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शंकरदान सामौर



राजस्थानी काव्य में राष्ट्रवादी अग्नि-शिखा के ऋत्विक : शंकरदान सामौर
- डॉ. के. एल. राजपुरोहित
. ना. व्यास वि.वि., जोधुपर के राजनीति विज्ञान विभाग में एसोसियेट प्रोफेसर

भारतीय इतिहास में राजस्थान ने अपनी विशिष्ट पहिचान कुछ वरेण्य जीवन मूल्यों में लिए सतत बलिदानों की सुदीर्घ परम्परा से बनायी है। स्वातंत्र्य प्रेम को इन मूल्यों का सुमेरु कहा जा सकता है। इस तथ्य की काव्यात्मक अभिव्यक्ति मरुभूमि में इन्द्र की कृपणता का खुलासा, स्वातंत्र्य चेतना व उसकी रक्षार्थ उत्सर्ग की तत्परता के संदर्भ में शंकरदान द्वारा इस भाँति हुई है-
पंणी रौ कांई पिये, (आ) रगत पियौड़ी रज्ज।
संके कन में आ समझ, घण नह बरसै गज्ज।।

स्वातंत्र्य रक्षण के प्रयत्नों की महत्ता राजस्थानी मानस में इस भाँति रची बसी है कि-
सुत मरियौ हित देश रै, हरख्यौ बंधु समाज।
मा नह हरखी जनम दे, जितरी हरखी आज।।

उन्नींसवीं सदी में राजस्थान में इस स्वातंत्र्य चेतना का तूर्यनाद करने वाले चूरू जिले के बोबासर गाँव में २२ नवम्बर १८२४ को जन्में कवि शंकरदान सामौर का व्यक्ति और जीवन इस प्रदेश की बलिदानी परम्परा का गौरव मंडित अध्याय है। सामौर क्रांतिचेता कवि होने के साथ-साथ जनसाधारण के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर चुके थे। अपनी गहरी सूझ-बूझ से उन्होंने विदेशी शासन की वास्तविक प्रकृति व उसके विनाशकारी प्रभाव को भली-भाँति समझ लिया था। साथ ही तत्कालीन सामंती व्यवस्था की विद्रूपता व उसके जनविरोधी स्वरूप की भी उन्हें ठीक-ठीक पहचान थी। समकालीन हालात से उनसे भीतर जो विक्षोभ खदबदा रहा था, १८५७ के विप्लव ने उस लावे को बहिर्मुख कर दिया। वे स्वतंत्रता यज्ञ में समिधा डालने हेतु तत्पर हो गये और अपनी काव्य प्रतिभा का प्रभावी उपयोग इस महत् ध्येय की सिद्धि के लिये किया।
अन्याय व अनाचार का विरोध उनकी दूसरी प्रकृति थी। उस समय शासक वर्ग की मनमानी और कदाचार के विरूद्ध चारणों द्वारा दिए जाने वाले धरानों में उनकी सदैव अग्रणी भूमिका रही और इस भावना का चरमोत्कर्ष १९५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका से परिलक्षित होता है। शंकरदान के काव्य में युगीन चेतना के स्वर सशक्त रूप से उभरे। उनका काव्य मनो विनोद या निसत्व राजाओं के प्रशस्तिगान द्वारा लाख पसाव प्राप्त करने का साधन नहीं अपितु राष्ट्र के सुप्त पौरुष व निष्पंद गौरव भाव को जगाने, लोगों में ऐक्य भाव का संचार करने, कर्तव्य विमुख हो चुके सत्ताधीशों को शब्दों के प्रतोद से प्रताड़ित करने एवं विदेशी शासन के बहुविध शोषण से हतश्री हो चुके देश के जनसाधारण को उठ खड़े होने का आव्हान था। उनके काव्य में राष्ट्रीयता की तेजस्विता व स्निग्धता दोनों विद्यमान थीं। समकालीन परिस्थिति से अवसन्न इस कवि की दृष्टि से जनसाधारण के दु:ख-दर्द कभी ओझल नहीं हुए। यही कारण है कि उनके काव्य में सर्वत्र प्रखर देशभक्ति व मातृभूमि के उद्धार के लिए बलिदान की महत्ती आवश्यकता मुखरित हुई है।
१८५७ के विप्लव को पराधीनता के पाश से मुक्ति पाने का महान्ब अवसर मानने वाले सामौर ने अपने पूर्ववर्ती कविराजा बांकीदास की भाँति राष्ट्रवासियों को जगाने का स्तुत्य कार्य किया। वे इस विप्लव की घटनाओं के न केवल साक्षी थे वरन् इसमें उन्होंने सक्रिय भूमिका भी निभायी। अंग्रेज व उनके आश्रित राजाओं-सामन्तों की जन विरोधी घातक नीतियों व क्रिया कलापों ने उन्हें आहत कर दिया था, जिसकी अभिव्यक्ति उनके सम्पूर्ण सृजन में हुई है। तत्कालीन राजस्थान के हालात के संदर्भ में क्रांति का शंखनाद करने वाले इस जनकवि की व्यथा को भली-भाँति समझा जा सकता है।

