवाड़ी समाज को दिखाना है कि औरत भी आत्मनिर्भर बन सकती है। घर वालों की इच्छानुसार प्रभा को एक खूंटे से बंधकर रह जाना स्वीकार नहीं था। यही एक ऐसा मोड़ प्रभा के जीवन में आता है जो उनकी दिशा को दृष्टि देता है। प्रभा को अमेरिका जाने का मौका मिलता है और सन् १९६६ में प्रथम विदेश यात्रा करती हैं। वहां कैलिफोर्निया बेवरली हिल हेल्थ क्लब से 'ब्यूटी थेरापी` में डिप्लोमा करती हैं। इसी डिप्लोमा के दौरान उनको वहां अनेक नए अनुभवों से भी गुजरना पड़ा। माना वे एक धनी परिवार से संबंध रखती थीं, लेकिन वहां उन्हांेने कई समस्याओं का सामना किया। लोहा अग्नि में तपकर अनेक प्रकार के सुंदर और मजबूत आकार ग्रहण करता है, बस प्रभा के व्यक्तित्व में भी नई समस्याओं से निखार आता जा रहा था। अब उनके सपने और ऊंची उड़ान भर रहे थे। वहां ऑफिसों के वैभव को देखकर प्रभा का मन करता कि एक दिन मेरा भी ऐसा ही ऑफिस होगा, मैं भी वैभव से जीवन जी सकूंगीं। आइलिन जैसी औरत ने शायद प्रभा की आंकाक्षाओं को और ऊंचा उठने में सहारा दिया। प्रभा आइलिन द्वारा कही गई बात लिखती हैं- ''डिप्लोमा लेकर तुम्हें अपने देश जाना है। पौधा अपनी जमीन पर उगता है।``
अमेरिका से लौटने के बाद फिगरेट नाम से हेल्थ क्लब खोलने की कहानी प्रभा के शब्दों में- ''अमेरिका की पहली यात्रा से लौटकर मैंने फिगरेट नाम से हेल्थ क्लब खोला था। लोगों का मुझसे पहला सवाल था- भला पैसे देकर कोई दुबला होना चाहेगा? मुझे लगा यदि अमेरिकी स्त्रियां अंग सौष्ठव चाहती हैं तो भारतीय स्त्रियां क्यों नहीं चाहेंगी? ....... सन् १९७०, इसी हेल्थ क्लब से मुझे पच्चीस से तीस हजार रुपये महीने की आय हो जाती थी। अपने आप में यह एक बड़ी आर्थिक उपलब्धि थी।``
उपलब्धि चाहे छोटी हो चाहे बड़ी लेकिन हर उपलब्धि के बाद आत्मबल मजबूत होता है और मन कहता है कि एक कदम और बढ़ायो। बस, ऐसे ही चलता जाता है इंसान अपनी कामयाबियों का रसास्वादन करते हुए आगे और आगे। संतुष्ट होना जिसने सीख लिया उसका जीवन एक पड़ाव पर आकर ठहर-सा जाता है। नदी जमीन के एक टुकड़े से संतुष्ट नहीं होती इसीलिए वह बढ़ती जाती है, अनेक पड़ाव पार कर पर्वत से रेगिस्तान तक।
अर्थ की स्वतंत्रता के साथ-साथ प्रभा के व्यक्तिगत जीवन में उलझने बढ़ती जा रही थीं। परंतु प्रभा उलझनों के बीच भी एक सुंदर भविष्य देख रही थीं। प्रभा लिखती हैं- ''तमाम उलझनों के बीच मैंने एक बेहतर भविष्य का सपना देखना नहीं छोड़ा।``
प्रभा एक कमजोर स्त्री बनकर नहीं जीना चाहती। आत्मकथा में लिखती हैं- ''मैं एक सपना देख रही थी। उस सपने में मैं एक सबल और सशक्त महिला थी। इस समाज में मेरी भी एक ऊंची हैसियत थी। लेकिन यह सपना सच कैसे हो?``
व्यक्तिगत उलझनों से निकलना, आत्मनिर्भर बनना, पितृसत्तात्मक संस्था में स्त्री का स्वतंत्र जीने का सपना और इन सबको सच करने के लिए आर्थिक जगत में स्थापित होना जरूरी है। फिगरेट से प्रभा को २५-३० हजार रुपये माहवार आय होती थी जो एक रूप में आर्थिक स्वतंत्र बनाती थी। लेकिन प्रभा एक मकान तक सीमित रहकर सिर्फ पैसे नहीं कमाना चाहती थीं। उनका मन ऊंची उड़ान भरना चाहता था, जो पैसे के साथ-साथ दुनियां को देख सके, खूबसूरत जहान में अपने वजूद को स्थापित कर सके। इसी चाह को लिए प्रभा ने दूसरा व्यवसाय करने की मन में ठानी और वो भी निर्यात का। प्रभा अपने निर्यात व्यापार की इच्छा के बारे में लिखती हैं- ''मैं अपना व्यापार खड़ा कर लूं और वह भी निर्यात का, कम से कम देश-विदेश घूम तो सकूंगीं, लोगों की जर में इज्जत मिलेगी वह अलग। स्वाभाविक था कि निर्यातक बनने की, अपना स्वतंत्र व्याापार करने की मेरी इच्छा दिन-पर-दिन बलबती होती।``
प्रभा ने अपने छोटे भाई की सलाह पर चमड़े से बनी चीजों का निर्यात व्यवसाय करने का मानस बनाया। प्रभा कलकत्ता के बाजारों, गलियों में चमड़े से बने बैग, चप्पलें, जूते आदि देखती और कारीगरों से मिलती, उनके बनाए सामान को देखती। प्रभा के इस काम में भी बहुत-सी अड़चने आईं, मगर उन्होंने हार नहीं मानीं। अपनी कड़ी मेहनत और उत्साह के कारण प्रभा ने चमड़े से बनी चीजें निर्मित करने का कारखाना स्थापित किया। दिन-रात की मेहनत ने आगे बढ़ाया। प्रभा अपने व्यापार के जुनून को इस प्रकार व्यक्त करती हैं- ''एक उन्माद था..... चमड़े की चीजों का बनाते रहने का, एक नशा था, व्यापार करने का जो प्यार के नशे से भी ज्यादा था, मेरे सामने एक दुनियां थी, उस दुनियां में रोज नए-नए दरवाजे खुल रहे थे और मुझे लग रहा था कि मैं पहली बार सूरज देख रही हूं कि पहली बार हवा इतनी मादक है। मैं विभोर थी बाहर की दुनियां से। घंटों अपनी कल्पना में खोई रहती....... माना कि मेरा व्यापारिक अनुभव कम था, मगर काम करने का मुझमें उत्साह बहुत अधिक था।`` कोई भी काम पूर्ण निष्ठा और इमानदारी से किया जाए तो सफलता सामने खड़ी नजर आती है और मानो कदम सफलता खुद बढ़ा रही होती है। प्रभा अपने काम के प्रति पूर्ण समर्पित हो गईं। व्यापारिक संसार में इतना रस आ रहा था कि प्रभा को अपना जीवन भरा-पूरा लगने लगा। पहले मन का कोई कोना उदास होता था, लेकिन अब मन का हर कोना नए सपने बुन रहा था। प्रभा अपने व्यापार को विकसित करती जा रही थीं और साथ-ही-साथ खुद दौड़ रही थी। प्रभा लिखती हैं- ''मैं दौड़ रही थी.... और पहले वाली रिक्तता, शून्यता, व्यर्थता के बदले बहुत कुछ सार्थक पा रही थी। मुझे अपनी इस नई व्यापारिक दुनियां में रस मिल रहा था, काम में संतुष्टि थी। हर दिन लगता मैं प्रगति की राह पर एक और कदम आगे बढ़ा रही थी।``
सफलताएं आसानी से नहीं मिल जाया करतीं। विकट परिस्थितियां आती हैं, मगर ये समस्याएं तो हथौड़े की उस चोट के समान होती हैं जो हर प्रहार के बाद लोहे के आकार को सुंदरता की तरफ बढ़ाती जाती हैं। जब तक इंसान को ठोकर नहीं लग जाती वो संभलकर कदम नहीं रखता। व्यापार के सिलसिले में प्रभा ने भी रोज नए अनुभवों का सामना किया। निर्यात के व्यवसाय में विदेश की धरती पर भी प्रभा ने नई परिस्थितियों से टक्कर लीं।
विदेश में हुए अनुभवों के बारे में प्रभा लिखती हैं- ''निर्यात के चक्कर में बक्सा उठाए-उठाए न जाने कितने देशों में कितने शहरों में गई हूं, कैसे-कैसे अजीबो-गरीब अनुभव हुए हैं। ऐसा नहीं कि व्यापार की दुनियां में आतंक नहीं था, धोखा और छलावा नहीं था, पर वहां दुश्मन मेरे सामने था। बाधाओं को मैं देख पा रही थी और उन बाधाओं के पार एक और दुनियां भी है जिसका मुझे अंदाजा था।``
माली एक बगिया लगाता है और रात-दिन मेहनत से पसीना बहाता हुआ उसे सुंदर से सुंदरतम स्वरूप देने का प्रयास करता रहता है। माली के पसीने की खुशबू ही फूलों के माध्यम से चारों तरफ महकती है। सबको आकर्षित करती है। प्रभा ने भी अपने व्यापार का छोटा-सा बगीचा सजाया और उसे सुंदरतम स्वरूप देने के लिए रात-दिन पसीना बहाती रहीं। अमीर घर में जन्मी, पली-पढ़ी प्रभा जी-तोड़ मेहनत करती और पसीने की गंध को फूलों की खुशबू से भी से भी कहीं अच्छा महसूस करतीं। अपने काम का जिक्र करती हुई प्रभा लिखती हैं- ''फैक्ट्री लोर पर घंटों खड़ी रहती, पसीने से लथपथ- पसीने और चमड़े की गंध मुझे सुकून देती, जीवित रहने का बोध देती।``
पितृसत्तात्मक व्यवस्था में कोई स्त्री सबल होकर ऊपर उठे; ये आसान नहीं। समाज चारों तरफ दीवारें चुनकर रास्ते रोकना चाहता है, मगर पानी जब बहने की ठान लेता है तो ऊंची-ऊंची चट्टानों के बीच में से रास्ता बना लेता है। प्रभा ने हर चुनौती को स्वीकारा और निर्मल जल की तरह आगे से आगे बहती चली गईं। मंजिल को पाने की अपनी एकनिष्ठता के बारे में प्रभा खेतान लिखती हैं- ''कैसा पागलपन था, कैसी अंधी जिद, कितनी गहरी आस्था कि गिरती-पड़ती फिर भी मैं अकेली बढ़ती चली जा रही थी अपनी मंजिल की ओर।``
रात्रि के बाद आने वाले सूर्य के उजाले में दुनियां रात्रि को भूला देती है, मगर महान् तो चंद्रमा है जो रात्रि का साथ निभाता है। प्रभा ने अपने काम को पूर्ण तन्मयता के साथ निभाया। अपने कर्मपथ पर खड़ी होकर मंजिल की ओर देखा। अपनी लम्बी तपस्या के कारण ही प्रभा 'कलकत्ता चेम्बर ऑफ कॉमर्स` की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं। जो अपने-आप में बड़ी उपलब्धि थी।
प्रभा व्यवसाय जगत का चमकता हुआ सितारा थीं। अपनी कम्पनी के बारे में आत्मकथा में स्वयं लिखती हैं- ''एक स्वस्थ आत्मछवि के साथ मेरी कम्पनी सर उठाकर खड़ी है। कुछ लोगों की नजर में यह एक छोटी विजय है, मेरी दृष्टि में यह आजादी की लड़ाई से कम नहीं।``
सन् १९७६ से प्रभा खेतान ने चमड़े व सिल-सिलाए वस्त्रों का निर्यात शुरू किया जो सतत् रूप से अंतिम समय तक जारी रहा। प्रभा अपनी कम्पनी 'न्यू होराईजेन लिमिटेड` की प्रबंध निदेशिका रहीं। संक्षेप में कहें तो प्रभा खेतान अर्थ के कारण हर प्रकार से स्वतंत्र थीं और हर नारी के लिए अनुकरणीय हैं।
समाजसेवा क्षेत्र के शिखर पर :
स्व के केन्द्र से बाहर निकलकर इतर के लिए निस्स्वार्थ भाव से किए जाने वाले कार्य ही समाज सेवा के रूप में जाने जाते हैं। परिवार के बाद बालक का जुड़ाव समाज से होता है। प्रभा खेतान का संबंध एक धनी परिवार से रहा। पैसे वालों का अपना अलग समाज है वे प्राय: गरीब व निम्न तबके से सरोकार नहीं रखते। परंतु प्रभा का जुड़ाव पैसों में पलते हुए भी गरीबों से रहा। गरीबों के जीवन को करीब से देखा- दाई मां के रूप में, खेदरवा व उसकी मां के रूप में, फैक्ट्री के मजदूरों के रूप में। इन सबके माध्यम से प्रभा ने निम्नवर्गीय समाज को समझा। नारी समाज की स्थितियों से तो अपने माध्यम से खूब गहराई से जान ही लिया था। विदेशों में घूमते हुए नारी की दशा से प्रभा को और समझने का मौका मिला।
प्रभा का रूझान इन कमजोर एवं शोषित वर्गों की सेवा के प्रति हुआ।
बचपन से ही प्रभा संवेनशील थीं। प्रभा जब भी किसी के साथ भेदभाव होता हुआ देखती या फिर उच्च वर्ग द्वारा निम्न वर्ग व पुरुष द्वारा नारी का शोषण देखती तो हजारों अनसुलझे सवाल सामने आ खड़े होते। तार्किक विवेचन उनका पीछा करता। परंतु जैसे-जैसे प्रभा बड़ी होती गईं, दुनियां को समझती गईं और अनसुलझे प्रश्नों की तह धीरे-धीरे खुलती गई।
अपने जीवन की परिस्थितियों के कारण प्रभा मजबूत हेाती गईं और साहित्यिक तथा व्यावसायिक जगत् में स्थापित होते-होते कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़ गईं। प्रभा ने पैसों को दूसरों के हितार्थ खूब बांटां। अपनी आत्मकथा में प्रभा लिखती हैं- ''उदार हाथों से पैसा लुटाया है मैंने, जी भरकर दिया है आसपास के लोगों को। सम्पर्कों ने खूब-खूब फायदा उठाया है इसका...... धन को जितना समेटूंगी उतनी गरीब हो जाऊंगी। मुझे कृपण और ओछे मन के लोग कभी पसंद नहीं आते।`` आगे बढ़ने की इच्छा रखने वालों की मदद के लिए प्रभा के हाथ हरदम खुले रहे। अनेकों संस्थाओं के माध्यम से प्रभा ने लोगों की सहायता कीं। अंतरराष्ट्रीय मारवाड़ी सम्मेलन की युवा शाखा तथा प्रभा खेतान फाउण्डेशन के सांझा कार्यक्रम 'सभी के लिए शिक्षा` के तहत एक वृहत्तर कार्यक्रम का संचालन प्रभा द्वारा समाज सेवा में बड़ा कदम रहा। इसमें गरीब और मेधावी छात्र-छात्राओं के लिए विशेष व्यवस्था का प्रबंध रखा गया।
प्रभा का मानना था कि शिक्षित पीढ़ी ही भारत का भविष्य है और इसी वजह से शिक्षा के प्रति सेवा-सहयोग भाव सदैव रहा। छात्राओं का साहित्य के प्रति रूझान हो इसीलिए प्रभा ने 'प्रभा खेतान प्रतिभा पुरस्कार` शुरू किया। इसमें राजस्थान की साहित्यिक छात्रा प्रतिभाओं का पुरस्कृत किया गया।
प्रभा खेतान स्वयं 'प्रभा खेतान फाउण्डेशन` की संस्थापिका अध्यक्षा थीं। इस संस्था के माध्यम से प्रभा ने अनेक तरहों से सामाजिक योगदान दिया।
नारी विषयक कार्यों में प्रभा सक्रिय रूप से भागीदार रहीं। स्त्री शिक्षा के प्रसारात्मक भी अनेक कदम उठाएं। प्रभा खेतान फाउण्डेशन के द्वारा स्थाई कोष बनाकर 'कलकत्ता चेम्बर ऑफ कॉमर्स` के माध्यम से 'प्रभा खेतान पुरस्कार` की स्थापना की। अपने क्षेत्र में विशेष योगदान देने वाली किसी महिला को प्रतिवर्ष इस पुरस्कार से नवाजा जाता है। पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपये की नगद राशि दी जाती हैं। इस पुरस्कार के संबंध में प्रभा खेतान कहती हैं, ''यह एक सेल्फमेड स्त्री की ओर से एक सेल्फमेड स्त्री के काम की पहचान और सम्मान है।`` यह पुरस्कार अब तक मेधा पाटेकर, शबाना आजमी, कपिला वात्सायायन, मीरा मुखर्जी, वंदना शिवा, उषा गांगुली आदि को मिल चुका है।
प्रभा अनेक सामाजिक गतिविधियों में भागीदार रहीं- ''प्रभा खेतान दातव्य न्यासों से जुड़े रहकर पूरे भारत में सक्रिय रहीं। रेडक्रास सोसायटी के माध्यम से भी काफी लोगों की मदद की। रेडक्रास सोसायटी के कल्याण शाखा की प्रभा खेतान चेयरपर्सन भी रहीं।``
'देशभक्त ट्रस्ट` में भी न्यासी के रूप में प्रभा का योगदान उल्लेखनीय रहा। भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन जैसे लोगों के साथ प्रभा का इस ट्रस्ट में न्यासी होना अपने-आप सक्रियता का भान कराता रहा।
जिला सैनिक बोर्ड, कलकत्ता की मानद सदस्या के रूप में भी प्रभा ने सैनिक कल्याणार्थ कार्य किए। सौ वर्षों से अधिक पुरानी प्रतिष्ठित व एशिया की सबसे पुरानी संस्था 'कलकत्ता चेम्बर ऑफ कॉमर्स` (स्थापना सन् १९३०) की प्रथम अध्यक्षा पद पर भी प्रभा रहीं।
गरीब व असहायों की मदद के लिए प्रभा खेतान सदैव आगे रहीं। नीचे से चलकर ऊपर उठने की चाह रखने वालों को प्रभा का सदैव सहयोग मिला।
प्रभा में सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने की प्रवृत्ति प्रारम्भ से ही थीं। राष्ट्रसेवा के निमित्त तो उन्होंने अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया। सन् १९६२ में नेहरूजी के आह्वान पर अपनी प्रिय धरोहर सोने के गहने दान कर दिए। प्रभा के ही शब्दों में- ''यह १९६२ का साथ था। भारत पर चीन का आक्रमण हुआ। मेरा राष्ट्रवादी मानस पूरी तरह सत्ता के साथ था। मैं अपने सोने के तमाम गहने दान कर आई थी ......... देश को धन की जरूरत है।``
जब एक लड़की मां के पहनाए हुए गहनों को बेहिचक दान करने का माद्दा रख सकती है तो फिर अपनी मेहनत से व्यावसायिक उपलब्धियों से लबरेज होने के बाद समाज सेवा में आर्थिक योगदान असम्भव कैसे हो सकता है? प्रभा ने कभी नहीं देखा कि समाज ने उनको क्या दिया बस वे तो खुले हृद्य से समाज सेवा को जैसा भी बन पड़ा अर्पण करती रहीं और आजीवन अपने कर्म को जारी रखते हुए आगे बढ़ती गईं।
स्त्री के प्रति दृष्टिकोण :
जिस परिवेश में मनुष्य का बालपन एवं लड़कपन बीतता है वहां से उसे जो अनुभव प्राप्त होते हैं, छोटे-छोटे सवालों एवं जवाबों से दु:ख एवं खुशी के क्षण आते हैं, उन सबसे उसके अंतर ज्ञान के वृक्ष पर छोटी-छोटी कोंपले निकलती रहती हैं। जीवन की सुखद लगने वाली कठिन राहों पर जब वह चलता है तो हर विपरीत स्थिति उसे पूर्वज्ञान का स्मरण कराती रहती है। अपने प्रतिकूल होता आया आज तक का कार्य व्यापार उसके मानस पटल पर आकर हथौड़े चलाने लगता है। ऐसा क्यों हुआ? समाज में अक्सर ऐसा क्यों होता है? इसका निस्तारण क्या है? आदि जटिल सवाल उसके अंदर उगने लगते हैं। परिणाम स्वरूप वो किसी भी माध्यम से अपने भावों को अभिव्यक्ति देता है।