ब्रिटिश सत्ता के विस्तार की परिणति-
ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना से राजस्थान में अराजकता व राजनीतिक अस्थिरता के अंधयुग की तो समाप्ति हुई किन्तु जनसाधारण के लिए उस अन्तहीन दु:खरजनी का प्रारम्भ हुआ जिसमें, अन्याय, शोषण व उत्पीड़न के अंधकार में जीवन एक दु:सह अभिशाप बन कर रह गया। ब्रिटिश प्रभुओं से प्राप्त अभयदान ने राजाओं को अपनी प्रजा पर कहर ढ़ाने की खुली छूट दे दी। इस युग में राजस्थान में सामन्ती व्यवस्था प्रजापीड़न, क्रूरता व मानवीय अध:पतन की पराकाष्ठा की प्रतीक बनकर रह गयी। एक जंगल राज की शुरुआत हो गई जिसमें रैयत राजाओं व उनके जागीरदारों का भक्ष्य बन गयी। गोरे प्रभुओं की चाटुकारिता मंे तल्लीन राजा व जागीरदार प्रजा की गर्दन पर सिंदवाद की कथाओं के बूढ़े की तरह सवार हो गए। जिन मेहनतकश लोगों के परिश्रम पर उनकी विलासिता का तांडव चल रहा था, वे तिहरी गुलामी के बोझ के नीचे दबकर सर्वथा असहाय हो गए। सामंती तत्त्वों के गर्हित आचरण के फलस्वरूप जागीरदारी प्रथा जुल्म का पर्याय बन गयी। रियासती प्रजा रूपी नींबू को इतनी निर्दयता से निचोड़ा गया कि उसके रेशे तक बाहर निकल आये। ये शोषक सामन्त इतने विवेकहीन हो चुके थे कि रैयत द्वारा की गई फरियाद को भी उन्होंने अपनी सत्ता के लिए चुनौती समझ कर निर्मम दमन का सहारा लिया। सामौर ने तत्कालीन परिस्थिति पर समग्रता से विचार किया। फलत: यह बात उनके सम्मुख दिन के उजाले की भाँति स्पष्ट हो गई कि 'मीठे ठग` अंग्रेजों की बनिया मनोवृति ही इसके लिए उत्तरदायी है। श्री अरविन्द के शब्दों में ''बनिया जब शासक बन जाता है तो सबसे बुरा शासक सिद्ध होता है।`` उदीयमान ब्रिटिश पूंजीवाद के हितों के संवर्धन के लिए स्वावलंबी भारतीय अर्थ व्यवस्था को तो अंग्रेजों ने चौपट किया ही और साथ ही राजनीतिक प्रभुत्व के विस्तार के लिए हर प्रकार के छल-छद्म का भी सहारा लिया। इन तथ्यों व उनके निहितार्थ का चित्रण सामौर ने अपने एक गीत में इस प्रकार किया है-
बिणज रौ नांव ले आया बण बापड़ा, तापड़ा तोड़िया राज तांईं
मोकौ पा मुगळां रौ माण जिण मारियौ, पोखो थां कुणकयां समझ कांईं
धोळ दिन देखतां नबाबी धपाई, संताई बेगमां अवधसाई
खोड़लां फौज हिंदवांण री खपाई, सफाई नांखौ मत सरम साई
धरा हिंदवांण री दाबर्या धकै सूं, प्रगट में लड़यां ई पार पड़सी
संकट में अेक हुय भेद मेटो सकळ, लोक जद जोस हूं जबर लड़सी

अंग्रेजों के अत्याचारों को उन्होंने सूक्ष्म दृष्टि से देखा था। अपनी वणिक वृत्ति से उन्होंने पूर्ववर्ती सभी आक्रान्ताओं को पीछे छोड़ दिया था। इस बात को रेखांकित करते हुए सामौर ने कहा कि अंगे्रज तो चंगेज खां से भी दो कदम आगे थे, क्योंकि-
महलज लूटण मोकळा, चढया सुण्या चंगेज।
लूटण झूंपा लालची, आया बस इंगरेज।।
सामौर अपनी निर्भयता व स्पष्टवादिता की दृष्टि से अद्वितीय हैं। अत: अंगे्रजों के विरूद्ध अपने आक्रोश के प्रकटीकरण व आत्म सम्मान को धता बताकर क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए उनकी चाटुकारिता करने वाले राष्ट्र द्रोही राजाओं व सामन्तों की भर्त्सना करते समय उनकी लेखनी ने आग्नेय रूप धारण कर लिया। राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाले सामौर के लिए कहा गया यह दोहा उनके जीवन का सार प्रस्तुत कर देता है-
शंकरियै सामौर रा गोळी जिसड़ा गीत।
मिंत ज साचा मुलक रा, विपुवां उलटी रीत।।
१८५७ का स्वतंंत्रता संग्राम और सामौर
विदेशी शासन के अभिशाप से देश को मुक्त कराने हेतु प्राणापण से सचेष्ट सामौर का तेजस्वी रूप १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूर्णता से प्रकट हुआ। वे सर्वतोभावेन इस महद् प्रयास की सफलता के लिए जुट गए। वे इस संग्राम की महत्ता को भली भाँति समझते थे। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए उन्होंने देशवासियों को उद्बोधन देते हुए स्पष्ट किया कि इस दुर्लभ अवसर को खो देने पर हिन्द की खोयी आजादी को प्राप्त करने का ऐसा मौका फिर नहीं आएगा, जैसे छलांग भरते समय एक बार चूक जाने पर हिरण फिर संभल नहीं पाता। यह छप्पय द्रष्टव्य है-
आयौ औसर आज, प्रजा पख पूरण पाळण
आयौ औसर आज, गरब गौरां रौ गाळण
आयौ औसर आज, रीत राखण हिंदवाणी
आयौ औसर आज, विकट रण खाग बजाणी
फाळ हिरण चूक्यां फटक, पाछौ फाळ न पावसी
आजाद हिन्द करवा अवर, औसर इस्यौ न आवसी
सामौर १८५७ के विप्लव के निहितार्थों को भली भाँति समझते थे। उनकी अन्तस्थ देश भक्ति इस समय प्रबल आलोड़न की अवस्था में थी। उनके दृष्टिपथ में समस्त भारत था। अत: इस संग्राम के साथ जुड़े सभी क्षेत्रों के छोटे-बड़े सभी योद्धाओं का उन्होंने स्तवन किया। तांत्या टोपे के तो वे प्रत्यक्ष संपर्क में आए थे और गाढ़े समय में टोपे की उन्होंने जो मदद की, वह इस प्रदेश के स्वाधीनता संघर्ष का स्वर्णिम अध्याय है। तात्या जैसे दुर्धर्ष योद्धा के अथक प्रयासों से वे अभिभूत थे। उनके अदम्य साहस व प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अविचल भाव से डटे रहने जैसे गुणों की सराहना में सामौर द्वारा रचित इस गीत से इस निजंधरी नायक के प्रति उनके अहोभाव की ऊर्मिया तरंगित होती हैं।
जठै गयौ जंग जीतियौ, खटके बिन रणखेत।
तकड़ौ जड़ियौ तांतियौ, हिंदथान रै हेत।।
मचायौ हिंद में आखी तहलको तांतियै मोटो
घोटो जेम घुमायौ लंक में हणूं घोर
रचायौ रूळंती राजपूती रौ आखरी रंग
जंग में दिखायौ सुवायौ अथाग जोर
हुय हतास राजपूती छंडियौ छत्रियां हाथ
साथ चंगौ सोधियौ दिक्खणी महासूर
बिड़द धार छतीसां वंस रौ रंण बांको बीर
नीर धारी हिन्द रौ बंचायौ सागी नूर
पळकती आकास बीज कठै ई जांवती पड़ै
छड़ै तांतियै री व्हैगी इसी ही छलांग
खळकती नंद्ंया रा खाळ मांय हूतो पाड़ खड़ै
लड़ै इणा विधी लाखां हूतं एकलांग
गीत में ''रचायौ रूळंती राजपूती रौ आखरी रंग`` और ''पळकती आकाश बीज कठै ई जांवती पड़ै`` जैसी पंक्तियाँ अप्रतिम योद्धा तात्या के सम्बन्ध में कवि के गहन अध्ययन को दर्शाती हैं। अरिदल पर उनके आक्रमण जिस तीव्रता व आकस्मिकता से होते थे, उस तथ्य का रूपक द्वारा वर्णन सुहृद्य बन पड़ा है।
१८५७ के विप्लव के आखिरी दौर में चारों ओर से निराश होने के पश्चात् तात्या टोपे मदद की आशा से शेखावाटी इलाके में आए। इस समय सामौर ने उनकी यथासंभव भरपूर मदद की। मदद के भरोसे तात्या लक्ष्मणगढ़ के किले के किले में घिर गए। वहाँ से किसी तरह निकलने के बाद कहीं पर भी सहायता न मिलती देखकर सामौर उन्हें अपने पैतृक गाँव बोबासर अपने भाई पृथ्वीसिंह सामौर के गढ़ में ले आए। इस पर क्रुद्ध हो अंगे्रेजों ने गढ़ को बारूद से उड़ा दिया। इस प्रकार सामौर ने केवल शब्दों द्वारा ही नहीं वरन् अपने कर्तव्य द्वारा भी क्रांतिधर्मा होने का प्रमाण दिया। उनके अंग्रेज विरोधी रुख की भारी कीमत बड़े भाई पृथ्वीसिंह ने चुकायी। इस बारे में स्वयं शंकरदान ने कहा-
गढ़वी पिरथीसिंह गुणी, गोरां मेट गरूर।
मरद तांतिये री मदत, की उण बेळ करूर।।
तांत्या की मदद करते हुए तो सामौर परिवार को अपना सब कुछ गंवाना पड़ा पर इस स्वातंत्र्य यज्ञ में अपनी आहुति देने वाले अन्य सेनानी भी सामौर की दृष्टि से ओझल नहीं हुए। झाँसी की रानी, अवध के सैनिकों व आऊवा ठाकुर कुशालसिंह के बलिदानों का स्तवन करने में भी वे अग्रणी रहे। लक्ष्मी बाई के अप्रतिम शौर्य व बलिदान को उन्होंने इस भाँति याद किया-
हुयौ जांण बेहाल, भाल हिन्द री भोम रौ।
झगड़ौ निज भुज झाल, लिछमी झांसी री लड़ी।।