प्रभा खेतान ने कोलकाता महानगर में अमीर मारवाड़ी के घर जन्म लिया। सबसे पहले अपनी मां, दादी, मामी, नानी, चाची, ताई एवं बहन-भाभी का जीवन करीब से देखा और महसूस किया। वहां नारी महंगें वस्त्र, आभूषणों से सज्जित वस्तुमात्र थी, जो परिवार चलाने का अनिवार्य तंत्र एवं पूरे दिन के बाद घर आने पर पुरुष के मन-बहलाव का साधन थी। प्रभा जब घर से बाहर निकली तो स्कूल अध्यापिकाओं के साथ-साथ बंगाली समाज की पढ़ी-लिखी कामकाजी महिला को देखा। वहां शिक्षा का महत्त्व तो था ही साथ ही साथ आत्मनिर्भर स्वाभिमानी स्त्री की इज्जत भी थी। परंतु कहीं अधिक तो कहीं कम मगर स्त्री दमित एवं कुंठित हर जगह थी।
प्रभा ने अपने आसपास की स्त्रियों के घुटन भरे जीवन से जानना चाहा कि आखिर नारी की इस स्थिति का कारण क्या है? शायद सबसे बड़ा कारण अशिक्षा और पैसा ही है। यदि स्त्री आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर हो जाए तो एक हद तक वह स्वतंत्र हो सकेगी। इसी बात को प्रभा स्वीकार करती हैं- ''आजादी स्त्री के पर्स से शुरु होती है।``
औरत अपने परिवार के प्रति पूर्णतया समर्पित हो जाती है और परिवार के अस्तित्व में ही अपना अस्तित्व डूबो देती है। परिवार को जब उसकी जरूरत नहीं रहती तब उसको पीछे धकेल दिया जाता है और वह पूर्णतया अकेली रह जाती है। तब वह अपने वजूद को टटोली है मगर समय बहुत बीत चुका होता है। यह बात प्रभा के मन में विद्यार्थी जीवन से ही गहरी बैठ जाती है। प्रभा लिखती हैं- ''एक बात बड़ी गहन मन में बैठती जा रही थी। .....नहीं, मुझे अम्मा की तरह नहीं होना, कभी नहीं। भाभी की घुटन भरी जिंदगी की नियति मैं कदापि स्वीकार नहीं कर सकती। मैं अपने जीवन को आंसुओं में नहीं बहा सकती। क्या एक बूंद आंसू में ही स्त्री का सारा ब्रह्मांड समा जाए? क्यों? किसलिए? रोना और केवल रोना, आंसुओं का समंदर, आंसुओं का दरिया और तैरते रहो तुम! अम्मा, जीजी, भाभीजी, ताई, चाचियां, यहां तक कि मेरी शिक्षिकाएं भी, जिनकी ओर मैंने बड़ी ललक से देखा, जिनको मैंने क्रांतिचेता पाया था, वे भी तो उसी समंदर को अपने-अपने आंसुओं से भरती चली जा रही थीं।``
एक स्त्री जितनी तन्मयता से परिवार को बनाती है, बच्चों को पालती है, उनके जीवन को संवारती है, पति की खुशी के लिए रात-दिन पिसती है, उनकी सफलता के लिए दुवाएं मांगा करती है, इतनी ही तन्मयता से अपने जीवन को संवारने में लगे तो शायद पुरुष से कहीं आगे हो। प्रभा लिखती हैं- ''हम औरतें प्रेम को जितनी गम्भीरता से लेती हैं, उतनी गम्भीरता से यदि अपना काम लेतीं तो अच्छा रहता; जितना आंसू डॉक्टर साहब के लिए गिरते हैं उससे बहुत कम पसीना भी यदि बहा सकूं तो पूरी दुनियां जीत लूंगी।``
प्रभा अपने प्रति होते व्यवहार को देखती तो लगता मानों यहां स्त्री होना ही अपने-आप में अपराध है। जहां स्त्री को कमजोर साबित करने वाले थे वहीं स्त्री के स्वाभिमान को जागृत करने वाले भी प्रभा को मिले और इससे उनके अंदर की स्त्री का स्वाभिमान जागा भी।
कॉलेज शिक्षा के समय उनके गुरु के शब्द प्रभा के ही शब्दों में- ''स्त्री होना कोई अपराध नहीं है पर नारीत्व की आंसू भरी नियति स्वीकारना बहुत बड़ा अपराध है। अपनी नियति को बदल सको तो वह एकलव्य की गुरुदक्षिणा होगी।``
लड़की को बचपन से ही यह आभास कराया जाने लगता है कि तुम कमजोर हो, यह घर तुम्हारा नहीं, तुम्हें पति के घर जाना है और उसी घर को अपनाना है, पुरुष घर का मुखिया है वह कमाता है एवं स्त्री का जीवन उसी पर निर्भर करता है। प्रभा ने इन बातों को न सिर्फ नकारा बल्कि पुरुष आधिपत्य वाले व्यापारिक साम्राज्य में स्वयं को बुलंदियों तक पहुंचाया। एक मायने में उनकी इस उपलब्धि भरे उदाहरण से नारी की आत्मशक्ति जागृत हुई।
प्रथम बार अमेरिका जाते समय जब पैसों का प्रबंध नहीं बैठ रहा था तब डॉक्टर सर्राफ (जिनसे प्रभा प्रेम बंधन में बंधी थी) ने पैसे देने की बात कही और उसके जवाब में प्रभा का एक छोटा-सा वाक्य नारी शक्ति को दर्शा जाता है- ''मैं आपसे रुपए नहीं ले सकती।``
प्रभा ने भारत की दमित औरत को ही नहीं देखा, वह तो अनेक देशों में गई और वहां की औरत के दु:ख को भी गहराई से महसूस किया। प्रभा ने जहां भी देखा औरत के आंसू हर जगह दिखाई दिए। प्रभा के उपन्यास का एक पात्र कहता है- ''दुनियां में ऐसा कोई कोना बताओ, जहां औरत के आंसू नहीं गिरे?``
इन आंसुओं का कारण पुरुष द्वारा बनाए गए समाज के नियम रहे। पुरुष ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई ताकि उसकी सत्ता सलामत रह सके। एक हद तक औरत खुद भी इस व्यवस्था को बनाए रखने में सहभागी रही। हां, अभी कुछ वर्षों से औरत ने अपने अधिकारों को पहचाना है मगर जड़ जमाए पुरानी सत्ता तोड़ने में समय तो लग ही जाता है। फिर भी औरत जागृत तो हुईं। प्रभा ने भी माना- ''पुरुष ने अपने स्वार्थ में धर्म, समाज और कानून को बनाया है, औरत ने तो बस अभी-अभी अपने अधिकारों के बारे में बोलना शुरू किया है।``
स्त्री का अस्तित्व पुरुष जाति में है ही नहीं, वह तो हमेशा दोयम दर्जे पर धकेल दी जाती रही है। उसे अपने वजूद के लिए अकेले ही संघर्ष की सीढ़ियां चढ़नी है। यह समस्या किसी एक जाति या राष्ट्र की नारी की समस्या नहीं बल्कि पूरे विश्व की महिला इसी मरुस्थल में भटक रही है। इन्हीं विचारों को व्यक्त करते प्रभा की आत्मकथा में अमेरिकन महिला के शब्द- ''प्रभा औरत अभी मनुष्य श्रेणी में नहीं गिनी जाती और तुम अमीर-गरीब का सवाल उठा रही हो? तुम मुझे राष्ट्र का भेद समझा रही हो? माई स्वीट हार्ट! हम सब औरतें अर्ध-मानव हैं। पहले व्यक्ति तो बनो।``
जहां भारत की औरत चूल्हे-चौके में कैद है वहीं अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश की औरत पैसे की चारदीवारी में जकड़ी हुई है। प्रभा स्त्री की बाह्य स्वतंत्रता की बजाय आंतरिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देती रहीं। स्त्री पहनावे से और चारदीवारी से बाहर निकलने मात्र से स्वतंत्र नहीं हो जाती। उसे अपनी मानसिकता को स्वतंत्र करना होगा। साड़ी में भी नारी सबल हो सकती है और जींस में भी गुलाम मानसिकता लिए कमजोर हो सकती है। प्रभा लिखती हैं- ''यानी ये अमेरिकी औरतें भी हम भारतीय औरतों की तरह असहाय हैं। केवल पैंट पहनने और मेकअप करने से औरत सबल नहीं हो जाती।``
पुरुष ने हमेशा स्त्री को पिता, पति, पुत्र के रूप में सुरक्षा चक्र दिया है और समय-समय पर उसे सचेत करता आया है कि यदि वह सुरक्षा चक्र टूट गया तो तुम्हारा अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन सही मायने में देखें तो स्त्री को सबसे ज्यादा असुरक्षित इसी सुरक्षा चक्र ने बनाया है। जब कभी नारी ने इस घेरे को तोड़ने का प्रयास किए तो पुरुष ने उसे पीछे धकेलते हुए श्रद्धा रूपी बड़ा-सा ब्रह्मास्त्र फेंककर बाहर के पुरुष का खतरा याद दिलाया। घर के बाहर का पुरुष मारने वाला, भीतर का तारने वाला और इसी उलझे हुए जाल में नारी पिसती रही- वर्षों तक, सदियों तक। पितृसत्तात्मक मिथक को प्रभा व्यक्त करती हैं, ''औरतें वह चाहे बाल कटी हों या गांव-देहात से आई हों, कहीं भी सुरक्षित नहीं। उनके साथ कुछ भी घट सकता है। सुरक्षा का आश्वासन पितृसत्तात्मक मिथक है। स्त्री कभी सुरक्षित थी ही नहीं। पुरुष भी इस बात को जानता है। इसलिए सतीत्व का मिथक संवर्धित करता रहता है। सती-सावित्री रहने का निर्देशन स्त्री को दिया जाता है। हां, सतीत्व का आवरण जरूर ओढ़ लेती है या फिर आत्मरक्षा के नाम पर जौहर की ज्वाला में छलांग लगा लेती है।``
रात-दिन घर की चक्की में पिसती हुई औरत के काम को हमेशा नकारा गया है। 'तुम करती क्या हो? सारे दिन घर मेें पड़ी रहती हो, सबकुछ मिल जाता है।` पुरुष यही सब कहता है। पुरुष की आठ घण्टें की ड्यूटी के आगे स्त्री की चौबीस घण्टों वाली ड्यूटी को तुच्छ माना गया। बार-बार आभास कराया गया कि तुम कमजोर हो कुछ नहीं कर सकती और जब स्त्री ने अपनी शक्ति को पहचाना तथा घर से बाहर निकलकर आठ घण्टें वाली ड्यूटी में शामिल होकर ये दिखाया कि वह भी सक्षम है तब पुरुष समाज में खलबली मच गई।
बौद्धिक और आर्थिक जगत में पुरुष उसे मर्दों के गुणों से नवाजकर स्त्री गुणों को निम्न साबित करने का प्रयास करता है। प्रभा अपनी आत्मकथा में लिखती हैं- ''लेकिन नहीं, मैं एक औरत थी..... औरत के आर्थिक अवदान को नकारने की परम्परा रही है। पहले गृहस्थी में उसके श्रम को नकारा जाता है, फिर मुख्यधारा में यदि उसे स्थान दिया जाता है तब उस स्त्री को या तो अपवाद मानकर पुरुष वर्ग अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेता है, या फिर उसे परे ढकेल दिया जाता है।``
आज की पढ़ी-लिखी स्त्री घर बैठकर महज पति की पूजा में तो अपना जीवन नहीं लगा सकती। अच्छे वर की आशा में लड़की व्रत-उपवास और मंदिर के चक्करों में तो नहीं रह सकती। पति और परिवार के साथ आधुनिक युग के प्रगति करते संसार में अपना अस्तित्व भी स्त्री को कायम करना है। रोज आगे बढ़ते पुरुष के साथ उसे भी आसमान की ऊंचाईयों को छूना है। सबकुछ की इच्छा रखने वाली औरत ही स्वतंत्र हो पायेगी। कुछ ऐसे भाव ही व्यक्त करती है प्रभा- ''आधुनिक स्त्री की तपस्या, पार्वती की तपस्या से भिन्न है। वह प्रार्थना करती है, उस प्रार्थना में वह सब कुछ मांगती है क्योंकि आज की पार्वती के लिए केवल पति ही काफी नहीं। पुरुष ने शिव के अलावा सत्य और संुदर को चाहा तो स्त्री क्यों नहीं अपने जीवन में इसकी मांग करे? स्त्री भी न्याय और औचित्य की बात करेगी। इस नए सृजित संसार में प्रगति का प्रशस्त मार्ग, घर की देहरी से निकलकर पृथ्वी के अनंत छोर तक जाता है। स्त्री को यह समझना होगा।``
जीवन की सब इच्छाएं पूरी करने वाली ये स्वतंत्रता यूं ही नहीं मिल जाया करती। इसके लिए संघर्ष करना होता है और स्त्री को अपना हक पाने के लिए अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होती है। प्रभा कहती हैं- ''औरत के लिए केवल प्यार ही काफी नहीं। व्यक्ति बनने के लिए उसे और भी बहुत कुछ चाहिए। धन-मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी कुछ। जीवन शुरू करने उसे भी पुरुष के बराबर की जमीन चाहिए और इस जमीन को समाज से छीनकर लेना पड़ता है। महज अनुनय-विनय से काम नहीं चलता।``
इतिहास ने स्त्री के जीवन को पुरुष के हाथ का खिलौना मात्र समझा है। अहल्या इसका साक्षात् उदाहरण बनती है। प्रभा की ये मार्मिक पंक्तियां-
''भोक्ता इंद्रविधायक गौतममुक्ति-दाता रामक्यों?``
पुरुष ने अपनी पाश्विक तृप्ति स्त्री से की और पुरुष ही ने उसे दोषी करार देकर एक आकार में बांध दिया और फिर उसी पुरुष ने मुक्ति का कर्म कर अपने-आप को महान् साबित कर दिया। कब तक स्त्री यूं पुरुष के हाथों की कठपुतली बनी रहेगी? उसे स्वयं अपना उद्धार करना होगा, वरना पुरुष उसे यूं ही सदियों-सदियों तक पत्थर बनाए रखेगा। प्रभा स्त्री को जागने के लिए कहती हैं-
''मत करो प्रतीक्षा राम कीप्रयास करोप्रस्तर की कारा सेमुक्ति का!``
स्वयं के प्रयास से प्राप्त की गई आजादी ही सुख दायिनी होती है, दया से दी गई मुक्ति तो सबसे बड़ा बंधन है।
घर के बाहर स्त्री ने पुरुष के बराबर काम किया और घर आते ही वह फिर से काम में लग जाती है, पूरे घर का काम उसी के कंधों पर है। सारे दिन मजदूरी करता उसका पति जो बाहर की दुनियां में शोषित है, घर आकर पत्नी का शोषक बन जाता है। और तो और स्त्री के द्वारा किए जाने वाले घर के काम का कभी मूल्यांकन नहीं हुआ और घर के बाहर भी स्त्री श्रम का मूल्यांकन पुरुष-श्रम से कम आंका जाता है। प्रभा के अनुसार- ''आंकड़े उठाकर देख लीजिए; स्वास्थ्य, राजनीति, रोजगार और व्यापार-जगत, हर जगह स्त्री-श्रम की कीमत पुरुष-श्रम से कम है।`` रात-दिन पसीने में लथपथ स्त्री ने शारीरिक शोषण के साथ-साथ मानिसक आघात को भी झेला है। सामाजिक और आर्थिक ढांचे से ऊपर उठकर देखें तो राजनीति और साहित्य की दुनियां में भी स्त्री को न सिर्फ किनारे पर धकेला गया बल्कि उसकी बौद्धिक क्षमता को निम्नतर स्तर पर रखा गया है। भारतीय संस्कृति के वाहक धर्मग्रंथों एवं बड़े-बड़े शास्त्रों में भी स्त्री को उपेक्षित किया गया है। प्रभा इसी को रूपांकित करती हैं- ''स्त्री विरोधी वाक्यों और इन विशेषणों से हमारे शास्त्र भरे पड़े हैं।`` पुरुष साहित्य में अपना वर्चस्व जमाये रहा है और उसने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए निम्नवर्गीय तबके को आगे नहीं आने दिया। नारी उसी शोषित तबके में शामिल है। कहने को वह महारानी और राजमाता भी कहलाई है मगर उसने तो मात्र मूक होकर परदे से दो स्थिर आंखों से पुरुष का रचा हुआ खेल देखा है। प्रभा ने साहित्य में स्त्री की पीड़ा को व्यक्त किया- ''सदियों से उत्पीड़ित होती हुई स्त्री साहित्य-जगत में भी कुंठित है। वह पुरुषों की पैंतरेबाजी से आतंकित है, संपादक मंडल की लाल स्याही के सामने असुरक्षा और हीनता के बोध से ग्रसित है।``
प्रभा ने माना कि नारी खुद कलम उठाकर अपना इतिहास लिखे और शोषण, दमन से मुक्त हो। इसी के पक्ष में लिखा- ''सभी दलित और वंचित वर्गों को अपना अतीत दर्ज करने का उद्यम स्वयं ही करना पड़ता है।``
पुरुष ने आगे बढ़ने के लिए स्त्री रूपी सीढ़ी का इस्तेमाल किया और आगे बढ़ते हुए सीढ़ी को पीछे धकेलता गया। स्त्री को त्याग और दया से मंडित कर श्रद्धावरण से ढक पुरुष ने उसे निर्जीव मूर्ति की तरह समाज में स्थापित कर दिया। अपनी कामयाबी का इतिहास लिखते हुए पुरुष ने स्त्री के योगदान को दफन कर दिया।
सदियों से स्त्री के होठों पर ठहरी चुप्पी को प्रभा तोड़ने के पक्ष में रहीं। स्त्री क्यों नहीं चाहती है कि पुरुष उसके अवदान को दुनियां के सामने लाए? क्यों नहीं वह अपने श्रम से ही पुरुष की उपेक्षा को तोड़ती हुई अपने अवदान को स्वयं दुनियां के आगे रखे। प्रभा ने लिखा- ''मैं तहेदिल से स्वीकारती हूं कि स्त्री को अपनी खामोशी तोड़नी होगी, उसे वह सब लिखना होगा जो अब तक लिखा नहीं गया।``
न सिर्फ विचार बल्कि प्रभा खेतान का पूरा व्यक्तित्व ही स्त्री के लिए अनुकरणीय है। इस पुरुषवादी समाज में एक स्त्री का उपेक्षा भरे धरातल से संघर्षमय सफर, जो उसे न सिर्फ सफलता की ऊंचाईयों तक ले जाता है बल्कि इस समाज में पुरुष के बराबर स्थापित करता है। प्रभा ने स्त्री को स्वयं की शक्ति पहचानने के लिए कहा। उनका मानना रहा कि जब स्त्री अपने-आप को पहचान लेगी उस दिन वह पुरुष के बराबर धरातल पर खड़ी होगी। स्त्री को सशक्त बनने के लिए पुरुष का विरोध नहीं करना होता, उसे तो पुरुष के साथ चलकर दोनों को समाज की समान धूरी बनाना है।
प्रभा खेतान का कर्तृत्व :
प्रभा खेतान ने व्यवसाय की व्यवस्तताओं के बीच भी पूरी लगन से लिखा और सिर्फ लिखा ही नहीं अपितु साहित्य जगत में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान भी बनाया। छोटी-सी कविता से शुरू हुआ प्रभा का साहित्यिक सफर उत्कृष्टता के साथ लेखन की ऊंचाईयों को स्पर्श करने वाला रहा। आत्मा की आवाज पर लिखे काव्य और कथा संसार के साथ ही बौद्धिक धरातल पर लिखा गया चिंतनपरक-शोधपरक साहित्य प्रभा को हिन्दी-जगत में अमरता की ओर ले गया।
प्रभा का रचना संसार :