इस तरह अवध राज्य के सैनिकों की सूरमाई व अंग्रेज विरोधी हलचल का बखान करते हुए लिखा-
फिरंगां तणी फजीत, करवा नै कस कस कमर।
जण जण बण जंगजीत, लड़या अवध रा लाडला।
इस विप्लव में राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता को सबसे गम्भीर चुनौती देने वाले आऊवा की घटनाएँ इस प्रदेश के स्वाधीनता संग्राम का सर्वाधिक रोमांचक अध्याय है। ब्रिटिश सत्ता को सर्वाधिक ध्यान आऊवा पर ही देना पड़ा उनके विरुद्ध किये गये तनी अभियना एवं तदुपरान्त भीषण प्रतिशोध की भावना से किया गया आऊवा का सर्वनाश इस बात को स्पष्ट करते हैं कि अंग्रेजों की दृष्टि में आऊवा की हल-चल कितनी खतरनाक थी। इस समय आऊवा द्वारा किये गये बलिदान को गौरवभाव से चित्रित करते हुए सामौर ने लिखा-
हुआ दुखी ंहिंदवाण रा, रुकी न गोरां राह।
विकट लड़यौ सहियो बिखौ, वाह आऊवा वाह।।
आऊवा ठाकुर खुशालसिंह को इस अभियान का नेतृत्व संभालने के फलस्वरूप भीषण आपदाओं से गुजरना पड़ा उनके बारे में सामौर कहते हैं- खेल्यौ रण में खाग हूं, जचकर जूझ्यौ जंग। दियौ सरब हित देश रै, रंग खुशाला रंग।
आऊवा की अगुआई में हुए संघर्ष में मारवाड़, बीकानेर, मेवाड़ एवं शेखवाटी के कई ठिकानों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था। आऊवा से निपटने के बाद अंग्रेजों ने इस सभी ठिकानों को ठिकाने लगाने पर ध्यान दिया।
१८५७ के विप्लव का सबसे दु:खद पहलू यह रहा कि राजस्थान के सभी रजवाड़े इस मुक्ति संग्राम से न केवल विलग रहे अपितु उसे कुचलने में भी अंग्रेजों का भरपूर सहयोग दिया। राष्ट्रभक्त शंकरदान को राजाओं के इस निंदनीय कृत्य से मरणान्तक व्यथा हुई।
गुलामी को खाद-पानी देने वाले इन राजाओं के प्रति सामौर के क्रोध का कोई पारावार नहीं था। अपनी रियासत बीकानेर के शासक सरदारसिंह भी इस दुष्कर्म के भागी थे। कवि ने इन सभी देशद्रोहियों की जमकर खबर ली। स्वातंत्र्य योद्धाओं का स्तवन करने वाली उनकी लेखनी ने अंग्रेज समर्थकों की भर्त्सना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बीकानेर रियासत के गोपाळपुरा, कणवारी तथा शेखावाटी के नवलगढ़, खेतड़ी, खण्डेला आदि ठिकाने भी उनके कोपभाजन बने क्योंकि इन ठिकानेदारों ने तात्या की मदद करने से उनके आग्रह को ठुकरा दिया था। अत्यन्त तीक्ष्ण शब्दशरों से उन्हें अंग्रेज भक्तों को बींध डाला। सरदारसिंह को धिक्कारते हुए कहा-
देख मरै हित देश रै, पेख सचौ रजपूत।
सरदारा तोनै सदा, कहसी जगत कपूत।।
खास बांधवां खीज, सैण गोरिया गिण सचा।
थूं बा`वै अेहड़ा बीज, फोग फोग फळ भोगसी।।

बीकानेर दरबार को मूर्ख मण्डली की संज्ञा देते हुए कवि ने कहा-
डफ राजा डफ मुसद्दी डफ ई देश दीवांण।
डफ ई डफ भेळा हुया, (जद) बाज्यौ डफ बीकांण।।

सरदारसिंह के उत्तराधिकारी डूंगरसिंह की अंग्रेज परस्ती के विरुद्ध सामौर के रोष की अभिव्यक्ति इस प्रकार हुई-
हो-छोगो हिंदवाण रौ, अडिग फिरंती आण।
पत्थर पाट बिराजतां, बटटौ लग्यौ बीकांण।।

तांत्या की मदद करने से इन्कार करने पर गोपाळपुरा के ठिकानेदार हमीरसिंह को उपालंभ देते हुए कहा-
तन मोटो मोटो तखत, मोटो वंश गंभीर।
हुयौ देश हित क्यूं हमैं, (थारौ) मन छोटो हम्मीर।।

इस वजह से खेतड़ी के शासक को इन शब्दों में फटकारा-
खेतड़ी मिळा दूं भेळी रेतड़ी
आकां ऊन ज्यूं उड़ा दूं हुर्र् फुर्र्।।

युगचेतना के उद्गाता जनकवि के रूप में-
सामौर ने राजस्थानी काव्य को एक नई भाव-भूमि पर खड़ा कर दिया। दरबारी संरक्षण में पनपी और फली-फूली कविता के सरोकार सर्वथा भिन्न थे। राजस्थान में ब्रिटिश प्रभुत्व के विस्तार ने ऐसे हालात पैदा कर दिये थे जिनमें आप व्यक्ति का जीवन दुस्वप्न में बदल गया। अभाव व भुखमारी जनता की नियति बन गये। सामौर के काव्य में विदेशी शासन के फलितार्थों के साथ ही जन साधारण की व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। झोंपड़ियों में रहने वाले राष्ट्र के मेरुदण्ड स्वरूप धरती पुत्रों की महिमा व कष्ट गाथा, दोनों को उन्होंने उजागर किया। उनकी रचना 'वगत बायरौ` में अंग्रजी शासन शोषणकारी प्रवृत्ति और उससे हतश्री सामान्य जनता की दशा का चित्रण हुआ है तो 'देश दर्पण` में देश वासियों को उठ खड़े होने के उद्बोधन के साथ साथ झोंपड़ियों को राष्ट्र का सच्चा शृंगार बताते हुए उनकी महत्ता को रेखांकित किया गया है। 'वगत वायरौ` हालात को समझने की उनकी विश्लेषणात्मक प्रतिभा का उत्तम उदाहरण है। अंग्रेजी अमल की अनुगूंज उसमें सुनाई पड़ती है। जन सामान्य की विपदाओं से सर्वथा उदासीन सत्ताधारी वर्ग को झिंझोड़ने वाले इस जनकवि की व्यथा इस प्रकार प्रकट हुइ है-
हुयगा सह हुक्काम, मिळ अंगरेजां हूं मुरख।
आज दुख्यारण आम, रैयत बापड़ी रामजी।।
रह्यौ सह्यौ रुजगार, अंगरेजां खोस्यौ अठै।
भूखी किण विध भार, रैयत झालै रामजी।।
सजा मुख मली सेज, नर सूवै हुय हुय निशंक।
बै कांटां रा बेझ, रै क्यूं जाणै रामजी।।
मुगळां खो निज मत्त, सहर बिगाड़या सांतरा।
गांवां री आ गत्त, अंगरेजां की रामजी।।