प्रभा खेतान ने हिन्दी में ६ कविता पुस्तकें, ६ उपन्यास, २ उपन्यासिका, ५ चिंतनपरक और शोधपरक पुस्तकें तथा 'अन्या से अनन्या` नाम से आत्मकथा लिखीं। २ पुस्तकों के अनुवाद के अलावा 'एक और पहचान` नामक पुस्तक का संपादन किया। 'पितृसत्ता के नये रूप` नामक पुस्तक का प्रभा ने राजेन्द्र यादव व अभय कुमार दुबे के साथ सह-संपादन भी किया।
प्रभा खेतान के अनेक फुटकर आलेखों का प्रकाशन भी हुआ। मासिक 'हंस` के मार्च, २००१ महिला विशेषांक का अतिथि संपादन किया।
प्रकाशित कृतियों का संक्षिप्त परिचय :
सृजित काव्य-संसार-
१. अपरिचित उजाले :
यह प्रभा के टूटते-जुड़ते भावों को पूर्णाभिव्यक्ति देता हुआ प्रथम काव्य संग्रह है। यह संग्रह सन् १९८१ में अक्षर प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ। संग्रह में कुल ६४ कविताएं हैं जिनका मूल स्वर प्रेम है।
कवयित्री कभी प्यार की सफलता का उल्लास तो कभी प्यार की असफलता की कसक का गहरा दर्द व्यक्त करती हैं। उनको पता है प्यार का मार्ग बड़ा ही कठिनाईयों भरा होता है फिर भी आकर्षित करता है, तभी तो उनके अंदर की मासूम लड़की बाहर निकलकर प्यार के सागर में उतर अपने-आप को भुला देती है-
''सहसा मुझसे निकलकरएक लड़की छलांग लगा जातीलहरों के बीच,तैरती चली जाती दूर आसमानों तक``
प्यार सायास नहीं किया जाता और ना ही योजनाबद्ध तरीके से निभाया जा सकता, वह तो चुपके-से दिल के किसी कोने में अपने होने की दस्तक देता है। प्रेम दुनियावाले करने नहीं दिया करते हैं, वो प्रेमियों की राहों में कांटे बिछा देते हैं, परंतु प्रेमी इनसे कब डरा करते हैं। तभी तो प्रभा कहती हैं-
''तुम जानते होमैंने तुम्हें प्यार किया हैसाहस और निडरता सेमैं उन सबके सामने खड़ी हूंजिनकी आंखेंहमारे संबंधों पर प्रश्नवाचक मक्खियों की तरह मंडराती है।``
इंतजार के लम्बे क्षणों के बाद प्रेमी के आने की आशा कभी बनी रहती है तो कभी टूट जाती है। प्रतीक्षा की अधिकता कभी क्षुब्ध भी कर जाती है और लेखिका उसे अपनी कविता में व्यक्त करती हैं-
''आखिर कब तक लटकी रहूंसारी-सारी शामसूखते कपड़ों-सी बरामदे मेंप्रतीक्षा करूं तुम्हारे आने कीएक क्षण सेदूसरे क्षण तक।``
कहीं जीवन की व्यवस्ताओं में उलझी प्रभा अपने से बाहर नहीं झांकना चाहती तो कहीं फुनगी पर बैठी चिड़िया और नीचे भिखारिन के व्यवसाय से समाज की असमानता को दर्शाती हैं। इन कविताओं में प्रभा ने पुरुष की सनातनी सोच को बड़े मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है-
''तुम चाहते होमैं बनूं तुम्हारे ड्राइंग रूम का कालीनपर्दे, सोफा;या बैड-कवरफैली रहूं बिस्तर पर।``
सदियों से चूल्हे-चौके में सीझती हुई स्त्री पति की खुशी में ही अपनी दुनियां ढूंढ़ती है, अपनी तो उसे सुध ही नहीं रहती। सरल से शब्दों में प्रभा स्त्री की पीड़ा व्यक्त करती हैं-
''चूल्हा सुलगायारोटियां पका-एक खुशनुमा दिनबंद कर दियापति के टिफिन-बक्स में।``
मां के प्यार के लिए तरसता हुआ प्रभा का बचपन बीत गया परंतु उसकी टीस मन में कहीं गहरे उठती रहती है, तभी तो उनकी रचनाओं में अक्सर मां का जिक्र हो जाता है। प्रभा के शब्दों में यही पीड़ा व्यक्त हो रही है-
''मां, याद मत करोकुछ भी,बस, मेरे साथ रहो।``
मां के साथ बैठकर सुख का जो अनुभव होता है उसे भी प्रभा व्यक्त करती हैं-
''मां-बेटी बातें करने में मग्नढेर सारे बिखरे धागों को समेटते हुएस्वेटर बुना जा रहा।``
कतरा-कतरा जुड़ती हुई प्रभा कभी टूटकर बिखर जाती हैं तो कभी सम्भलकर सिर्फ अपने लिए जीती हैं। ढेरों व्यवस्तताओं में कभी अपने लिए जीना जानती हैं, तभी तो लिखती हैं-
''मेरे हैं एक नहीं, तीन मनएक कविता लिखता हैएक प्यार करता हैऔर एक केवलअपने लिए जीता है।``
परिस्थितियों में पिसता हुआ इंसान पल-पल मर रहा है और उसका जिम्मेदार कोई एक कारण नहीं दुनियां की सभी व्यवस्थाएं उसे मार रही हैं। 'वह आदमी मर गया` कविता में प्रभा इसी को व्यक्त करती हैं-
''किसने मारा उसको?बचपन मेंस्कूल ने, शिक्षक ने, शास्त्रीय संगीत नेऔर अब यह व्यवस्था-पूंजीवाद, समाजवाद सबने।``
प्रभा खेतान का यह कविता संग्रह प्रेम की प्रधानता के साथ विषय की विविधता को लिए हुए है। पूरे संग्रह में लेखिका स्वयं के जीवन के साथ आस-पास के परिवेश को कविताएं व्यक्त करती नजर आती हैं।
२. सीढ़ियां चढ़ती हुई मैं :
३. एक और आकाश की खोज में :
४. कृष्णधर्मा मैं :
सन् १९८६ में स्वर समवेत, कलकत्ता से प्रकाशित प्रभा की 'कृष्णधर्मा मैं` एक लम्बी कविता है। यह प्रभा का चौथा कविता संग्रह है जो कि उनकी मानसिक परिपक्वता को दर्शाता है।
कविता किसी इच्छा के साथ नहीं लिखी जाती और न ही उत्पन्न की जाती, उसके बीज तो हृद्य के किसी कोने में स्वत: निर्मित होते हैं और वहीं अंकुरित होकर बाहर आने को आतुर होते हैं। 'कृष्णधर्मा मैं` की भूमिका में प्रभा लिखती हैं- ''यह कविता खुद-ब-खुद टुकड़े-टुकड़े में कलम के सहारे कागज पर उतरती चली गई। किसी महत्ती प्रेरणा के रूप में नहीं, यह कोई अमूर्त धारणा भी नहीं थी! यह तो अपने समूचे अस्तित्व के साथ सफेद कागज पर उभरती हुई एक बिल्कुल ठोस कविता थी।``
इस कविता में प्रभा ने कृष्ण के मिथक को ग्रहण किया है और खुद कृष्णमय होकर कविता के पन्नों पर उभरी हैं। कृष्ण ने इतिहास पुरुष बनने के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति को अंगीकार किया और महाभारत युद्ध का स्वरूप ही परिवर्तित कर दिया था। प्रभा मनुष्य जीवन को भी महाभारत के समान ही मानती है और इस जीवन में विशेष उपलब्धियां हासिल करने के लिए कृष्ण की सभी नीतियों को अपनाने के पक्ष में हैं।
प्रभा इतिहास के निर्माण में अपनी साझेदारी कृष्ण के बराबर की मानती हैं-
''तुम कौन कृष्ण और मैं कौनतुम्हारी विराट् चेतनाऔर मेरी व्यक्ति चेतनाइतिहास तो हमारे साझे का क्षेत्र है``
भगवान कभी जन्म नहीं लेता, मानव ही अपने कर्म से भगवान बन जाता है। कृष्ण भी केलिकुंजों से लेकर महाभारत तक की अपनी लीलाओं से विराट बन पाए। मगर फिर भी मनुष्य होने की पीड़ा तो कृष्ण को भी सहनी पड़ी। तभी तो प्रभा लिखती हैं-
''जानती हूंअकेले तुम कहीं नहीं पहुंचोगेकृष्ण!लेते रहोयुगोंऱ्युगों तक अवतारअकेले तुम बना नहीं सकतेआदमी को देवताबार-बार बनकरएक अदना आदमीतुम्हें भी भोगना पड़ताआदमी होने का दर्द।``
इस युग में भी चक्रव्यूहों में अभिमन्यु छल-कपट से मारे जाते हैं। व्यावसायिक जगत में प्रभा ने खुद इन परिस्थितियों को झेला, तभी तो-
''लगातार छटपटाती रहीअभिमन्यु की तरहबिंधती हुईईर्ष्या-द्वेष के बाणों सेहत्या व्यवसायी शत्रुओं के घातों-प्रतिघातों सेमारी जाती रही युद्धरत।``
द्वापर से लेकर आजतक, कृष्ण से कवयित्री तक अहंकार ने मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ा और वो समय-समय पर मनुष्य के अंदर उगता रहता है तथा पूर्ण अस्तित्व के साथ आत्मा जाग उठती है 'मैं हूं` का भाव सामने आता है। कृष्ण की स्थापित की हुई इस नींव के लिए प्रभा कहती हैं-
''क्या करूं अपने इस अहंकार का?क्या करूं अपनी इस आत्मनिष्ठा का?कहां विसर्जित कर दूंतुम्हारी रची इस व्यवस्था मेंबार-बार सिर उठाते पहचान बताने के लियेआकुल अहं को?``
कर्म में लीन व्यक्ति ही महान् बन पाता है। अपनी सृजनधर्मिता से अपना अस्तित्व स्थापित कर पाता है। कृष्ण ने शायद इसीलिए कर्तव्य-विमुख अर्जुन को कर्म का उपदेश दिया था और उसी निष्काम कर्म के उपदेश से आजतक मानव प्रेरणा पाता आया है। विसंगतियों भरे जीवन में प्रभा ने कभी हार नहीं मानी और हमेशा कर्मरत रहीं। प्रभा लिखती हैं-
''कैसे झुठला पाऊं मैंबार-बार कचोटते स्मृति-संदर्भों कोजिनसे मिलती रहीतमाम प्रतिकुलताओं से जूझ पाने की शक्तिखुलती रही जिनसेविरक्तियों के जंगल से गुजरकरसृजनधर्मी आसक्तियों की राह।``
प्रभा लिखती हैं कि महाभारत की सी दुष्टात्माएं अब भी इस जगत में अपना अस्तित्व बार-बार बना लेती है। पूरी ताकत के साथ बुराइयां अपना सिर उठाती हैं मगर उनसे हार मानने की प्रेरणा कृष्ण से हमें नहीं मिलती, वो तो पूर्ण निष्ठा के साथ इनका सामना करने के लिए हमें जागृत करता है। प्रभा के शब्दों में-
''जागता हैयन्त्रणाओं का एक पूरा नर्ककहीं दु:शासन कहीं दुर्योधनकहीं अंधा धृतराष्ट्रआदमियत के खिलाफ खड़ेहत्यारों की पूरी जमात।``
प्रभा कृष्ण को कहीं अपने अंदर ही महसूस करती हैं तभी तो वो स्वयं को कृष्णधर्मा कह पाईं हैं। महाभारत का सिलसिला निरंतर है, प्रभा कहीं भी घबराती नहीं वे तो डटकर मुकाबला करने को तैयार हैं क्योंकि कृष्णधर्म को अपनाकर ऊंचाइयों को छूने का निश्चय वो कर चुकी हैं। प्रभा लिखती हैं-
''न वरण करूंगी दैन्यन वरण करूंगी पलायनपहुंचना है मुझे भीतुम्हारी ऊंचाइयों तकचूमना है मुझे भी तुम्हारे धर्म का शिखर।``

५. हुस्नाबानो और अन्य कविताएं :
अपने ईद-गिर्द फैली सामाजिक समस्याओं को कविता में उकेरते हुए प्रभा का 'हुस्नाबानो और अन्य कविताएं` संग्रह विषय की विविधता लिए हुए है। सन् १९८७ में स्वर समवेत, कलकत्ता से प्रकाशित यह संग्रह प्रभा की सामाजिक संवेदनाओं का प्रकटीकरण है। पेट की भूख से शुरू होती हुई कविता आतंकवाद की जटिल समस्या तक आते-आते बौद्धिक स्तर पर पाठक के सामने अनेकों सवाल खड़े करती हैं।
प्रभा की इन कविताओं में जहां गरीब भूख की आग में जल रहा है वहीं अमीर अशांति के जहर से तड़प रहा है। गरीब को हर समय रोटी की चिंता है और प्रभा रोटी के लिए भागते व्यक्ति को कुछ इस प्रकार दर्शाती हैं-
''हर आदमी का चेहरातवे पर सिंकती हुई रोटीहर आदमी की पलकों परचिपकी हुईरोटी।``
संग्रह की शीर्षक कविता में गरीब के जुड़ते-टूटते सपनों का बड़ा ही मार्मिक वर्णन हुआ है। हुस्ना घर का सपना देखती है, उसे हर जगह एक छोटा-सा घर ही नजर आता है- मां के पेट में, मैले कपड़ों के ढेर में छिपकली के मुंह में मगर उसका घर नहीं बन पाता। बस वह सपने जोड़ती है मगर सपने रह नहीं पाते और उसके हाथों से फिसल जाते हैं। प्रभा की अभिव्यक्ति-
''रो मत हुस्ना!सपने झरा करतेदिन-रात।``
मिसेज गुप्ता जहां अपने अकेलेपन से, अपनी तन्हाई से परेशान है वहीं रत्ना की मालकिन व्यवस्तता की वजह से कुंठित होती जा रही है। अकेलेपन से थकी हुई मिसेज गुप्ता एक ऐसा दोस्त चाहती है जो उसकी भावनाओं को समझ सके। रत्ना की मालकिन के बेटे को मां-बाप का प्यार नहीं मिल पाता, वह सभी सुविधाओं के बीच प्यार खोजता है वहीं रत्ना अपने बच्चे के लिए सुविधाओं के सपने देखती है।
शाहबानों के सवाल हों या गायत्री मंत्र या फिर जंगल में अंकुरित होता हुआ बीज, बादलों में नीचे गिरने के लिए आतुर बूंद, मंजिल तक ले जाती हुई सड़क, जाला बुनता हुआ मकड़ा सभी को शब्दों में पिरोया गया है। इन कविताओं में बड़े ही करीने से जड़े हुए शब्द हर विषय के दर्द को कह रहे हैं।
प्यार के सपने देखने वाली लड़की दुल्हन बनकर जाते ही घर को सजाने-संवारने में अपने-आप को ही भूल जाती है और प्यार के सपने कहीं खो जाते हैं। ऐसी ही दुल्हनों को रोज सजाती हुई जेनी कभी अपने लिए प्यार के सपने नहीं देख पाती क्योंकि वो जानती है ये सपने कहीं खो जाने हैं, वह अपने काम में व्यस्त है। प्रभा लिखती हैं-
''बहुत व्यस्त है जेनीलगन के दिन बहुत कमातीजेनी को पता हैकहानी का अंत।``
और
''झर जायेंगे एक दिनजेनी के भीतर गाती चिड़िया केसारे पंख।``
अपने-आप से बाहर निकलकर दुनियां के यर्थाथ धरातल पर लिखी गई इन कविताओं के बारे में आलोचक-समीक्षक परमानंद श्रीवास्तव लिखते हैंं- ''हुस्नाबानों और अन्य कविताएं में संकलित प्रभा खेतान की कविताएं व्यक्ति के निजत्व के बाहर अपने समय और समाज की वास्तविकता से व्यग्र बेचैन साक्षात का ही परिणाम कही जा सकती हैं। यह अचानक नहीं हुआ है और महज रचनात्मक महत्वाकांक्षा के कारण ही नहीं हुआ है।``
६. अहल्या :
'कृष्णधर्मा मैं` की तर्ज पर प्रभा का 'अहल्या` काव्य संग्रह गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या का मिथक ग्रहण कर रचा गया है। सन् १९८८ में सरस्वती विहार, दिल्ली से प्रकाशित यह लम्बी कविता जहां प्रभा की बौद्धिकता और सम्वेदना को एक साथ व्यक्त करती है वहीं स्त्री जागृति के पैरोकारों में प्रभा का महत्त्वपूर्ण स्थान निर्धारित भी करती है।
प्रभा कहती हैं कि सदियों से स्त्री जाति का प्रतिनिधित्व अहल्या करती आई है। स्त्री आज भी मुक्त कहां हो पाई है। हमेशा पुरुष से छली गई लेकिन फिर भी पुरुष की नियति को नहीं पहचान पाई। अपनी मुक्ति की आशा आज भी पुरुष से लगाए बैठी है और ऐसी परिस्थितियों में प्रभा खेतान का नारीवादी चिंतन कह उठता है-
''लौट आओपथरीली गहराइयों सेनिकल आओसमाधि के अंधेरे से!आवाज दो, पत्थर हुई आत्मा को!``
स्त्री के उत्पीड़न मंे अहल्या से लेकर आज तक कोई बदलाव नहीं है। आज भी वह गौतम के शाप से ग्रसित, अपने मुक्तिदाता का इंतजार कर रही है। स्त्री को कोई चुपचाप मुक्ति नहीं दे देगा, वह तो उसे स्वयं खोजनी होगी। अपनी मुक्ति पाने स्त्री स्वयं सक्षम है और यही प्रभा लिखती हैं-
''उठोमेरे साथमेरी बहन!छोड़ दो,किसी और से मिली मुक्ति को मोह!तोड़ दो, शापग्रस्तता की कारातुम अपना उत्तर स्वयं हो अहल्या!ग्रहण करो,वरण की स्वतंत्रता।``
उधार की दी हुई मुक्ति से स्त्री मुक्त नहीं हो पाती बल्कि जाल में अधिक जकड़ जाती है। प्रभा मानती है कि स्वयं के प्रयासों से मिली मुक्ति ही सुखदायक होती है- ''मुक्ति मिली कहां मुझे? क्या किसी और के देने से मुक्ति मिल जाती है? मैं आज भी अपने को खोज रही हूं। आज भी अपनी पत्थर होती चेतना से पूछती हूं अपना अपराध। तेरी जैसी हजारों-लाखों को क्यों आज भी इसी त्रासदी से बार-बार गुजरना पड़ता है? क्या है वह स्थितिग्रस्तता राह किनारे के पत्थर की, अपने-आप में बन्दिनी प्रतीक्षा करती हुई, शायद कभी कोई राम आए और उसके चरणों को छू-भर लेने से जीवन कृतकृत्य हो जाए। ये सारे विधान पुरुष ने क्यों बनाये? किसी ने कभी हमसे क्यों नहीं पूछा कि हम क्या चाहती हैं?``
स्त्री कमजोर कहां है? बस वह तो अपनी शक्ति पहचानती नहीं। अपनी शक्ति को पहचाने की सूरत में वह कह उठती हैं-
''प्रकृति की हम बेटियांतूफानों के बीच भीकविता लिख सकती हैंदेती हुई चुनौतीत्रासदी को।``
अहल्या से कहां गलती हुई थी? उसने तो गौतम को देखा था, आवरण के भीतर क्या था, उसे वह नहीं पहचान पाई। एक भूख मिटाकर चला गया और दूसरा उसे सजा नहीं दे सका। सजा मिली निर्दोष अहल्या को। यही सब आज भी हो रहा है। इसी सच को प्रभा ने प्रकट किया-
''कौन था वह पुरुष, अहल्याजो लांघकर सतीत्व की सीमाकर गया नारीत्व का अपमान?क्या था तुम्हारी आंखों मेंउसके लिए,जो डोल गया इंद्रासन?बदल गया शरीरनहीं पहचान सकी तुमक्या दोष तुम्हारा था केवल?``
प्रभा ने समकालीन दौर में भी उस दर्द को महसूस किया जो सदियों पूर्व पत्थर बनती हुई अहल्या ने किया था। इस पूरी कविता में प्रभा स्त्री को अपनी स्वतंत्रता के प्रति जागरूक करना चाहती हैं। अहल्या के दर्द के साथ एकाकार होती हुई प्रभा लिखती हैं-
''लौट आओ अहल्या!मृत्यु के बाद भी जागो तुम!गूंजता है आज भीतुम्हारा ही दर्दमेरे हृद्य में।``

सृजित औपन्यासिक-संसार-
१. आओ पेपे घर चलें :
अपने परिवेश की सीमाओं से ऊपर उठकर विदेशी धरातल पर लिखा गया 'आओ पेपे घर चलें` उपन्यास न सिर्फ प्रभा खेतान का प्रथम उपन्यास है बल्कि हिन्दी साहित्य में भी विश्व की स्त्री का सच बयान करता यह उपन्यास पहला जान पड़ता है।
प्रभा ब्यूटी थैरोपी का कोर्स करने अमेरिका गईं उस दौरान के हुए अपने अनुभवों को बड़ी ही संजीदगी से इस उपन्यास में उभारा है। अमेरिका में प्रभा को लगा मानों लोग भाग रहे हैं, काम ही काम, रात-दिन मेहनत। जीवन-स्तर को और ऊपर उठाने के लिए पैसे परंतु सम्पन्नता के बीच भी टूटते हुए घर और टूटते हुए इंसान। बाहर से खुश दिखते हुए लोग लेकिन मन के भीतर जमता-पिघलता हुआ लावा।
उपन्यास की एक पात्र आइलिन दबंग और आत्मनिर्भर स्त्री है, जो अपनी ७० वर्ष की उम्र में अपने प्रथम पति को प्रेमियों में खोजती हुई जर्जर मन को पेपे (कुत्ते) के सहारे बहलाती है। आइलिन कुत्ते को बेटा मानकर जानवर में आदमी खोजती, जीवन के दुखों को भूलाने के प्रयास में पल-पल मरती हुई महसूस होती है। मरील जो अपने पति से अलग रहती है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते हुए भी दुखी है। पति-पत्नी के अहम् के टकराव से दोनों लड़कियां दिशा भ्रमित हो रही हैं।
डॉक्टर बेरी और हेल्गा का सुविधा-सम्पन्न घर है लेकिन परिवार के सदस्यों की आपसी समझ बिल्कुल भी नहीं। हेल्गा सम्पन्नता में भी अपने दु:ख को याद करती हुई परिवार से छुटकारा चाहती है।एलिजा (मिसेज डी) अपने पति का प्यार पाने के लिए हर प्रकार से समर्पित रहती है मगर वह अपने पति को नहीं पा सकी और आत्महत्या करने का प्रयास करती है। हर प्रकार से सक्षम एलिजा डॉक्टर को टूटकर चाहती है फिर भी उसे तलाक मिलता है।
समग्र रूप से देखें तो आइलिन, हेल्गा, एलिजा, मरील आदि सभी स्त्रियां आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते हुए भी किसी न किसी प्रकार से दुखी हैं। इस उपन्यास का मूल स्वर स्त्री के ईद-गिर्द घूमता है। स्त्री न सिर्फ भारत में दुखों को झेल रही है अपितु वह तो अमेरिका जैसे महान् समझे जाने वाले देश में भी टुकड़ों में जी रही है। इस उपन्यास में प्रभा के अमेरिका प्रवास के अनुभवों का औपन्यासिकरण है, उन्हीं के शब्दों में- ''पिछले चार महीने में जिंदगी के इतने हिस्से देख चुकी थी कि लगता था मेरी उम्र अचानक बहुत पक गई है। औरत की जिंदगी के भयावह सच मेरे सामने पर्त-दर-पर्त उघड़ते गए थे और यहां पर यदि यह स्थिति है, तो मेरे देश में; और वह भी मारवाड़ी समाज में कैसे झेलूगीं?``

२. तालाबंदी :
व्यावसायिक-जगत को कथा की धूरी बनाकर लिखा हुआ सन् १९९१ में सरस्वती विहार, दिल्ली से प्रकाशित 'तालाबंदी` उपन्यास प्रभा खेतान का आत्मकथांश है। उपन्यास का नायक 'श्याम बाबू` प्रभा स्वयं ही हैं। औपन्यासिक बदलाव के लिए मात्र कुछ मिथक जरूर गढ़े गए हैं।
सेठो के यहां मुनीम का काम करने वाले खानदान में जन्में श्यामबाबू पैतृक काम करने से मना कर देते हैं और स्वयं व्यवसाय शुरू करते हैं। वे अपनी रात-दिन की मेहनत के बाद व्यावसायिक-जगत में स्थापित हो जाते हैं।
व्यापार की सफलता से श्यामबाबू ने पैसा तो बहुत कमा लिया मगर वे दिन-प्रतिदिन परिवार के सदस्यों से दूर होते गए। खुद गरीबी में जीए श्यामबाबू को लगता है कि उनके पास सभी कुछ न कुछ पाने की इच्छा से आते हैं, सब स्वार्थवश बंधे हुए हैं। उन्हें अपना बेटा बिगड़ता लग रहा है, वो उसे जन्मदिन पर भी समय नहीं दे पाते हैं। पत्नी थोड़ा-सा समय भी साथ बिताने के लिए तरस जाती है। वह मजदूर यूनियन के जुलूस और धमकियों से आतंकित होती है, पति को अपनी बात पर नहीं मना पाती, हमेशा भयभीत-सी रहती है। मां अपने बेटे को श्रवणकुमार मानती है लेकिन फिर भी शिकायत करती है। बेटा उसे समय नहीं दे पा रहा है। मां को लगता है पैसे पाने के बाद बेटा बदल गया है। श्यामबाबू का भानजा विक्रम भी स्वार्थवश मामाजी की खुशामद करता है।
पारिवारिक स्थितियों से बाहर फैक्ट्री में भी रोज नई समस्याएं आती हैं। सीटू यूनियन के सहयोग से लगभग सब ठीक चल रहा है। शेखर बाबू का सहयोग उन्हें सहारा देता है। यूनियन पर शेखर की जगह स्वयं कमाण्ड करने की लालसा उन्हें मार्क्स को समझने के लिए प्रेरित करती है। वे मास्टरजी के पास पढ़ने जाते हैं और पूर्ण स्वामित्व की भूख के कारण यूनियन तोड़कर दूसरी यूनियन बना देते हैं। फैक्ट्री में दूसरी यूनियन बनती है और उसका नेतृत्व भी कोई अन्य व्यक्ति कर रहा है जो शेखर मुखर्जी और श्यामबाबू दोनों के सामने चुनौती खड़ी करता है। यूनियन की बगावत और घर तक आए जुलूस की वजह से पूरा घर आतंकित रहता है। श्यामबाबू स्वयं तनाव में है। दो-तीन दिन की ऊहापोह के बाद पैसे के बल पर शेखर बाबू से मिलकर सीटू से रिजायन करवाते हैं और फैक्ट्री-गेट पर क्लोजर का नोटिस लगवाकर अप्रत्यक्ष मध्यग्राम में नई फैक्ट्री में काम शुरू करने की झूठी खबर फैलाते हैं। इस प्रकार झूठ-सच और चालाकी से अपने-आप को डूबने से बचा लेते हैं।
यह उपन्यास व्यावसायिक परिवार की कुंठाओं के साथ-साथ व्यवसाय की समस्याओं और मालिक-मजदूर के संबंधों पर दृष्टि डालता है। स्वयं प्रभा के शब्द- ''तालाबंदी उपन्यास में व्यापारिक धोखाधड़ी, श्रमिक आंदोलन, एक व्यापारी का मानसिक तनाव सभी कुछ अभिव्यक्त हुआ है। व्यापार करना इतना कठिन है इसको भली-भांति दर्शाया गया है।``
एक सुविधाभोगी इंसान जो बाहर से देखने पर सुखी और भाग्यशाली नजर आता है, उसके भीतर के हिस्से कैसे चटकते और टूटते रहते हैं, ये इस उपन्यास में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है।

३. छिन्नमस्ता :
प्रभा का 'छिन्नमस्ता` तीसरा एवं सबसे अधिक चर्चित उपन्यास है, जो स्त्री के उत्पीड़न एवं सामर्थ्य की कहानी एक साथ बयान करता है। यह उपन्यास सन् १९९३ में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित है। 'छिन्नमस्ता` की नायिका प्रिया की शादी से पहले की कहानी प्रभा स्वयं की कहानी है।
मारवाड़ी परिवार में जन्मी प्रिया का बचपन उपेक्षित, कुंठित और भयभीत सहमी हुई लड़की का बचपन है। नौ वर्ष की उम्र से ही अंदर तक तोड़ देने वाली घटनाओं के कारण प्रिया का मासूम डरा हुआ मन किसी सुरक्षित कोने को खोजता है। कुछ दिनों के लिए पहले शिक्षक तो फिर पति की मजबूत बाहों के घेरे में वह अपने-आप को सुरक्षित महसूस करती भी है परंतु ये भ्रम भी टूटते हैं। वही छलावा, दुत्कार, उपेक्षा, घृणा उसे मिलती है। अंत में उसे सुरक्षा मिलती है लेकिन वह कहीं बाहर नहीं, अपने अंदर, अपने-आप में।
प्यार से प्रिया का विश्वास उठ जाता है। वो प्यार के नाम पर हमेशा छली गई हैं। उसका मन जहां भावनात्मक लगाव खोजता वहां उसको वह नहीं मिल पाता। हां, उसको प्यार मिला भी और वो भी बेहद आत्मीय लगाव के साथ, मगर वो प्यार अपने कहे जाने वाले लोगों से नहीं मिला। उसे तो प्यार बचपन में दाई मां से और बाद में अपने ससुर की रखैल पत्नी 'छोटी मां` से मिला। दोस्तों के उत्साह और प्यार ने प्रिया को जीवन की शक्ति प्रदान की।
उपन्यास की नायिका के जीवन में संघर्ष और सिर्फ संघर्ष नजर आता है। घटनाओं का सिलसिला कभी खत्म नहीं हुआ। लेखिका ने प्रिया के संघर्षमय जीवन को नीचे से ऊपर उठाया है। १२वर्ष के बेटे का त्याग; कितना कष्टमय कदम? मगर आगे खुला आकाश और सपनों का संसार। प्रिया को लगता बेटे को विरासत में सिर्फ बाप की सम्पत्ति ही नहीं मिलती, उसे बाप के गुण भी स्वत: मिल जाते हैं। बेटे संजू को वो अपने पास रखकर भी विरासत के गुणों को नहीं बचा सकेगी। हुआ भी वही। २०वर्ष का संजू मां के लिए पिता से झगड़ सकता है लेकिन छोटी मां और नीना भुआजी को नहीं अपना सकता।
प्रिया ने अपनी मेहनत और पसीने की बूंदों से व्यापार रूपी सपनों का महल खड़ा किया। प्रिया की छोटी-छोटी सफलताओं को देखकर नरेन्द्र न सिर्फ ईर्ष्या ही करता, वह प्रिया से चिढ़ने भी लगता। एक दिन तो सारी हदों को पार कर नरेन्द्र ने कह भी दिया कि यदि वह व्यापार के सिलसिले में आज लंदन गई तो वापस इस घर में नहीं आएगी। ये घर मेरा है, सिर्फ मेरा। पुरुषत्व के अहम् का यह सच! स्त्री को अपने हाथों की कठपुतली मानने की सदियों से विरासत में मिली पुरुष की आदत है।
प्रिया ने न सिर्फ पुरुष के इस भ्रम को तोड़ा कि इस दुनियां में केवल वही कुछ कर सकता है बल्कि उसने तो समाज, परिवार, अपने-परायों द्वारा खड़ी की गई समस्याओं की दीवारों को तोड़कर अपने जीवन को सार्थक बनाया। प्रिया ने ससुर की छोड़ी हुई अधूरी जिम्मेदारियों को भी पूरा किया। छोटी मां की सेवा और ननद की शादी।
स्त्री उत्पीड़न के ईद-गिर्द घूमते इस उपन्यास में एक जगह लेखिका प्रिया के माध्यम से स्त्री के दर्द को व्यक्त करती है- ''मेरा मन करता है, मैं किसी आदिम शहर की अकेली यात्रा करूं। उन आदिम गुफाओं में अंकित स्त्री-मूर्तियों से पूछूं- क्या तुमने भी वही दर्द झेला है जो हम झेल रही हैं?``

४. पीली आंधी :
प्रभा खेतान ने देखा और भोगा हुआ सामाजिक सच मोतियों की भांति अपनी रचनाओं में पिरोया है। 'पीली आंधी` उपन्यास भी मारवाड़ी समाज के अनछुए पहलू पाठक के सामने पर्त-दर-पर्त खोलता है। सन् २००१ में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित यह उपन्यास आगे चलकर के.के. बिड़ला फाउण्डेशन के बिहारी पुरस्कार से भी नवाजा गया।
उपन्यास की कथावस्तु की ओर बढ़ें तो सुजानगढ़ (राजस्थान) के सेठ गुरुमुखदासजी रूंगटा की हवेली से कथा शुरू होती हुई कोलकाता के 'रूंगटा हाउस` तक की यात्रा करती है।
आजादी से पूर्व वर्तमान राजस्थान अनेक रियासतो में बंटा हुआ था। रियासत का मुखिया राजा होता था। राजा के कुनबे को रजवाड़ा कहा जाता था। रजवाड़ों का आतंक कोने-कोने में पसरा हुआ था और ऐसे में आम जनता जहां शोषित होती हुई भी कहीं नहीं जा पाती थी; वहीं पूंजी कमाने वाले वणिक पुत्र देश के हर कोने में अपनी जगह बना लेते थे लेकिन अपनी मिट्टी की खुशबू को वे नहीं भूला पाते। अपने संस्कारों, खान-पान और पहनावे को बनाए रखते।
ऐसी परिस्थितियों में सूखे धोरों पर चलकर रात के अंधेरे को चिरता हुआ किशनलाल रूंगटा अपनी धरती को हमेशा के लिए छोड़कर जाता है। इस कहानी को प्रभा बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत करती हैं।
माधो पूर्ण निष्ठा के साथ रात-दिन पसीना बहाकर पैसा कमाता है और एक अदना-सी नौकरी से करोड़पति व्यापारी बनने तक की कठिनाईयों भरा सफर पूरा करता है। माधो का छोटा भाई सांवर आंकठ भोग में डूबा है और माधो का मुनीम पन्नालाल सुराणा मालिक (माधो) की मृत्यु के बाद भी पूर्ण इमानदारी से काम करता है। पद्मावती (माधो की पत्नी) अपनी औलाद न होते हुए भी देवर के बच्चों का पालन-पोषण करती है। घर की इज्जत को पति की इज्जत मानती हुई कभी उस पर आंच नहीं आने देती। कितने ही आवरणों से ढकी हुई पद्मावती के अन्तर्मन में क्या है कोई नहीं जान पाया। वह सुराणाजी से प्यार करती हुई भी आगे कदम नहीं बढ़ा पाती। घर में अनुशासन रखती। अपने मन की परतों में दबे हुए दु:ख को कभी प्रत्यक्ष नहीं होने देती। जीवन के अंत में हिम्मत करती है और घर की उसी मान-मर्यादा को जिसे वर्षों से बनाती, बचाती आई थी; को लांघ घर त्याग कर गई हुई बहु को वापिस बुलाती है, उसी के हाथ से अंतिम बार पानी की बूंद ग्रहण करती है।
रूंगटा हाउस की स्त्रियां महंगें वस्त्रों और आभुषणों के संग्रह में ही अपना परम् सुख समझती हैं। वहीं बहु सोमा अपने प्यार के लिए सुविधाभोगी जीवन को त्यागकर एक साधारण प्रोफेसर के घर ज्यादा सुखी महसूस करती है। इस उपन्यास की स्त्री अपनी जगह से न ही तो आगे बढ़ पाती है और न ही पीछे मुड़ पाती है। उसका अपना एक खांचा है और उसमें वो फिट हो चुकी है। सोमा जब इस खांचें को तोड़कर बाहर निकलती है तो पुरुष का अहम् तिलमिला उठता है।
घर के लिए स्त्री का पूर्ण समर्पण चाहिए और यही बात लेखिका उपन्यास की पात्र पद्मावती के द्वारा कहलवाती है- ''घर की नींव में ईंट नहीं होती, बेटा! हम स्त्रियों का त्याग होता है।``
अपनी शोहरत को बनाये रखने को प्रयास करता हुआ रूंगटा हाउस का हर सदस्य अपने मुखोटों को उतार फेंकना चाहता है लेकिन वो इतनी हिम्मत नहीं कर पाता।
संक्षेप में मूल्यांकन करें तो उपन्यास 'पीली आंधी` पारिवारिकता की धूरी विवाह नामक संस्था को कटघरे में खड़ा करता नजर आता है।
यह उपन्यास प्रभा ने अपनी नानी और मां से सुनी हुई कहानी के आधार पर शुरू किया। उपन्यास के पात्र माधो का जीवन के बाद का हिस्सा स्वयं द्वारा देखे हुए परिवेश का प्रकटीकरण है। प्रभा स्वयं के शब्दों में- ''मारवाड़ी समाज को मैंने जैसा देखा और समझा बस उसे ही उकेरने की चेष्टा की।``
५. अपने-अपने चेहरे :
सन् १९९६ में किताबघर, नई दिल्ली से प्रकाशित प्रभा खेतान का 'अपने-अपने चेहरे` उपन्यास अपनी जमीन तलाशती हुई स्त्री की कहानी है। अन्य रचनाओं की मानिंद इस उपन्यास में भी लेखिका के स्वयं के जीवन की घटनाओं के अंश भी मौजूद हैं।
उपन्यास की मुख्य स्त्री पात्र रमा विवाहित पुरुष राजेन्द्र गोयनका से प्रेम करती है। रमा राजेन्द्र के परिवार को खुश रखने के लिए हर संभव प्रयास करती है। वह जितना त्याग उसके लिए कर सकती है, उससे भी ज्यादा त्याग करने के प्रयास हमेशा करती है, फिर भी राजेन्द्र का परिवार उसे नहीं अपना पाता। रमा हमेशा उन लोगों को बाहरी लगती है। समाज उसके चेहरे पर दूसरी औरत होने का लेबल चिपका देता है। हर कहीं उसकी तरफ नजरें उठती हैं और उन नजरों में वह दूसरी औरत होती है।
रमा इस दूसरी औरत की भूमिका से निकलने का प्रयास भी करती है। वह अपना अस्तित्व स्थापित करने के लिए रात-दिन परिश्रम करती है, अपने व्यापार को मजबूत करती है, अपना अलग घर बनाती है। रमा बिना पति और बच्चों के भी पूर्ण स्त्री है और अपने नौकरों के साथ प्यार से रहना उसे परिवार की पूर्णता देता है।
पत्नी, बेटे, बहू, पोते सहित राजेन्द्र गोयनका का भरा-पूरा घर है मगर वह परिवार नहीं बन पाता। कोई एक-दूसरे के लिए नहीं जीता, सब अपने-अपने कोने ढूंढ़ते हैं। किसी को किसी से प्यार नहीं। एक छत के नीचे भी अजनबियों की भांति रहते हैं।
रीतू (राजेन्द्र की बेटी) १८वर्ष अवधि की शादी के बाद अपना घर छोड़कर आ जाती है। उसके पति कुणाल के जीवन में भी दूसरी औरत है। अपने ही पिता के घर रीतू का कोई सहयोग नहीं करता, सब अपनी-अपनी असमर्थता बताते हुए पीछे हट जाते हैं। अंत में रमा ही रीतू को अपनाती है, वही उसका सहयोग करती है।
मूल रूप से इस पुरुष-सत्तावादी समाज में स्त्री सुखी नहीं है, वह शोषित होती है- कभी रमा के रूप में, कभी मिसेज गोयनका के रूप में तो कभी रीतू के रूप में। इन सबके बीच लेखिका ने बड़े सलीके से यह साबित करने का प्रयास किया है कि पुरुष की खोज से अलग हटकर स्त्री अस्तित्व का निर्माण कर सकती है और उसके पास पूरी दुनियां मौजूद रह सकती है। स्त्री स्वयं की पहचान भी होनी चाहिए।
वास्तव में प्रभा ने इस पूरे उपन्यास में स्त्री को सशक्त होने का संदेश दिया है। आगे बढ़ने के लिए स्त्री के अपने पैर मजबूत होने जरूरी हैं। न सिर्फ पैर ही, जिस जमीन पर स्त्री खड़ी है वो जमीन भी उसकी स्वयं उपार्जित हो तभी वह पुरुषवादी सत्ता का सामना कर सकेगी। यही बात प्रभा अपने एक पात्र से कहलवाती हैं- ''पुरुष की जमीन पर खड़े होकर पुरुषों के खिलाफ बोलोगी तो उठाकर फेंक दी जाओगी। अपनी जमीन तैयार करो।``