स्वामी विवेकानन्द ने बारम्बार इस बात पर बल दिया था कि देश के उद्धरण की आशा दीन-हीन सामान्य जनों से ही है। सामौर ने अपनी कृत 'देश दर्पण` में इसी तथ्य को रेखांकित किया है, जब वे कहते हैं-
धिन झूंपड़ियां रा घण्यां, भुज थां भारत भारत।
हो थे ई इण मुलक रा, साचकला सिणगार।।
झूंपड़िया रहसी जितै, इण धरती पर अेक।
मिनखपणौ रहसी मतै, छळी कपटियां छेक।

ये दोहे इस बात को प्रमाणित करते हैं कि 'शंकरदान की साम्राज्य विरोधी चेतना क्रम से जनवाद की ओर अग्रसर हुई। सामौर ने कविता को आधुनिक विचारधारा से जोड़कर एक नयी सम्भावना जगायी। अब तक चली आ रही साहित्यिक व सामाजिक मान्यताओं को तोड़ा। कविता को स्वतंत्रता व राष्ट्रीयता से जोड़ा। अंग्रेजों को मुल्क के 'मीठे ठग` करार देकर उन्हें निकाल बाहर करने हेतु एक होने का मूलमंत्र देकर कवि ने युगधर्म निभाया। अपने समकालीनों में यह आव्हान करने वाले सामौर अकेले थे-
मिळ मुसळमान, रजपूत ओ मरेठा, जाट सिख पंथ छंड जबर जुड़सी।
दौड़सी देश रा दबियौड़ा, दाकल कर, मुलक रा मीठा ठग तुरत मुड़सी।।
जिस समय अधिकांश कवियों की देशभक्ति की भावना अपनी रियासत की सीमाओं से जुड़ी हुई थी, सामौर की वाणी में जाति, धर्म और प्रान्तीयता का अतिक्रमण करती हुई राष्ट्र के नवविहान की सूचक स्वतंत्रता की शंखध्वनि सुनायी पड़ती है।
शंकरदान सही अर्थों में अग्निधर्मा कवि थे। उन्हें गोरी सत्ता के विद्रोही कवि, गोळी हंदा गीतों के कवि के रूप में याद किया जाता है। जब अन्य कवियों के स्वर में राष्ट्रीयता तुतला रही थी, तब उनके स्वर में उसका प्रचंड गर्जन था। राजस्थानी कविता के माध्यम से व्यक्त राष्ट्रीयता की भावना को व्यक्त करने वाले कवियों में वे पांक्तेय थे। उनके काव्य में राष्ट्र के प्रति गौरवभाव व निर्भयता पदे पदे लक्षित होती है। उनके समकालिनों द्वारा कहे गये मरसियों से यह बात प्रमाणित होती है। उदाहरण स्वरूप ये मरसिये-
नह जणजै जग में निलज, दीण-हीण दबकेल
बेमाता हेकण भळै, जण शंकर जबरैल
- गिरधारीसिंह गारबदेसर
सुण्यौ निधन सामौर रौ, चट आयी आ चींत
कुण दकाल कहसी अबैं, गोळी जेहड़ा गीत
मीठा ठग इण मुलक रा, नहचै हुवा नचींत
बीतौ शंकर बाहरू, मुलक तणौ दृढ़ मींत
- पाबूदान बारहठ फोगां
रह्यौ हितू बण रैंत रौ, लाग लपट सह तोड़
नान्हां मिनखां हित लड़यौ, मुलक तणौ सिर मोड़
- दयालदास सिंढ़ायच