स्त्री अपना कमाने भर से स्वतंत्र नहीं हो जाती। जरूरत तो स्त्री के प्रति सदियों से बनी इस परिवार व्यवस्था की सोच में परिवर्तन लाने की है। औरत उस अवस्था से उबरे, जिसमें स्त्री को हर प्रकार से कमजोर माना जाता है। जब स्त्री स्वयं अपने-आप को इन भ्रमों के मायाजाल से ऊपर उठकर स्वतंत्र समझेगी तभी वह मुक्त हो पायेगी। ऐसा ही कुछ इस उपन्यास का एक पात्र कहता है- ''मुक्ति केवल आर्थिक नहीं होती। जरूरत तो है कि औरत अपनी मानसिक जकड़न से निकले।``
६. स्त्री पक्ष :
प्रभा खेतान का अंतिम और काफी उद्वेलन भरा उपन्यास 'स्त्री पक्ष` सन् १९९९ में 'जनसता सबरंग` में क्रमश: छपा।
प्रभा के अन्य उपन्यासों में स्त्री का संघर्षमय जीवन और मारवाड़ी (उच्चवर्गीय) परिवारों से उठाए गए कथानक हैं परंतु 'स्त्री पक्ष` में इससे अलग हटकर मध्यमवर्गीय परिवारों से कथा का सूत्रपात किया गया है।
यह उपन्यास किशोरवय में प्रवेश करती हुई लड़की के भीतर-बाहर होते हुए मानसिक-शारीरिक परिवर्तनों को इंगित करता है। तूफान और आवेश की इस वय में लड़की वृंदा को अपने में होते परिवर्तन कभी लुभाते हैं तो कभी उसे एक साथ हजारों विरोधाभासी सवाल घेरकर भयाक्रांत कर देते हैं। बनते-टूटते सपनों के साथ वह इस दुनियां को पलभर में समझ लेना चाहती है परंतु उसका बौद्धिक स्तर अभी शैशवावस्था में ही विचरण करता है।
वृंदा स्वतंत्र विचारों की लड़की है। वह अपने जीवन को अपनी इच्छा से जीना चाहती है। इसीलिए शादी से इन्कार करती है। कॉलेज में अनीश से प्रभा की अच्छी दोस्ती है। वह उससे अपने दु:ख-सुख की, जीवन के ख्वाबों की बातें करती है मगर अपनी मर्यादा से आगे नहीं बढ़ती। एक रोज पार्टी में बीयर पीने के कारण वह कॉलेज में बदनाम हो जाती है। उस दिन वह घर तो सुरक्षित आ जाती है लेकिन उक्त घटना उसे समझा जाती है कि स्त्री कहीं सुरक्षित नहीं। वह कमजोर है, अकेली नहीं जी सकती, उसे एक पुरुष की जरूरत है क्योंकि पुरुष ही उसे सुरक्षा दे सकता है। वृंदा ने मां-बाप के कहने पर सुमित से शादी कर ली। शादी के बाद कुछ दिन सबकुछ सामान्य चलता है। पति डॉक्टर बन जाने और आय बढ़ने के बाद आशिक मिजाज व्यक्ति बन जाता है। वृंदा पति के इस रवैये से परेशान होती है, फिर भी संयमित रहने का प्रयास करती है।
यहां तक उपन्यास घरेलू दिनचर्या के साथ आगे बढ़ता है। उपन्यास में रोचकता मानो खो-सी गई है। अपने ही सवालों से घिरी वृंदा पाठक को अपनी ओर नहीं खींच पाती।
सुमित के तलाक देने के निर्णय के साथ ही उपन्यास में जबरदस्त मोड़ आता है। वृंदा थोड़ी जद्दोजहद के बाद तलाक के कागज पर दस्तखत कर देती है। उसी लैट में रहती हुई वृंदा अपना बुटीक खोल लेती है। अपनी आत्मनिर्भरता के बाद वृंदा अच्छा महसूस करती है। बच्चों को वह बड़े प्यार से पाल रही है। उनको हर सुविधा मुहैया कराने की कोशिश करती है और तभी ३२ वर्षीया वृंदा के जीवन में २५ वर्षीय युवक आर्जव आता है। आर्जव पेंटर है। बच्चे आर्जव को अपना लेते हैं। आर्जव भी घर, बच्चे सबको आगे बढ़कर संभाल लेता है।
वृंदा बच्चों को पिता से तोड़ती नहीं है और बच्चे पापा से मिलने भी कभी-कभी चले जाते हैं। पितृसत्ता की परम्परा यहां भी कायम रहती है। वृंदा का बेटा रचित अपने पिता की सुविधाभोगी जिंदगी को देखकर उसी के पास चला जाता है लेकिन बेटी रीमा ने अपनी मां का साथ दिया। रीमा अपनी मां का पूरा सहयोग करती है।
आर्जव को मुंबई में बड़ा काम मिलता है और वह वृंदा से कहता है कि हम सब वहीं चलें। वृंदा इस बात को सुनकर खुश नहीं हो पाती। वह अपने पिछले जीवन की तरह आज्ञाकारिणी पत्नी बनकर पति के पीछे लटकना नहीं चाहती। वह यह भी चाहती कि आर्जव जैसे अब तक रह रहा था वैसे ही मेरे घर को संभाले और मैं अपने कारोबार की मालकिन बनी रहूं। आर्जव को वृंदा यहीं रहने के लिए कहती है लेकिन जब आर्जव अपने बनते कैरियर को नहीं छोड़ना चाहता तो वृंदा उससे कह देती है कि पूरे जीवन कोई किसी से प्यार नहीं करता। दोनों में सहमति नहीं हो पाती और आर्जव मुंबई चला जाता है। दोनों का अहम् उन्हें एक नहीं रहने देता। वृंदा आर्जव को स्टेशन तक छोड़ने जाती है और वापिस आते समय वह अपना घर बनाने का निर्णय लेती है। एक ऐसा घर जिसमें किसी पुरुष की मेहनत का एक पैसा भी न लगा हो।
रोजमर्रा की छोटी-छोटी परेशानियां स्त्री को कितना झकझोर जाती हैं पुरुष को इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं होती। उसको रोज अपने सभी सुविधाएं पूरी मिलनी चाहिएं। पत्नी ये सब कैसे करें इस बात से उसे कोई मतलब नहीं। वह कमाता है और मालिक है अत: उसका चाहा सब होना जरूरी है। इन सबके पीछे पत्नी का मन कितना आहत होता है और कैसे वह रोज अंधेरे कोने में अपने-आप को फिट करना शुरू कर देती है। यही सब प्रभा ने इस उपन्यास के माध्यम से व्यक्त किया है।
किशोरी होती लड़की से लेकर परिपक्व और आत्मनिर्भर स्त्री तक के सफर को प्रभा ने बड़ी ही सतर्कता से लिखा है। प्रभा ने स्त्री की छोटी-छोटी समस्याओं को पाठकों के सामने लाने का एक सफल प्रयास इस उपन्यास में किया है।
उपन्यासिका-
१. अग्निसंभवा :
मासिक पत्रिका 'हंस` के मार्च, अप्रेल, और मई, १९९२ के अंकों में क्रमश: प्रभा की यह रचना छपी। रचना प्रवृत्ति के हिसाब से इसे उपन्यासिका की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है। जो कि लम्बी कहानी और उपन्यास के मध्य की श्रेणी है।
'अग्निसंभवा` चीन की महिला आइवी पर केन्द्रित है और इसी बहाने आसपास की घटनाओं के समुच्य को दर्शाया गया है।
आइवी चीन के साधारण किसान परिवार की महिला है। शराबी पति आइवी के साथ रोज मारपीट करता रहता है। आइवी रात-दिन खेतों में काम करती फिर भी उसे प्रताड़ित किया जाता। उसकी बेटी को जन्मते ही मार दिया गया। जब उसने विरोध किया तो उसकी सास ने बताया कि मेरी तो दो बेटियां पानी में डूबो दी गई थीं। ऐसे परिवेश से शुरू हुआ आइवी का संघर्ष उपन्यास के अंत तक हांगकांग में ब्रांच मैनेजर पद तक पहुंचाता है।
पति के घर से भागकर आइवी एक फैक्ट्री में काम करती है। वहां रात-दिन मजदूर खटते हैं फिर भी उन्हें पूरा पारिश्रमिक नहीं मिलता। शोषण और भ्रष्टाचार को देखकर आइवी वो काम छोड़ देती है। रोजगार के लिए हांगकांग भाग आती है। वहां आकर लम्बे समय तक टैक्सी चलाती है और अपनी इमानदारी तथा कर्मण्ठशीलता के बल पर कम्पनी में नौकरी पाती है। आइवी अपने देश से बहुत प्रेम करती है। इसी वजह से वह अपने बेटे को भी चीन में ही रखती है और वहां क्रांतिकारियों में शामिल बेटे को पुलिस की गोली लग जाती है। आइवी महत्त्वाकांक्षी है, वो संतुष्ट होना नहीं जानती। शिव (अपने मैनेजर) की वास्तविक शिकायत करके वह स्वयं ब्रांच मैनेजर बनती है। शिव के साथ संबंध टूटने के बाद भी वह शिव के बेटे बॉब को अपने पास रखती है और बड़े प्यार से उसका पालन-पोषण करती है।
आइवी की कहानी के साथ-साथ प्रभा ने चीन में शोषित होती स्त्री और मजदूर वर्ग पर तथा चीन की क्रांति एव मार्क्सवाद पर भी प्रकाश डाला है।
लेखिका ने स्त्री के संघर्ष को वैश्विक स्तर पर उभारा है। स्त्री ठान ले तो आइवी की तरह सक्षम बन सकती है। इस उपन्यासिका में लेखिका का मूल मकसद यह संदेश देना है कि स्त्री हर जगह से, हर परिस्थिति से उठकर अपना लक्ष्य हासिल कर सकती है। स्त्री का आत्मबल और इच्छा शक्ति की जागृति ही प्रगति और आजादी का मूल आधार है।
२. एड्स :
छोटी-छोटी घटनाओं को गंभीरता से उठाती प्रभा खेतान की ये उपन्यासिका; जिसे लम्बी कहानी भी माना जा सकता है, पत्रिका 'आज` पूजा वार्षिकांक में प्रकाशित हुई। प्रभा ने इसमें विदेश यात्राओं व विदेशों में कदम-कदम पर समस्याओं का सामना करती हुई स्त्री का सूक्ष्मता से वर्णन किया है।
एक अमेरिकन व्यक्ति विश्व के सबसे बड़े पांच नगरों में अपने घर बनाता है, फिर भी बेघर भटकता है। वह अपने जीवन के प्रति आशंकित है। पत्नी को एड्स है। वह डॉक्टरों से अपने शरीर की पूरी जांच करवाता है और जांच में एच.आई.वी. रिर्पोट नेगेटिव होती है। फिर भी उसे डर है कि पत्नी की लाइलाज बीमारी एड्स उसे न ग्रस ले।
पत्नी सुखद दाम्पत्य जीवन में भी पति के दोस्त के प्रेम में आकंठ डूब जाती है और उसी से उसको एड्स मिल जाती है। वह अपने पति के सामने सब कुछ स्वीकार कर लेती है फिर भी पति उसे अपनाए रखता है। अस्पताल में पत्नी से मिलने जाता है, सीसे की दीवार के उस ओर पत्नी पल-पल करीब आती हुई मौत को देख रही है। अकेलेपन से त्रस्त वह व्यक्ति मानवीय संवेदना का स्पर्श चाहता है। बेटी उन दोनों को छोड़कर अपनी नानी के पास चली गई है क्योंकि उसे भी मृत्यु से डर लगता है।
दुनियां भर में पैर पसारती हुई एड्स जैसी गंभीर बीमारी और उससे भयाक्रांत इंसान का वर्णन प्रभा ने इस कहानी में किया है। वहीं पश्चिमी देशों में टूटते हुए परिवार की व्याख्या है। वहां अकेलेपन का दंश झेलता हुआ मनुष्य भौतिक सुविधाओं के बीच टूटता रहता है। वह मानवीय समर्पण को खोजता है लेकिन मिल नहीं पाता है।
विश्व पटल पर लिखी इस रचना में प्रभा पश्चिमी संस्कृति के अनेकों सच पाठकों के सामने बेहतर ढंग से रखने में सफल हुई हैं।
सृजित चिंतनपरक-संसार-
१. उपनिवेश में स्त्री :
मुक्ति कामना की दस वार्ताएं - हिन्दी में नारीवाद को शंका की दृष्टि से देखा जा रहा है। पितृसत्ता के रखवालों को लगता है कि यदि स्त्री अपने बारे में सोचने लगी तो हमारा नेतृत्व छूट जाएगा। वे यह कहकर नारीवाद को अस्वीकृत कर देते हैं कि भारत में नारी को हमेशा सम्मानजनक स्थान प्राप्त था, ये नारीवाद तो पश्चिम से आयातित है अत: यहां इसका कोई औचित्य नहीं।
नारीवाद के प्रति बने इन सभी भ्रमों, पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों को प्रभा खेतान अपनी 'उपनिवेश में स्त्री : मुक्ति कामना की दस वार्ताएं` पुस्तक के माध्यम से विस्तृत और स्पष्ट तरीके से दूर करने का प्रयास करती हैं। यह पुस्तक सन् २००३ में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई। स्त्री और उपनिवेश को एक साथ उठाती हुई प्रभा अपने विषय को दस अध्यायों में बांटकर भारतीय नारीवादी दृष्टिकोण को स्पष्ट करती हैं।
पुस्तक की भूमिका में ही प्रभा स्पष्ट करती हैं कि नारीवाद को निश्चित सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। उनके शब्दों में- ''स्त्री के अधिकारों की चर्चा करने पर पूछा जाता है कि वह किस राष्ट्र की नागरिक है? उसका धर्म, उसकी जाति, उसका सम्प्रदाय क्या है? इन सवालों का जवाब यह है कि नारीवाद को राष्ट्रीय सीमा में बंद नहीं किया जा सकता।``
पुरुष ज्ञान का स्रोत विचार को मानता है, भावना को नहीं। वह तर्क और पद्धति को मान्यता देता हुआ हार-जीत की भावना रखता है परंतु नारीवादी चितंक ज्ञान का स्रोत भावना आधारित स्वीकारती हुई सत्य को शिव के साथ एकाकार की पक्षधर हैं।
'आधी दुनियां का श्रम और भूमंडलीकरण` नामक प्रथम अध्याय में प्रभा एक व्यवसायी स्त्री होने के नाते अपने अनुभवों को संजोते हुए भूमंडलीकरण के दौर में आधी आबादी (स्त्री) का सच सामने लाती है। भूमंडलीकरण स्त्री के लिए जितना लाभ की स्थिति में रहा उससे अधिक हानिकारक साबित हुआ है। स्थानीय पूंजी का सीधा संबंध अंतरराष्ट्रीय पूंजी से है। अंतरराष्ट्रीय स्तर की मांग स्थानीय श्रम की गतिविधि को निर्धारित करती है। श्रम की सैद्धांतिक स्पष्टता जब तक श्रमजीवी स्त्री समझ नहीं लेती तब तक वह शोषण का विरोध नहीं कर पायेगी। लेखिका का मानना है कि भूमंडलीय स्तर पर विश्व की स्त्री को अपनी स्थानीय समस्याओं को समझना होगा।
स्त्री ने घर से बाहर सार्वजनिक स्थानों पर पुरुष के बराबर अपनी उपस्थिति तो कायम की है लेकिन वह वहां भी दोयम दर्जे पर ही है। स्त्री को पारिश्रमिक पुरुष से कम ही मिलता है। प्रभा यूनियन को भी पुरुष प्रधान संस्था मानती हैं। प्रभा मानती हैं कि भारतीय स्त्री को आर्थिक स्वतंत्रता के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय होना पड़ेगा।
भारतीय परम्परा ने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि सभी जगहों पर पुरुष वर्चस्व को स्थापित किया है। अपनी सत्ता स्थापित करने में पुरुष ने स्त्री को माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया। साहित्य जगत में भी पितृसत्तात्मक इस परम्परा ने अपना परचम लहराया। पुरुष द्वारा दिखाए रास्ते पर चलती हुई स्त्री जब साहित्य में परम्परागत आदर्शों को मानती रहती है तो आलोचक उसे स्वीकारते हैं। स्त्री जब बेबाकी से अपने अनुभवों को लिखती है तो उसके लेखन को उच्छंृखल कहकर हाशिए पर धकेल दिया जाता है।
कुछ आलोचक तो स्त्री द्वारा लिखे साहित्य को पढ़ते ही नहीं। कुछ पढ़कर सहानुभूति दर्शाकर रह जाते हैं। कुल मिलाकर स्त्री साहित्य को नकारा जाता है। पुरुष ने स्त्री को अपने साहित्य में स्थान दिया मगर वह एक उपभोग की वस्तु मात्र बना दी गई। सुनिता हो या पारो पुरुष के लिए बनाई गई थीं, उनका स्वयं का अस्तित्व नहीं था। इसको स्पष्ट करती हुई प्रभा लिखती हैं- ''कोई पारो थी, कोई सुनीता, जो अपनी बात कहना चाहती थी, मगर ठीक से कभी कह नहीं पाई।``
लेखिका मानती हैं कि चाहे कितने उदार लेखक हों, प्रेमचंद या जैनेन्द्र जैसे भी मगर वे भी मानवतावादी बाद में और पुरुष पहले थे तभी तो शरत की पारो की पीड़ा किसी को नहीं दिखाई दी। प्रभा के अनुसार स्त्री अपनी मानवीय गरिमा और अधिकार को समझकर संरचनात्मक, सांस्कृतिक तथा मानवीय दृष्टिकोण के तत्त्वों का विश्लेषण करे।
नारीवाद के बौद्धिक सरोकार और सनातन धर्मवादी राष्ट्र में नारीवाद की भूमिका पर 'बौद्धिक सरोकार, राष्ट्रवाद और नारीवाद की जमीन` अध्याय में प्रभा ने विस्तृत चर्चा की है। प्रभा ने पश्चिमी नारीवाद का मूल्यांकन भारतीय परिप्रेक्ष्य में किया है। प्रभा के अनुसार नारीवाद को राष्ट्रों की सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता क्योंकि फिर राष्ट्र के भीतर भी जाति, वर्ग, सम्प्रदाय आदि में इसे और बांटा जायेगा।
बुद्धिजीवियों की दो श्रेणी हमारे यहां है। प्रथम पारम्परिक बुद्धिजीवी है, जिनकी भूमिका हमेशा अपरिवर्तित रही है- शिक्षक, पुरोहित, प्रशासक आदि। दूसरा विशिष्ट व्यावसायिक संस्थानों से जुड़ा है और वह बौद्धिक क्षमता द्वारा वर्गीय सत्ता पर नियंत्रण रखता है। नारीवाद को अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना होगा और स्त्री संघर्ष के इतिहास को सुव्यवस्थित भी करना होगा। प्रभा कहीं भी पुरुष से विद्वेष रखने की राह नहीं दिखाती। वे तो समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर देती हैं। प्रभा तो यह मानती हैं कि मानव समाज के लिए स्त्री के मन में भी उतना ही आदर है जितना कि एक पुरुष के मन में है।
परम्परा से ही समाज ने स्त्री को अधीनस्थ स्थिति में रखने के लिए संस्कृति का जाल बुना है। प्रभा ने पितृसत्ता के विभिन्न सांस्कृतिक हथियारों की चर्चा की है। पुरुष ने विश्व की श्रेणीबद्ध कल्पना में सबसे ऊपर ब्रह्म, ईश्वर, अल्लाह को रखा है और फिर क्रमश: सवर्ण, शूद्र। सबसे नीचे जाकर स्त्रियां तथा जानवर माने हैं। इतना होते हुए भी मानवीय मूल्यों को बचाए रखने के लिए स्त्री को ही कहा जाता है।
समीक्षक श्रीधरम के शब्दों में- ''प्रभा खेतान के अनुसार २१वीं सदी में नारीवाद को समझने के लिए एक नया दृष्टिकोण विकसित करना होगा। क्योंकि नारीवाद में उमड़े अंतर्विरोधों और विरोधाभासों को समझकर ही यह समझा जा सकता है कि नारीवाद में कितना बिखराव है साथ ही यह सत्ता और व्यवस्था के स्वर में कितना अलग है।``
प्रभा चाहती हैं कि नारीवाद का उद्देश्य स्त्री उद्धार और मानव मुक्ति हो। कहीं नारीवादी चिंतन भी पुरुषों की तरह ही न चलने लगे।
पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की यौन प्रवृत्ति को पुरुष ने अपनी कामना तक सीमित रखा है, स्त्री के सुख के बारे में उसने कभी नहीं सोचा। पुरुष केन्द्रित ये यौन मानसिकता स्त्री को गुलाम मानसिकता प्रदान करती है। प्रभा 'यौनिकता की राजनीति` अध्याय में इसी मुद्दे पर अनेक प्रश्न उठाती हैं। प्रभा के अनुसार जब स्त्री के सुख का सवाल ही नहीं रखा जाता फिर इतरलिंगी संबंध ही क्यों स्वीकारे जाते हैं। पाश्चात्य नारीवादियों के विचारों की समीक्षा करते हुए प्रभा ने यौन जीवन में सत्ता के स्थान पर आनंद की प्रधानता पर बल दिया है। समलिंगी यौनिकता का यह सबसे मजबूत पक्ष है क्योंकि आनंद कोई बाह्य वस्तु नहीं, आनंद तो एकदम आंतरिक अनुभूति है। प्रभा समलिंगी यौन व्यवस्था को नारीवाद का प्रयास नहीं मानती। लेकिन वो मानती हैं- ''शिश्न-प्रवेशरहित 'काम` का प्रचार किया जाए तो यह अधिकार स्त्रियों के पक्ष में जाएगा। इससे समलैगिंकता की समस्या को समझने में सहायता मिलती है।``
'सामाजिक सरोकार उर्फ आक्रमकता की खोज` नामक अध्याय प्रभा राजेन्द्र यादव के लेख 'होना, सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ` से शुरू करती हैं। प्रभा के अनुसार इस लेख में राजेन्द्र यादव की पितृसत्तात्मक मानसिकता उनको स्त्री के दैहिक अस्तित्व से आगे नहीं जाने देती। यदि उनकी जगह कोई स्त्री होती तो पितृसत्ता की बेहतर आलोचना कर पाती। प्रभा के अनुसार स्त्री की स्थिति हमेशा तरल है ठोस नहीं। स्त्रियां पितृसत्ता के दमन और उत्पीड़न का शिकार हैं। इतना होते हुए भी स्त्री के मानवीय मूल्य पुरुष के मूल्यों पर भारी पड़ते हैं। प्रभा अपना स्वयं का उदाहरण देते हुए लिखती हैं- ''निस्संदेह किसी स्वर्णिम अतीत की कल्पना मेरे जेहन में नहीं है। स्त्री-जाति का कोई इतिहास नहीं हुआ और न ही हमारे नाम पर राजकाज हुए। आज जो है वही सुखद स्थिति है। इससे अधिक स्वतंत्र मैं कभी नहीं थी।``
प्रभा के अनुुसार ''स्त्री स्वयं अपनी देह के प्रति नया दृष्टिकोण निर्धारित करे, अपनी देह के संसाधन का महत्त्व पहचाने। इसी दैहिकता के आधार पर वह प्रकृति के इतने करीब है।``
'क्रांति-चेतना के नारी-रूप` शीर्षक निबंध में प्रभा ने मार्क्सवादी क्रांति चेतना में नारीवाद के स्वरूप पर विचार किया है। प्रभा नारीवाद के संदर्भ में मार्क्स की सीमाओं को चिहि्उात करती हैं। आंदोलन के भीतर यौन विभाजन को मान्यता देना, मार्क्स के समतामूलक समाज में भी पितृसत्तात्मक संस्था स्त्री को सर्वहारा बनाए रखने के पक्ष में जाती है। मार्क्सवाद पूंजीवाद को नियंत्रित नहीं कर पाए क्यांेकि वे दुनियां की आधी आबादी को साथ लेकर नहीं चले। अत: लेखिका के अनुसार ''हमें एक नई 'दास कैपिटल` भी लिखनी चाहिए और एक नया 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र` भी लिखना चाहिए जो न केवल पूंजीवाद के बदले हुए चेहरे का एक बार फिर जायजा लेगा बल्कि वर्ग-समाज में यौन-विभाजन की उस उलझन को भी सुलझाएगा जिस मार्क्स ने नजर अंदाज कर दिया था।``
'भाषा और विमर्श का संजाल` अध्याय में प्रभा वात्स्लाव हावेल तथा नेल्सन मंडेला को सत्तर के दशक में निष्प्राण कौम में राजनीतिक संस्कृति को पुनर्परिभाषित करने का श्रेय देती हैं। इस अध्याय में प्रभा ने उत्तर आधुनिकतावाद, संरचनावाद एवं उत्तर-संरचनावाद के संदर्भ में विस्तृत चर्चा की है। प्रभा के अनुसार इस उत्तर-संरचनावाद के युग में अस्तित्ववाद को समझना होगा। स्त्री ने अभी-अभी बोलना ही सीखा है अत: उत्तर-आधुनिकवादियों को स्त्री के इतिहास को स्वीकारना होगा। स्त्री को मुक्ति की दिशा जहां से मिले उसे वो स्वीकारनी चाहिए।
निष्कर्ष रूप में प्रभा के इस संग्रह से नारीवाद की भ्रांतियां दूर होगीं और नारीवाद को समझना भी इससे कुछ हद तक आसान होगा। स्त्री विमर्श के लिए यह पुस्तक एक बड़ी उपलब्धि है।
२. बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ - भूमंडलीकरण के स्त्री प्रश्न :
प्रभा खेतान की यह छह अध्यायों में विभक्त चिंतनपरक पुस्तक है। सन् २००४ में वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित इस कृति में प्रभा की बौद्धिक परिपक्वता और गहन अध्ययन-विश्लेषण क्षमता प्रत्यक्ष रूप से देखी जा सकती है। प्रथम अध्याय 'एक प्रश्नवाची समय` में भूमंडलीकरण पर वृहद् रूप से विश्लेषण किया गया है। अपने अनुभवों और विषय से संबंधित अनेक देशों के आंकड़ों के आधार पर प्रभा ने भूमंडलीय प्रक्रियाओं का खाका पाठक के सामने खींचा है। भूमंडलीकरण का व्यक्ति के जीवन पर अच्छा और बुरा असर एक साथ पड़ा है। अमीरी और गरीबी की खाई अधिक बढ़ी है। बाजार उत्पादित साधनों से भरा है मगर आम इंसान की क्रय शक्ति उसके एवज में नहीं बढ़ी। सामान्य व्यक्ति की आय को बढ़ाने वाले स्थानीय व्यवसाय बढ़े परंतु वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों से प्रतियोगिता नहीं कर पाते और एक-एक कर दम तोड़ते रहे हैं। एक तरफ मजदूर की आय घटी ही नहीं, उसे काम भी नहीं मिल पाता तो दूसरी तरफ एक सुविधाभोगी तबका दिन-रात पूंजी को केन्द्रित करता जा रहा है। यही नहीं प्रभा के अनुसार किसान भी बहुमंडलीकरण के चंगुल में फंसता जा रहा है। उसके छोटे-छोटे कृषि भूमि के टुकड़ों को हड़प कर बड़े-बड़े सुविधाभोगी कृषि क्षेत्र निर्मित किए जा रहे हैं और वहां किसान की आवश्यक उपज के बजाय निर्यात के लिए गुलाब के फूल उपजाए जा रहे हैं। इससे किसान की आय बढ़ी मगर साथ ही बाजार पर उसकी निर्भरता बढ़ती जा रही है और अनाज उसे महंगा दिया जा रहा है। गैट समझौते का भी किसान पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।
प्रकृति से पानी, जंगल, हवा आदि जिसका अधिकार हमें मिला पेटेंट कानून द्वारा बहुराष्ट्रीय कम्पनियां उन पर नियंत्रण करती जा रही हैं। कुछ शक्तिशाली राष्ट्र यू.एन.ओ, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संघ को अपने हित के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। प्रभा यह भी मानती हैं कि- ''स्वतंत्र बाजार ने विज्ञापन द्वारा प्रत्येक देश की संस्कृति को प्रभावित किया है।`` भूमंडलीकरण का प्रभाव स्त्री पर भी उतना ही पड़ा है जितना पुरुष पर। प्रभा के अनुसार एक तरफ भूमंडलीय प्रक्रियों के कारण स्त्री को काम के लिए क्षेत्र मिला है फलत: वह शक्तिशाली और आत्मनिर्भर बनी है। उसकी सामाजिक भूमिका में परिवर्तन आया है। घर से बाहर जाने का अवसर मिला है तो दूसरी तरफ स्त्री पर इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ा है। भूमंडलीय व्यवस्था में स्त्री श्रम का शोषण हो रहा है, उसे नई जटिलताओं का सामना भी करना पड़ रहा है।
चूंकि प्रभा खुद निर्यात उद्योग से जुड़ी हुई थीं उन्होंने अपने ३५ वर्ष के व्यावसायिक अनुभव से उदारीकरण की नीतियों से पैदा होने वाली चमक-दमक के कारण श्रम बाजार के भीतरी हालातों पर विचार किया। 'श्रम के स्त्रीकरण की हकीकत` शीर्षक निबंध में प्रभा ने बाजारवादी नव-उदारवाद से स्त्री-श्रम पर पड़ने वाले प्रभावों को विस्तार से स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उदारीकरण अपने साथ बाजार में लुभाने वाले और सुविधाभोगी सामान का अम्बार लेकर आया है। प्रभा के अनुसार भूमंडलीकरण ने स्त्री के लिए रोजगार के दरवाजे जरूर खोले हैं मगर उसके श्रम का शोषण हुआ है।
स्त्री को बड़े समूह में फैक्ट्रियां रोजगार देती हैं क्योंकि उनका श्रम सस्ता होता है और छंटनी करने में भी सुविधा होती है। उपद्रव का भय भी नहीं रहता। अविवाहित स्त्रियां ऑवर-टाइम काम करती हैं और उनको मातृत्व अवकाश एवं शिशुगृह की व्यवस्था की जरूरत भी नहीं पड़ती अत: उनकी अधिक मांग होती है। स्त्री के काम के घंटे भी ज्यादा होते हैं क्योंकि वह घर जाकर भी काम करती है मगर उसके काम को सेवा का नाम देकर श्रम में नहीं आंका जाता।
नई तकनीक ने जहां पढ़ी-लिखी युवा स्त्री के लिए नये रोजगार के साधन उपलब्ध कराएं हैं वहीं प्रभा मानती हैं- ''अधिकतर स्त्रियां जो कम शिक्षित और उम्रदराज हैं, बेरोजगार हुई हैं।``
प्रभा अपनी फैक्ट्री के उदाहरण से ये बताने की कोशिश भी करती हैं कि नई तकनीक जो सुविधापूर्ण है का प्रयोग पुरुष करना चाहते हैं और स्त्रियांे को पीछे धकेलकर अपना स्थान बना लेते हैं। स्त्री अपनी आय में से अपने ऊपर बहुत कम खर्च कर पाती हैं। वे अपनी इच्छाओं को परिवार की इच्छाओं पर बलिदान कर देती हैं।
प्रभा ने विश्व के कई देशों का जायजा लिया और स्वीडन और वियतनाम जैसे देशों की स्त्रियों की स्थिति को विकसित कहे जाने वाले देशों की तुलना में बेहतर पाया। प्रभा के अनुसार भारत में शहरी, उच्च शिक्षा प्राप्त स्त्री उद्योग से निकलकर सेवा क्षेत्र में जाना पसंद कर रही है। बाजार व्यवस्था स्त्री-पुरुष संबंधों में एक हद तक परिवर्तन लाई है। बाजार के आगे परिवार ने घुटने टेके हैं और लड़कियों के कैरियर की चिंता करते माता-पिता ने विवाह की उम्र में वृद्धि को स्वीकार किया है।
भूमंडलीकरण ने बाजार के उत्पाद के साथ ही वेश्यावृति के रूप को किस प्रकार बदल दिया इस उलझे हुए एवं बहुत ही जटिल विषय को प्रभा ने 'यौनकर्म की कीमत` शीर्षक निबंध में उठाया है। वेश्यावृति आज के युग की देन नहीं, सभी राष्ट्रों में यह पहले से ही किसी न किसी रूप में मौजूद थी। बस फर्क इतना है तब यह सेवा कुछ सामंती और धनाढ़्य लोगों के लिए हुआ करती थी ओर आज सामान्य पुरुष के लिए भी सुलभ है।
लेखिका के अनुसार आज सैक्स वर्कर फाइफस्टार होटलों के वातानुकूलित कमरों में सेलफोन के माध्यम से ग्राहकों से संपर्क करती हैं। आने वाले ५० वर्षों में भी यौनकर्म चलता रहेगा मगर इनके जीवन स्तर में सुधार आएगा। इस व्यवसाय का संचालन करने वाले लोग कभी समाज के सामने नहीं आते और अपना जाल कुछ इस प्रकार फैलाए रखते हैं कि समाज की आंखों से ओझल हो ज्यादा से ज्यादा लड़कियां खरीदी और बेची जाएं।
भूमंडलीकरण में लड़कियों की खरीद-फरोख्त में कुछ अंतर आया है, उसको लेखिका कुछ इस प्रकार दर्शाती हैं- ''भूमंडलीकरण के बाद से बेटियों के व्यापार में कुछ परिवर्तन हो रहे हैं। अब उन्हें सीधे नहीं बेचा जाता बल्कि माता-पिता या उसके अभिभावक उसे गिरवी रखकर ऋण लेते हैं जिसमें लड़की की भूमिका गौण होती है।`` दक्षिण एशिया के गरीब राष्ट्रों से लेकर अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्रों तक यौन उद्योग अपनी जड़ जमाए हुए है। थाईलैंड, फिलीपींस जैसे छोटे राष्ट्रों से बड़ी संख्यां में लड़कियों का निर्यात किया जाता है।
प्रथम विश्वयुद्ध व सैन्य-शक्ति के विस्तार के साथ ही वेश्यावृति भी बढ़ती गई। युद्ध में थके हुए और तनावग्रस्त सैनिकों को राहत के लिए वेश्याएं उपलब्ध कराई जाती और इसी कारण सैनिक छावनियों के आसपास वेश्यावृति के अड्डे पनपे।
एशिया में देह व्यापार की नींव प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पड़ी और वियतनाम युद्ध के दौरान इसे बहुत बड़ा प्रोत्साहन मिला। अमेरिकी फौजों के जवान देह के एवज में डॉलरों में भुगतान करते और यह स्थानीय मुद्रा में बड़ी रकम होती थी। युद्धों की समाप्ति के बाद यह उद्योग सैनिकों की जगह पर्यटन के रूप में विकसित होने लगा।
लेखिका के अनुसार- ''वेश्यावृति एक नयी विकसित रणनीति है। आज यह केवल गरीब स्त्रियों की रोजी-रोटी से संबंधित नहीं बल्कि इसके आधार पर राष्ट्र अपना विकास कर रहे हैं।``
सैक्स वर्करों के कारण डॉक्टरों और दवा उद्योग का व्यवसाय करोड़ों रुपयों में आमदनी कर रहा है।
इस व्यवसाय में अधिकतर कम उम्र की लड़कियों को उतारा जाता है। कभी-कभी तो रजस्वला होने से पूर्व ही देह व्यापार में लड़कियां धकेल दी जाती हैं। इस विडम्बना को प्रभा लिखती हैं- ''अधिकांश लड़कियों को धोखे से व जबरदस्ती इस व्यापार में लाया जाता है क्योंकि ग्राहक नाबालिग 'अक्षत` तथा रोगमुक्त कन्या वेश्याओं की मांग करते हैं। कुछ समय पश्चात् उनमें एच.आई.वी. एड्स के लक्षण पाये जाते हैं। इस रोग तथा देह व्यापार की शिकार कई लड़कियों की भर्ती किशोरावस्था में हुई थी जिन्हें २२-२३ वर्ष की उम्र में ग्राहकों द्वारा नकारे जाने के बाद चकलाघरों के मालिकों द्वारा बाहर फेंक दिया जाएगा एवं संभवत: तीस वर्ष के आसपास उनकी मृत्यु हो जाएगी।``
देह व्यापार ने निर्धन समुदाय में बेटियों को मूल्यवान बना दिया। थाईलैण्ड में कई बेटियों वाला परिवार भाग्यशाली माना जाता है। भारत में भी वेश्याओं की बड़ी संख्या दलित एवं अछूत वर्ग के अत्यंत गरीब तबकों से और कुछ आदिवासी समूहों से भी आती हैं। ये औरतें शोषण के तीन गुणा भार से पीड़ित हैं- गरीबी, दलित और स्त्री होना।
आज एक तरफ जहां विश्व मानवीय मूल्यों एवं अधिकारों की बात करता है वहीं पर्यटन और यौन-मंनोरंजन के नाम पर देह-व्यापार को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्त्री की पहचान उसके मूल्यों से नहीं शरीर की कीमत से आंकी जा रही है।
भूमंडलीकृत संस्कृति की व्याप्ति ने पितृसत्ता के सामने नई चुनौती खड़ी की है। इन्हीं परिवर्तनों और बदलते मानवीय मूल्यों पर प्रभा ने 'घुमड़ते हुए बादल` शीर्षक निबंध में प्रकाश डाला है।
समलिंगी यौन संबंधों को नई सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए अनेक बार आंदोलन हुए और समलैगिंकता को कई मायनों में स्थापित कर दिया। स्त्री अपनी पारम्परिक भूमिका से निकलकर अपनी नई पहचान कायम करना चाहती है। ताईपेई का लेस्बियन आंदोलन और अमेरिकी गे आंदोलन दोनों के पीछे की विचारधारा ने पारम्परिक परिवार की भूमिका पर प्रश्नवाचक चिह्उा लगाया है। एड्स जैसी बीमारी का निराकरण समलिंगी यौन संबंधों के पक्षधर समलैगिंकता के द्वारा करना चाहते हैं।
प्रभा के अनुसार- ''गे समुदाय ने कलंकीकरण से व्यक्ति को बचाकर और एड्स की महामारी को रोक कर यह बताया है कि समाज अंधेरी सुरंगों से निकल पाया है और खुले उजाले में विभिन्नता के तहत मानव अनुभवों पर एक नजर डाल रहा है।`` परिवार में बदलती हुई भूमिकाएं पितृसत्ता के लिए चुनौती है मगर प्रभा के विचार से परिवार व्यवस्था कभी खत्म नहीं होगी क्योंकि एक मनुष्य अपने जीवन और अस्तित्व के लिए दूसरे मनुष्य का साथ चाहेगा। अत: परिवार का रूप भले ही परिवर्तित हो परंतु परिवार खत्म नहीं होगा। एक हद तक आज भी हम परिवारों के बदलते स्वरूपों को देख सकते हैं।
आज स्त्री का नया उभरता हुआ व्यक्तित्व सामने आ रहा है और यह अधिक जटिल, असुरक्षित एवं लचीला है। स्त्री अपनी व्यक्तिगत जरूरतों की तरफ ध्यान देने लगी है। यौन भिन्नता और अभिव्यक्ति स्त्री की निजी जरूरत के रूप में स्थापित होती जा रही है। प्रभा के अनुसार- ''स्त्री की भूमिकाओं को पुन: परिभाषा भूमंडलीय समाज की सबसे बड़ी जरूरत है।``
भूमंडलीय संस्कृति एकरूपीकरण का प्रयास करते हुए भी अपने भीतर अतिशय भिन्नतामूलक मूल्यों को लिए है। इस भूमंडलीय उभोक्तावादी संस्कृति में बाजार में घर नजर आते हैं और घर बाजार में रूपांतरित होता नजर आता है। 'भोग और भोगा जाना` शीर्षक निबंध में प्रभा बाजारीकरण की वर्तमान प्रवृत्ति को स्पष्ट करते हुए लिखती हैं- ''भूमंडलीय समाज में आज चीजों का उपयोग प्रतीकात्मक हो गया है। हो सकता है कि उस वस्तु का कोई भौतिक मूल्य न हो पर फिर भी प्रतीकात्मक स्तर पर उपभोक्ता के लिए वह बेशकीमती मायने रख सकता है। अति समर्थ समाजों, जहां पूंजी का आधिक्य है वहां यह सब ज्यादा घर कर रहा है।``
उपभोग व्यक्ति के मूल्यों को स्थापित कर रहे हैं और इस ब्रांड (संकेतक) से निर्यात होता हुआ उपभोक्ता स्वयं में एक ब्रांड बनता जा रहा है।
उपभोक्ता जिन साधनों का उपभोग कर रहा है उन्हीं के आधार पर उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को आंका जाता है और विज्ञापनों के द्वारा इस उपभोक्ता संस्कृति का निर्माण हो रहा है एवं विज्ञापन संस्कृति संचार माध्यम का परिणाम है। बेनेटन (कपड़ों की बहुराष्ट्रीय कंपनी) के उदाहरण से प्रभा ब्रांड संस्कृति को समझाने के प्रयास करती हैं। पहले मानवीय संसाधनों का पेटेंट संभव था लेकिन प्राकृतिक वस्तुओं का पेटेंट संभव नहीं था, मगर आज इसका पेटेंट किया जा रहा है। हर इंसान के भीतर एक खरीददार बैठा है और बाजार उसे सोते-जागते कुछ न कुछ खरीदने के लिए उकसाता रहता है। गांव में रहने वाले गरीब का बच्चा भी 'अंकल चिप्स` की मांग करता है। प्रभा के अनुसार विश्व में उपभोक्ता की स्थिति- ''निजी उपभोग खर्च यानि घरेलू वस्तुओं और सेवाओं पर किया गया खर्च १९६० के मुकाबले २००० तक चार गुना बढ़कर २० खरब डॉलर हो गया है। इसमें से साठ फीसदी उपभोक्ता अकेले उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में रहने वाले दुनिया के बारह फीसदी लोग हैं जबकि दुनिया के एक तिहाई लोगों के हिस्से इसका मात्र ३.२ प्रतिशत पाता है। विकासशील देशों में भी उपभोक्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है।``
उपभोक्ता संस्कृति ने स्त्री को सबसे अधिक प्रभावित किया है। ब्रांड तो स्त्री के चारण-भाट बनकर समाज से उसका परिचय करा रहे हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति ने नारीवादी आंदोलन को भी प्रभावित किया है। सत्तर के दशक में नारीवाद एक जीवित धड़कता हुआ आंदोलन था, तब स्त्री ने पितृसत्ता, परिवार, विवाह व्यवस्था पर सवाल उठाए। स्त्री ने अपनी पितृसत्ता द्वारा निर्मित भूमिका से स्वतंत्रता चाही। वह घर से बाहर की दुनियां को अपने कदमों से नापना चाह रही थी। जबकि नव-नारीवाद ने तो परिवार, विवाह, महत्त्वकांक्षा, सार्वजनिक जगत में व्यक्तित्व की मोहकता के साथ बुद्धिमानी सभी को एक साथ हासिल किया है। वर्तमान दौर में नारीवाद का दुश्मन न तो पुरुष है और न ही पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था, क्योंकि स्त्री ने इनका सामना करना सीख लिया। कॉरपोरेट पूंजी स्त्री का नया खड़ा होता दुश्मन है, स्त्री इसको अभी समझ भी नहीं सकी। बाजार स्त्री का वस्तुकरण करता जा रहा है। आज स्त्री बाजार द्वारा संचालित होती-सी नजर आती है। पितृसत्ता के जाल से निकलती हुई स्त्री भूमंडलीय उपभोक्तावादी ब्रांड संस्कृति में फंसती जा रही है।
पुस्तक के अंतिम अध्याय 'बहुलतावादी रणनीति चाहिए` में भूमंडलीकरण से हुए विभिन्न परिवर्तनों में स्त्री की स्थिति, बाजार उपभोक्तावादी संस्कृति और सामाजिक संबंधों की विवेचना करते हुए बहुलतावादी रणनीति की आवश्यकता महसूस की गई है। स्थानीय सामाजिक संबंध और भूमंडलीय प्रक्रिया आपस में एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। प्रभा के अनुसार- ''लैगिंक दृष्टिकोण एक ऐसा नजरिया प्रदान करता है जिससे सामाजिक संबंधों में आए हुए आधारभूत परिवर्तनों को समझने में आसानी होती है।``
उत्तर-औपनिवेशिक भारत में हुए परिवर्तनों को पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण, पूंजीवाद और मार्क्सवादी अवधारणा में से किसी को आधार बनाकर नहीं समझा जा सकता और एक तर्क व्यवस्था उचित भी नहीं। प्रभा के मुताबिक- ''भारतीय समाज में घटित परिवर्तनों के संदर्भ में स्त्री के अनुभवों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।``
मुख्यधारा में आज भी स्त्री अनुपस्थित है। नारीवादी दृष्टिकोण विकसित करने के लिए स्त्री का महत्त्व क्यों और कहां है, यह समझना होगा। अर्थात् सिद्धांत को भूमंडलीय प्रक्रिया के अनुभवगत अध्ययन से जोड़कर अन्य सामाजिक संबंधों के साथ संबंधित करना है। भूमंडलीय नागरिक समाज की विवेचना नारीवाद के लिए जरूरी है।
इस पुस्तक में प्रभा खेतान ने समकालीन मुद्दों पर तार्किक विवेचना करके नारीवाद को पुख्ता किया है तथा नारीवाद के सामने आए नए संकटों से रू-ब-रू करवाया है। बौद्धिक धरातल पर यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण है और प्रभा के लेखन को गरिमा प्रदान करती है तथा नारीवाद चिंतकों में अग्रगण्य बनाती है।
३. सार्त्र का अस्तित्ववाद :
प्रभा खेतान ने कलकत्ता विश्वविद्यालय, कलकत्ता से इस विषय पर दर्शनशास्त्र में पी-एच.डी. की उपाधि ली थीं। वही शोध प्रबंध पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है। सन् १९८४ में सरस्वती विहार, दिल्ली से प्रकाशित यह रचना सार्त्र के चिंतन पर गहरा प्रकाश डालती है। पुस्तक में क्रमश: सार्त्र का अस्तित्ववाद बनाम सिद्धांत और निरूपण की व्यवस्था, समवेग का सिद्धांत, अस्तित्व-अनस्तित्व : तर्क प्रणाली (डायलेक्टिक्स), व्यामोह (बेड फेथ) व अस्तित्ववादी मनोविश्लेषण नामक पांच अध्याय हैं। इन सबसे गुजरने के उपरांत सार्त्र व उसके अस्तित्ववाद को एक नई दृष्टि से समझा जा सकता है।
४. सार्त्र : शब्दों का मसीहा सार्त्र -
विश्व चिंतन सीरीज के तहत सरस्वती विहार, नई दिल्ली से सन् १९८५ में प्रकाशित प्रभा खेतान की यह पुस्तक मुख्य रूप से फ्रांसीसी दार्शनिक-चिंतक ज्यां पाल सार्त्र के जीवन वृत्त पर व्यापक प्रकाश डालती है। साथ ही पुस्तक सार्त्र के चिंतन व सिद्धांतों का भी सम्यक् विश्लेषण कराती है। पांच अध्यायों में विभाजित यह पुस्तक सार्त्र के बारे में जिज्ञासु पाठकों को पूर्ण तृप्ति कराने वाली है।
५. अल्बेयर कामू : वह पहला आदमी -
विश्व चिंतन सीरीज के तहत ही सरस्वती विहार, नई दिल्ली से सन् १९९३ में प्रभा खेतान की यह पुस्तक प्रकाशित हुई। १९५७ के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित व 'द रिबेल`, 'द स्टें्रजर`, 'मिथ आफ सिसिफस` 'प्लेग` व 'ल प्रीमियर होमे` जैसी विश्व प्रसिद्ध कृतियों के रचनाकार पर पुस्तक में पूरा प्रकाश डाला गया है। मात्र ४६ वर्ष जीए फ्रांसीसी विद्वान अल्बेयर कामू का प्रभा ने बेहतरीन मूल्यांकन किया है। वह पहला आदमी, जटिल होते संबंध, घर में किताब का सवाल, बीमार मेधावी, अशांत वैवाहिक संबंध, शिक्षा एवं विचार भूमि, यथार्थ से संवाद की स्थापना, जुझारू तेवर और राजनीति, सृजन है या फिर नहीं है, संघर्षों से गुजरते हुए, युद्ध, निरस्त्रीकरण और कामू, गालीमार हाउस के लेखक, विद्रोह का स्वर और आदमी की स्वतंत्रता, जगत : साझे की जिंदगी, व्यक्ति की सत्ता के लेखक व मानवीय चेतना का चितेरा शीर्षकों से प्रभा ने अल्बेयर कामू के जीवन व चिंतन का विशद् मूल्यांकन और प्रकटीकरण किया है। कामू को पढ़ने और समझने के लिए यह कृति महत्त्वपूर्ण है।

सृजित इतर साहित्यिक-संसार :
अनुवाद :
१. सांकलों में कैद क्षितिज : कुछ दक्षिण अफ्रीउा कविताएं -
दक्षिण अफ्रीकी के १८ कवियों की चुनिंदा कविताओं का प्रभा ने अनुवाद 'सांकलों में कैद क्षितिज` नाम से किया। इस पुस्तक का प्रकाशन सन् १९८८ में सरस्वती विहार, दिल्ली से हुआ।
कवि पर्सी वाई शेले की कविता को प्रभा पुस्तक के आमुख में शामिल करके मूल विषय का संदेश संप्रेषण प्रयास करती है। कुछ अंश-
''नींद से उठे शेर की तरह दहाड़ते हुए उठो तुमओ असंख्य लोगो!``
प्रभा ने इन कविताओं के मर्म को पहचाना और हिन्दी भाषा के पाठकों को दक्षिण अफ्रीकी कवियों की गहन वेदना से अवगत कराया। प्रभा भूमिका में लिखती हैं- ''आदमी के खून से लिखी गई ये कविताएं आपको गिने-चुने शब्दों के जरिये जो संदेश देती हैं, वह दर्द से निचुड़कर आंखों से बहने लगता है। इन कविताओं को पढ़ते हुए धरती के किसी भी हिस्से का आदमी यही सोचेगा 'आह! यह मेरी बात कह रहा है। यह तो हम सब दमितों और दलितों के दर्द से उपजी आवाज है।`......``
अपने हकों के लिए लड़ते हुए अधिकतर कवियों को अपनी ही धरती से निर्वासित होना पड़ा। इनमें अधिकतर कवि अफ्रीका नेशनल कांग्रेस (ए.एन.सी.) के सदस्य हैं।
संग्रह में प्रथम कवि के रूप में 'डेनिस ब्रूटस` को शामिल किया गया है। कैदी को दी जाने वाली यातना का जींवत चित्रण-
''जमीन पर पटके गये कैदी की गर्दन कोदबाकर पांवों से बार-बार डुबो रहे थे वेगड़हे में उसके सिर को,असहाय तड़प रहा थावह कैदी।``
संग्रह में आगे क्रमश: बैरी फिन्बर्ग, केयोरेपेत्से गोसितसाइल, ए.एन.सी. कुमालो, हग लेविन, इल्वा मैके, डंकन माटलहो, रेबेका माटलहो, विक्टर माटलो, जॉन मातशिकिजा, विक्टर मोटापनियान, ओस्वाल्ड मत्शाली, ऑर्थर नौर्जे, मोन्गाने वाली सरोटे, क्रिस्टोफर वैनवाइक, स्कारलेट विट्मैन, सोयेन्का ओल व जॉन पेपर क्लार्क की कविताएं ली गई हैं।
अधिकतर कविताओं का स्वर ब्रिटिश उपनिवेश के विरोध में उठा है। दक्षिणी अफ्रीका के नागरिकों केा अपने ही देश में यातनाओं से गुजरना पड़ रहा है और ये अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं। कैद में इन काले समझे जाने वाले व्यक्तिओं को कितनी बर्बरता का शिकार होना पड़ता, यह ये कविताएं स्पष्ट करती हैं। कविताओं को पढ़ते हुए पाठक स्वयं को यातनाओं का अहसास होता है। भाषान्तर की यही सफलता है।
२. स्त्री उपेक्षिता :
नारीवाद आंदोलन को अपने विचारों से प्रारम्भिक स्तर पर पुख्ता करने वालों में फ्रांसीसी लेखिका सीमोन द बोउवार का स्थान अहम् है। सीमोन द बोउवार अस्तित्ववादी चिंतक सार्त्र के साथ काम करने वाली जिंदादिल महिला थीं। स्त्री के स्थान और उसकी स्थिति के प्रति सीमोन द बोउवार सदैव चिंतित रही। लैंगिक विभेद को वह सदैव अस्वीकार करती रही।
सीमोन द बोउवार ने सन् १९४७ में एक पुस्तक पर काम शुरू किया और वह सन् १९४९ में पूर्ण होकर जब पुस्तक रूप में आया तो पूरे विश्व में हलचल मच गई। सन् १९४९ में प्रकाशित वह पुस्तक और कोई दूसरी कृति नहीं वह 'द सेकिण्ड सेक्स` ही थीं जो कि नारीवादी आंदोलन के लिए गीता की मानिंद पूज्य पुस्तक है।
इसी पुस्तक का प्रभा खेतान ने हिन्दी अनुवाद 'स्त्री उपेक्षिता` के नाम से किया जो कि सन् १९९० में हिन्द पॉकेट बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। दो खण्डों में विभक्त उक्त पुस्तक के प्रारम्भ में प्रभा ने सीमोन द बोउवार का परिचय, प्रस्तुति संदर्भ और भूमिका दी है। प्रथम खण्ड को 'तथ्य और मिथ` शीर्षक दिया है जिसके तहत नियति, इतिहास, मिथक उपशीर्षक हैं। द्वितीय खण्ड को 'आज की स्त्री` के नाम से परिभाषित किया है और निर्माण काल, स्थिति, औचित्य, स्वाधीनता संग्राम उपशीर्षकों के माध्यम से विस्तृत चिंतक फलक प्रदान किया है।
यह पुस्तक स्त्री जाति के लिए पूर्णतया एक आदर्श पुस्तक है और उसके चिंतन को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने में सक्षम है।
संपादन :
एक और पहचान : कविता संग्रह, १९८६
हंस, मासिक, अंक मार्च-२००१ (महिला विशेषांक)
पितृसत्ता के नये रूप (स्त्री विमर्श पर लेख) : २००३ सह संपादन, राजेन्द्र यादव, अभय कुमार दुबे के साथ।
पुरस्कार और सम्मान :
प्रभा खेतान ने व्यवसाय से साहित्य, घर से सामाजिक कार्यों तथा देश से विदेशों तक के सफर में अनेक मंजिलें तय कीं। धरातल से शुरू किए अपने जीवन को खुले आकाश की ऊंचाईयों तक पहुंचाने के प्रभा के साहस और क्षमता को कई पुरस्कार-सम्मानों से भी नवाजा गया।
प्रभा को मिलने वाले पुरस्कार-सम्मान :-
१. रत्न शिरोमणि, इंडिया इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर यूनिटी द्वारा
२. इंदिरा गांधी सॉलिडियरिटी एवार्ड, इंडियन सॉलिडियरिटी काउसिंल द्वारा
३. टॉप पर्सनाल्टी एवार्ड (उद्योग), लायन्स क्लब द्वारा
४. उद्योग विशारद, उद्योग टेक्नोलॉजी फाउण्डेशन द्वारा
५. प्रतिभाशाली महिला पुरस्कार, भारत निर्माण संस्था द्वारा
६. महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन पुरस्कार, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा
७. बिहारी पुरस्कार, के.के. बिड़ला फाउण्डेशन द्वारा
८. भारतीय भाषा परिषद व डॉ. प्रतिभा अग्रवाल नाट्य शोध संस्थान द्वारा सम्मान।
हांलाकि ये पुरस्कार और सम्मान उनकी प्रतिभा को आंकने के लिए पूर्ण तो नहीं माने जा सकते फिर भी उनके विराट व्यक्तित्व के ये छोटे-छोटे अवलम्ब अवश्य बनें।
स्वर्गवास :
सीने में तकलीफ के बाद कोलकाता के आमरी अस्पताल में उनका उपचार चला तथा हुई बाईपास सर्जरी के दौरान प्रभा खेतान को असामयिक निधन १९ सितम्बर, २००९ को हुआ।

मासिक 'वागर्थ` (कोलकाता), नवम्बर, २००८ में प्रभा खेतान को श्रद्धांजलि-
एक और आकाश की खोज में उनका अनन्त सफर
- अरुण माहेश्वरी
प्रसिद्ध लेखिका, उपन्यासकार, कवयित्री, प्रबंधकार, स्त्रीवादी चिंतक, विदूषी शोधकर्ता और उद्यमी प्रभा खेतना हमारे बीच नहीं रहीं। १९ सितम्बर की तड़के सुबह सीने में दर्द की तकलीफ के कारण उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उसी दिन आपात परिस्थितियों में उनकी बाईपास सर्जरी हुई और उसी सर्जरी के बाद उनकी स्वाभाविक हृद्य गति लौट कर नहीं आ सकी तथा रात के वक्त उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। १ नवम्बर, १९४२ में जन्मी प्रभा खेतान के निजी जीवन से परिचित हर व्यक्ति उनके विद्रोही, उदार, संघर्षशील और स्वतंत्रचेता व्यक्तित्व का साक्षी रहा है। हाल में प्रकाशित उनकी आत्मजीवनी 'अन्या से अनन्या` में उनके विद्रोही चरित्र के आत्म संघर्ष की जो झलक मिलती है, उसने देश भर के हिन्दी पाठकों का ध्यान आकर्षित किया था। कोलकाता के प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कालेज से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करके उन्होंने प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र के अस्तित्ववाद के सिद्धांत पर डाक्टरेट किया था। लेखन की दुनिया में प्रभा जी ने एक कवि के रूप में कदम बढ़ाये थे, उनके कई कविता संकलन भी प्रकाशित हुए। उनका पहला कविता संकलन था 'अपरिचित उजाले` जो १९८१ में प्रकाशित हुआ था। फिर एक के बाद एक, सीढ़िया चढ़ती हुई मैं, एक और आकाश की खोज में, कृष्णधर्मा मैं, और हुस्नबानों और अन्य कविताएं, कविता संकलन प्रकाशित हुए। लेकिन जल्द ही उन्होंने उपन्यास विधा को अपना लिया और अपने प्रारंभिक उपन्यास 'छिन्नमस्ता`, 'आओ पेपे घर चलें`, 'तालाबंदी` और 'अग्निसंभवा` के जरिये व्यापक पाठक समाज का ध्यान अपनी ओर खींचा। एक उपन्यासकार के रूप में उनके उनके अत्यंत परिपक्व, परिष्कृत और सर्वोत्कृष्ट रूप का परिचय मिला उनके उपन्यास 'पीली आंधी` से। इस उपन्यास के माधो बाबू और पद्मावती की तरह के चरित्र अपनी खास रंगत लिये हुए अविस्मरणीय चरित्र कहे जा सकते हैं। 'पीली आंधी` को हिन्दी के वरिष्ठ आलोचकों से भारी प्रशंसा मिली और इस पर प्रभाजी को कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। प्रभाजी एक बेहतरीन अनुवादिका भी थी। सीमोन द बोउवार की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक 'द सेकंड सेक्स` का 'स्त्री उपेक्षिता` शीर्षक से उनका हिन्दी में काफी पढ़ा और सराहा जाता है। सार्त्र पर उनकी थिसिस के अलावा उनके द्वारा लिखी गई सार्त्र की जीवनी 'शब्दों का मसीहा सार्त्र` और अल्बेयर कामू पर उनकी पुस्तक 'अल्बेयर कामू : वह पहला आदमी` हिन्दी में पश्चिम के विशिष्ट चिंतकों और लेखकों के बारे में प्रकाशित अब तक प्रकाशित पुस्तकों में अपना निजी स्थान रखती है। उन्होंने 'सांकलों में कैद कुछ क्षितिज` शीर्षक से कुछ दक्षिण अफ्रीकी कविताओं के हिन्दी अनुवाद का भी एक संकलन प्रकाशित करवाया था। प्रभाजी के लेखन और व्यक्तित्व की चर्चा तब तक अधूरी रहेगी जब तक उनके स्त्रीवादी नजरिये और स्त्रीवादी लेखन की चर्चा नहीं की जाती। 'स्त्री उपेक्षिता` के अनुवाद के साथ ही उन्होेंने यथार्थ को देखने की एक ऐसी विद्रोही स्त्रीवादी दृष्टि अर्जित कर ली थी, जिससे उनके समूचे लेखन की अपनी विशिष्टता रेखांकित की जा सकती है। गौर करने लायक बात है कि स्त्री-स्वातंत्र्य की दृढ़ पक्षधर प्रभाजी इसके पश्चिमी संस्करण के अंधानुकरण की नहीं बल्कि उसके प्रति आलोचनात्मक और साथ ही विधेयात्मक दृष्टिकोण की समर्थक थी। खास तौर पर हाल के वर्षों में प्रकाशित उनकी दो कृतियां 'उपनिवेश में स्त्री : मुक्ति कामनाएं की दस वार्ताएं` और 'बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ, भूमंडलीकरण और स्त्री के प्रश्न` आज के वैश्वीकरण की पृष्ठभूमि मे स्त्री प्रश्न पर विमर्श की ऐसी पुस्तकें हैं जिनकी अवहेलना नहीं की जा सकती है। इस विषय में उनकी यह मान्यता काफी विचारोत्तेजक रही है, जब वे कहती हैं 'स्त्री के जीवन पर भूमंडलीकरण के प्रभाव बहुमुखी, लेकिन विरोधाभासी है। राष्ट्र बनाम भूमंडलीकरण या फिर बाजार बनाम समाज जैसे सरलीकरणों पर सवार होकर स्त्री की आजादी के पैरोकार इन प्रभावों का आकलन नहीं कर सकते।` प्रभाजी कोई स्त्रीवादी एक्टिविस्ट नहीं थी, लेकिन हिन्दी में यदि कोई स्त्रीवादी विमर्श है तो उसमें प्रभाजी का अपना खास स्थान भी जरूर है। प्रभाजी के व्यक्तित्व का एक और विशष पहलू उनके उद्यमी जीवन का रहा है। संभवत: इसी के चलते उन्होंने दुनिया के अनेक देशों की यात्राएं की थीं और इन यात्राओं ने ही उनकी सोच के क्षितिज को काफी विस्तार दिया था। वे मार्क्सवाद से गहराई से प्रभावित थीं और शुरू से ही अपने लेखन में समाज के कमजोर तबकों को शक्ति देने और उनके दर्द के साथ एकात्म होकर उसे गहराई से अभिव्यक्ति देने की एक प्रगतिशील रचना-दृष्टि को उन्होंने आत्मसात किया था। सन् १९८७ में प्रकाशित हुए उनके कविता संकलन 'हुस्नबानों और अन्य कविताएं` की सभी रचनाएं उनकी इस रचना-दृष्टि का प्रमाण है। इसी संकलन की उनकी कविता 'बड़ी अच्छी मेमसाब` की इन अंतिम मार्मिक पंक्तियों को भला कोई कैसे भुला सकता है- 'इतनी अच्छी मेम साब/इतने भले हमारे साब/फिर ऐसा क्यों होता है मीरा दी/ऐसा क्यों?/मालकिन का गुस्सा/मुझे क्यों बना जाता है बकरी?` प्रभाजी की इस असमय और आकस्मिक मृत्यु ने निश्चित तौर पर कोलकाता के हिन्दी साहित्य के जगत को काफी झकझोर दिया है। कोलकाता का शायद ही कोई लेखक, साहित्यकार, पत्रकार होगा जो कभी प्रभाजी के संपर्क में न आया हो। उनके द्वारा स्थापित किये गए प्रभा खेतान फाउंडेशन ने भी कोलकाता के समाज में अपना अपना विशेष स्थान बना लिया था और देश भर की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को इसकी सहायता ने समय-समय पर बल पहुंचाया है। वे लम्बे समय से जनवादी लेखक संघ के साथ जुड़ी हुई थीं और जलेस के पटना राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने उपस्थित होकर उसके कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी की थी। आज प्रभाजी का इस प्रकार अकस्मात् चले जाना हिन्दी साहित्य जगत की एक अपूरणीय क्षति है। हिन्दी जगत को उनसे अभी और बहुत अपेक्षाएं थीं। हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इन दिनों नियमित उनका लेखन प्रकाशित हो रहा था। उनकी मृत्यु को एक बड़ा आघात कहा जा सकता है। दुख और शोक की इस वेदनामयी घड़ी में हम उनके परिवार के सभी लोगों के प्रति गहरी संवेदना प्रेषित करते हैं।
- साल्टलेक, कोलकाता-७०००६४


मासिक 'पाखी` (नई दिल्ली), नवम्बर, २००८ में प्रभा खेतान को श्रद्धांजलि-

भेद खोलेगी बात ही
- साधना अग्रवाल
हिन्दी कथा साहित्य में अपने 'छिन्नमस्ता` उपन्यास में प्रिया जैसी बोल्ड नारी पात्र की सृजक डॉ. प्रभा खेतान का १९ सितम्बर, २००८ की आधी रात को कोलकाता के आमरी अस्पताल में आकस्मिक और अप्रत्याशित निधन की दुखद सूचना मुझे २१ सितंबर की सुबह दैनिक हिंदुस्तान में छपी खबर से मिली। जिस पर विश्वास करना मुश्किल हो रहा था जहां मुझे सहसा याद कि जनवरी २००४ में साहित्य अकादेमी की ओर से युवा लेखकों को दिए जाने वाल साहित्यिक यात्रा अनुदान के क्रम में कोलकाता की मेरी पहली यात्रा थी। प्रभा दी के घर पर उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी। प्रभा दी के घर जाकर जो पहला अहसास हुआ, वह एक लेखक का सुरुचि संपन्न घर था, जहां तमाम आधुनिक साज-सज्जाओं के बीच विराजमान थे- विश्व के तमाम लेखक, हिन्दी सहित। बातचीत के क्रम में दिल्ली के साहित्यिक जगत की जानकारी ही उन्होंने नहीं ली, बल्कि इस बात की तहकीकात भी की कि भोपाल से प्रकाशित 'दुनिया इन दिनांे` में ब्रह्मराक्षस के नाम से कौन स्तंभ लिखता है?यदि डॉ. प्रभा खेतान ने समकालीन कथा साहित्य में एक तरफ अपनी पहचान कथा-लेखन से बनाई तो दूसरी तरफ सीमोन द बुवाआर की प्रसिद्ध पुस्तक 'द सेकेंड सेक्स` के अनुवाद के साथ सार्त्र और कामू के जीवन दर्शन पर चिंतन से। वे न केवल चर्म उद्योग से जुड़ीं एक उद्योग प्रतिष्ठान की निदेशिका थीं, बल्कि उनका कपड़े के निर्यात का भी व्यवसाय है। उनका अधिकांश लेखन आत्म कथात्मक है। मारवाड़ी समाज की दकियानूसी संकीर्णता के बीच उनके नारी पात्र जिस तरह विद्रोह करते हैं, स्त्री अस्मिता एवं उसकी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते प्रस्तुत हेाता हैं- वह समकालीन हिन्दी उपन्यास जगत में विलक्षण हैं। उनकी विशेषता यह है कि अपने कथ्य में वे कहीं लाउड नहीं होती हैं। बिना शोरगुल मचाए चुपचाप रचनात्मकता की लंबी रेखा खींच देती है। खासकर 'छिन्नमस्ता` की प्रिया तो हिन्दी उपन्यास की एक ऐसी पात्र है जो अपने वृतांत में न केवल अकेली है, बल्कि स्पृहणीय थी। प्रभा खेतान का पहला उपन्यास 'आओ पेपे घर चलें` (१९८०) छपा तो हिन्दी संसार में खलबली मची- फिर उसके बाद 'छिन्नमस्ता`, 'अपने-अपने चेहरे`, 'पीली आंधी` और पिछले दिनों प्रकाशित आत्मकथा 'अन्या से अनन्या` बेहद चर्चित रही है।प्रभाजी का जन्म १ नवंबर, १९४२ को एक बेहद संकीर्णतावादी हिन्दू सनातनी परिवार में हुआ। माता-पिता की आखिरी संतान थीं और स्वाभाविक है कि लड़की के पैदा होने से ठंडी सांस ही बरक हुई होगी। प्रेसिडेंसी कॉलेज से दर्शन में स्नातक, कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और पटना विश्वविद्यालय बिहार से दर्शन में पीएचडी की। बचपन में जितना अनुशासन उन्हें घर और स्कूल में सिखाया गया, कॉलेज में आकर एक-एक की परतें उधेड़ने लगीं। बगावत करना, बहस खड़ी करना, क्लास से निकल भागना, काफी हाउस में अड्डेबाजी, कुल मिलाकर कॉलेज का जीवन बेहद हलचल भरा और रुचिकर था।उनके लेखन की शुरूआत कविता से हुई। पहली कविता जब 'सुप्रभात` में प्रकाशित हुईं, उस समय सातवीं कक्षा मंे थीं। उनका मानना था, 'औरत को इतनी हिम्मत जुटा लेनी होगी कि वह आचार संहिताओं से सवाल पूछे और स्त्री विरोधी शास्त्रों को जला डाले। इसके लिए स्त्री समाज को एक और बड़े एवं व्यापक स्तर पर प्रतिरोध सीखना होगा। कुल मिलाकर जुम्मा-जुम्मा हम भारतीय स्त्रियों ने पिछले ३०-४० वर्षों से अपने बारे में सोचना और बोलना सीखा है। हम आप जैसे दो-चार विशिष्ट या दो-चार टोकन उदाहरणों से आम औरत की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं होगा। आम औरत की जिंदगी तो तभी बदलेगी, जब वह पितृसत्ता द्वारा अभिव्यक्त संस्थाओं के प्रतिरोध की भाषा सीखेगी।` ('मुझे प्रतिरोध अच्छा लगता है। आखिर हम स्त्रियां विरोध क्यों नहीं करें? यदि कोई आपको तोड़ता रहे तो क्या हम सब कुछ खामोशी से स्वीकार लें?)भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच लेखन के लिए समय निकाल लेने के सवाल पर उनका कहना था कि '२४ साल की उम्र में मैंने पैसा कमान शुरू किया। आर्थिक स्वतंत्रता को मैंने अपने जीवन में वेद वाक्य की तरह स्वीकारा है और पैसा कमाने के लिए मैंने कड़ी मेहनत की है। ('गली-गली घूमी हूं, बक्सा उठाये-उठाये देश-विदेश के हर कोने में गई हूं और सफलता-असफलता की द्वंद्वात्मकता से संचालित व्यापारिक दुनिया के सारे तामझाम सीखने-समझने की चेष्टा की है। चमड़े के व्यवसाय के अलावा मद्रास में कपड़े के व्यवसाय के लिए तीन साल चेन्नई में व्यस्त रही। इसे जीवन का अंतिम समय तो नहीं कह सकती, पर मेरे जीवन का बड़ा महत्वपूर्ण पक्ष है।`)पिछले कुछ सालों से अपने मुंहबोल गोद लिए बेटे संदीप, जो हिन्दी साहित् से बेहद लगाव रखता है, साथ ही प्रभा जी के मिशन में भी सहयोग देता है, के साथ रहते हुए भी वस्तुत: प्रभाजी ने प्रेम करते हुए भी अपमान पूर्ण एकाकी जीवन जिया है और अविवाहित रहकर सामाजिक उपेक्षा तथा यंत्रणा झेली है।प्रभाजी की टिप्पणी है, 'जहां तक एक अविवाहित महिला के प्रेम संबंध का सवाल है, समाज का इस पर आपत्ति करना स्वाभाविक है। ('मैंने कभी समाज के साथ पंगा नहीं लिया। जिन रास्तों पर मैं चली, वे मेरी पंगडंडियां थीं और मुझे पता था कि मेरे लिए वहां कोई स्वागत समारोह नहीं होने वाला।`) लोगों ने मुझे जान से नहीं मार डाला, यही बहुत है। पारंपरिक-सामाजिक सोच में इतनी जल्दी तो बदलाव आने से रहा, ('ऐसे किस्से अपवाद के बदले जब आए दिन घटने वाली घटनाओं मंे बदल जाते हैं, तभी समाज की आचार संहिताओं में परिवर्तन नजर आता है।`) समाज ऐसे विहाहेत्तर संबंधों को पूरा नहीं स्वीकारता, मगर कमोबेशी स्वीकारने लगता है। (खासकर, आर्थिक रूप से स्वावलंबी स्त्री को वह स्वीकृति मिल ही जाती है। स्त्री यदि दमित और शोषित है तो वह चाहे जितनी चेष्टा करे, पर आदर्श पत्नी और मां के रूप में भी इस औपनिवेशिक व्यवस्था में हीन स्थिति में रहेगी।) जब तक स्त्री खुद अपना स्थान नियत नहीं करेगी, अपने बारे में निर्णय नहीं लेगी, तब तक तयशुदा संबंधों से इतर संबंधों पर समाज ठप्पा लगाता रहेगा। आज जरूरत है कि परिधि पर रहते हुए लोग प्रतिरोध की भाषा ईजाद करें। स्त्री के अपने जीवन में चुनाव के क्षण कम होते हैं, क्योंकि व्यवस्था से संचालित मानस इन क्षणों को देखकर भी अनदेखा करता है। (यदि कोई स्त्री अपनी तरह से जिंदगी जीना चाहती है तो उसे अपनी तरह के लोगों से ही दोस्ती करनी होगी, अपने समूह का विकास करना होगा। अब मेरी जैसी स्त्री सती-सावित्रियों की तुलना में श्रेष्ठ होने का दावा करे या उनसे टक्कर ले तो स्वाभाविक है कि फिलहाल सती-सावित्रियों की परंपरा ही जीतेगी।) वैसे मैं नहीं सोचती कि मैंने ऐसा कोई अनोखा और नया कुछ किया है, ऐसे संबंध पहले भी होते थे। लेकिन आज औरत अपनी कमियों के साथ अपनी पहचान हासिल करती है। वह न किसी के लिए सती होती है और न अपनी जिंदगी हवन करती है, बल्कि वह जिंदगी जीने की कोशिश करती है। विवाह व्यवस्था तो आज एक टूटती हुई व्यवस्था है, पारंपरिक समाज इसे आवश्यकता से अधिक महत्त्व देना चाहता है, इसे टिकाये रखने की चेष्टा भी करता है। यह तो हम स्त्रियों को सोचना है कि हम समाज को किस हद तक बदलना चाहेंगी।`प्रभाजी की पुस्तक 'उपनिवेश में स्त्री` काफी चर्चित रही है। स्त्री को उन्होंने अंतिम उपनिवेश क्यों माना, के जवाब में वह बताती हैं, 'मर्दवादी समाज ने स्त्री को हजारों सालों से दोयम स्तर पर ही रखा है। इसे हम-आप सभी जानते हैं। बल्कि इस उपनिवेश में औरत ही नहीं, मर्द भी मौजूद हैं। वही मर्द जिसने इस उपनिवेश की रचना की थी। पहले उसे यकीन था कि उपनिवेश की बागडोर उसके हाथ में हैं। पर आज मालिकाने का उसका एहसास दुविधाग्रस्त हो चुका है। बात यह है कि इस उपनिवेश की कोई भू-क्षेत्रीय या टेरीटोरियल सीमाएं तो हैं नहीं। यह १९वीं सदी और २०वीं सदी के पहले पचास सालों के उस उपनिवेश से अलग हैं जिसके खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम लड़े गये थे। पुरुष इसलिए दुविधाग्रस्त है क्योंकि स्त्री के साथ वो भी आधा-अधूरा रह गया। (आखिर कुछ पुरुष नारी के हकों का समर्थन क्यों करते हैं? क्या केवल उदारतावादी और बहुलतावादी विचारधाराओं के कारण? मानव मुक्ति की कामना से प्रेरित होकर? ये सभी कारण तो हैं ही, पर असली और अहम कारण है पितृसत्ता ने अपने हाथों जो उपनिवेश खड़ा किया है, उससे स्त्रियों को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ उसकी बागडोर संभालने वाले हाथों की मानवीयता का भी क्षय कर दिया।) आज के विचारवान पुरुष अपने पौरुष की रक्षा के लिए स्त्री का समर्थन करने के लिए मजबूर हैं। जाहिर हैं, इस लिहाज से आज का मर्द रेनेसां के उस मर्द से अलग हो चुका है जिसने स्वतंत्रता, मैत्री, समता और बुद्धिसंगत चिंतन और आचरण का नारा बुलंद करते हुए भी स्त्रियों पर पाबंदी लगाना जरूरी समझा था।स्त्री जानती है जो उपनिवेश उसके खिलाफ है, वह उपनिवेश अपनी ताकत स्त्री के समर्थन से ही हासिल करता है। पुरुष भी जानता है कि स्त्री की तरह अगर वह भी संघर्ष चेतना से लैस नहीं हुआ तो यह उपनिवेश उसे हमेशा के लिए खत्म कर देगा। (जरा ऐसे पुरुष की व्यथा का अंदाजा लगाइये, उसके भीषण अपराधबोध को समझने की चेष्टा कीजिये कि किस दारुण वेदना से वो छटपटा रहा है। पुरुष जितना छटपटाएगा, औरत को अपनी लड़ाई में उतनी ही मदद मिलेगी। यह पुरुष औरत की आजादी का हमसफर है। मगर नारीवाद को अपनी उन सीमाओं का भी अतिक्रमण करना होगा जो उसने अपने अतिवादी दृष्टिकोण के कारण स्वयं पर लागू की हैं। मार्क्सवाद की भांति नारीवादी को भी आत्मलोचना की जरूरता है। हमें सोचना होगा आखिर क्यों स्त्री अधिकारों के प्रवक्ताओं का स्वर दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों के स्वर से मेल खाने लगता है? ऐसा क्यों होता है कि कामनाओं पर लगाई गई शुद्धतावादी पाबंदियों की पैरोकारी करते हुए नारीवाद भी कैथरिन मैकिनॅन और एण्ड्रिया डॉरकिन जैसे सिद्धांतकारों का नजरिया अपना लेता है।)सीमोन द बुवाआर से काफी हद तक प्रभावित प्रभाजी मुक्ति की पहली शर्त स्त्री के आर्थिक स्वावलंबन को मानती थीं। यही कारण था कि वे रात-दिन भागदौड़ करतीं अपने काम में डूबे रहीं। बल्कि यह कहना सही होगा कि वे व्यावसायिक सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ती हुईं भी अपने एकांत और अकेलेपन से लगातार जूझती रहीं। अचानक बिना किसी को बताये चुपचाप उन्होंने इस संसार से विदा ले लिी। उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।
- ऊना इन्क्लेव, मयूर विहार, दिल्ली-११००९१